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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

प्रारंभिक पृष्ठ एवं स्पन्द-दर्शन भूमिका

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स्पन्दकारिका
भट्टकल्लट-क्षेमराज-उत्पलाचार्य-रामकण्ठार्य-प्रणीता ‘स्पन्दकारिकावृत्ति’
‘स्पन्दनिर्णय’-‘स्पन्दप्रदीपिका’-‘स्पन्दकारिकाविवृति’-निबन्धेभ्यः
‘सरोजिनी’ हिन्दीव्याख्यासहिता
व्याख्याकार
डॉ. श्यामाकान्त द्विवेदी ‘आनन्द’
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
वाराणसी

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॥ श्रीः ॥
चौखम्बा सुरभारती ग्रन्थमाला
३७०
— ❖ —
स्पन्दकारिका
भट्टकल्लट-क्षेमराज-उत्पलाचार्य-रामकण्ठाचार्य-प्रणीता 'स्पन्दकारिकावृत्ति-
'स्पन्दनिर्णय'-'स्पन्दप्रदीपिका'-'स्पन्दकारिकाविवृति'-निष्कर्षरूपा
'सरोजिनी' हिन्दीव्याख्यासहिता
व्याख्याकार
डॉ० श्यामाकान्त द्विवेदी 'आनन्द'
एम.ए., एम.एड., व्याकरणाचार्य,
पीएच्.डी., डी.लिट्.
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
वाराणसी

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प्रकाशक
चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन
( भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के प्रकाशक तथा वितरक )
के० 37/117, गोपालमन्दिर लेन
पो० बा० नं० 1129, वाराणसी 221001
फोन : 2335263
2333371
सर्वाधिकार सुरक्षित
प्रथम संस्करण 2004
मूल्य 400.00
अन्य प्राप्तिस्थान
चौखम्बा संस्कृत प्रतिष्ठान
38 यू . ए . बंगलो रोड, जवाहरनगर
पो० बा० नं० 2113
दिल्ली 110007
फोन : 23856391
*
प्रधान वितरक
चौखम्बा विद्याभवन
चौक ( बैंक ऑफ बड़ौदा भवन के पीछे )
पो० बा० नं० 1069, वाराणसी 221001
फोन : 2420404
कम्प्यूटर टाइप सेटर : मुद्रक :
चित्तरञ्जन कम्प्यूटर वर्क्स ए० के० लिथोग्राफर
नई दिल्ली दिल्ली

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The
CHAUKHAMBA SURBHARATI GRANTHAMALA
370
❖ * ❖
SPANDAKĀRIKĀ
OF
Bhaṭṭakallaṭācārya
Edited With
'Sarojinī' Hindi Commentary
By
Dr. SHYAMAKANTA DWIVEDI 'ANAND'
M.A., M.Ed., Vyakaranacharya,
Ph.D., D.Lit.
卐 स्वाध्यायान्मा प्रमदितव्यम् 卐 चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन, वाराणसी
CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
VARANASI

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Publishers:
© CHAUKHAMBA SURBHARATI PRAKASHAN
(Oriental Publishers & Distributors)
K. 37 / 117, Gopal Mandir Lane
Post Box No. 1129
VARANASI 221001
Telephone $ : 2335263
: 2333371 $
First Edition
2004
Also can be had of
CHAUKHAMBA SANSKRIT PRATISHTHAN
38 U. A. Bungalow Road, Jawaharnagar
Post Box No. 2113
DELHI 110007
Telephone : 23856391
*
CHOWKHAMBA VIDYABHAWAN
Chowk, ( Behind Bank of Baroda Building )
Post Box No. 1069
VARANASI 221001
Telephone : 2420404


Computer Type-setters : | Printers :
Chittaranjan Computer Works | A. K. Lithographers
New Delhi | Delhi

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वक्तव्य
वैश्विक धरातल पर भारतीय दर्शन की जो अपनी पहचान है वह मुख्यतया
'योगशास्त्र', तन्त्रशास्त्र एवं अद्वैतवादी वेदान्त या अद्वैतप्राण दृष्टि को लेकर है। भारतीय
दर्शनों पर जितने भी ग्रन्थ लिखे गए उनमें मुख्यतया चार्वाक, सांख्य, योग, वेदान्त,
न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, जैन एवं बौद्ध दर्शनों पर ही प्रकाश डाला गया। तान्त्रिक
दर्शन को स्वतन्त्र दर्शन मानकर उस पर स्वतन्त्र रूप से प्रकाश नहीं डाला गया।
आचार्य बलदेव उपाध्याय एवं डॉ० उमेश मिश्र ने उनको यह स्थान दिया तो, किन्तु
तान्त्रिक दर्शन की मूलभूत दृष्टियों, विशिष्ट सिद्धान्तों, मौलिक स्थापनाओं एवं भारतीय
दर्शनों में उनके मूल्यांकन, महत्त्व एवं स्थान के सन्दर्भ में विशेष प्रकाश नहीं डाला।
तान्त्रिक दृष्टि एवं उसकी स्थापनाएँ वैदिक काल से अद्यतन काल तक समस्त दार्शनिक
सम्प्रदायों, दर्शनों एवं मतों को प्रभावित करती रही हैं। किन्तु फिर भी भारतीय दर्शनों
पर ग्रन्थ लिखने वाले लेखकों ने उनकी उपेक्षा की है।
मैंने इसी अक्षम्य उपेक्षा को दृष्टि में रखकर केवल तन्त्र (आगम) शास्त्र को ही
अपने लेखन का विषय चुना। जहाँ तक अद्वैतवाद की बात है इसके विभिन्न प्रस्थान एवं
विभिन्न प्रकार हैं; यथा—(१) शब्दाद्वैतवाद, (२) ब्रह्माद्वैतवाद, (३) शांकर अद्वैतवाद,
(४) शून्याद्वैतवाद, (५) विज्ञानाद्वैतवाद, (६) द्वैताद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैत-
वाद आदि। किन्तु इन सबसे पृथक् त्रिक दर्शन का 'द्वयात्मक अद्वैतवाद' (ईश्वराद्वय-
वाद, विमर्शप्रकाशात्मक अद्वयवाद) भी है। काश्मीर का अद्वैतवादी शैव दर्शन (त्रिक
दर्शन) 'स्पन्ददर्शन' एवं 'प्रत्यभिज्ञादर्शन' की दो मुख्य धाराओं में विभाजित है। इन
दोनों दार्शनिक धाराओं का मूल उत्स 'शिवसूत्र' है।
प्रस्तुत ग्रन्थ स्पन्दकारिका, स्पन्दसूत्र या स्पन्दशास्त्र एक ही ग्रन्थ के विभिन्न
अभिधान हैं। आचार्य क्षेमराज ने 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहा है कि शिलोत्कीर्णा,
स्वप्नदृष्ट शिवोपनिषद्स्वरूप शिवसूत्रों को हृदयंगम करके काश्मीरी शैवाचार्य वसुगुप्त ने
इन्हें भट्टकल्लट आदि शिष्यों को पढ़ाया और शिवसूत्रों की व्याख्या के रूप में (वसुगुप्त
ने) (अपने शिष्यों को) जो उपदेश दिया और इन अपने उपदेशों को पुस्तकाकार संगृहीत
किया वही शिवसूत्रोद्भावित एवं संगृहीत उपदेश-ग्रन्थ 'स्पन्दकारिका' है—
'इमानि शिवोपनिषत् संग्रहरूपाणि शिवसूत्राणि ततः समासासाद। एतानि च सम्यक्
अधिगम्य भट्टश्रीकल्लटाद्येषु सच्छिष्येषु प्रकाशितवान् स्पन्दकारिकाभिश्च संगृहीतवान् ॥१
आचार्य उत्पल ने 'स्पन्दप्रदीपिका' में कहा है कि—'स्पन्द' ज्ञरूप है। शक्तियों
का ईश्वर है और उसी के संकल्प से लय-उदय दोनों हुआ करते हैं ऐसे स्वबल एवं
१. आचार्य क्षेमराज—'शिवसूत्रविमर्शिनी'।

