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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 567 of 590

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Page 567

मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषाअनुवादसहित ५३७


पि तदानीं बद्धपुरुषान्तराविद्यासत्त्वात् । नहीश्वरस्येश्वरत्वं सत्यकामा-
दिगुणवैशिष्ट्यं च स्वाविद्याकृतम्, तस्य निरञ्जनत्वात्, किन्तु बद्धपुरुषा-
विद्याकृतमेव तत्सर्वमेष्टव्यम् ।

न च विद्यान्तरफलैः साम्यं मोहपरिक्षयात् ।
तेषु भोगस्य साम्येऽपि जगद्व्यापारवर्जनात् ