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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

About this granth

The Siddhantaleshasangraha (सिद्धान्तलेशसंग्रह) is a work on Advaita Vedanta by the sixteenth-century polymath Appayya Dikshita. After Shankara, Advaita teachers differed on many questions: where ignorance resides and what it veils, the nature of the individual soul and of God, whether souls are one or many, and how knowledge of Brahman arises. Appayya gathers these views concisely without taking sides, and the work remains a key guide to the schools of post-Shankara Vedanta.

It has four chapters following the order of the four books of the Brahma Sutras. This edition gives the text with a Hindi translation and notes by Vedantacharya Pandit Mulshankar Vyas, edited by Pandit Chandiprasad Shukla Shastri, principal of the J. G. Goenka Sanskrit College, and Pandit Shrikrishna Pant Shastri, head of the Achyut Granthamala.

It is the sixth volume of section B of the Achyut Granthamala, first published at Kashi by Gaurishankar Goenka in Samvat 1993 (1936) and printed by N. R. Soman at the Lakshminarayan Press, Benares. It runs to 590 pages.

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५२८सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

धर्मादौ प्रवृत्तिदर्शनात् । तत्र क्षणिकसुखकालीनदुःखाभावस्य पुरुषार्थत्वे तदर्थं बहुकालदुःखानुभवायोगात् । न च तत्र क्षणिकसुखस्य पुरुषार्थत्वेऽपि दोषतौल्यम् , भावरूपे सुखे उत्कर्षापकर्षयोरनुभवसिद्धत्वेन क्षणमप्यत्युत्कृष्टसुखार्थं बहुकालदुःखानुभवोपपत्तेः । दुःखाभावे चोत्कर्षापकर्षासम्भवात् । तस्मान्मुक्तौ संसारदुःखनिवृत्तिरप्यविद्यानिवृत्तिवत् सुखशेष इतयनवच्छिन्नानन्दप्राप्तिरेव स्वतःपुरुषार्थ इत्याहुः ॥ ३ ॥

प्रत्यगेव परानन्दस्तिरोभूतः स्वमोहतः ।
स्वकण्ठचामीकरवत् प्राप्तप्राप्यः स्वविद्यया ॥ १० ॥

अपने मोहसे प्रत्यग्रूप परानन्द ही तिरोभूत हुआ है अतः प्राप्त होनेपर भी भूली हुई अपनी कण्ठगत सुवर्णमालाके समान अपनी विद्यासे प्राप्य होता है ॥१०॥

प्रवृत्ति देखी जाती है । उस स्थलमें अर्थात् निन्दित उक्त प्रवृत्तिस्थलमें * क्षणिक सुखकालिक दुःखाभावमें पुरुषार्थताका यदि अङ्गीकार किया जाय, तो उसके लिए अधिककाल तक दुःखानुभव नहीं हो सकता है । यदि शङ्का हो कि निन्दित प्रवृत्तिस्थलमें क्षणिक सुख पुरुषार्थ माना जाय, तो भी दोष तो समान है ? तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि भावरूप सुखमें उत्कर्ष और अपकर्षका अनुभव होनेसे क्षणिक उत्कृष्ट सुखके लिए बहुत काल तक दुःखका अनुभव उपपन्न हो सकता है, और दुःखाभावमें उत्कर्ष और अपकर्ष नहीं हो सकते हैं † । इससे अर्थात् दुःखाभावके स्वतः पुरुषार्थ न होनेसे संसाररूप दुःखकी निवृत्ति भी अविद्यानिवृत्तिके समान सुखकी अङ्ग है, अतः अनवच्छिन्न-शुद्ध-आनन्दकी प्राप्ति ही स्वतः-पुरुषार्थ है ॥ ३ ॥


* समाधान इस अभिप्रायसे देते हैं कि सुखव्यक्ति वस्तुतः एक है, तथापि उपाधिके भेदसे सुखका भेद होनेके कारण सुखत्व जाति अक्षत है, अतः सुखको स्वतः पुरुषार्थ माननेसे कारणतावच्छेदकप्रयुक्त लाघव है । और दुखाभाव ही यदि स्वतः पुरुषार्थ होता, तो अधिक काल तक क्षणिक सुखके लिए अनेक पुरुष प्रवृत्त नहीं देखे जाते, अतः सुखको ही पुरुषार्थ मानना युक्ति-युक्त है ।
† कारण कि अभावमें उत्कर्षत्व और अपकर्षत्वरूप जाति नहीं मानी जाती है, यह भाव है ।

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मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भाषानुवादसहित ५२९


नन्वनवच्छिन्नानन्दः प्रत्यग्रूपतया नित्यमेव प्राप्तः । सत्यम्, नित्य-
प्राप्तोऽपि अनवच्छिन्नानन्दस्तमावृत्य तद्विपरीतमर्थं प्रदर्शयन्त्या अविद्यया
संसारदशायामसत्कल्पत्वं नीत इत्यकृतार्थताऽभूत् । निवर्तितायां च तस्यां
निरस्तनिखिलानर्थविक्षेपे स्वकण्ठगतविस्मृतकनकाभरणवत् प्राप्यते इवेत्यौ-
पचारिकी तस्य प्राप्तव्यतेति केचित् ।

अप्राप्तिरपि तस्याऽभूत् संसृतौ व्यावहारिकी ।
सा विद्यया निवृत्तेति मुख्यां प्राप्तिं परे जगुः ॥ ११ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दकी व्यावहारिक अप्राप्ति थी वह विद्यासे निवृत्त हुई, इसलिए उसकी मुख्य प्राप्ति हो सकती है ॥११॥


यदि कोई शङ्का करे कि अनवच्छिन्न आनन्द तो प्रत्यगात्मारूप है, अतः वह † सर्वदा प्राप्त ही है, इसलिए उसकी प्राप्तिके लिए कोई प्रयत्न करनेकी आवश्यकता नहीं है ? तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि यद्यपि वह अनवच्छिन्न आनन्द नित्य प्राप्त ही है, तथापि उस आनन्दको आवृत करके विपरीत अर्थको—दुःखात्मक संसारको—दिखलाती हुई अविद्या संसारदशामें उस आनन्दको नहींके समान बना देती है, अतः पूर्णानन्दकी अप्राप्ति भासती है । उस अविद्याकी निवृत्ति हो जानेपर सम्पूर्ण अनर्थरूप विक्षेपकी निवृत्ति हो जानेसे अपने कण्ठमें स्थित सुवर्णहारको विस्मृतिके समान ✲ उस आनन्दकी भी प्राप्ति हो जाती है, अतः आनन्दमें औपचारिक प्राप्तिविषयता है, ऐसा भी कुछ लोग कहते हैं ।


†जीवको स्वरूप होनेसे ब्रह्मानन्द नित्य प्राप्त ही है, अतः उसकी प्राप्तिके उद्देश्यसे आनन्द-प्राप्तिके साधनोंमें पुरुषकी प्रवृत्ति नहीं होनी चाहिए, यह प्रश्नका तात्पर्य है ।

✲ जैसे अपने हारके गलेमें रहते भी, उसकी विस्मृतिसे उसे इधर उधर खोजता है, यद्यपि हार प्राप्त ही है, अप्राप्त नहीं है, तथापि भ्रान्तिसे उसको अप्राप्तके समान मानता है, जब उसकी भ्रान्ति निकल जाती है कि हार तो मेरे गलेमें ही है, तब उसके प्राप्त रहनेपर भी मैंने अप्राप्त वस्तु प्राप्त की, ऐसा मानता है, बस इसी प्रकार स्वरूप आनन्दके नित्य प्राप्त होनेपर भी अनादि अविद्यासे आवृत हो जानेके कारण वह अप्राप्तके समान प्रतीत होने लगता है, उस अविद्याके निवृत्त हो जानेपर, तो निखिल अनर्थरूप विक्षेपके निकल जानेसे स्वतः आनन्दका स्फुरण हो जाता है, इसलिए अप्राप्त वस्तुकी प्राप्ति हुई, ऐसा औपचारिक व्यवहार है, यह भाव है ।

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५३०सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

अन्ये तु संसारदशायां 'नास्ति, न प्रकाशते' इति व्यवहारयोग्यत्व-रूपाज्ञानावरणप्रयुक्तस्य 'मम निरतिशयानन्दो नास्ति' इति प्रत्ययस्य सर्वसिद्धत्वात् तदालम्बनभूतः कश्चिद् ब्रह्मानन्दस्याऽभावः काल्पनिको यावदविद्यमनुवर्तते, अविद्यानिवृत्तौ च तन्मूलत्वान्निवर्तते इति 'यस्मिन् सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादिलक्षणानुरोधेन मुख्यमेव तस्य प्राप्यत्वमित्याहुः ।

परे प्रागावृत्तत्वेन पारोक्ष्यादपुमर्थताम् ।
मुक्तौ तु तदभिन्नत्वादात्मप्राप्त्या पुमर्थताम् ॥ १२ ॥

कुछ लोग कहते हैं कि संसारदशामें अनवच्छिन्न आनन्दमें आवृत होनेके कारण परोक्ष होनेसे, पुरुषार्थ नहीं है और मुक्तिमें तो अपरोक्ष होनेसे उसकी प्राप्ति होनेके कारण वह पुरुषार्थ है ॥१२॥


