सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context| ५५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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स्वरूपस्तु' (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १९) इति सूत्रान्तरेण दहरविद्यानन्तरमिन्द्रप्रजापतिसंवादे 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यादिना अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकयुक्तमात्मानमुपदेक्ष्यमुपक्षिप्य 'य एषोऽक्षिणि
'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु'‡ इस प्रकारके अन्य सूत्रसे—दहरविद्याके बादके इन्द्रप्रजापतिके संवादमें 'य आत्माऽपहतपाप्मा'× (जो आत्मा है, वह पाप-रहित है) इत्यादि श्रुतिसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त उपदेश्य आत्माका प्रस्ताव करके 'य एषोऽक्षिणि' (जो आँखमें पुरुष देखा जाता है, वही तुम्हारा
आदि गुणोंकी अनुपपत्ति होगी। यदि जीव लिया जाय, तो उसमें पृथ्वी आदि जगत्का आधारत्व नहीं आ सकता है, अतः दहराकाश परमात्मा ही है, ऐसा निर्णय होता है, यह भाव है।
‡ इस सूत्रका यह अर्थ है—उत्तरात् अर्थात् 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि उत्तरके प्रजापति-वाक्यसे अपहतपाप्मत्वादि गुणवाला जीव ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस उत्तरवाक्यमें आविर्भूतस्वरूपवाले—अपने ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए जीवका ही कथन है, जीवत्वविशिष्ट जीवका नहीं, अतः अपहतपाप्मत्वादिविशिष्ट परमात्मस्वरूप ही है, जीव नहीं है, इससे दहराकाश जीव नहीं हो सकता, यह अर्थ है।
× इन्द्र और विरोचन प्रजापतिके पास आत्मज्ञानकी इच्छासे गये, उस समयके ये प्रजापतिके वाक्य हैं (छान्दोग्य ८-७-४) और ये वाक्य 'अपहतपाप्मा' इत्यादि वाक्यसे पूछे गये आठ गुणोंसे युक्त उपदेश्य आत्माके उत्तररूपमें कहे गये हैं, इसलिए आठ गुणोंसे युक्त आत्मा जीव ही प्रतीत होता है। यह ख्यालमें रखना चाहिए कि इस ग्रन्थका दूर तक सम्बन्ध है, इसमें पर्यायशब्द जो आये हुए हैं, उनका अर्थ—प्रकार या तरीका, अथवा एक आत्मरूप अर्थके बोधक वाक्य—करना चाहिए, अर्थात् चार प्रकारसे आत्माका बोध करानेके लिए प्रजापति द्वारा उक्त वाक्य, यह मूलग्रन्थमें 'पर्याय' शब्दका अर्थ होगा। समुदित ग्रन्थका तात्पर्य यह है कि 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि वाक्योंसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त जीव भी प्रतीत होता है, इसलिए अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण दहराकाशमें परमेश्वरके निर्णायक नहीं हो सकते हैं। यदि कथञ्चिद् कहें कि प्रजापतिके चार वाक्योंमें से प्रथम वाक्यमें जाग्रदवस्थाका बोधक कोई पद नहीं है, अतः प्रजापतिके चार पर्यायोंका तात्पर्य जीवके बोधनमें नहीं हो सकता है, इसलिए प्रजापतिके प्रथम वाक्यसे परमात्माका ही प्रतिपादन है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक वाक्योंमें पहले 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका [जाग्रदादि अवस्थापन्न जीवका] फिर तुझे उपदेश करता हूँ) इस वाक्यके होनेसे प्रत्योक्त चार प्रकारके श्रुतिवाक्योंसे जीवका ही प्रतिपादन है, इस प्रकारकी आशङ्का करके इस शङ्काका समाधान करते हुए सूत्रकारने 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रसे मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलाई है।