वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५
पञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५
ओ३म्
अथ द्वितीयमाह्निकम्
आत्मा के अधिष्ठातृत्व में शरीर के अवयवों और उस से सम्बन्ध पाये
हुए मूसल आदि साधन विशेषों में प्रयत्नादि कारण से उत्क्षेपणादि कर्मों
का लक्षण और परीक्षा समाप्त हुई । इस अगले आह्निक में पृथिवी आदि
द्रव्यों में प्रेरणादि से उत्पन्न होने वाले गमन आदि कर्म की परीक्षा के लिये
प्रथम यह वर्णन करते हैं कि पृथिवी में अपने आप उत्पन्न होने वाला कर्म
(भूकम्प आदि) किस प्रकार होता है—
२०१-नोदनाभिघातात्संयुक्तसंयोगाच्च पृथिव्यां कर्म ॥ १ ॥
(नोदनाभिघातात्) प्रेरणा की चोट से (च) और (संयुक्तसंयोगात्)
संयुक्त पदार्थों के साथ संयोग से (पृथिव्याम्) पृथिवी में (कर्म) गमन और
भूकम्पादि क्रिया होती है ॥
पृथिवी में ऐसे द्रव्यों का संयोग विशेष है, जिन से उस का सूर्य के
साथ आकर्षण हो और वह गति क्रिया से युक्त होकर आगे को चले और
सूर्य की ओर आकर्षण के बल से उस की गति स्वयं अपनी परिक्रमा का
कारण आप ही बने और उस की गति से जो हिलोर और रगड़ उत्पन्न हो
उस से अपूर्व स्थानों में अपूर्व द्रव्यों का संयोग हो और उन संयुक्त द्रव्यों के
संयोग से उस का फटना वा हिलना वा कांपना इत्यादि क्रिया उत्पन्न होवें॥१॥
पृथिवी के अपनी और सूर्य की परिक्रमा करने रूप क्रिया का कारण
बतलाते हैं:—
२०२-तद्विशेषेणादृष्टकारितम् ॥ २ ॥
(तद्विशेषेण) पृथिवीस्थ पृथिवी की विशेषता से (तत्) वह गति
क्रिया (अदृष्टकारितम्) अदृष्ट आकर्षणशक्ति से कराई हुई है ॥ २ ॥
पृथिवी की क्रिया परीक्षित हो चुकी। अब जल की क्रिया की परीक्षा
करेंगे, उस का आरम्भ करते हैं:—
२०३-अपां संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ३ ॥
(अपाम्) जलों के (गुरुत्वात्) भारी होने से (संयोगाभावे) संयोग
न रहने पर (पतनम्) गिरना होता है ॥
१०० वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
अर्थात् ऊपर से छोड़ा हुवा जल, धारक पदार्थ के संयोग बिना भारी
होने से पृथिवी की आकर्षणशक्ति से पृथिवी पर गिर पड़ता है ॥ ३ ॥
२०४-द्रवत्वात् स्यन्दनम् ॥ ४ ॥
( द्रवत्वात् ) गीला और पतला होने से ( स्यन्दनम् ) नीचान में को
बहाव होता है ॥ ४ ॥
प्रश्न-यदि गीला और पतला होने से जल नीचे को बहता है तो फिर
समुद्र का जल मेघ में पहुंचने के लिये ऊपर कैसे चढ़ता है ? वह तो सदा
नीचे ही को बहना चाहिये ? उत्तर-
२०५-नाड्यवायुसंयोगादारोहणम् ॥ ५ ॥
( नाड्यवायुसंयोगात् ) सूर्यकिरण और वायु के संयोग से [ जलों का ]
( आरोहणम् ) ऊपर को चढ़ाव होता है ॥
इस सूत्र से यह भी ध्वनि निकलती है कि यदि किसी नाड़ी ( नली )
में गर्मी भरी जावे और वह वायु को ऊपर को फेंके और फिर नीचे नली
रिक्त होजावे तो अपने से छुए हुए पानी को ऊपर को खींचेगी ॥ ५ ॥
प्रश्न-सूर्य की किरण और वायु का संयोग के सिवाय कभी २ बिना
सूर्य की किरणों के भी पानी ऊपर को चढ़ता देखा जाता है, जैसे फ़ौवारे
में । सो क्यों ? उत्तर-
२०६-नोदनापीडनात् संयुक्तसंयोगाच्च ॥ ६ ॥
( नोदनापीडनात् ) धक्के और दबाव से ( च ) और ( संयुक्तसंयोगात् )
संयुक्त पदार्थ के संयोग से [ भी पानी ऊपर को उठता है ] ॥
२०७-वृक्षाभिसर्पणमित्यदृष्टकारितम् ॥ ७ ॥
( इति ) यह ( अदृष्टकारितम् ) अदृष्ट वृक्षस्थ जीव शक्ति का कराया
हुवा काम है कि ( वृक्षाभिसर्पणम् ) वृक्ष की ओर पानी का खिंच जाना ॥
वृक्ष की जड़ में दिया हुवा पानी जो ऊपर को वृक्ष के पत्र और शाखाओं
में पहुंच जाता है, उस का कारण वह अदृष्ट शक्ति है जो जीवित वृक्ष में
परमात्मा ने छिपी हुई रक्खी है ॥ ७ ॥ और-
२०८-अपां संघातो विलयनञ्च तेजःसंयोगात् ॥ ८ ॥