कुछ लोग तो कहते हैं कि 'नास्ति, न प्रकाशते' (निरतिशय आनन्द नहीं है और उसका प्रकाश भी नहीं होता) इस प्रकारसे व्यवहारके योग्य अज्ञानरूप आवरणसे होनेवाला 'हमको निरतिशय आनन्द नहीं है' इस प्रकार ज्ञान सभीको अनुभव सिद्ध है, इसलिए उस प्रकारके विज्ञानका विषयीभूत कोई काल्पनिक ब्रह्मानन्दका अभाव अविद्याकी अवस्थिति तक † अनुवर्तमान होता है । और अविद्याकी निवृत्ति हो जानेसे अविद्यामूलक उस काल्पनिक अभावकी निवृत्ति हो जाती है, इसलिए ‡ 'यस्मिन्सत्यग्रिमक्षणे' इत्यादि अग्रिम लक्षणके अनुरोधसे ब्रह्मानन्दमें मुख्य ही प्राप्यता है ।


† 'एतस्यैवानन्दस्यान्यानि भूतानि मात्रामुपजीवन्ति' 'आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्' इत्यादि वेदान्तोंसे प्रतिपादित निरतिशय आनन्दका सांसारिक पुरुषोंको अनुभव नहीं होता, यह जगत्प्रसिद्ध है । इसलिए प्रत्यक्रूपसे उस आनन्दके सर्वदा रहनेपर भी उसके अभावका अनुभव होनेसे वास्तविक अभावके न होनेपर भी काल्पनिक अविद्याप्रयुक्त निरतिशय आनन्दका अभाव माना जाता है, जो आनन्दाभाव व्यवहारका आलम्बन है, और यह अभाव जब तक अविद्या रहती है, तब तक रहता है, यह तात्पर्य है ।

‡ 'यस्मिन् सति अग्रिमक्षणे यस्य सत्त्वम् यदभावे च यस्य अभावः तत् तत्साध्यम्' अर्थात् जिसके अस्तित्वमें उत्तरक्षणमें जिसका अस्तित्व हो और जिसके अभावमें जिसका अभाव हो वह उससे साध्य होता है, प्रकृतमें ज्ञानके होनेपर उत्तरक्षणमें निरतिशय आनन्दकी अस्तिता है, और ज्ञानके अभावमें उक्त आनन्दका अभाव है, अतः ज्ञानसे वह साध्य है, इसलिए निरतिशय आनन्दमें प्राप्यता मुख्य है, यह भाव है ।

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मोक्षके प्राप्यत्व और अप्राप्यत्वका विचार ] भाषानुवादसहिते ५३१


अपरे तु अवेद्यस्याऽपुरुषार्थत्वात् संसारदशायां सदप्यनवच्छिन्नसुखस्यापरोक्ष्याभावान्न पुरुषार्थः । न च स्वरूपज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तदाऽप्यस्ति, तस्य सर्वदा स्वरूपसुखाभिन्नत्वात् । वृत्तिज्ञानेनाऽऽपरोक्ष्यं तु न मुक्तावपीति वाच्यम्, नहि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम्, घटावच्छिन्नचैतन्याभिव्यक्तौ तदभिन्नस्य घटगन्धस्याऽपि आपरोक्ष्यापत्तेः । किन्तु अनावृतार्थस्य तदभेदः । तथा चाऽनावृतत्वांशस्तत्त्वसाक्षात्कारे


※और कुछ लोग कहते हैं कि अवेद्य पुरुषार्थ नहीं होता है, अतः संसारदशामें अनवच्छिन्न सुखके रहनेपर भी आपरोक्ष्यके न रहनेसे उसमें पुरुषार्थता नहीं है । यदि शङ्का† हो कि स्वरूपज्ञानसे आपरोक्ष्य संसारदशामें भी उक्त आनन्दमें है, क्योंकि स्वरूपज्ञान सर्वदा स्वरूपसुखसे अभिन्न है, और वृत्तिज्ञानकृत अपरोक्षत्व तो मुक्तिमें भी नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि‡ अपने व्यवहारके अनुकूल चैतन्यका अभेद ही अपरोक्षत्व नहीं है, कारण कि यदि अभेदको ही अपरोक्षत्व माने, तो घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर उस चैतन्यसे अभिन्न घटके गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, किन्तु अनावृत अर्थका अनावृत चैतन्यके साथ अभेद ही अपरोक्षत्व है । इस अवस्थामें अनवच्छिन्न सुखांशमें *अनावृतत्वांशकी


* पूर्वमतसे इस मतमें यही विशेषता है कि पूर्वमतमें ब्रह्मानन्दका स्वरूप ही पुरुषार्थ है और इस मतमें ब्रह्मानन्दका आपरोक्ष्य पुरुषार्थ है, अविद्याके विद्यासे निवृत्त हो जानेपर अपरोक्षत्व प्राप्त होता है, अतः विद्यासाधनत्वकी उपपत्ति हो सकती है, यह भाव है ।

† शङ्काका भाव यह है कि विद्यासे प्राप्त होनेवाला आनन्दापारोक्ष्य क्या स्वप्रकाश चैतन्यरूप है, अथवा वृत्तिरूप है ? दोनों ही पक्ष नहीं बन सकते, क्योंकि स्वप्रकाशरूप चैतन्य तो संसारकालमें भी है, कारण कि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्वरूपमें पर्यवसित उक्त आपरोक्ष्यका संसारदशामें असत्त्व नहीं है । द्वितीय पक्ष—वृत्तिरूप कहेंगे, तोवह भी मुक्तिमें नहीं है, अतः उभयथा आपरोक्ष्यका असम्भव है, यह भाव है ।

‡ समाधानका तात्पर्य यह है कि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्व । अर्थात् अपने व्यवहारमें प्रयोजक (उपयोगी) चैतन्यके साथ वस्तुका अभेद केवल अपरोक्षत्व नहीं है, क्योंकि ऐसा माननेसे घटव्यवहारमें उपयोगी घटावच्छिन्न चैतन्यकी अभिव्यक्ति होनेपर अभिव्यक्त चैतन्यके साथ अभिन्न घटवृत्ति गन्धका भी प्रत्यक्ष हो जायगा, क्योंकि उन दोनोंके अभेदमें प्रयोजक समानेदेशत्वादि विद्यमान ही है, अतः अनावृत अर्थके साथ अनावृत चैतन्यके अभेदको ही अपरोक्षत्व कहना होगा, अतः उक्त दो प्रकारके अपरोक्षत्वको लेकर दोष नहीं हो सकता है, यह भाव है ।

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५३२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

सत्येवेति निरतिशयसुखापरोक्ष्यस्य पुरुषार्थस्य विद्याप्राप्यत्वं युक्तमित्याहुः ।

अन्ये भूमसुखाद्भेदो जीवेऽध्यस्तोऽभवत् पुरा ।
मुक्तौ तन्नाशतः प्राहुः प्राप्तिं स्फुटसुखात्मिकाम् ॥ १३ ॥

इतर लोग कहते हैं कि संसारदशामें ब्रह्मरूप सुखसे भेद भी जीवमें अध्यस्त हुआ था, मुक्तिमें उसका नाश होनेसे सुखरूप की प्राप्ति होती है ॥१३॥

इतरे तु अस्तु व्यवहारानुकूलचैतन्याभेदमात्रमापरोक्ष्यम् । तथाऽप्यज्ञानमहिम्ना जीवभेदवच्चिदानन्दभेदोऽपि अध्यस्त इति संसारदशायां पुरुषान्तरस्य पुरुषान्तरचैतन्यापरोक्ष्यवद् अनवच्छिन्नसुखापरोक्ष्यस्यापि


उपपत्ति तत्त्वसाक्षात्कार होनेपर ही हो सकती है, इसलिए निरतिशय सुखके अपरोक्षत्वरूप पुरुषार्थमें विद्याप्राप्यत्व युक्त है।

और कुछ लोग कहते हैं कि* यद्यपि स्वव्यवहारानुकूलचैतन्यका अभेदमात्र अपरोक्षत्व भले ही हो, तथापि अज्ञानके प्रभावसे जीवके भेदके समान चिदानन्दका भेद भी अध्यस्त है, इसलिए संसारदशामें पुरुषान्तरको अन्य† पुरुषके चैतन्यका जैसे आपरोक्ष्य नहीं होता, उसके समान अनवच्छिन्न सुखका भी आपरोक्ष्य नहीं होता। और अज्ञानकी निवृत्ति होनेपर तो चिदानन्दभेदके भी


* इस मतमें स्वव्यवहारानुकूल चैतन्याभिन्नत्व ही अपरोक्षत्वका लक्षण है, इसमें अनावृतत्व अंश देने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उसके न रहनेपर भी कोई दोष नहीं है। यदि शङ्का हो कि घटावच्छिन्न चैतन्य की अभिव्यक्ति होनेपर घटवृत्ति गन्धका भी अपरोक्षत्व प्रसक्त होगा, अतः अनावृतत्व अंशकी आवश्यकता है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि धर्म आदिके साक्षीमें अध्यस्त होनेसे अनावृत साक्षीरूप चैतन्याभिन्नत्वके रहनेपर भी जैसे उनका अपरोक्षत्व नहीं माना जाता है, वैसे ही प्रकृतमें समझना चाहिए । यदि शङ्का हो कि धर्म आदि तो प्रत्यक्षके अयोग्य हैं, अतः उनका प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि इसी युक्तिके आधारपर प्रकृतमें भी चाक्षुषवृत्तिसे अभिव्यक्त चैतन्यके प्रति अनुभवके अनुरोधसे गन्धको अयोग्य मानेंगे, अतः उक्त दोषका परिहार हो सकता है, इसलिए केवल स्वव्यवहारानुकूलचैतन्याभिन्नत्वको अपरोक्षत्व माननेपर भी कोई दोष नहीं है, यह भाव है ।

