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स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

स्पन्दनिर्णय एवं स्पन्दकारिका (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैव स्पन्द-शास्त्र सान्वय सटीक)

Spanda Nirnaya of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य वसुगुप्त / क्षेमराज

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DevanagariHindipublished519 pages

Page 8 of 519

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वक्तव्य ७
हैं—मिथ्या हैं—मृगमरीचिका हैं—(१) 'ब्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या' (२) 'यद्दृष्टं तन्नष्टं' ।
'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' सृष्टि 'माया' करती है निर्गुण, निराकार एवं निष्क्रिय ब्रह्म नहीं ।
इसीलिए शांकर वेदान्त को 'शान्तब्रह्मवाद' कहा गया है ।
'स्पन्दशास्त्र' के 'ईश्वराद्वयवाद' में परमशिव इच्छा, ज्ञान एवं क्रिया, तिरोधान एवं
अनुग्रह—इन पाँचों क्रियाओं का निष्पादक होने के कारण 'पंचकृत्यकारी' कहा गया है ।
इसीलिए स्पन्द के अद्वैत को द्वयात्मक अद्वयवाद कहा जा सकता है । परमशिव
'विश्वोत्तीर्ण' एवं 'विश्वमय' दोनों हैं । परमशिव निर्गुण, निष्क्रिय, निराकार एवं विश्वोत्तीर्ण
होते हुए भी अपनी स्वाभिन्न एवं स्वसमवेत 'स्पन्दशक्ति', 'स्वातन्त्र्यशक्ति' या पाँच
शक्तियों के साथ तादात्म्यभावापन्न होने के कारण पंचकृत्यकारी 'भी है । 'स्पन्द' ही
परमशिव का 'हृदय', 'सार', 'विमर्श' एवं 'शक्ति' है । 'स्पन्द' परमात्मा का क्रियापक्ष
है । इसी के द्वारा परमशिव 'स्वतन्त्र' हैं और इसी के द्वारा स्पन्दशास्त्र का 'स्वातन्त्र्यवाद'
जीवित है ।
शिव के इसी शक्ति पक्ष (क्रिया पक्ष) को प्राधान्य देकर 'स्पन्दशास्त्र' प्रवृत्त हुआ है ।
'शक्ति' शिव का ही अपना एक दूसरा पक्ष है । शिव 'प्रकाश' हैं और शक्ति 'विमर्श' है ।
श्री सम्प्रदाय इन्हें ही 'समय' एवं 'समया' या 'कामेश्वर' एवं 'कामेश्वरी कहता है ।
'स्पन्दकारिका' स्पन्दशास्त्र का अन्यतम ग्रन्थ है तथापि अद्यप्रभृति इसकी हिन्दी
टीका (अन्य संस्कृत टीकाओं की व्याख्याओं को अन्तर्गर्भित करके) प्रकाशित नहीं हुई
थी । इस अभाव को पूरा करने के लिए मैंने इस अनुभूति-प्रवण एवं साधना-प्रधान ग्रन्थ
की व्याख्या की है और विद्वानों के अवलोकनार्थ प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
भारतीय संस्कृति के परमानुरागी माननीय प्रकाशक, चौखम्बा सुरभारती प्रकाशन,
वाराणसी, महोदय ने यदि मुझे इसके लिए उत्प्रेरित न किया होता एवं प्रकाशन की
इच्छा व्यक्त नहीं की होती तो इसका प्रकाशन तो दूर इसका प्रणयन ही संभव न हो
पाता । अतः मैं माननीय व्यवस्थापक—चौखम्बा सुरभारती वाराणसी—का अत्यन्त
आभारी हूँ कि वे भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन एवं साधना के
लिए उपयोगी इन गुप्त एवं गुह्य ज्ञान-भण्डार के अप्रतिम आर्ष ग्रन्थों को प्रकाशित करने
हेतु प्रयत्नशील हैं । प्रकाशनों की उसी श्रृंखला में 'स्पन्दकारिका' भी एक है ।
इस रचना के प्रकाशन के माध्यम से भारतीय दर्शन एवं भारतीय आर्ष चिन्तन के
इन सिद्धान्तों की ओर जनता एवं पाठकों का ध्यान आकृष्ट करने का प्रयास किया गया
है कि जगत दुःखमय नहीं आनन्दमय है और—
(१) जगत जड़ नहीं चिन्मय है । सब कुछ चिन्मय है—कोई भी वस्तु जड़ है ही
नहीं 'सर्वं चिन्मयं विश्वे' ।
(२) जगत शिव की विमर्श शक्ति का विकसित (व्यक्त) रूप है ।
(३) जगदाभास न तो नव्योत्पत्ति है और न तो संहार विषय है । जगत तो
'संवित् तत्त्व' का रूपान्तर है । वह उत्पन्न नहीं प्रकट होता है । प्रलय के समय भी जगत
शक्ति में सूक्ष्म रूप में अवस्थित रहता है । जगत का शक्ति एवं शिव दोनों के साथ