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६ स्पन्दकारिका
ज्ञरूप 'स्पन्द' की मैं वन्दना करता हूँ—
यत् परापरभूस्पर्शि यत्संकल्पलयोदयौ
स्पन्दसंज्ञं ज्ञरूपं तच्छक्तीशं स्वबलं नुमः ॥१
अद्वैतवादी वेदान्ती शंकराचार्य की दृष्टि में 'ब्रह्म' (परा सत्ता) क्रियाहीन है—
निष्क्रिय है अतः क्रिया भी पारमात्मिक सत्य नहीं प्रत्युत् माया का कार्य होने के कारण
असत् है । समस्त विश्व-व्यापार (सृजन एवं अन्य व्यापार माया की 'आवरण' एवं
'विक्षेप' शक्तियों का व्यापार) माया के व्यापार हैं ।
मायावादी शंकराचार्य का 'मायावाद' ही निःशेष विश्व व्यापार एवं अशेष क्रियाओं
का मूलाधार है और इसलिए जगत, जगत के व्यापार, सृजन आदि समस्त क्रियाएं माया
स्पन्दतत्त्व का स्वरूप— शक्ति के गर्भ में स्थित शक्तिरूप
अस्फुट जगत (कारण जगत)
— परमशिव
म
र शि
स्पंद क्रिया शक्ति
(अहं ज्ञान शक्ति
प व इच्छा शक्ति
प्रत्यवमर्श) आनन्द शक्ति
(शिव का चिति
सिसृक्षात्मक सूक्ष्म
संकल्प ही
किंच्चलनात्मक
'स्पन्द' है ।)
चितिशक्ति आनन्दशक्ति इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति
| | | | |
चिति आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया
शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति
जगत 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं'
जगदाभास 'शक्ति' का विश्वाकारित विराट
स्थूल जगत (बाह्य) रूप = स्थूल जगत,
शिव का विमर्श ही 'शक्ति' है
और जगत इसी शक्ति का
'प्रचय' है ।
१. स्पन्दप्रदीपिका ।

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वक्तव्य ७
हैं—मिथ्या हैं—मृगमरीचिका हैं—(१) 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' (२) 'यद्दृष्टं तन्नष्टं' ।
'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' सृष्टि 'माया' करती है निर्गुण, निराकार एवं निष्क्रिय ब्रह्म नहीं ।
इसीलिए शांकर वेदान्त को 'शान्तब्रह्मवाद' कहा गया है ।
'स्पन्दशास्त्र' के 'ईश्वराद्वयवाद' में परमशिव इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया, तिरोधान एवं
अनुग्रह—इन पाँचों क्रियाओं का निष्पादक होने के कारण 'पंचकृत्यकारी' कहा गया है ।
इसीलिए स्पन्द के अद्वैत को द्वयात्मक अद्वयवाद कहा जा सकता है । परमशिव
'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय' दोनों हैं । परमशिव निर्गुण, निष्क्रिय, निराकार एवं विश्वोत्तीर्ण
होते हुए भी अपनी स्वाभिन्न एवं स्वसमवेत 'स्पन्दशक्ति', 'स्वातन्त्र्यशक्ति' या पाँच
शक्तियों के साथ तादात्म्यभावापन्न होने के कारण पंचकृत्यकारी 'भी है । 'स्पन्द' ही
परमशिव का 'हृदय', 'सार', 'विमर्श' एवं 'शक्ति' है । 'स्पन्द' परमात्मा का क्रियापक्ष
है । इसी के द्वारा परमशिव 'स्वतन्त्र' हैं और इसी के द्वारा स्पन्दशास्त्र का 'स्वातन्त्र्यवाद'
जीवित है ।
शिव के इसी शक्ति पक्ष (क्रिया पक्ष) को प्राधान्य देकर 'स्पन्दशास्त्र' प्रवृत्त हुआ है ।
'शक्ति' शिव का ही अपना एक दूसरा पक्ष है । शिव 'प्रकाश' हैं और शक्ति 'विमर्श' है ।
श्री सम्प्रदाय इन्हें ही 'समय' एवं 'समया' या 'कामेश्वर' एवं 'कामेश्वरी कहता है ।
'स्पन्दकारिका' स्पन्दशास्त्र का अन्यतम ग्रन्थ है तथापि अद्यप्रभृति इसकी हिन्दी
टीका (अन्य संस्कृत टीकाओं की व्याख्याओं को अन्तर्गर्भित करके) प्रकाशित नहीं हुई
थी । इस अभाव को पूरा करने के लिए मैंने इस अनुभूति-प्रवण एवं साधना-प्रधान ग्रन्थ
की व्याख्या की है और विद्वानों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
भारतीय संस्कृति के परमानुरागी माननीय प्रकाशक, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन,
वाराणसी, महोदय ने यदि मुझे इसके लिए उत्प्रेरित न किया होता एवं प्रकाशन की
इच्छा व्यक्त नहीं की होती तो इसका प्रकाशन तो दूर इसका प्रणयन ही संभव न हो
पाता । अतः मैं माननीय व्यवस्थापक—चौखम्बा सुरभारती वाराणसी—का अत्यन्त
आभारी हूँ कि वे भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन एवं साधना के
लिए उपयोगी इन गुप्त एवं गुह्य ज्ञान-भण्डार के अप्रतिम आर्ष ग्रन्थों को प्रकाशित करने
हेतु प्रयत्नशील हैं । प्रकाशनों की उसी श्रृंखला में 'स्पन्दकारिका' भी एक है ।
इस रचना के प्रकाशन के माध्यम से भारतीय दर्शन एवं भारतीय आर्ष चिन्तन के
इन सिद्धान्तों की ओर जनता एवं पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया गया
है कि जगत दुःखमय नहीं आनन्दमय है और—
(१) जगत जड़ नहीं चिन्मय है । सब कुछ चिन्मय है—कोई भी वस्तु जड़ है ही
नहीं 'सर्वं चिन्मयं विश्वे' ।
(२) जगत शिव की विमर्श शक्ति का विकसित (व्यक्त) रूप है ।
(३) जगदाभास न तो नव्योत्पत्ति है और न तो संहार विषय है । जगत तो
'संवित् तत्त्व' का रूपान्तर है । वह उत्पन्न नहीं प्रकट होता है । प्रलय के समय भी जगत
शक्ति में सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है । जगत का शक्ति एवं शिव दोनों के साथ