† जैसे एक पुरुषको अन्य पुरुषके चैतन्यका साक्षात्कार नहीं होता है, वैसे ही संसारदशामें जीवको अनवच्छिन्न आनन्दका अपरोक्ष नहीं होता, क्योंकि जैसे जीवोंका अज्ञाननिबन्धन परस्परभेद अध्यस्त है, वैसे ही अज्ञाननिबन्धन साक्षी चैतन्य और ब्रह्मानन्दका

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मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५३३


नास्ति। अज्ञाननिवृत्तौ तु चिदानन्दभेदप्रविलयात्तदापरोक्ष्यमिति तस्य विद्यासाध्यत्वमित्याहुः ॥ ४ ॥

अथ मुक्तौ भवेच्छुद्ध उतैशोऽत्र निगद्यते ।
व्यक्ता जीवैक्यवादे हि शुद्धब्रह्मैकशेषता ॥ १४ ॥

अब शङ्का होती है कि मुक्त पुरुष शुद्ध चैतन्यस्वरूप हो जाता है अथवा ईश्वररूप होता जाता है ? इस विषयमें कहते हैं कि एकजीववादमें शुद्ध चैतन्यस्वरूपसे उस जीवकी अवस्थिति व्यक्त ही है ॥१४॥

अथ विद्योदये सत्युपाधिविलयादपेतजीवभावस्य किम् ईश्वरभावापत्तिर्भवति, उत शुद्धचैतन्यमात्ररूपेणाऽवस्थानम् ? इति विवेचनीयम्। उच्यते—
एकजीववादे तदेकाज्ञानकल्पितस्य जीवेश्वरविभागादिकृत्स्नभेदप्रपञ्चस्य तद्विद्योदये विलयान्निर्विशेषचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम्।

विनष्ट होनेसे उसकी अपरोक्षता हो सकती है, इसलिए उसमें विद्यासाध्यत्व हो सकता है ॥४॥

अब शङ्का होती है कि विद्याका उदय होनेपर उपाधिका विनाश होनेसे जिसका जीवभाव निवृत्त हो गया है, उस चैतन्यकी क्या ईश्वरभावापत्ति-परमेश्वररूपता-होती है या उसका शुद्ध चैतन्यमात्रसे अवस्थान होता है, इसका निर्वचन करना चाहिए ? कहते हैं—

एक जीववादमें केवल जीवके ‡ एक अज्ञानसे कल्पित जीव और ईश्वरके विभाग आदि समस्त प्रपञ्चका उस जीवकी विद्याका उदय होनेपर विनाश होनेसे निर्विशेष चैतन्यरूपसे जीवका अवस्थान होता है ।


अनादि भेद अध्यस्त है, इसलिए ब्रह्मानन्दका अपने व्यवहारमें अनुकूल साक्षी चैतन्यके साथ अभेद न होनेसे परस्पर वस्तुतः जीवोंमें अभेदके रहनेपर भी उसके अकिञ्चित्कर होनेसे दोष नहीं है, यह भाव है।

‡ जीवके एक होनेसे उसका मूलाज्ञान भी एक ही है, यह भाव है। इसलिए एक जीवके किसी भी अन्तःकरणमें तत्त्वसाक्षात्कारके उदित होनेपर अज्ञानका देव, तिर्यक्, मनुष्य आदि सम्पूर्ण स्वकार्योंके साथ उसी दम नाश हो जाता है। यदि इस विषयमें शङ्का हो कि शुक आदिके अन्तःकरणमें उत्पन्न तत्त्वज्ञानसे ही सब प्रमाताओंके संसारका समूल विलय हो जाना चाहिए, अतः इस समय संसारकी अनुवृत्ति कैसे देखी जाती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि शुक आदिकी मुक्तिमें कोई प्रमाण ही नहीं है, और शुक आदिके मुक्तिप्रतिपादकवाक्य स्वार्थमें उपचरित हैं, अतः संसारकी अनुवृत्तिमें कोई हानि नहीं है; यह भाव है।

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५३४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेदं

अनेकजीववादेऽपि प्रतिबिम्बेशवादिनाम् ।
मुक्तस्य बिम्बसद्भावाच्छुद्धता पर्यवस्यति ॥ १५ ॥
अनेकजीववादेऽतो नाऽवच्छेदनयः शुभः ।
बद्धमुक्ताव्यवस्थानार्त्तद्देशोपाधिबन्धनात् ॥ १६ ॥

अनेकजीववादमें भी जो मायामें चैतन्यके प्रतिबिम्बको ईश्वर कहते हैं, उनके मतमें बिम्बका अस्तित्व होनेसे मुक्तकी शुद्धता ही प्रसक्त होती है । इसीसे अनेकजीववादमें अवच्छेदवाद युक्त नहीं है, क्योंकि बद्ध और मुक्त की व्यवस्था नहीं हो सकती है कारण कि तत् तत् देशवर्ती उपाधिके साथ मुक्त जीवरूप चैतन्यका सम्बन्ध है ॥१५॥१६॥

अनेकजीववादमभ्युपगम्य बद्धमुक्तव्यवस्थाङ्गीकारेऽपि यद्यपि कस्यचिद्विद्योदये तदविद्याकृतप्रपञ्चविलयेऽपि बद्धपुरुषान्तराविद्याकृतो जीवेश्वरविभागादिप्रपञ्चोऽनुवर्तते, तथाऽपि 'जीव इवेश्वरोऽपि प्रतिबिम्बविशेषः' इति पक्षे मुक्तस्य बिम्बभूतशुद्धचैतन्यरूपेणैवाऽवस्थानम् । अनेकोपाधिष्वेकस्य प्रतिबिम्बे सति एकोपाधिविलये तत्प्रतिबिम्बस्य बिम्ब-

अनेकजीववादका अङ्गीकार करके बद्ध और मुक्तकी व्यवस्थाका अङ्गीकार करनेपर भी जिस पुरुषको ज्ञानकी उत्पत्ति हुई है, उसी पुरुषके प्रति अविद्यादि समस्त प्रपञ्चका विलय होगा और अन्य बद्ध पुरुषोंकी अविद्यासे जीव तथा ईश्वर विभाग आदि प्रपञ्चकी यद्यपि अनुवृत्ति हो *सकती है, तथापि 'जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्बविशेष है' इस पक्षमें मुक्त पुरुष बिम्बभूत शुद्ध चैतन्यरूपसे ही अवस्थित रहता है । क्योंकि अनेक उपाधियोंमें एक ब्रह्म चैतन्यके प्रतिबिम्ब होनेपर एक उपाधिके विलयसे उस प्रतिबिम्बका बिम्ब-


*अर्थात् अनेक जीववादमें वक्ष्यमाण प्रकारसे जब तक सबकी मुक्ति नहीं हो जाती तब तक मुक्त पुरुषकी अन्य पुरुषनिष्ठ अविद्याकृत ईश्वरभावप्राप्ति रहती है, यह भाव है। यदि प्रकृतमें शङ्का हो कि मूल ग्रन्थमें 'यद्यपि' शब्द कहा गया है, इससे यह अर्थ होगा कि यद्यपि ईश्वरभावापत्ति हो सकती है, तथापि नहीं हो सकती है, यह कथन भी युक्त नहीं है, क्योंकि अनेकजीववादका निरुपण अनेक प्रकारोंसे उपलब्ध होता है, इसलिए सब अनेक जीववादोंमें मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति नहीं हो सकती है, किन्तु जीवके समान ईश्वर भी प्रतिबिम्ब है, इस पक्षमें शुद्ध चैतन्यरूपसे जीवकी अवस्थिति होती है, इसी अर्थका सूचन करनेके लिए 'यद्यपि' शब्द दिया गया है, यह भाव है ।

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मुक्तिके स्वरूपका विचार ] · भाषानुवादसहित ५३५

भावेनैवाऽवस्थानौचित्येन प्रतिबिम्बान्तरत्वापत्यसम्भवात् । तत्सम्भवे कदाचिज्जीवरूपप्रतिबिम्बान्तरत्वापत्तेरपि दुर्वारत्त्वेनाऽवच्छेदपक्ष इव मुक्तस्य पुनर्वन्धापत्तेः । अत एवाऽनेकजीववादे अवच्छेदपक्षो नाऽऽद्रियते । यदवच्छेदेन मुक्तिस्तदवच्छेदेनाऽन्तःकरणान्तरसंसर्गे पुनरपि बन्धापत्तेः ।

बिम्बेशवादे मुक्तः प्राक् सर्वजीवविमोचनात् ।
ईशो भूत्वा ततः शुद्धे स्वभावे व्यवतिष्ठते ॥ १७ ॥

बिम्ब चैतन्य ईश्वर है, इस पक्षमें जब तक सब जीवों की मुक्ति नहीं होती तब तक मुक्त जीव ईश्वर रहकर फिर सब जीवोंके मुक्त होनेपर शुद्धस्वभाव ब्रह्म हो जाता है ॥१७॥


भावसे अवस्थान उचित है, अतः प्रतिबिम्बान्तरभावकी आपत्ति नहीं हो सकती है। यदि उसका प्रतिबिम्बान्तरभाव माना जाय, तो किसी समय उसका जीवरूप प्रतिबिम्बान्तरभाव भी प्रसक्त हो सकता है, इसलिए अवच्छेद पक्षके समान मुक्त पुरुषको पुनः बन्धकी आपत्ति हो सकती है। इसीलिए अनेक जीववादमें अवच्छेद पक्षका अङ्गीकार नहीं किया जाता है, क्योंकि यदवच्छेदेन मुक्ति हुई हो, तदवच्छेदेन अन्तःकरणान्तरका सम्बन्ध होनेपर फिर भी बन्धकी ‡ आपत्ति हो सकती है ।


