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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 9

८ स्पन्दकारिका
शक्ति में सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है। जगत का शक्ति एवं शिव दोनों के साथ
तादात्म्य है। जगत न तो जड़ परमाणुओं का संघात है और न तो पूर्व कर्मों के भोग का
या संसरण की संरचना है। यह शिव की आनन्द क्रीड़ा है—यह परम शिव की स्वेच्छा
रूप तूलिका द्वारा आत्मा के पट पर बनाया गया चित्र है—यह क्रीड़ाराम है—क्रीडनक
है—शिव के अहं को व्यक्त करने का माध्यम है—'शक्ति' के स्वरूप का उल्लास है—
शिव का आनन्दोल्लास है—शिव की आत्म-स्वरूप दिदृक्षा है एवं शिव का विनोद है।
(४) 'परमशिव' निष्क्रिय एवं उदासीन (शान्त) ब्रह्म नहीं है प्रत्युत पञ्चकृत्यकारी
परमात्मा है और 'शक्ति' उसी शिव का अपना विमर्श है—आत्मपरामर्श है—प्रत्यविमर्श
है।
शिव शांकर अद्वैत का अद्वयतत्त्व नहीं है प्रत्युत् शक्ति के साथ सामरस्यापन्न,
द्वयात्मक अद्वैत है। बंधन भी बंधन नहीं और मुक्ति भी मुक्ति नहीं, प्रत्युत अवरोहण एवं
आरोहण का स्वकल्पित अभिनय है—एक क्रीडा है। यहाँ का अद्वैत मिथुनात्मक,
दाम्पत्यात्मक, संघट्टात्मक, युगलभावात्मक एवं सामरस्यात्मक है।
(५) यहाँ मुक्ति 'सामीप्य', 'सालोक्य', 'सार्षि' एवं 'सायुज्य' नहीं है। प्रत्युत्
जीते जी मुक्ति है—'जीवन्मुक्ति' है न कि 'विदेहमुक्ति'।
(६) साधना के मार्गों में ज्ञान-भक्ति-योग इन तीनों का मणिकांचन योग ही
उपादेय है। 'भक्ति' भी वही वरेण्य है जिसे 'अद्वैतभक्ति' कहते हैं। शिव के साथ
अभेदात्मकता की अनुभूति ही यथार्थ ज्ञान है और यह अनुभूत्यात्मक ज्ञान ही 'मुक्ति' है।
'भक्ति' का वह प्रकार जो 'वैधी', 'गौणी' आदि रूप वाली है या 'साधन भक्ति है
स्पृहणीय नहीं है—'ज्ञानोत्तरा भक्ति' ही अभीष्ट है।
यदि देश को शक्तिशाली बनाना है तो 'स्पन्द' एवं 'प्रत्यभिज्ञा' के शक्ति सिद्धान्त
एवं शक्ति-साधना का आत्मीकरण करना आवश्यक है।
'शिवोऽहं', 'शिवोऽहं', 'अहं देवी न चान्योस्मि', 'न सावस्था न यः शिवः' आदि
को आत्मसात करके जीव को शिव बनाने की साधना का प्रवर्तन करने वाले आचार्य
वसुगुप्त को शतशः नमन करते हुए मैं प्रकाशक महोदय को पुनः धन्यवाद देना चाहता
हूँ कि उन्होंने 'स्पन्दकारिका' प्रकाशित करने का सत्संकल्प रूपायित कर दिया।
श्यामाकान्त द्विवेदी 'आनन्द'