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८ स्पन्दकारिका
शक्ति में सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है। जगत का शक्ति एवं शिव दोनों के साथ
तादात्म्य है। जगत न तो जड़ परमाणुओं का संघात है और न तो पूर्व कर्मों के भोग का
या संसरण की संरचना है। यह शिव की आनन्द क्रीड़ा है—यह परम शिव की स्वेच्छा
रूप तूलिका द्वारा आत्मा के पट पर बनाया गया चित्र है—यह क्रीड़ाराम है—क्रीडनक
है—शिव के अहं को व्यक्त करने का माध्यम है—'शक्ति' के स्वरूप का उल्लास है—
शिव का आनन्दोल्लास है—शिव की आत्म-स्वरूप दिदृक्षा है एवं शिव का विनोद है।
(४) 'परमशिव' निष्क्रिय एवं उदासीन (शान्त) ब्रह्म नहीं है प्रत्युत पञ्चकृत्यकारी
परमात्मा है और 'शक्ति' उसी शिव का अपना विमर्श है—आत्मपरामर्श है—प्रत्यविमर्श
है।
शिव शांकर अद्वैत का अद्वयतत्त्व नहीं है प्रत्युत् शक्ति के साथ सामरस्यापन्न,
द्वयात्मक अद्वैत है। बंधन भी बंधन नहीं और मुक्ति भी मुक्ति नहीं, प्रत्युत अवरोहण एवं
आरोहण का स्वकल्पित अभिनय है—एक क्रीडा है। यहाँ का अद्वैत मिथुनात्मक,
दाम्पत्यात्मक, संघट्टात्मक, युगलभावात्मक एवं सामरस्यात्मक है।
(५) यहाँ मुक्ति 'सामीप्य', 'सालोक्य', 'सार्षि' एवं 'सायुज्य' नहीं है। प्रत्युत्
जीते जी मुक्ति है—'जीवन्मुक्ति' है न कि 'विदेहमुक्ति'।
(६) साधना के मार्गों में ज्ञान-भक्ति-योग इन तीनों का मणिकांचन योग ही
उपादेय है। 'भक्ति' भी वही वरेण्य है जिसे 'अद्वैतभक्ति' कहते हैं। शिव के साथ
अभेदात्मकता की अनुभूति ही यथार्थ ज्ञान है और यह अनुभूत्यात्मक ज्ञान ही 'मुक्ति' है।
'भक्ति' का वह प्रकार जो 'वैधी', 'गौणी' आदि रूप वाली है या 'साधन भक्ति है
स्पृहणीय नहीं है—'ज्ञानोत्तरा भक्ति' ही अभीष्ट है।
यदि देश को शक्तिशाली बनाना है तो 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' के शक्ति सिद्धान्त
एवं शक्ति-साधना का आत्मीकरण करना आवश्यक है।
'शिवोऽहं', 'शिवोऽहं', 'अहं देवी न चान्योस्मि', 'न सावस्था न यः शिवः' आदि
को आत्मसात करके जीव को शिव बनाने की साधना का प्रवर्तन करने वाले आचार्य
वसुगुप्त को शतशः नमन करते हुए मैं प्रकाशक महोदय को पुनः धन्यवाद देना चाहता
हूँ कि उन्होंने 'स्पन्दकारिका' प्रकाशित करने का सत्संकल्प रूपायित कर दिया।
श्यामाकान्त द्विवेदी 'आनन्द'

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विषयानुक्रमणिका
भूमिका खण्ड
परिचय एवं पृष्ठभूमि
पृष्ठाङ्क
[१] काश्मीरीय शैवाद्वैत एवं स्पन्दमत १४
[२] स्पन्दसूत्र एवं स्पन्द १६
[३] स्पन्द १८
स्पन्दसूत्र एवं शिवसूत्र २१
शैव दर्शन एवं उसकी साम्प्रदायिक परम्परा २१
स्पन्दशास्त्र और उसके सिद्धान्त २४
१. सर्वशक्तिवाद २५
२. अजातिवाद एवं उदयवाद २६
३. क्रीडावाद २६
४. संकल्पसृष्टिवाद २७
५. इच्छासृष्टिवाद २७
६. स्वातंत्र्यवाद २७
७. द्वयात्मक अद्वयवाद २७
८. सर्वविमर्शवाद २७
९. स्वस्वभाववाद २८
१०. अद्वैतवाद २८
स्वस्वरूपवाद ३०, अनुग्रहवाद ३०, संकल्पवाद ३२, भोगापवर्ग-
साहचर्यवाद ३३, जीवन्मुक्तिवाद ३४, सर्वचैतन्यवाद ३४, सर्व-
चिन्मयतावाद ३४, विश्वात्मवाद ३५, सर्वात्मवाद ३५, क्रीडावाद
३८, लीलावाद, चित्रवाद ३८, अहंतावाद ३८, लीलात्मक
विनोदवाद ३९, स्वभाववाद ३९, सर्वात्मवाद ३९, अहन्तावाद
३९, नादसृष्टिवाद ४५, सर्वशिववाद ४५, अद्वैतवादी काश्मीरीय
शैव दर्शन का उद्देश्य ४५, सर्वात्मवाद ४६, इच्छा-ज्ञान-क्रियाभेद-
वाद ४६, शब्दसृष्टिवाद ४६, वाक्तत्त्व अहन्ता एवं विश्व में तादात्म्य
४९, नादसिद्धान्त ४९, अद्वैतवादी दृष्टि का वैलक्षण्य ५०

