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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

DevanagariHindipublished590 pages

Page 566 of 590

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Page 566

५३६ सिद्धान्तलेशसंग्रह [चतुर्थः परिच्छेदः

'प्रतिबिम्बो जीवः, बिम्बस्थानीय ईश्वरः, उभयानुस्यूतं शुद्धं चैतन्यम्' इति पक्षे तु मुक्तस्य यावत्सर्वमुक्तिसर्वज्ञत्वसर्वकर्तृत्वसर्वेश्वर-त्वसत्यकामत्वादिगुणपरमेश्वरभावापत्तिरिष्यते । यथा अनेकेषु दर्पणेषु एकस्य मुखस्य प्रतिबिम्बे सति एकदर्पणापनये तत्प्रतिबिम्बो बिम्बभावे-नाऽवतिष्ठते, न तु मुखमात्ररूपेण, तदानीमपि दर्पणान्तरसन्निधानप्रयुक्तस्य मुखे बिम्बत्वस्याऽनपायात्, तथैकस्य ब्रह्मचैतन्यस्याऽनेकेषूपाधिषु प्रति-बिम्बे सति, एकस्मिन् प्रतिबिम्बे विद्योदये तेन तदुपाधिविलये तत्प्रति-बिम्बस्य बिम्बभावेनाऽनवस्थानावश्यम्भावात् । न च मुक्तस्याऽविद्याऽ-भावात् सत्यकामतादिगुणविशिष्टसर्वेश्वरत्वानुपपत्तिः । तदविद्याऽभावे-

  • अविद्यामें चैतन्यका प्रतिबिम्ब जीव है, बिम्बस्थानीय चैतन्य ईश्वर है और उभयमें अनुस्यूत चैतन्य शुद्ध चैतन्य है, इस पक्षमें तो मुक्त पुरुषकी, जब तक कि सब जीव मुक्त न हों, तब तक सर्वज्ञत्व, सर्वकर्तृत्व, सर्वेश्वरत्व, सत्यकामत्व आदि गुणोंसे विभूषित ईश्वरके साथ तादात्म्यरूपसे अवस्थिति मानी जाती है । जैसे अनेक दर्पणोंमें एक मुखके प्रतिबिम्बित होनेपर उनमें से एक दर्पणके हटानेपर उसमें पड़ा हुआ प्रतिबिम्ब बिम्बरूपसे अवस्थित रहता है, मुखमात्रसे अवस्थित नहीं रहता, क्योंकि एक दर्पणके हटानेपर भी अन्य दर्पणके सन्निधानप्रयुक्त बिम्बत्व मुखमें विद्यमान है, वैसे ही एक ब्रह्म-चैतन्यके अनेक उपाधियोंमें प्रतिबिम्बित होनेपर एक प्रतिबिम्बमें विद्याके उदित होनेपर उससे उस उपाधिके विलीन होनेके कारण उसमें पड़े हुए प्रतिबिम्बकी भी बिम्बरूपसे अवश्य अवस्थिति होगी । यदि शङ्का हो कि उक्त पुरुषको अविद्याका अभाव होनेसे सत्यकामत्व आदि गुणोंसे युक्त सर्वेश्वरत्वकी अनुपपत्ति हो जायगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि ॐ उस कालमें मुक्त पुरुषकी

  • यदि शङ्का हो कि अनेक जीववादमें प्रतिबिम्बेश्वरपक्षमें मुक्तको ईश्वरभावापत्ति नहीं हो सकती है और अवच्छेद पक्षमें तो मुक्ति ही नहीं है, तो फिर ईश्वरभावापत्ति किस पक्षमें होगी ? तो इस शङ्काका उत्तर इस ग्रन्थसे देते हैं ।
  • प्रकृत ग्रन्थमें अविद्याके नानात्वव्यवहारसे अनेक अविद्याओंमें प्रतिबिम्बित अनेक जीव हैं और अन्तःकरण तो उनमें रहनेवाले कर्तृत्व आदिकी उपाधि है, यह सूचित किया गया है, इसलिए मुक्त पुरुषका ऐश्वर्य अविद्याप्रयुक्त है, ऐसा स्वीकार करनेसे परमार्थरूपसे एकरूप ही सर्वदा मुक्ति है, अतः ब्रह्मसूत्रके तृतीयाध्यायके अन्तिम अधिकरणके साथ विरोध नहीं है, यह भाव है ।