‡ पूर्ण चैतन्यमें जिस चैतन्यप्रदेशसे मुक्ति हो, उस प्रदेशमें चैतन्यके साथ अन्य उपाधिका सम्बन्ध होनेपर फिर बन्धकी आपत्ति हो सकती है, यह भाव है। चैतन्यप्रदेशसे मुक्तका ग्रहण करना चाहिए ।

इस विषयमें एक विचार करना चाहिए कि चैतन्य तो स्वतः नित्यमुक्त है, वह जब अनादि अविद्यादि उपाधिसे युक्त होता है, तब उसमें जीवत्व या बन्धकी सम्भावना हो सकती है, यह वस्तुस्थिति है, इस अवस्था में मुक्तिके पूर्वमें जिस उपाधिपरतन्त्रचैतन्यप्रदेशमें बन्ध था, उसमें फिर बन्धकी आपत्ति नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्तिकालमें उस उपाधिकी निवृत्ति हो जानेसे उपाधिपरतन्त्र बन्धाश्रय चैतन्यकी भी निवृत्ति हो ही जाती है। और शुद्ध मुक्त चैतन्यमें भी बन्धका आपादन नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उसमें बद्ध जीवान्तरकी उपाधिके संसर्गसे जीवान्तरत्वकी आपत्ति आ सकती है, तथापि जो बद्ध मुक्तिको प्राप्त हुआ है, उसमें पुनः बन्धकी प्रसक्ति नहीं हो सकती है, अतः उसमें बन्धकी आपत्ति होती है, यह कहना असङ्गत है, किञ्च, मुक्त चैतन्यका अन्य अन्तःकरणके साथ संसर्ग होनेसे उससे जीवान्तरत्वकी आपत्ति होनेपर भी 'जो मैं पूर्वमें संसारी होकर मुक्त था, वही मैं पुनः संसारको प्राप्त हुआ' इस प्रकारका अनुसन्धान (प्रत्यभिज्ञा) नहीं हो सकती है, क्योंकि मुक्त जीव और बद्ध जीवकी एक उपाधि नहीं है। इसलिए जीवान्तरत्वकी प्राप्ति जो मूलमें दी गई है, वह अकिञ्चित्कर है। इसी प्रकार पूर्वोक्त प्रतिबिम्बरूप जीवान्तरत्वकी भी प्रसक्ति नहीं हो सकती है।

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५३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थः परिच्छेदः

'प्रतिबिम्बो जीवः, बिम्बस्थानीय ईश्वरः, उभयानुस्यूतं शुद्धं चैतन्यम्' इति पक्षे तु मुक्तस्य यावत्सर्वमुक्तिसर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वसर्वेश्वर-त्वसत्यकामत्वादिगुणपरमेश्वरभावापत्तिरिष्यते । यथा अनेकेषु दर्पणेषु एकस्य मुखस्य प्रतिबिम्बे सति एकदर्पणापनये तत्प्रतिबिम्बो बिम्बभावे-नाऽवतिष्ठते, न तु मुखमात्ररूपेण, तदानीमपि दर्पणान्तरसन्निधानप्रयुक्तस्य मुखे बिम्बत्वस्याऽनपायात्, तथैकस्य ब्रह्मचैतन्यस्याऽनेकेषूपाधिषु प्रति-बिम्बे सति, एकस्मिन् प्रतिबिम्बे विद्योदये तेन तदुपाधिविलये तत्प्रति-बिम्बस्य बिम्बभावेनाऽनवस्थानावश्यम्भावात् । न च मुक्तस्याऽविद्याऽ-भावात् सत्यकामतादिगुणविशिष्टसर्वेश्वरत्वानुपपत्तिः । तदविद्याऽभावे-

  • अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, बिम्बस्थानीय चैतन्य ईश्वर है और उभयमें अनुस्यूत चैतन्य शुद्ध चैतन्य है, इस पक्षमें तो मुक्त पुरुषकी, जब तक कि सब जीव मुक्त न हों, तब तक सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वेश्वरत्व, सत्यकामत्व आदि गुणोंसे विभूषित ईश्वरके साथ तादात्म्यरूपसे अवस्थिति मानी जाती है । जैसे अनेक दर्पणोंमें एक मुखके प्रतिबिम्बित होनेपर उनमें से एक दर्पणके हटानेपर उसमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब बिम्बरूपसे अवस्थित रहता है, मुखमात्रसे अवस्थित नहीं रहता, क्योंकि एक दर्पणके हटानेपर भी अन्य दर्पणके सन्निधानप्रयुक्त बिम्बत्व मुखमें विद्यमान है, वैसे ही एक ब्रह्म-चैतन्यके अनेक उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होनेपर एक प्रतिबिम्बमें विद्याके उदित होनेपर उससे उस उपाधिके विलीन होनेके कारण उसमें पड़े हुए प्रतिबिम्बकी भी बिम्बरूपसे अवश्य अवस्थिति होगी । यदि शङ्का हो कि उक्त पुरुषको अविद्याका अभाव होनेसे सत्यकामत्व आदि गुणोंसे युक्त सर्वेश्वरत्वकी अनुपपत्ति हो जायगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ॐ उस कालमें मुक्त पुरुषकी

  • यदि शङ्का हो कि अनेक जीववादमें प्रतिबिम्बेश्वरपक्षमें मुक्तको ईश्वरभावापत्ति नहीं हो सकती है और अवच्छेद पक्षमें तो मुक्ति ही नहीं है, तो फिर ईश्वरभावापत्ति किस पक्षमें होगी ? तो इस शङ्काका उत्तर इस ग्रन्थसे देते हैं ।
  • प्रकृत ग्रन्थमें अविद्याके नानात्वव्यवहारसे अनेक अविद्याओंमें प्रतिबिम्बित अनेक जीव हैं और अन्तःकरण तो उनमें रहनेवाले कर्तृत्व आदिकी उपाधि है, यह सूचित किया गया है, इसलिए मुक्त पुरुषका ऐश्वर्य अविद्याप्रयुक्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे परमार्थरूपसे एकरूप ही सर्वदा मुक्ति है, अतः ब्रह्मसूत्रके तृतीयाध्यायके अन्तिम अधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।
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मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषाअनुवादसहित ५३७


पि तदानीं बद्धपुरुषान्तराविद्यासत्त्वात् । नहीश्वरस्येश्वरत्वं सत्यकामा-
दिगुणवैशिष्ट्यं च स्वाविद्याकृतम्, तस्य निरञ्जनत्वात्, किन्तु बद्धपुरुषा-
विद्याकृतमेव तत्सर्वमेष्टव्यम् ।

न च विद्यान्तरफलैः साम्यं मोहपरिक्षयात् ।
तेषु भोगस्य साम्येऽपि जगद्व्यापारवर्जनात् ॥ १८ ॥

सगुण उपासनाओंके फलोंके साथ मुक्तिका साम्य भी नहीं है, साम्य होनेपर भी जगद्व्यापार उसमें नहीं है ॥ १८ ॥

न च 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' 'तं यथा यथोपासते' इत्यादिश्रुतिषु सगुणोपासकानामपीश्वरसायुज्यश्रवणाद् मुक्तेः सगुणविद्याफलाविशेषापत्तिः । सगुणोपासकानामखण्डसाक्षात्कारा-


अविद्या नहीं है, तथापि बद्ध पुरुषान्तरकी अविद्या विद्यमान है। और * ईश्वरका ईश्वरत्व है, और सत्यकामत्वादिवैशिष्ट्य अपने आश्रित अविद्या-से जन्य नहीं हैं, क्योंकि ईश्वर तो निरञ्जन अर्थात् सम्पूर्ण दोषोंसे रहित है, किन्तु बद्धपुरुषकी अविद्यासे ही उसमें ईश्वरत्व आदि हैं, यह समझना चाहिए।

यदि शङ्का हो कि 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके०' ( जिस गुणसे युक्त ब्रह्मकी इस लोकमें पुरुष उपासना करता है उसी गुणसे युक्त ब्रह्मको मरणके बाद प्राप्त करता है ) 'तं यथा यथोपासते' ( उस ईश्वरकी जिन जिन गुणोंसे युक्ततया उपासना करता है, वह उस गुणसे विशिष्टको प्राप्त करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें सगुण उपासककी भी ईश्वरसायुज्यरूप मुक्ति सुनी जाती है, अतः मुक्ति भी


* इसमें यदि किसीको शङ्का हो कि जीवकी संसारिता जैसे अपनी अविद्यासे होती है, वैसे ही ईश्वरकी ईश्वरता भी उसकी उपाधिसे ही होगी, इसलिए मुक्त पुरुषमें उपाधिके न रहनेसे ऐश्वर्य नहीं हो सकता, इस शंकाका इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं—तात्पर्य यह है कि ईश्वरकी उपाधि क्या अविद्या है या अविद्याभिन्न माया है ? द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्यामें बिम्बभूत चैतन्यमें जीवाश्रित अविद्यासे ही ऐश्वर्य हो सकता है, तो फिर अतिरिक्त मायारूप उपाधिकी कल्पना व्यर्थ ही है और तत्तत् जीवगत तत्त्वज्ञानसे तत्तत् अविद्याकी निवृत्ति होगी, इस क्रमसे सब जीवोंकी मुक्तिके बाद भी मायाका निवर्तक न होनेसे उस समयमें भी माया अवश्य रहेगी। 'मम माया दुरत्यया' इत्यादि एकवचनान्त निर्देश जातिके अभिप्रायसे है, अतः अविद्याके नानात्वपक्षमें दोष नहीं है, प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ईश्वरका ऐश्वर्य स्वाविद्याकृत नहीं है, यह भाव है।