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१० स्पन्दकारिका
[ ४ ] शिव और शक्ति ५०
शिव की शक्तियाँ ५१
स्वातन्त्र्यवाद ५२
[ ५ ] जीवतत्त्व ५२
आत्मा पर चढ़े हुए पंचावरण एवं वाग्योग ५३
[ ६ ] सृष्टिविधान जगत् का उपादान ५७
शब्दसृष्टिवाद ५९
[ ७ ] साधनान्तर्गत आत्म चैतन्य की विविध अवस्थायें एवं मोक्ष के उपाय ६२
[ ८ ] बन्धन और मुक्ति ७८
[ ९ ] अद्वैत भक्ति ७९
[ १०] मन्त्रविज्ञान और स्पन्दशास्त्र ८२
मन्त्र और आत्मबल की प्राप्ति का अन्तर्सम्बन्ध ८४
अवस्थाएँ, शून्य विषुव, ९ चक्र, मन्त्रार्थ, अहं ८७
[११] मन्त्र और नाद ८८
मन्त्र के अङ्ग ९१
मन्त्र और उसके विभिन्न अर्थ ९२
मन्त्र शक्ति एवं उसका स्वरूप ९६
ग्रन्थ खण्ड
स्पन्दकारिका
१. स्पन्दकारिका का अध्यायीकरण २
२. सूत्रों की अनुक्रमणिका ३
३. विशेष ध्यातव्य ५
प्रथम निष्यन्द—स्वरूपस्पन्द निष्यन्द ६
इच्छासृष्टिवाद ७, संकल्पसृष्टिवाद ८, अनेकात्मकता एवं एकात्मकता
में सामरस्य ८, जड़चेतन अभेदवाद ९, शक्ति-शक्तिमान में
अभेदात्मकता ९, सर्वात्मवाद १०, स्पन्द-सिद्धान्त ११, स्पन्द
नामकरण ११, स्पन्दशास्त्र का विषय एवं स्वरूपस्पन्द शब्द की
सोद्देश्यता ११, स्वरूपस्पन्द नामकरण की सार्थकता १२, शिव
विश्वात्मा १३, स्वरूपस्पन्द १५
स्पन्दकारिका के प्रतिपाद्य विषय
१. शक्ति-विशिष्ट शङ्कर की वन्दना १८
२. स्पन्द तत्त्व का स्वरूप ५५

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विषयानुक्रमणिका ११
३. आत्मा की सभी अवस्थाओं में अविचल एकरूपता ७८
४. समस्त अवस्थाओं एवं मनोदशाओं में एक ही स्पन्दतत्त्व
की अनुस्यूतता ९१
५. पारमार्थिक तत्त्व का स्वरूप १०७
६-७. शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आन्तर शक्ति चक्र के
साथ अचेतन इन्द्रियों को भी चैतन्य प्रदान किए जाने
का प्रतिपादन ११५
८. आत्मबल प्राप्त होने पर 'पशु' भी 'पशुपति' बन जाता है १२५
९. क्षोभावसान से परमपद की प्राप्ति का प्रतिपादन १३३
१०. क्षोभ के विलीन हो जाने पर मितात्मा का सर्वज्ञातृत्व एवं
सर्वकर्तृत्व १६६
११. 'स्वस्वभाव' की सर्वव्यापकता के साक्षात्कार के कारण योगी
की संसरण से मुक्ति १७३
१२-१३. अभावब्रह्मवाद शून्यात्मवाद तथा सर्वशून्यवाद की अयथार्थता १८०
१४. स्पन्द तत्त्व की दो अवस्थायें १९३
१५. जड़ समाधि में अवस्थित अबुध योगी की अभावात्मक
मिथ्यानुभूति १९७
१६. अन्तर्मुख चेतन सत्ता के सार्वकालिक अस्तित्व एवं नित्यता
का प्रतिपादन २०४
१७. सुप्रबुद्ध एवं प्रबुद्ध योगियों में चिद्रूप स्वभाव की अनुभूतियों
के भेद २०८
१८. विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप २१४
१९. गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पंद का अन्तर्सम्बन्ध २२२
२०. विशेष स्पंदों के लक्षण और प्रभाव २२८
२१. जाग्रत अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय २३२
२२. स्पन्द का स्वरूप-लक्षण २३९
२३-२५. मूढ़ एवं प्रबुद्ध साधकों की अवस्थाओं की तुलना २४७
द्वितीय निष्यन्द—सहजविद्योदय निष्यन्द २६२
२६. स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि २६२
२७. मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता २६९

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१२ स्पन्दकारिका
२८-२९. पशुप्रमाता एवं पतिप्रमाता में साम्य एवं सभी अवस्थाओं
शिवत्व की व्यापकता २७२
३०. जीवन्मुक्ति का स्वरूप एवं विश्व के साथ ऐकात्म्य-प्रतिपत्ति २८४
३१-३२. तदात्मता महासमापत्ति २९०
तृतीय निष्यन्द—विभूतिस्पन्द निष्यन्द
३३-३४. योगियों की यथाकांक्षित अभीष्टों की तत्काल सिद्धि ३०४
३५. योगी के स्वरूपस्थित न रहने के परिणाम ३१५
३६-३७. स्वबल का महत्त्व ३१६
३८. स्पन्दात्मक आत्मबल की शक्ति ३२२
३९. स्पन्दतत्त्व के समावेश से अधिगत शक्तियाँ ३२५
४०. ग्लानि और उसकी निवृत्ति ३२९
४१. उन्मेष का स्वरूप ३३३
४२. यौगिक सिद्धियाँ और उन्मेषानुशीलन ३३७
४३. प्रत्येक भाव में स्पन्दात्मक स्वरूप की अनुभूति द्वारा
प्रथमाभास ३४२
४४. प्रत्येक भाव में स्वस्वरूप की व्यापकता की अनुभूति
करने विषयक योगोपदेश ३४६
४५. पशु कौन है? शाब्दी प्रभाव से पशुत्व प्राप्ति ३५१
४६. विकल्पात्मक ज्ञान परामृतरस एवं स्वातन्त्र्य दोनों से
वंचित होना ३६२
४७. स्वरूपाच्छादन और उसके कारण ३७४
४८. शिव की क्रियात्मिका शक्ति के कार्य ३८०
४९-५०. संसरण के कारण और पुर्यष्टक की भूमिका ३९०
५१. भोक्तृभाव एवं चक्रेश्वरत्व की प्राप्ति ३९८
५२-५३. गुरुवाणी की वन्दना एवं भट्टकल्लट द्वारा स्पन्दकारिका के
प्रणयन की पुष्टि ४१०