( अपाम् ) जल का ( संघातः ) जमाव ( च ) और ( विलयनम् ) गलकर
पतला होजाना ( तेजःसंयोगात् ) तेज के संयोग से होता है ॥
आकाश से जमे हुए पानी के ओले वर्षने में अथवा बर्फ़ जमाने की
कलों में पानी के जमजाने में कारण दिव्य तेज का संयोग है और फिर बर्फ़
से वा ओले से गलकर पानी होजाने का कारण लौकिक गर्मी का संयोग है ॥८॥
२०९-तत्र विस्फूर्जथुलिङ्गम् ॥ ९ ॥
( तत्र ) उस मेघमण्डल में ठहरे हुए जलों के जमाव में ( विस्फूर्जथुः )
बिजली की चमक और कड़क ( लिङ्गम् ) तेज की पहचान है ॥
यदि मेघ में दिव्यतेज का संयोग न होता तौ बिजली की चमक और
कड़क न पाई जाती । पाई जाती है, इस से जाना जाता है कि मेघस्थ जलों
में दिव्यतेज बिजली का संयोग है, जो जल के पतला रहने के कारण लौकिक
गर्मी को बल से बाहर फेंक देता है और जल को जमा देता है, जिस से
सघन जल के संयोग से पाषाणतुल्य कठिन शिला सी बन जाती हैं और वे
ही टूट २ कर ओले के रूप में वर्षती हैं । यही कारण बर्फ़ की कलों में है ।
फिर जब बिजली का प्रभाव बर्फ़ में से निकलता जाता है और उस के स्थान
में लौकिक गर्म वायु घुसता जाता है तब बर्फ़ पिघल कर फिर पतला पानी
हो जाता है ॥ ९ ॥ तथा-
२१०-वैदिकञ्च ॥ १० ॥
( च ) और ( वैदिकम् ) वेद का भी यही सिद्धान्त है ॥
“ गर्भोऽस्योषधीनां गर्भोवनस्पतीनाम् ।
गर्भोविश्वस्य भूतस्याग्ने गर्भो अपामसि ” ॥
( यजुः १२-३७ )
अर्थ-अग्नि ओषधियों का गर्भ है, वनस्पतियों का गर्भ है, सब भूत
मात्र का गर्भ है ( और ) “ जलों का गर्भ= भीतर रहने वाला है ” ॥
इसी प्रकार-
“गर्भोयो अपां गर्भोवनानां गर्भश्च स्थातां गर्भश्चरथाम् ।
अद्रौ चिदस्मा अन्तर्दुरोणे विशां न विश्वो अमृतः स्वाधीः” ॥
( ऋ० १ । ७० । २ )
अर्थ-जो जलों के गर्भ में रहता है, वनस्थ वनस्पतियों के गर्भ में रहता
है और स्थावर जङ्गम के गर्भ में रहता है और पहाड़ों के नीचे दुर्गम छिपे
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१०२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
स्थान में रहता है, जैसे कि प्रजाओं में स्वतन्त्र असृत सर्वत्र वर्त्तमान है (वह
अग्नि है) ॥ इसी प्रकार-
“ गर्भो अस्योषधीनां गर्भोहिमवतामुत ।
गर्भोविश्वस्य भूतस्येमं मे अगदं कृधि ” ॥
( अथर्व ६ । १० । ५३ । ३ )
अर्थ-( अग्नि ) ओषधियों का गर्भ है और बर्फीले पर्वतों का गर्भ है।
सब भूतमात्र का गर्भ है, ( वह ) इस मेरे नैरोग्य को करे ॥ तथा-
“ अग्निमूर्द्धा दिवः ककुत्पतिः पृथिव्या
अयम् । अपां रेतांसि जिन्वति ” ॥
( साम उ० १ । ३ । ९)
अर्थ-यह अग्नि ऊपर को जाने वाला द्युलोक की टाट है तथा पृथिवी
और जलों के कणों को जोड़ता और पिंघलाता है ॥
इस प्रकार वेद में अन्य भी अनेक मन्त्र हैं जो जल के जमने और पिंघलने
में दिव्य और लौकिक अग्नि को कारण बताते हैं ॥ १० ॥
आगे बिजली की चमक का कारण बतलाते हैं-
२११-अपां संयोगाद्विभागाच्च स्तनयित्नोः ॥ ११ ॥
( अपाम् ) तेज को गर्भ में लिये हुए जलों के ( संयोगात् ) संयोग से
( च ) और ( विभागात् ) विभाग से ( स्तनयित्नोः ) बिजली की उत्पत्ति
चमक और कड़क होती है ॥
आकाश में बिजली की चमक और कड़क का कारण मेघस्थ जलों,
बिजलियों और वायुओं की आपस में रगड़ है ॥ ११ ॥
आगे अग्नि और वायु की क्रियाओं की परीक्षा को पृथिवी की क्रिया
की परीक्षा में अन्तर्गत होना कहते हैं-
२१२-पृथिवीकर्मणा तेजःकर्म वायुकर्म च व्याख्यातम् ॥ १२॥
(पृथिवीकर्मणा) पृथिवी की क्रिया के साथ (तेजःकर्म) तेज की क्रिया
(च) और (वायुकर्म) वायु की क्रिया का ( व्याख्यातम् ) व्याख्यान हो
चुका समझो ॥
प्रजिस कार पृथिवी में प्रेरणा बादि से क्रिया उत्पन्न होती है इसी
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