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५३८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद


भावाद् नाऽविद्यानिवृत्तिः, न वा तन्मूलाहङ्कारादेर्विलयः । आवरणा-
निवृत्तेर्नाखण्डानन्दस्फुरणम् । ‘जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च’
(उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १७) ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’
(उ० अ० ४ पा० ४ सू० २१) इत्यादिसूत्रोक्तन्यायेन तेषां पर-
मेश्वरेण भोगसाम्येऽपि सङ्कल्पमात्रात् स्वभोगोपयुक्तदिव्यदेहेन्द्रियवनि-
तादिसृष्टिसामर्थ्येऽपि सकलजगत्सृष्टिसंहारादिस्वातन्त्र्यलक्षणं न निरव-
ग्रहमैश्वर्यम् । मुक्तानां तु निस्सन्धिबन्धमीश्वरभावं प्राप्तानां तत्सर्वमिति


सगुणविद्याके फलके समान ही होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सगुणोपासकों-
को अखण्डब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता है, अतः उनकी अविद्याकी निवृत्ति
नहीं होती है और अविद्यामूलक अहङ्कार आदिकी भी निवृत्ति नहीं होती ।
आवरणकी निवृत्ति न होनेके कारण अखण्ड आनन्दकी स्फूर्ति भी नहीं
होती । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’* और ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’ † इत्यादि
सूत्रोक्तन्यायसे यद्यपि उन सगुण उपासकोंका भोग परमेश्वरके साथ समान है
और सङ्कल्पमात्रसे ‡ अपने भोगके उपयुक्त दिव्य देह, इन्द्रिय, वनिता आदिकी
सृष्टिमें सामर्थ्य है, तथापि सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि, संहार आदिमें स्वातन्त्र्यरूप
अप्रतिहत ऐश्वर्य नहीं है । और मुक्त पुरुषोंके, जो कि निर्गुण उपासनाके
प्रभावसे सर्वात्मरूपसे ईश्वरभावको प्राप्त हुए हैं, पूर्वोक्त अविद्यानिवृत्ति


* इस सूत्रका यह अर्थ है—सम्पूर्ण जगत्‌की सृष्टि, स्थिति और संहार करनेकी ईश्वरमें जो शक्ति है उससे भिन्न अपने भोगमें उपयुक्त भोग्यभोगोपकरणमात्रकी उत्पत्ति करनेकी ही उपासकोंमें शक्ति हो जाती है, क्योंकि जगत्‌की सृष्टिमें ‘आत्मनः आकाशः सम्भूतः’ इत्यादिसे परमात्माका ही उल्लेख किया गया है और सृष्टिवाक्योंमें उपासकोंका सन्निधान भी नहीं है ।

† हिरण्यगर्भके शरीरमें प्रवेश करके भोग भोगनेवाले परमेश्वरके साथ उपासकोंका केवल भोगमात्रमें ही साम्य है, क्योंकि उसमें प्रमाण है—‘तमाह आपो वै खलु मीयन्ते लोकोऽसौ’ अर्थात् अपने पास आये हुए उपासकसे उसने कहा कि मैं अमृतरूप जलका भोग करता हूँ, अतः तुम्हें भी इसी अमृतरूप जलका भोग करना चाहिए, यह भाव है ।

‡ ‘यं ये कामं पित्रादिरूपं कामयते स स कामः सङ्कल्पादेव समुत्तिष्ठति’ (उपासक पिता आदि जिन जिन पदार्थोंकी अभिलाषा करता है, वे सबके सब केवल इसके सङ्कल्पमात्रसे ही प्राप्त हो जाते हैं, इस श्रुतिसे केवल भोग्य पदार्थ ही सङ्कल्पसिद्ध प्रतीत होते हैं, यह भाव है ।

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[मुक्तके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहित ५३९


महतो विशेषस्य सद्भावात् । न च परमेश्वरस्य रघुनाथाद्यवतारे तमस्वित्वदुःखसंसर्गादिश्रवणाद् मुक्तानामीश्वरभावे पुनर्बन्धापत्तिः, तस्य विप्रशापामोघत्वादित्वकृतमर्यादापरिपालनाय कथंचिद् भृगुशापादिसत्यत्वं


आदि सभी विद्यमान हैं, अतः महान् अन्तर है। × यदि शङ्का हो कि परमेश्वरको रामचन्द्र आदि अवतारोंमें अज्ञान और दुःखसम्बन्ध आदि सुने जाते हैं, इसलिए मुक्त पुरुषोंका ईश्वरभाव होनेपर भी फिर बन्धकी आपत्ति हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ब्राह्मणों द्वारा दिये गये शापोंमें अमोघत्व आदि स्वकृत मर्यादाके परिपालनके लिए और किसी प्रकारसे भृगुऋषिके शापादिके ❊ सत्यत्वप्रख्यापनके लिए नरके समान वह केवल


× शङ्काका तात्पर्य यह है कि रामचन्द्र, श्रीकृष्ण आदि जितने ईश्वरके अवतार हैं, उनमें अज्ञान आदि वर्तमान हैं, क्योंकि इस अर्थमें उन्हींके वाक्य उपलब्ध होते हैं, जैसे कि—
'आत्मानं मानुषं मन्ये रामं दशरथात्मजम्' अर्थात् रामचन्द्रजी अपनेको दशरथका पुरुषरूप पुत्र समझने लगे, और—
'राज्यनाशो वने वासः सीता नष्टा द्विजो हतः ।
ईदृशीयं ममालक्ष्मीर्निर्दहेदपि पावकम् ॥'
'न मद्विधो दुष्कृतकर्मकारी'
अर्थात् राज्यनाश, वनमें वास, सीताका नाश, ब्राह्मणका ( रावणका ) विनाश आदि मेरे महापातक अग्निको भी दग्ध कर सकते हैं, मेरे जैसा संसारमें अन्य कोई दुष्कृत कर्म करनेवाला नहीं है, इत्यादि वाक्य रामचन्द्रजीको अत्यन्त दुःखी सूचन करते हैं और 'सुग्रीवं शरणं गतः' इत्यादिसे उनकी दीनता भी सूचित होती है। उत्तरका तात्पर्य यह है कि यद्यपि अज्ञान आदिका उक्त वचनोंसे ईश्वरावतारमें श्रवण होता है, तथापि वह श्रवण केवल ईश्वरका नटके समान अभिनयमात्र बोधक है अर्थात् ईश्वरने संसारके निर्माणके समयमें उसकी ठीक ठीक व्यवस्था रहे इसलिए मर्यादा बनाई है, जैसे ब्राह्मणोंके शापमें अवन्ध्यत्व आदि । उस मर्यादाका परिपालन करनेके लिए उसको भी वैसा ही आचरण लोकमें करना चाहिए जिससे कि मर्यादाका भङ्ग न हो । और श्रीरामचन्द्र स्वयं सर्वज्ञ एवं साक्षात् ईश्वर थे, तथापि महादेव; इन्द्र आदिके सामने विनयको सूचन करनेके लिए ही अपने आपको मनुष्य बतलाते हैं और अपनी उद्दण्डताका खण्डन करते हैं । यदि अपने आप अपना अभिमान प्रकट करते, तो लोकमें भी इसका बुरा प्रभाव पड़ता और लोकमें एक प्रकारसे अनर्थ फैलता, अतः लोककी शिक्षाके लिए वैसे वचन हैं, यह समझना चाहिए । इसी प्रकार अनेक मर्यादाओंके परिपालनके लिए तत्-तत् वचनोंकी सङ्गति लगानी चाहिए, यह भाव है ।

❊ भृगुशापका अङ्गीकार और उसकी सत्यताको लोकमें बतलानेके लिए ईश्वरका मनुष्य-रूपसे अवतार है, यह भाव है, इस विषयमें उत्तररामायणमें एक कथा उपलब्ध होती है


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५४०सिद्धान्तलेशसंग्रहे[ चतुर्थ परिच्छेद

प्रत्याययितुं नटवदीश्वरस्य तदभिनयमात्रपरत्वात् । अन्यथा तस्य नित्यमुक्तत्वनिरवग्रहस्वातन्त्र्यसमाभ्यधिकराहित्यादिश्रुतिविरोधात् । तस्माद्यावत्सर्वमुक्ति परमेश्वरभावो मुक्तस्येति बिम्बेश्वरभावे न कश्चिद्दोषः ।

अभिनयमात्र करता है, इसके सूचनके लिए ही रामादि अवतारोंमें अज्ञानका कथन है, वस्तुतः नहीं। † यदि ऐसा न माना जाय, तो उस परमात्मामें नित्यमुक्तत्व, निरवग्रहस्वातन्त्र्य एवं सम और अभ्यधिकके राहित्य आदिका जो श्रुतिने प्रतिपादन किया है, उसका विरोध हो जायगा । इससे जब तक सभी जीवोंकी मुक्ति नहीं होती, तब तक मुक्त पुरुषका परमेश्वरके साथ तादात्म्य-रूपसे अवस्थान होता है, अतः बिम्बभूत ईश्वरभावमें कोई दोष नहीं है ।


