वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
महर्षि कणाद द्वारा
स्रोत: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 160 में से
संदर्भ में पढ़ेंपञ्चमोऽध्याय २ आह्निक ९५
ओ३म्
अथ द्वितीयमाह्निकम्
आत्मा के अधिष्ठातृत्व में शरीर के अवयवों और उस से सम्बन्ध पाये
हुए मूसल आदि साधन विशेषों में प्रयत्नादि कारण से उत्क्षेपणादि कर्मों
का लक्षण और परीक्षा समाप्त हुई । इस अगले आह्निक में पृथिवी आदि
द्रव्यों में प्रेरणादि से उत्पन्न होने वाले गमन आदि कर्म की परीक्षा के लिये
प्रथम यह वर्णन करते हैं कि पृथिवी में अपने आप उत्पन्न होने वाला कर्म
(भूकम्प आदि) किस प्रकार होता है—
२०१-नोदनाभिघातात्संयुक्तसंयोगाच्च पृथिव्यां कर्म ॥ १ ॥
(नोदनाभिघातात्) प्रेरणा की चोट से (च) और (संयुक्तसंयोगात्)
संयुक्त पदार्थों के साथ संयोग से (पृथिव्याम्) पृथिवी में (कर्म) गमन और
भूकम्पादि क्रिया होती है ॥
पृथिवी में ऐसे द्रव्यों का संयोग विशेष है, जिन से उस का सूर्य के
साथ आकर्षण हो और वह गति क्रिया से युक्त होकर आगे को चले और
सूर्य की ओर आकर्षण के बल से उस की गति स्वयं अपनी परिक्रमा का
कारण आप ही बने और उस की गति से जो हिलोर और रगड़ उत्पन्न हो
उस से अपूर्व स्थानों में अपूर्व द्रव्यों का संयोग हो और उन संयुक्त द्रव्यों के
संयोग से उस का फटना वा हिलना वा कांपना इत्यादि क्रिया उत्पन्न होवें॥१॥
पृथिवी के अपनी और सूर्य की परिक्रमा करने रूप क्रिया का कारण
बतलाते हैं:—
२०२-तद्विशेषेणादृष्टकारितम् ॥ २ ॥
(तद्विशेषेण) पृथिवीस्थ पृथिवी की विशेषता से (तत्) वह गति
क्रिया (अदृष्टकारितम्) अदृष्ट आकर्षणशक्ति से कराई हुई है ॥ २ ॥
पृथिवी की क्रिया परीक्षित हो चुकी। अब जल की क्रिया की परीक्षा
करेंगे, उस का आरम्भ करते हैं:—
२०३-अपां संयोगाभावे गुरुत्वात् पतनम् ॥ ३ ॥
(अपाम्) जलों के (गुरुत्वात्) भारी होने से (संयोगाभावे) संयोग
न रहने पर (पतनम्) गिरना होता है ॥