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भूमिका खण्ड
परिचय एवं पृष्ठभूमि
अन्तस्थल में निस्पन्द सिन्धु के वक्षस्थल पर तरंगात्मक स्पन्दन की भाँति निस्पन्द
परमशिव को स्पन्दित करने वाली उनकी स्वात्मरूपा शक्ति ‘स्पन्द’ है। ‘स्पन्द’ शिव का
अपना ‘धर्म’ है—‘स्वभाव’ है—‘शक्ति’ है—‘हृदय’ है—‘ऊर्मि’ है—‘विमर्श’ है
और ‘स्वातंत्र्य’ है।
‘स्पन्द’ को कहीं ‘शिव की शक्ति’ कहा गया है और कहीं उसे स्वयं ‘शिव’ कहा
गया है यथा— स्पन्दः सामान्यपूर्वश्च शुद्धात्माशांकरः शिवः ।१
किन्तु इसे ‘भाव’, ‘स्वभाव’, ‘तत्त्व’ एवं ‘ज्ञाता’ आदि भी कहा गया है—
भावः स्वभावस्तत्त्वं च ज्ञातेत्याद्यभिधा स्मृताः ।। १ ।।२
‘स्पन्द’ के दो रूप— १. शिवरूप २. शक्तिरूप ।
रामकण्ठाचार्य ‘स्पन्द’ को ‘शिव’ नहीं शाक्ततत्त्व कहकर उसकी वन्दना कर रहे
हैं—‘निजोधर्मः शंभोरनुपम चमत्कारसरसः ।
१. परंशाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।।
२. ‘स्पन्दस्य परस्य शाक्तस्य तत्त्वस्य । (स्पं०का० वि० २।५)
३. स्पन्दानां क्षेत्रज्ञज्ञानादिशक्तीनां । (स्पं०का०वि० २।६)
‘स्पन्द’ ‘सामान्य’ एवं ‘विशेष’ इन दो भागों में भी विभाजित है—
‘गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्द संश्रयात्’ ।
‘स्पन्द’ का धात्वर्थ—
१. गुणादिस्पन्द = ‘विशेष स्पन्द’ } ‘स्पदिकिंचिच्चलने धातु से ‘स्पन्द’
२. ‘सामान्य स्पन्द’ } शब्द की व्युपत्ति हुई है ।
‘सामान्य स्पन्द’ १. यही परमेश्वर की मुख्य शक्ति हैः ‘सामान्यस्पन्द एव परमेश्वर
मुख्यशक्तित्वेन’ ।
२. ‘मैं दुखी हूँ, मैं सुखी हूँ, आदि संवेदन तथा इन्द्रियाँ, पञ्चभूत, तन्मात्रा,
शरीर, बुद्धि, अहंकार, शरीर, गुणत्रय आदि जो ‘विशेष स्पन्द’ हैं उनसे यह ‘सामान्य-
स्पन्द’ भिन्न है और विशेष स्पन्दों का आश्रय है—
‘गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।’ (२।३ स्पं० का०) ‘स्पन्द’ के दो
रूप हैं—(१) ‘सामान्य’, (२) ‘विशेष’—
१.-२. स्पन्दप्रदीपिका ।

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१४ स्पन्दकारिका
१) 'परस्य शाक्तस्य तत्त्वस्य उपचरित—सामान्यविशेषात्मकतया द्विप्रकारत्वेन'
(रामकण्ठाचार्यः स्पन्द का० २।३) ।
२) 'सुखाद्युपाध्युपरागजनितान्योन्यभिन्नरूपेभ्यो विशेषस्पन्देभ्यो' स्पन्दों के
'निष्यन्द'—स्पन्दात्मक प्रत्यय संधान हैं—
'गुणमयाः स्पन्दनिष्यन्दाः प्रत्ययसंधानाः प्रसरन्ति।' (२।५)
स्पन्द निष्यन्दा नानार्थोन्मुख्येन प्रसृत प्रवाह रूप भिन्नात्मक प्रत्यय हैं—
निष्यन्दाः नानार्थोन्मुख्येन प्रसूताः प्रवाहाः भिन्नाः प्रत्ययाः स्पन्दनिष्यन्दाः ॥ (राम-
कण्ठाचार्यः स्पन्दका०वि० २।५) ।
स्पन्दनात्मक होने के कारण ही इस शक्ति को 'स्पन्द' संज्ञा प्राप्त हुई 'स्पन्दनात्
स्पन्दः ॥१'
'स्पन्दन' है क्या ? निस्तरंग परमात्मा की जो युगपद (एक साथ) निर्विकल्पात्मक
सार्वत्रिक औन्मुख्यवृत्तिता है उसे ही 'स्पन्द' कहा जाता है—'स्पन्दनं च निस्तरंगस्यास्य
तावत् परमात्मनः युगपन्निर्विकल्पा या सर्वत्रौन्मुख्यवृत्तिता' ।२
'शान्तषाड्गुण्यस्वरूप' 'आत्मबलशक्तीश' की जो चिद्रूप प्रतिभा का उदय है वही
स्फुरणात्मिका 'स्पन्द शक्ति' है ।
शान्तषाड्गुण्यरूपस्य यत् स्फुरन् प्रतिभोदयः ।
स चाऽत्मबलशक्तीशश्चिद्रूपः स्पन्दसंज्ञकः ॥३
आचार्य रामकण्ठ 'स्पन्दकारिकाविवृति' में कहते हैं कि—स्पन्द शक्ति के निम्न
लक्षण हैं—
१) जो नानात्मक दशाओं एवं दिक्काल आदि से अकलित 'चिदालोक वपु'
शिव के हृदय में तद्रूप स्वात्मानुभव के रूप में विस्फुरित होती है ।
२) जो शंभु का स्वधर्म है (स्वाभाविक स्वरूप है) ।
३) जो अनुपम चमत्कार से रसान्वित है ।
४) जो परं शाक्त तत्त्व है—वह 'स्पन्द' है—
दशादिक्कालाद्यैरकलितचिदालोकवपुषः,
सदा तादृक्स्वात्मानुभवितृतया विस्फुरति यः ।
निजो धर्मः शंभोरनुपम चमत्कारसरसः
परं शाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ॥
[१] काश्मीरीय शैवाद्वैत एवं स्पन्द मत
कश्मीर की अद्वैतवादी शैव परम्परा में शैव दर्शन की दो शाखायें मिलती हैं—
१. 'प्रत्यभिज्ञा', २. 'स्पन्द' ॥ इसी स्पन्द शाखा का आद्य दार्शनिक ग्रंथ है—
१-३ स्पन्दप्रदीपिका ।