और वह दशरथके प्रति दुर्वासासे कही गई है—

एक समय देवताओंका और असुरोंका परस्पर भयङ्कर युद्ध हुआ, उस युद्धमें देवताओंने असुरोंका पराजय किया। असुर लोग अपनी रक्षाके लिए भृगु ऋषिकी पत्नीकी शरणमें गये, उसने असुरोंको अभयप्रदान किया और निर्भय होकर वे रहने लगे। भगवान्‌को जब यह मालूम हुआ तब उन्होंने क्रुद्ध होकर अपने चक्रसे भृगुपत्नीका माथा काट डाला। अपनी पत्नीका शिरच्छेद देखकर भृगुने विष्णुको सहसा शाप दिया कि अरे विष्णु ! तुमने मेरी पत्नीका वध किया है, इसलिए तुम मनुष्ययोनिमें जन्म पाकर अपनी पत्नीके वियोगमें अनेक वर्षतक दुःख भोगोगे । परन्तु भगवान्‌की अमोघशक्तिसे वह शाप भगवान्‌को नहीं लगा, बल्कि वापस आकर भृगुको ही सताने लगा । जब उन्होंने इस शापसे अत्यन्त दुःखी होकर शापसे मुक्त होनेके लिए अन्य ऋषियोंकी प्रार्थना की तब उन्होंने विष्णुकी उपासनाके लिए सलाह दी । सलाहके अनुसार भृगुने विष्णुकी उपासना की । फलतः भगवान् प्रसन्न हुए और कहा कि हे भृगु, तुम दुःखी मत होओ, तुम्हारा दिया हुआ शाप मैं वापिस ले लेता हूँ और तुम्हारे शापकी सत्यताके लिए मैं मनुष्य भी होऊँगा और पत्नीवियोगका कष्ट भी सहन करूँगा । तब भृगुने अनेक प्रकारसे भगवान्‌की अर्चना और स्तुति की । इस प्रकार शापकी रक्षाके लिए भगवान्‌ने नर बनकर यह सब अभिनय किया, यह भाव है ।

† 'एष त आत्मा सर्वान्तर्र्याम्यमृतः, एष सर्वेश्वरः, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' ( यही तुम्हारा आत्मा अमृत ( नित्य ) और सबका अन्तर्यामी है, यही सबका नियामक है, इस आत्माकी बराबरी करनेवाला और इससे अधिक दूसरा नहीं है, निर्गुणोपासक संसारसे तर जाता है, वही परमपद है ) इत्यादि श्रुतियोंसे 'नारायणात् ब्रह्मा जायते, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः' ( नारायणसे ब्रह्मा हुआ, बाहर और भीतर सबको व्याप्त करके नारायण अवस्थित है ) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे सिद्ध ईश्वरमें नित्यमुक्तत्व आदि धर्म सुने जाते हैं, यह भाव है ।

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मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४१

पक्षोऽयं चरमः साधुः सूत्रभाष्यादिषु स्फुटः ।
आविर्भूतस्वरूपेऽपि गुणाष्टकनिरूपणात् ॥ १९॥

यह अन्तिम पक्ष ही श्रेष्ठ है, क्योंकि सूत्र, भाष्य आदिमें इसीकी स्पष्टता पाई जाती है, सगुण अपरोक्ष ब्रह्मानुभवसे ईश्वरस्वरूपमें आविर्भूत जीवमें आठ गुणोंका निरूपण किया गया है ॥ १९ ॥

अयमेव पक्षः श्रुतिसूत्रभाष्याद्यनुगुणः । तथा हि—समन्वयाध्याये तावद् ‘दहर उत्तरेभ्यः’ (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १४) इत्य- धिकरणे ‘अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन् अन्तराकाशः’ इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टो दहराकाशो न भूताकाशः, नापि जीवः, किन्तु परमेश्वरः, उत्तरेभ्यो वाक्यशेषेभ्यः । ‘उभे अस्मिन् द्यावा- पृथिवी अन्तरेव समाहिते’ ‘यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ ‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपि- पासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः’ इत्यादिना प्रतिपाद्यमानेभ्यो द्यावा- पृथिव्याद्याधारत्वलक्षणगुणेभ्यो हेतुभ्य इति निर्णीय ‘उत्तराच्चेदाविर्भूत-

यही पक्ष श्रुति, सूत्र और भाष्य आदि सम्मत है—क्योंकि समन्वया- ध्यायमें ‘दहर उत्तरेभ्यः’ इस अधिकरणमें ‘अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म०’* इत्यादि श्रुतिमें उक्त दहराकाश भूताकाश नहीं है, और जीव भी नहीं है, किन्तु परमेश्वर ही है, ‘उमे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ (इस प्रकृत दहराकाशमें अन्तः द्युलोक और पृथ्वी स्थित हैं) ‘यावान्वा०’ (यह जितना बड़ा बाहरका भूताकाश है उतना ही बड़ा हृदयके भीतर दहराकाश है) ‘एष आत्मा०’ (आत्मा पापसम्बन्धसे रहित है, जरासे रहित है, मृत्युसे रहित है, शोकसे रहित है, भोजनेच्छासे रहित है, पिपासासे रहित है, आत्मा सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है) इत्यादि श्रुतिसे प्रतिपादित द्यु, पृथ्वी आदिके प्रति आश्रयत्व प्रभृति गुणरूप हेतुओंसे दहराकाशसे परमात्माका ही ग्रहण† है, ऐसा निर्णय करके


* ब्रह्मकी उपलब्धिमें हेतुभूत जो यह शरीर है उसमें छोटे आकारका जो पुण्डरीक है, उसके भीतर दहर आकाश है, यह इस श्रुतिका अर्थ है। और ‘दहर उत्तरेभ्यः’ इस सूत्रसे, दहराकाश शब्दसे परमात्मा ही लिया जायगा, किससे ? उत्तरके वाक्यशेषोंसे, इस प्रकारका जो अर्थ होता है, उसीका ही इस अग्रिम ग्रन्थसे कथन है।
† कारण कि दहराकाशशब्दसे यदि भूताकाश लिया जाय, तो उसमें सत्यसङ्कल्पत्व

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५५२सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

स्वरूपस्तु' (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १९) इति सूत्रान्तरेण दहरविद्यानन्तरमिन्द्रप्रजापतिसंवादे 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यादिना अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकयुक्तमात्मानमुपदेक्ष्यमुपक्षिप्य 'य एषोऽक्षिणि


'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु'‡ इस प्रकारके अन्य सूत्रसे—दहरविद्याके बादके इन्द्रप्रजापतिके संवादमें 'य आत्माऽपहतपाप्मा'× (जो आत्मा है, वह पाप-रहित है) इत्यादि श्रुतिसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त उपदेश्य आत्माका प्रस्ताव करके 'य एषोऽक्षिणि' (जो आँखमें पुरुष देखा जाता है, वही तुम्हारा


आदि गुणोंकी अनुपपत्ति होगी। यदि जीव लिया जाय, तो उसमें पृथ्वी आदि जगत्का आधारत्व नहीं आ सकता है, अतः दहराकाश परमात्मा ही है, ऐसा निर्णय होता है, यह भाव है।

‡ इस सूत्रका यह अर्थ है—उत्तरात् अर्थात् 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि उत्तरके प्रजापति-वाक्यसे अपहतपाप्मत्वादि गुणवाला जीव ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस उत्तरवाक्यमें आविर्भूतस्वरूपवाले—अपने ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए जीवका ही कथन है, जीवत्वविशिष्ट जीवका नहीं, अतः अपहतपाप्मत्वादिविशिष्ट परमात्मस्वरूप ही है, जीव नहीं है, इससे दहराकाश जीव नहीं हो सकता, यह अर्थ है।

× इन्द्र और विरोचन प्रजापतिके पास आत्मज्ञानकी इच्छासे गये, उस समयके ये प्रजापतिके वाक्य हैं (छान्दोग्य ८-७-४) और ये वाक्य 'अपहतपाप्मा' इत्यादि वाक्यसे पूछे गये आठ गुणोंसे युक्त उपदेश्य आत्माके उत्तररूपमें कहे गये हैं, इसलिए आठ गुणोंसे युक्त आत्मा जीव ही प्रतीत होता है। यह ख्यालमें रखना चाहिए कि इस ग्रन्थका दूर तक सम्बन्ध है, इसमें पर्यायशब्द जो आये हुए हैं, उनका अर्थ—प्रकार या तरीका, अथवा एक आत्मरूप अर्थके बोधक वाक्य—करना चाहिए, अर्थात् चार प्रकारसे आत्माका बोध करानेके लिए प्रजापति द्वारा उक्त वाक्य, यह मूलग्रन्थमें 'पर्याय' शब्दका अर्थ होगा। समुदित ग्रन्थका तात्पर्य यह है कि 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि वाक्योंसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त जीव भी प्रतीत होता है, इसलिए अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण दहराकाशमें परमेश्वरके निर्णायक नहीं हो सकते हैं। यदि कथञ्चिद् कहें कि प्रजापतिके चार वाक्योंमें से प्रथम वाक्यमें जाग्रदवस्थाका बोधक कोई पद नहीं है, अतः प्रजापतिके चार पर्यायोंका तात्पर्य जीवके बोधनमें नहीं हो सकता है, इसलिए प्रजापतिके प्रथम वाक्यसे परमात्माका ही प्रतिपादन है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक वाक्योंमें पहले 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका [जाग्रदादि अवस्थापन्न जीवका] फिर तुझे उपदेश करता हूँ) इस वाक्यके होनेसे प्रत्योक्त चार प्रकारके श्रुतिवाक्योंसे जीवका ही प्रतिपादन है, इस प्रकारकी आशङ्का करके इस शङ्काका समाधान करते हुए सूत्रकारने 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रसे मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलाई है।

