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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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विषयानुक्रमणिका ११
३. आत्मा की सभी अवस्थाओं में अविचल एकरूपता ७८
४. समस्त अवस्थाओं एवं मनोदशाओं में एक ही स्पन्दतत्त्व
की अनुस्यूतता ९१
५. पारमार्थिक तत्त्व का स्वरूप १०७
६-७. शैवी स्वातन्त्र्य शक्ति के द्वारा आन्तर शक्ति चक्र के
साथ अचेतन इन्द्रियों को भी चैतन्य प्रदान किए जाने
का प्रतिपादन ११५
८. आत्मबल प्राप्त होने पर 'पशु' भी 'पशुपति' बन जाता है १२५
९. क्षोभावसान से परमपद की प्राप्ति का प्रतिपादन १३३
१०. क्षोभ के विलीन हो जाने पर मितात्मा का सर्वज्ञातृत्व एवं
सर्वकर्तृत्व १६६
११. 'स्वस्वभाव' की सर्वव्यापकता के साक्षात्कार के कारण योगी
की संसरण से मुक्ति १७३
१२-१३. अभावब्रह्मवाद शून्यात्मवाद तथा सर्वशून्यवाद की अयथार्थता १८०
१४. स्पन्द तत्त्व की दो अवस्थायें १९३
१५. जड़ समाधि में अवस्थित अबुध योगी की अभावात्मक
मिथ्यानुभूति १९७
१६. अन्तर्मुख चेतन सत्ता के सार्वकालिक अस्तित्व एवं नित्यता
का प्रतिपादन २०४
१७. सुप्रबुद्ध एवं प्रबुद्ध योगियों में चिद्रूप स्वभाव की अनुभूतियों
के भेद २०८
१८. विभिन्न अवस्थाओं में आत्माभिव्यक्ति के विभिन्न रूप २१४
१९. गुणादि विशेष स्पन्द एवं सामान्य स्पंद का अन्तर्सम्बन्ध २२२
२०. विशेष स्पंदों के लक्षण और प्रभाव २२८
२१. जाग्रत अवस्था में भी स्पन्दतत्त्वाभिव्यक्ति के उपयोगी उपाय २३२
२२. स्पन्द का स्वरूप-लक्षण २३९
२३-२५. मूढ़ एवं प्रबुद्ध साधकों की अवस्थाओं की तुलना २४७
द्वितीय निष्यन्द—सहजविद्योदय निष्यन्द २६२
२६. स्पन्दस्वरूप आत्मबल-प्राप्त मन्त्रों की शक्तियों में वृद्धि २६२
२७. मन्त्रों का चिदाकाश में लय एवं उनकी शिवात्मकता २६९