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परिचय एवं पृष्ठभूमि १५
'स्पन्दशास्त्र' या 'स्पन्दसूत्र' या 'स्पन्दकारिका' । यह एक अनुभूति परक ग्रन्थ है ।
इसके रचनाकार के संबंध में संदेह उत्पन्न होने का कारण यह है कि किसी-किसी
संस्करण में अंतिम श्लोक के रूप में यह श्लोक पाया गया है—
वसुगुप्तादवाप्येदं गुरोस्तत्त्वार्थदर्शिनः ।
रहस्यं श्लोकयामास सम्यक् श्री भट्टकल्लटः ॥ ५३ ॥
अर्थात् श्री भट्टकल्लट ने अपने तत्त्वार्थदर्शी गुरु वसुगुप्त से यह रहस्य भलीभाँति
प्राप्त करके इसे श्लोकबद्ध किया ।
स्पष्ट है कि विचार एवं दार्शनिक सिद्धान्त तो वसुगुप्ताचार्य के हैं किन्तु इन्हें
पुस्तकाकार में प्रस्तुत करने का कार्य भट्टकल्लट ने किया । तो क्या 'स्पन्दकारिकावृत्ति' के
साथ ही 'स्पन्दकारिका' के भी रचयिता भट्टकल्लट हैं?—यह विवादास्पद विषय है ।
निस्तरंग परमात्मा में जो एक साथ सर्वरूप से उन्मुख होने की योग्यता है वही
किंचित् चलन है किन्तु इसके द्वारा उसकी निर्विकल्पता भंग नहीं होती । प्राचीन काल में
परमात्मा का एक नाम 'स्पन्द' भी था । शुद्धात्मा, शंकर, शिव, भाव, स्वभाव, ज्ञाता,
सामान्य, शक्ति आदि सभी स्पन्द वाच्य हैं ।
'स्पन्द' पूर्ण अहं विमर्श है । यह अहं विमर्श वह मौलिक स्फुरण है जिसके द्वारा
वह एक रहते हुए भी विश्व के अनन्त रूपों एवं आकारों में स्फुरित हो रहा है यह शाश्वत
स्फुरणशील (या स्पन्दायमान) होने के कारण ही स्पन्द नाम से पुकारा जाता है ।
'स्पन्द किंचित् चलन तो है किन्तु किसका किंचित् चलन ? किस स्वरूप का
किंचित् चलन? सूक्ष्म अहं विमर्श की स्फुरण ही किंचित् चलन है और वही 'स्पन्द' है ।
यह शक्ति के प्रसार ही किंचित् चलन है और वही 'स्पन्द' है । यह शक्ति के प्रसार की
संकल्पोत्मक उन्मुखता है । 'स्पन्द' अहं प्रत्यवमर्शात्मक गति है । यह एक उच्छ-लन
है । यह संवित् समुद्र की तरंग है स्वतन्त्र रूप में स्फुरण ही किंचित् चलन है और चूँकि
स्पन्द का यही स्वभाव है इसलिए इसे 'स्पन्द' कहा गया है । यह परमात्मा की स्वातंत्र्य
शक्ति है । इसी के दर्पण में परमात्मा अपना मुख देख पाते हैं इसीलिए कहा गया है—
'शैवीमुखंगिहोच्यते' अर्थात् पत्नी शिव की मुख है ।
आचार्य अभिनवगुप्त 'मालिनीवार्तिक' में प्रश्न उठाकर फिर कहते हैं—
'किं यादृग्लोकसंसिद्धकर्तृत्वं कर्मयोगतः ?
स्पन्दात्म तद्विभौ स्पन्दहीने समुपपद्यते ।
ननु ज्ञानं चिकीर्षा च यत्नश्चेति गुणत्रयम् ॥ (३२४)
समवैति यदत्रास्य तत्कर्मत्वमुदाहृतम् ।
कर्तृमित्येव यद्रूपं ज्ञानादीनां विशेषणम् ॥ (३२५)
करोतेस्तत्र कोऽर्थ स्याद्यदि सस्पन्दता किल । (३३०)
तदसौ स्पन्दितुं वेत्ति प्रेप्सतीति भवेद्रुचः ।
तच्च स्वात्मगतं नास्य स्पन्दितं वैभवोद्भवात् । (३३१)
अन्यदस्पन्दितं ज्ञानं सर्वस्यापि च संभवेत् ॥ (३३२)

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१६ स्पन्दकारिका
हृदय (शिव की आत्मभूता शक्ति) स्पन्दात्मिका है—
‘तस्योपायं परं ब्रूते हृदयं स्पन्दनात्मकम् । (द्वि०का० १८)
‘स्पन्द’ का मुख्य स्वरूप ‘सामान्यस्पन्द’ है जिसके विषय में ‘मालिनीवार्तिक’
(२०) में अभिनवगुप्त कहते हैं—
भावग्राह्याद्यचरमदशाद्रयोल्लासिनिर्वृतिसुपूर्णः ।
जगदानन्दमयोऽसौ ‘सामान्यस्पन्द’ इत्युक्तः ॥ (मा० वा० २०)
इसके अतिरिक्त ‘विशेषस्पन्द’ भी हैं—
‘चित्त्तत्त्वस्य विशेषस्पन्ददशाशालिनश्चिदानन्दः ॥ (६३)
एक ही स्पन्दन के ३ भेद हैं—एकस्य स्पन्दनस्येयं त्रिधा भेदव्यवस्थिति ॥
(६५) (मा०वा०) ।
काश्मीर शैव दर्शन के अनुसार परमेश्वर अपनी ‘स्पन्दरूपा शक्ति’ से सदैव
अवियुक्त रहता है । स्पन्दरूपा शक्ति ही उसका नित्यस्वभाव है । इसीलिए ‘स्पन्द
निर्णय वृत्ति’ में क्षेमराज ने इस दर्शन को ‘स्पन्दशास्त्र’ कहा है—‘यथोक्तं स्पन्दशास्त्रे’
(स्पन्दनिर्णय) ।
[२] स्पन्दसूत्र एवं स्पन्द
आचार्य उत्पलदेव ने ‘स्पन्द’ शब्द का व्यापक अर्थ न लेकर केवल ‘स्पन्द-
कारिकाओं के लिए ही ‘स्पन्दशास्त्र’ का प्रयोग किया है । काश्मीर शैव दर्शन का
साहित्य इन तीन भागों में विभक्त है—(१) ‘आगमशास्त्र’, (२) ‘स्पन्दशास्त्र’, (३)
प्रत्यभिज्ञाशास्त्र’ ।
काश्मीर शैव दर्शन का साधना-पक्ष ‘स्पन्दशास्त्र’ है । ‘स्पन्दशास्त्र’ में आगमों की
भाँति सिद्धान्त-निरूपण मात्र ही नहीं है परपक्ष खण्डन एवं स्वपक्ष मण्डन वाली
दार्शनिक शैली की प्रधानता भी आत्मीकृत नहीं हुई है । खण्डन-मण्डन सामान्य रूप से
प्रस्तुत यदि है—सम्प्रदायों का नाम लेकर नहीं ।
स्पन्द शब्द की सोद्देश्यता—
काश्मीरीय शैव दर्शन की एक शाखा ‘प्रत्यभिज्ञाशास्त्र’ के नाम से इसलिए प्रसिद्ध
हुई क्योंकि इस दर्शन का चरम लक्ष्य ‘प्रत्यभिज्ञा’ (‘नूनं स एव ईश्वरोहमिति’) प्राप्त
करना है । किन्तु इसी दर्शन की दूसरी शाखा का नाम ‘स्पन्द’ क्यों पड़ा ? दोनों के
दार्शनिक सिद्धान्त दोनों की साधना-पद्धति एवं चिन्तन तो समान हैं तथा दोनों के
आचार्य भी एक ही हैं फिर दूसरी शाखा को ‘स्पन्द’ क्यों कहा गया ?
आचार्य वसुगुप्त के दार्शनिक चिन्तन की दो धारायें थीं—१) ‘शिवसूत्र’ और
२) ‘स्पन्दकारिका’ ।
अद्वैतवादी काश्मीरी शैव दर्शन को दार्शनिक, तार्किक एवं खण्डनमण्डनात्मक
दृष्टि देने का कार्य तो सोमानन्दपाद ने अपने ग्रन्थ ‘शिवदृष्टि’ के माध्यम से किया
किन्तु ‘शिवदृष्टि’ भी शिवसूत्रों की ही व्याख्या है । सोमानन्द की ‘शिवदृष्टि’ को

