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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

DevanagariHindipublished519 pages

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Page 7

६ स्पन्दकारिका
ज्ञरूप 'स्पन्द' की मैं वन्दना करता हूँ—
यत् परापरभूस्पर्शि यत्संकल्पलयोदयौ
स्पन्दसंज्ञं ज्ञरूपं तच्छक्तीशं स्वबलं नुमः ॥१
अद्वैतवादी वेदान्ती शंकराचार्य की दृष्टि में 'ब्रह्म' (परा सत्ता) क्रियाहीन है—
निष्क्रिय है अतः क्रिया भी पारमात्मिक सत्य नहीं प्रत्युत् माया का कार्य होने के कारण
असत् है । समस्त विश्व-व्यापार (सृजन एवं अन्य व्यापार माया की 'आवरण' एवं
'विक्षेप' शक्तियों का व्यापार) माया के व्यापार हैं ।
मायावादी शंकराचार्य का 'मायावाद' ही निःशेष विश्व व्यापार एवं अशेष क्रियाओं
का मूलाधार है और इसलिए जगत, जगत के व्यापार, सृजन आदि समस्त क्रियाएं माया
स्पन्दतत्त्व का स्वरूप— शक्ति के गर्भ में स्थित शक्तिरूप
अस्फुट जगत (कारण जगत)
— परमशिव
म
र शि
स्पंद क्रिया शक्ति
(अहं ज्ञान शक्ति
प व इच्छा शक्ति
प्रत्यवमर्श) आनन्द शक्ति
(शिव का चिति
सिसृक्षात्मक सूक्ष्म
संकल्प ही
किंच्चलनात्मक
'स्पन्द' है ।)
चितिशक्ति आनन्दशक्ति इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति क्रियाशक्ति
| | | | |
चिति आनन्द इच्छा ज्ञान क्रिया
शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति शक्ति
जगत 'शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं'
जगदाभास 'शक्ति' का विश्वाकारित विराट
स्थूल जगत (बाह्य) रूप = स्थूल जगत,
शिव का विमर्श ही 'शक्ति' है
और जगत इसी शक्ति का
'प्रचय' है ।
१. स्पन्दप्रदीपिका ।