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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

Page 14 of 519

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Page 14

भूमिका खण्ड
परिचय एवं पृष्ठभूमि
अन्तस्थल में निस्पन्द सिन्धु के वक्षस्थल पर तरंगात्मक स्पन्दन की भाँति निस्पन्द
परमशिव को स्पन्दित करने वाली उनकी स्वात्मरूपा शक्ति ‘स्पन्द’ है। ‘स्पन्द’ शिव का
अपना ‘धर्म’ है—‘स्वभाव’ है—‘शक्ति’ है—‘हृदय’ है—‘ऊर्मि’ है—‘विमर्श’ है
और ‘स्वातंत्र्य’ है।
‘स्पन्द’ को कहीं ‘शिव की शक्ति’ कहा गया है और कहीं उसे स्वयं ‘शिव’ कहा
गया है यथा— स्पन्दः सामान्यपूर्वश्च शुद्धात्माशांकरः शिवः ।१
किन्तु इसे ‘भाव’, ‘स्वभाव’, ‘तत्त्व’ एवं ‘ज्ञाता’ आदि भी कहा गया है—
भावः स्वभावस्तत्त्वं च ज्ञातेत्याद्यभिधा स्मृताः ।। १ ।।२
‘स्पन्द’ के दो रूप— १. शिवरूप २. शक्तिरूप ।
रामकण्ठाचार्य ‘स्पन्द’ को ‘शिव’ नहीं शाक्ततत्त्व कहकर उसकी वन्दना कर रहे
हैं—‘निजोधर्मः शंभोरनुपम चमत्कारसरसः ।
१. परंशाक्तं तत्त्वं जगति जयति स्पन्द इति तत् ।।
२. ‘स्पन्दस्य परस्य शाक्तस्य तत्त्वस्य । (स्पं०का० वि० २।५)
३. स्पन्दानां क्षेत्रज्ञज्ञानादिशक्तीनां । (स्पं०का०वि० २।६)
‘स्पन्द’ ‘सामान्य’ एवं ‘विशेष’ इन दो भागों में भी विभाजित है—
‘गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्द संश्रयात्’ ।
‘स्पन्द’ का धात्वर्थ—
१. गुणादिस्पन्द = ‘विशेष स्पन्द’ } ‘स्पदिकिंचिच्चलने धातु से ‘स्पन्द’
२. ‘सामान्य स्पन्द’ } शब्द की व्युपत्ति हुई है ।
‘सामान्य स्पन्द’ १. यही परमेश्वर की मुख्य शक्ति हैः ‘सामान्यस्पन्द एव परमेश्वर
मुख्यशक्तित्वेन’ ।
२. ‘मैं दुखी हूँ, मैं सुखी हूँ, आदि संवेदन तथा इन्द्रियाँ, पञ्चभूत, तन्मात्रा,
शरीर, बुद्धि, अहंकार, शरीर, गुणत्रय आदि जो ‘विशेष स्पन्द’ हैं उनसे यह ‘सामान्य-
स्पन्द’ भिन्न है और विशेष स्पन्दों का आश्रय है—
‘गुणादिस्पन्दनिष्यन्दाः सामान्यस्पन्दसंश्रयात् ।’ (२।३ स्पं० का०) ‘स्पन्द’ के दो
रूप हैं—(१) ‘सामान्य’, (२) ‘विशेष’—
१.-२. स्पन्दप्रदीपिका ।