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मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४३


पुरुषो दृश्यते एष आत्मा' इति जाग्रदवस्थायां द्रष्टृत्वेनाक्षिसन्निहितस्य 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति एष आत्मा' इति स्वप्नावस्थापन्नस्य 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तस्सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानाति एष आत्मा' इति सुषुप्त्यवस्थापन्नस्य 'एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः' इत्यवस्थात्रयोत्तीर्णस्य च जीवस्योपदेशाद् जीवेऽप्यस्ति अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकमिति न तद् दहराकाशस्य परमेश्वरत्वनिर्णायकम्, 'य एष स्वप्ने' इत्यादिपर्यायेषु प्रतिपर्यायम् 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-


आत्मा है ) इस श्रुतिसे जाग्रदवस्थामें द्रष्टारूपसे अक्षिसन्निहित जीवका, 'य एष स्वप्ने०' (जो यह स्वप्नमें वनिता आदिसे पूज्यमान होकर विषयोंका अनुभव करता है, वह आत्मा है ) इत्यादि श्रुतिसे स्वप्नावस्थापन्न जीवका, 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तः०' ( जिस कालमें यह जीव सुषुप्तिको प्राप्त होता है और इसके समस्त करणोंका समुदाय विलीन हो जाता है, तब अपने स्वरूपभूत आनन्दमें मग्न होकर स्वप्नको भी नहीं देखता है, वही आत्मा है ) इस प्रकारकी श्रुतिसे सुषुप्त्यवस्थापन्न जीवका और 'एष सम्प्रसादो०' (सुषुप्ति अवस्थासे उपलक्षित जीव शरीरसे उत्क्रमण करके देवयान मार्गको पा कर अपनी उपासनाके फलभूत ऐश्वर्यसे युक्त स्वरूपको प्राप्त करता है * ) इत्यादि श्रुतिसे अवस्थात्रयसे रहित जीवका उपदेश होनेसे जीवमें भी अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण विद्यमान हैं, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं हो सकता है, क्योंकि 'य † एष स्वप्ने०' इत्यादि पर्यायोंके प्रत्येक पर्यायमें 'एतं त्वेव भूयोऽनु-


* इस वाक्यका पूर्वपक्षकी रीतिसे ब्रह्मलोकमें गया हुआ, उपासक, जीव उत्तमपुरुष अर्थात् अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त होता है, यह अर्थ समझना चाहिए ।

† तात्पर्य यह है कि प्रजापतिवाक्यमें चार पर्यायोंका सर्वथा जाग्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें तात्पर्य नहीं है, क्योंकि प्रथम पर्यायमें किसी जाग्रदवस्थापन्न जीववाची पदके न होनेसे यह जाग्रदवस्थापन्न जीवका बोधक नहीं हो सकता है । इसलिए प्रथम पर्यायसे इन्द्र और विरोचन द्वारा अपहतपाप्मत्वादि गुणोंसे युक्त जिस आत्माके विषयमें प्रश्न किया जाता है, वही आत्मा निर्दिष्ट है, और वह ब्रह्म है, इसलिए प्रजापतिवाक्यमें भी आठ गुणोंसे संयुक्त ब्रह्मका ही उपदेश किया गया है, जीवका नहीं, अतः यह आशङ्का नहीं हो सकती है कि गुणाष्टक दहराकाशमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं है, इस मध्यवर्ती शङ्काका इससे परिहार करते हैं ।

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५४४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

व्याख्यास्यामि' इति श्रवणेन स्फुटस्वप्नादिजीवलिङ्गानां द्वितीयादि-पर्यायाणामेव जीवविषयत्वम्, प्रथमपर्यायस्य च ब्रह्मविषयत्वमिति चोद्यानवकाशादित्याशङ्क्य तत्र चतुर्थपर्याये निरूप्यमाणः सकलबन्धविनिर्मुक्तत्वेनाऽऽविर्भूतस्वरूपो जीवः प्रतिपाद्यः । न तु सांसारिकावस्था-

व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका पुनः व्याख्यान करता हूँ) ऐसा श्रवण होनेसे—जिनमें स्वप्न आदि जीवलिङ्ग स्पष्टरूपसे प्रतीत होते हैं, ऐसे द्वितीय आदि पर्यायोंका ही जीव विषय है और प्रथम पर्यायका ब्रह्म विषय है, इस प्रकारके प्रश्नका—अवकाश नहीं है, ऐसी आशङ्का करके 'उन चार पर्यायोंमें से चतुर्थ पर्यायमें निरूप्यमाण सम्पूर्ण सांसारिक बन्धनोंसे विनिर्मुक्त अपने स्वस्वरूपमें आविर्भूत जीव ही प्रतिपाद्य है, सांसारिक अवस्थाविशेषसे कलुषित जीव प्रतिपाद्य नहीं है, क्योंकि सांसारिक आत्मामें * सत्यसङ्कल्पत्व


पूर्वपक्षीका यह भाव है कि द्वितीय आदि जो पर्यायवाक्य हैं, वे जीवपरक ही हैं, ऐसा तो निश्चित ही है। इसी प्रकार प्रथम पर्यायवाक्यका भी जीवको ही विषय मानना चाहिए, क्योंकि प्रथम पर्यायमें निर्दिष्ट आत्माका ही 'एतं त्वेव' इत्यादि वाक्यस्थित सर्वनाम 'एतत्' शब्दसे परामर्श होनेसे अर्थभेद माननेपर एतच्छब्दकी अनुपपत्ति होगी। इसीसे यह प्रश्न भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि प्रथम पर्यायकी विषयता चक्षुःस्थ प्रतिबिम्बमें है, और वह दृश्यमान भी है, क्योंकि द्वितीय पर्यायगत एतच्छब्दसे प्रथमपर्यायमें ही निर्दिष्ट अक्षिस्थ पुरुषके अमृतत्व, अभयत्व, ब्रह्मत्व आदिका कथन है, और इन सबकी प्रतिबिम्बमें उपपत्ति नहीं हो सकती है। यदि शङ्का हो कि उन गुणोंकी जीवमें भी उपपत्ति नहीं हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जाग्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें उक्त गुण यद्यपि नहीं रह सकते हैं, तथापि उन अवस्थाओंसे रहित जीवमें उक्त गुण हैं, ऐसा प्रजापतिवाक्यसे प्रतीत होता है।

* यदि शङ्का हो कि चौथे पर्यायमें भी प्रथमके तीन पर्यायोंके समान संसारी आत्माका प्रतिपादन क्यों नहीं होता है, क्योंकि चतुर्थ पर्यायमें भी 'शरीरात् समुत्थाय' इससे शरीरसे उत्क्रान्तिसे युक्त संसारीकी स्पष्टरूपसे प्रतीति होती है, तो इस शङ्काके परिहारके लिए 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रमें स्थित तुशब्दकी व्याख्या द्वारा इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि चतुर्थ पर्यायमें भी संसारी आत्माका निरूपण होगा, तो इन्द्र द्वारा पूछे गये अपहतपाप्मत्वादिगुणविशिष्ट आत्माका प्रजापतिने उपदेश नहीं किया, यही सिद्ध होगा। इससे प्रजापतिवाक्य प्रतिवचन ही नहीं होगा, इसलिए चतुर्थ पर्याय उक्त गुणोंसे युक्त मुक्त जीवपरक है, यही कहना चाहिए। यदि शङ्का हो कि पूर्वपक्षीकी उक्तिसे सगुणविद्यासे ब्रह्मलोकमें गये हुए जीवमें अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण रह सकते हैं, अतः चतुर्थ पर्याय आत्यन्तिक मुक्त जीवपरक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सगुणविद्यासे आत्यन्तिक अविद्याकी

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मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४५

भेदकलुषितः, तत्र सत्यसङ्कल्पत्वादिगुणबाधात् । अवस्थात्रयोपन्यासस्य तत्तदवस्थादोषाभिधानेन चतुर्थपर्यायोपदेशशेषत्वप्रतिपत्तेरिति समाधानः सूत्रकारश्चतुर्थपर्याये प्रतिपाद्यस्य मुक्तस्येश्वरभावापत्तिं स्पष्टमाह । तदभावे

आदि गुणोंका बाध है। और तीन * अवस्थाओंके बोधक तीन पर्यायोंका इसलिए उपन्यास किया गया है कि तत्-तत् अवस्थाओंके दोषोंके अभिधान द्वारा उन तीन पर्यायोंमें चतुर्थ पर्यायके उपदेशकी अङ्गत्वप्रतिपत्ति हो, इस प्रकारसे समाधान † करनेवाले सूत्रकारने चतुर्थ पर्यायमें प्रतिपाद्य मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्ट रीतिसे बतलायी है। मुक्तपुरुषकी यदि ‡ ईश्वरभावापत्ति न हो, तो मुक्तमें भी सत्यसङ्कल्पत्व