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परिचय एवं पृष्ठभूमि १७
'प्रत्यभिज्ञा-शास्त्र' के रूप में प्रतिष्ठित करने का कार्य उनके शिष्य उत्पलदेवाचार्य ने—
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' नामक ग्रन्थ ('शिवदृष्टि' की व्याख्या के रूप में रचित) द्वारा सम्पादित
किया किन्तु 'शिवसूत्र' के साधनात्मक, श्रद्धात्मक एवं धार्मिक पक्ष को प्रस्तुत करने के
लिए जिस ग्रन्थ का प्रणयन किया गया—उसका नाम है 'स्पन्दकारिका'।
प्रश्न उठता है कि शिवसूत्रों की व्याख्या करने वाली इस शाखा ने शिवसूत्रों को
'स्पन्दसूत्र' या स्पन्दकारिका' के नाम से क्यों ग्रहण किया ? शिवसूत्रों में तो कहीं भी
'स्पन्द' शब्द का भूल से भी प्रयोग नहीं किया गया है? इसका समाधान यह है कि शिव
के 'प्रकाश' पक्ष को जिन आचार्यों ने प्राधान्य दिया वे सोमानन्द, एवं उत्पलदेव आदि
आचार्य शैवशास्त्र को खण्डनमण्डनात्मक पद्धति से तार्किक एवं दार्शनिक आधार देते
हुए मुख्यतः सैद्धान्तिक पक्ष पर जोर देते रहे और उन्होंने अपनी चरम उपलब्धि
'प्रत्यभिज्ञा' के रूप में स्थापित की । चूँकि इस दर्शन या साधना-पक्ष विवृत नहीं हो पा
रहा था । अतः एतदर्थ स्पन्दसूत्र (स्पन्दकारिका) की रचना की गई ।
एक प्रश्न पुनः उठता है कि यदि 'शिवसूत्र' सिद्धान्त-प्रधान मात्र था तो उसकी
साधना-प्रधान व्याख्या 'स्पन्दसूत्र' में करके क्यों शिवसूत्रों की मूल दृष्टि के साथ
विश्वासघात नहीं किया गया? इसका उत्तर यह है कि स्वयं 'शिवसूत्र' भी साधना-प्रधान
हैं क्योंकि उनका अध्यायीकरण साधना के तीन उपायों—(१) 'शांभवोपाय' (२)
'शाक्तोपाय' एवं (३) 'आणवोपाय' के नाम पर ही किया गया है और 'स्पन्दसूत्र' भी
मात्र साधनाशास्त्र ही नहीं है प्रत्युत् सिद्धान्तपक्ष का प्रस्तोता भी है । सोमानन्दपाद की
'शिवदृष्टि' एवं 'स्पन्दसूत्र' दोनों शिवसूत्रों की व्याख्यायें हैं किन्तु दोनों में दृष्टिभेद है ।
'स्पन्दकारिका' को वसुगुप्त की रचना माना जाता है और 'शिवसूत्र' को वसुगुप्त के द्वारा
उद्धार की गई रचना स्वीकार किया जाता है । यदि 'स्पन्दकारिका' के रचनाकार वसुगुप्त
स्वयं ही शिवसूत्रों की व्याख्या 'स्पन्दसूत्र' के रूप में करते हैं तो स्पष्ट है कि 'शिवसूत्र'
एवं 'स्पन्दसूत्र' दोनों में ऐकात्म्य है और यदि दृष्टि-वैषम्य के बिन्दु सिद्ध भी हो जायें तो
मानना पड़ेगा कि ये बिन्दु भी प्रारंभ से ही रहे हैं ।
प्रश्न पुनः अनुत्तरति रह जाता है कि काश्मीरी अद्वैतवाद की इस शाखा का नाम
'स्पन्द' क्यों रखा गया ? वसुगुप्त ने 'स्पन्दकारिका' एवं सोमानन्द (९०० ई०) ने
'शिवदृष्टि' द्वारा कश्मीरी अद्वैतवादी शैवमत की पृष्ठभूमि प्रस्तुत की काश्मीरी शैवमत
की अद्वैतवादी शाखा के ये ही मूल संस्थापक हैं । 'सोमानन्द' वसुगुप्त के शिष्य हैं ।
उनके समय में स्पन्दकारिका ('स्पन्दशास्त्र' के नाम से) विद्यमान थी । उन्होंने 'शिवदृष्टि'
के प्रारंभ में (प्रथम श्लोक की व्याख्या में) 'नहीच्छानोदनस्यायं प्रेरकत्वेन वर्तते' (१।८)
सूत्र को उद्धृत भी किया है । उनके शिष्य ने 'शिवदृष्टि' की व्याख्या के रूप में जिस
'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा' का प्रणयन करके 'प्रत्यभिज्ञा शाखा' के नाम से शैवाद्वैतवादी एक नए
मत का नामकरण किया यह नाम ही 'शिवदृष्टि' के प्रथम श्लोक की व्याख्या में
सोमानन्द ने 'ईश्वरप्रत्यभिज्ञा प्रपंचित न्यायेन' वाक्य द्वारा पहले से ही लिख दिया था ।
१. सोमानन्द का 'शिव' 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' शिव है ।
स्पं. भू. १