निवृत्ति न होनेसे निरङ्कुश अपहतपाप्मत्व आदि रह नहीं सकते और प्रजापतिवाक्यका निर्गुण ब्रह्ममें तात्पर्य सविस्तर बतलाया गया है, अतः निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषमें उत्क्रान्ति आदिका सम्भव नहीं है, यह भाव है। इसलिए इस तात्पर्यके अनुसार 'शरीरात् समुत्थाय' इत्यादि श्रुतिका यह अर्थ है—शरीरसे समुत्थान करके अर्थात् तीन शरीरोंसे विलक्षण त्वम्पदके लक्ष्यका निर्णय करके परब्रह्मरूप ज्योतिका साक्षात्कार कर अपने स्वरूपको प्राप्त होता है, यह भाव है।

* यदि शङ्का हो कि चतुर्थ पर्याय ही यदि जिज्ञासित आठ गुणोंसे युक्त आत्माका प्रतिपादन करता है, तो पूर्वके तीन पर्याय निरर्थक ही होंगे ? तो इस शङ्काका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं, तात्पर्य यह है कि जाग्रदवस्थामें अन्धत्व आदि दोषोंके कथनसे, स्वप्नावस्थामें रोदन आदि दोषोंके अभिधानसे और सुषुप्तिमें अपने आपका और दूसरेका ज्ञान न होना आदि दोषोंके अभिधानसे तीन अवस्थाओंसे कलुषित लोकसिद्ध जीवके स्वरूपकी हेयताके बोधन द्वारा ठीक ठीक अधिकारी जिज्ञासुके वास्तविक स्वरूपका बोध करानेके लिए चतुर्थ पर्यायकी प्रवृत्ति है, ऐसा ज्ञात होता है, अतः पूर्व पर्याय चतुर्थ पर्यायके अङ्ग हैं, ऐसा प्रतीत होता है, इसलिए पूर्व पर्याय व्यर्थ नहीं है, यह भाव है।

† अपहतपाप्मत्वादि आठ गुण दहराकाशमें नहीं रह सकते, क्योंकि प्रजापतिके वाक्यसे ये आठ गुण जीवमें भी हैं, अतः व्यभिचार होगा। इस प्रकारकी आशङ्का करके समाधान किया है कि प्रजापतिवाक्यसे मुक्त जीवमें ही आठ गुणोंका प्रतिपादन होता है, सांसारिक जीवमें नहीं, अतः उक्त आठ गुणोंकी सत्ता परमेश्वरसे अन्यत्र नहीं है, जिससे कि व्यभिचारकी शङ्का की जाय, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि कदाचित् मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति न मानी जाय, तो बद्ध जीवके समान मुक्त जीवमें भी, जो उपाधियोंसे रहित है, सत्य-सङ्कल्पत्व आदि गुणोंका योग नहीं होगा, इस प्रजापतिवाक्यमें आठ गुणोंसे युक्त आत्माका निरूपण ही नहीं हो सकेगा, अतः

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५४६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

मुक्तेऽपि सत्यसङ्कल्पत्वाद्ययोगाद्, अनुक्रान्तस्य गुणाष्टकस्य ईश्वरादन्यत्रापि भावे कृतशङ्कापरिहारालाभाच्च। तस्मिन् सूत्रे 'तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापितमपारमार्थिकं जैवं रूपं कर्तृत्वभोक्तृत्वरागद्वेषादिदोषकलुषितमने-

आदिका अयोग होगा, और यदि उपक्रममें श्रुत आठ गुणोंकी ईश्वरसे अन्यत्र भी सत्ता मानी जायगी, तो की गई शङ्काका परिहार भी नहीं हो † सकेगा। और 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रमें भाष्यकारने भी 'जीवब्रह्माभेद ही वास्तविक है' इससे अविद्याप्रयुक्त अपारमार्थिक कर्तृत्व, भोक्तृत्व, राग, द्वेष आदि दोषसे


प्रजापतिवाक्यके आधारपर ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही आठ गुणोंसे युक्त आत्माका अभिधान है, यह सूत्रकारका तात्पर्य स्पष्ट है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि यदि शङ्का की जाय कि जीव और ईश्वरका वस्तुतः भेद होनेसे मुक्त जीवमें ईश्वरतादात्म्य नहीं हो सकता, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो यह शङ्का हुई थी कि गुणाष्टकके जीवसाधारण होनेसे ईश्वरका वह असाधारण धर्म नहीं है, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशके ईश्वरत्वमें प्रमाण नहीं हो सकता है। इस शङ्काका 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रसे उस आत्माकी ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही समाधान किया गया है, उसका विरोध होगा।

इस विषयमें शङ्का होती है—मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिमें क्या प्रमाण है ? 'उत्तराच्चेत्' इस सूत्रभागसे की गई शङ्काके परिहारका अलाभ प्रमाण है, अथवा प्रजापतिवाक्य ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मुक्तका विम्बभूत ईश्वरभावापत्तिके विना यदि केवल चैतन्यरूपसे भी अवस्थान माना जाय, तो ईश्वरसे अन्यत्र सत्ताके न होनेसे उक्त आठ गुण जो केवल ईश्वरमें ही असाधारणरूपसे वर्तमान हैं, दहराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक हो सकते हैं। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि निर्गुण विद्याके प्रतिपादक प्रजापतिवाक्यमें गुणोंकी विवक्षा न होनेसे मुक्त जीवमें भी गुणाष्टकका सम्बन्ध प्रतिपादित नहीं हो सकता है। और ज्ञेय ब्रह्ममें उन गुणोंका असम्बन्ध है, ऐसा आनन्दमयाधिकरणमें भी प्रतिपादन किया गया है। इसीसे वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञेयब्रह्मप्रतिपादक वाक्योंमें अखण्डार्थता मानी जाती है, जो अखण्डार्थता संसर्गको विषय न करनेवाली प्रमितिके प्रति जनकरूप है। इसलिए प्रजापतिवाक्यके उपक्रममें सुने गये सत्यसङ्कल्पत्व आदि—बृहदारण्यकके छठे अध्यायमें सर्वेश्वरत्व आदि गुण जैसे ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए बतलाये गये हैं वैसे ही—ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए ही हैं अथवा उपलक्षणमात्र हैं, दहरविद्यामें श्रुत गुणोंके समान प्रतिपाद्य नहीं हैं, अतः भाष्यकी भी उपपत्ति हो सकती है, यह अधिक समझना चाहिए। इससे तथोक्त श्रुति, सूत्र और भाष्य मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिमें प्रमाणरूपसे नहीं दिखलाए जा सकते हैं, यह इस पक्षमें अस्वरसं है, अतः इसी अस्वरससे 'अविरोधाध्यायेऽपि' इत्यादि ग्रन्थका उपक्रम है।

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मुक्तके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहितं ५४७


कानर्थयोगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणं पारमेश्वरं रूपं विद्यया प्रतिपद्यते' इति भाष्यकारोऽप्यतिस्पष्टं मुक्तस्य सगुणेश्वरभावापत्तिमाह।

ईशांशस्येशभावाप्तौ सर्वदुःखप्रसञ्जनम्।
निवारयद्भिरत्रेऽपि विभुभावप्रदर्शनात् ॥ २० ॥

यदि ईश्वरका जीवको ईश्वरभावापत्ति मानी जाय, तो ईश्वरमें भी जीवके दुःख आदिकी प्रसक्ति हो जायगी, इस पूर्वपक्षका समाधान करते हुए श्रीसूत्रकार आदिने मुक्त जीवकी विभुभूत ईश्वरभावापत्तिके स्वीकार द्वारा समाधान किया है ॥ २० ॥

अविरोधाध्यायेऽपि 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते' इत्यादिश्रुतेस्तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन तत्तत्कर्मकारयितृत्वेन च उपकार्योपकारकभावेनावगतयोर्जीवेश्वरयोर्ह्यंशिभावरूपसम्बन्धनिरूपणार्थत्वे-नावतारिते 'अंशो नानाव्यपदेशात्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३)


कलुषित जो अनेक अनर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाला जीवका स्वरूप है, उसका विलय हो जानेसे तद्विपरीत अपहतपाप्मत्वादि गुणवाले परमेश्वरस्वरूपको विद्यासे प्राप्त करता है, इस ग्रन्थसे स्पष्टरूपतया मुक्तमें सगुण ईश्वरत्व बतलाया गया है।

अविरोधाध्यायमें * 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति०' (ईश्वर जिसको ऊपरके लोकमें चढ़ाना चाहता है, उसीसे अच्छा कर्म कराता है और जिसको नीचेकी ओर ले जाना चाहता है उसीसे असत् कर्म कराता है) इस श्रुतिसे तत्-तत् कर्मोंके कर्तृत्व और तत्-तत् कर्मोंके कारयितृत्वभावसे उपकार्य और उपकारकरूपसे ज्ञात जीव और ईश्वरके अंशाशिभावरूप सम्बन्धका निर्णय करनेके लिए अवतारित † 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस अधिकरणमें भाष्यकारने भी


* अविरोधाध्यायशब्दसे ब्रह्मसूत्रका द्वितीय अध्याय लेना चाहिए, क्योंकि प्रथमाध्यायमें जिस पदार्थका निरूपण किया गया है, उसके साथ अन्य प्रमाणोंके विरोधका परिहार द्वितीयाध्यायमें ही किया गया है। इस अविरोधाध्यायमें भी समाहित शङ्काग्रन्थसे भाष्यकारने मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलायी है। इस प्रकार इस समुदित ग्रन्थका सार है यह समझना चाहिए।

† जीव ईश्वरका अंश—अवयव है, क्योंकि नानात्वका—भेदका—यत्र तत्र उपदेश—कथन—है यह इस सूत्रके इस भागका अर्थ है। सम्पूर्ण सूत्र—'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा- चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके' इतना बड़ा है।