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१८ स्पन्दकारिका
२. स्पन्दसूत्रकार का 'शंकर'—'यस्योन्मेषनिमेषाभ्यां जगतः प्रलयोदयौ तं शक्ति
चक्रविभवप्रभवं शंकरं... ... ...' है। यह 'अस्मद्रूपसमाविष्ट' नहीं है ।
'अस्मद्रूपसमाविष्ट' शब्दावली 'प्रत्यभिज्ञोपरान्त योगी के ज्ञानात्मक अनुभव की
दशा है अतः यहाँ उपाय (साधनोपाय) भी व्यर्थ हैं अतः इस 'शिवदृष्टि' में साधना-
प्राधान्य न भी हो तो उचित ही है और ज्ञानमार्ग (अहं सः एव) के लिए उपासना
आवश्यक भी नहीं है—'प्रत्यभिज्ञा' ही साधना है और 'प्रत्यभिज्ञा' ही 'साध्य' है ।
स्पन्दसूत्रकार 'नमः' नहीं कहते 'स्तुमः' कहते हैं । सोमानन्द 'शिव' को
नमस्कार करते हैं किन्तु स्पन्दसूत्रकार 'शंकर' की स्तुति करते हैं । 'स्तुति' 'स्तुत्य'
'स्तोत्र' 'स्तुतिकर्ता' के भाव ज्ञानमार्ग में संभव नहीं अर्थात् 'प्रत्यभिज्ञा' (तत् त्वं असि)
में संभव नहीं । यह केवल भक्ति—उपासना—प्रेममार्ग में ही संभव है । 'प्रत्यभिज्ञा'
ज्ञानमार्गीय अद्वैत है और 'स्तुति'-द्वैतात्मक भक्ति है ।
'स्पन्द' नामकरण क्यों? इसलिए कि यह सिसृक्षात्मकता का सूक्ष्म संकल्प
है—संकल्पात्मक गतिमयता है—निस्पन्द परमशिव में यत्किंचिच्चलन रूप अहं विमर्श
है—अहं प्रत्यवमर्श रूप एक विमर्शात्मक चलता है ।
[३] स्पन्द
'स्पदि किंचिच्चलने' धातु से निष्पन्न होने के कारण 'स्पन्द' शब्द अल्प-
चलनात्मक अर्थ में प्रयुक्त होता है ।१ स्पन्द शब्द विकारों के अर्थ में भी प्रयुक्त हुआ
है—'तेन षोडश स्पन्दाः विकारा' ।
'षोडशस्पन्दसन्दोहे' (योगिनी हृदय के इस श्लोक) की व्याख्या करते हुए
भास्करराय ने 'स्पन्द' को विकार के जो अर्थ में प्रयुक्त किया है ।
समस्त द्वैत स्पन्द है—गौड़पादाचार्य कहते हैं कि विषय एवं इन्द्रियों के सहित
यह संपूर्ण द्वैत चित्त का स्फुरण मात्र है—
'चित्त स्पन्दितमेवेदं ग्राह्यग्राहकमद्वयम्' ।२
'सर्वं ग्राह्यग्राहकवच्चित्तस्पन्दितमेव' ।३
'षट्त्रिंशत् तत्त्वसंदोह' में कहा गया है कि—विश्वोन्मीलन की आद्या इच्छाशक्ति
ही शिव तत्त्व है और इसी को 'स्पन्द' कहते हैं ।
आचार्य क्षेमराज 'शिवसूत्रविमर्शिनी' में कहते हैं कि 'स्पन्दतत्त्व' शंकरात्मक एवं
चैतन्यात्मक, सर्वदा स्वप्रकाश एवं परमार्थ सत् है—शंकरात्मक स्पन्दतत्त्वरूपं चैतन्यं
सर्वदा स्वप्रकाशं परमार्थसत् अस्ति ।'४ यह शिव की एक अनुत्तरा शक्ति है और प्रतिभा
१. भास्कर राय—'सेतुबंध' (चक्रसंकेत में श्लोक २१ की व्याख्या) ।
२. माण्डूक्यकारिका—'अलातशान्तिप्रकरण' ।
३. शांकर भाष्यः माण्डूक्यकारिका ।
४. शिवसूत्रविमर्शिनी ।

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परिचय एवं पृष्ठभूमि १९
एवं चमत्कार भी है—अभिनवगुप्तपादाचार्य 'परात्रिंशिका विवृति' में इसी शक्ति को
नमस्कार करते हैं—
नरशक्तिशिवात्मकं त्रिकं, हृदये या विनिधाय भासयेत् ।
प्रणमामि परमानुत्तरां निजभासां प्रतिभाचमत्कृतिम् ॥१
'तन्त्रालोक' (५ आह्निकः श्लोक ५७) में अभिनवगुप्त कहते है—
उन्मना और 'स्पन्द'—'समना' भूमि को अतिक्रान्त करके 'उन्मना' का परिवेश
प्राप्त होता है । 'समना' तक अनन्तपाश हैं । भैरवीय चिद्रूप में प्रवेश के लिए 'समना'
को अतिक्रान्त करना अपरिहार्य है । उन्मना के अन्तिम छोर पर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के
अधिष्ठान में यहाँ 'विसर्ग' की सुषमा का साम्राज्य उल्लसित है । उसमें शाश्वत 'स्पन्द'
का उच्छलन होता रहता है ।
प्राणना, व्यापार एवं 'स्पन्द'—
'तन्त्रालोक' (आ० ५ । श्लोक १८) की व्याख्या में आचार्य जयरथ ने 'विवेक'
में कहा है कि—आन्तरउद्योगरूपा, जीवनात्मिका मुख्य वृत्ति 'प्राणना' है ।
आह्निक ६ के १२वें श्लोक में प्राणना व्यापार के निम्न पर्याय बताए गए हैं—
'आन्तर स्पन्द' 'स्फुरत्ता' 'विश्रान्ति' 'जीव' 'हृत' और मति ।
इयं सा प्राणना शक्तिरान्तरोद्योगदोहदा ।
स्पन्दः स्फुरत्ता, विश्रान्ति जीवो हृत्प्रतिभामतिः ॥
'विमर्श' 'संवित् शक्ति' और 'स्पन्द'—
परबोधमय देवाधिदेव की सर्वज्ञ, सर्वज्ञानशालिनी पराशक्ति को 'विमर्श' कहते
हैं । संवित् शक्ति में समस्त परामर्श उल्लसित हैं । उसे ही 'विमर्श', 'स्पन्द', 'हृदय',
विसर्ग आदि कहते हैं—
'इह खलु इदमेव संविदः संवित्त्वं यत् पराम्रष्टृत्वं नाम यस्य विमर्शः, 'स्पन्दो'
'हृदय' विसर्ग, इत्यादयः सहस्रशो व्यपदेशाः । (विवेक)
तस्य देवातिदेवस्य परबोधस्वरूपिणः ।
विमर्शः परमाशक्तिः सर्वज्ञा सर्वशालिनी ॥ ७७ (तन्त्रालोक आ० ५)
इसी विमर्श का अपर पर्याय 'स्पन्द' है ।
'विमर्श' संवित-'स्पन्द' ही है—संवित्स्पन्दस्त्रिशक्त्यात्मा संकोचविकासवान् ॥
(तन्त्रालोक आ० ५।७९)
इदमात्मक विमर्श एवं स्पन्द—'विशेष स्पन्द'—इदमात्मक विमर्श ही विशेष
नामक 'स्पन्द' है इसे ही 'औन्मुख्य' भी कहते हैं—
'ततः स्वातन्त्र्यनिर्मेये विचित्रार्थक्रियाकृति ।
विमर्शनं विशेषाख्यः 'स्पन्द' औन्मुख्य संज्ञितः ॥ (तन्त्रालोक ५।८१)
१. मालिनीवार्तिक (अभिनवगुप्त) ।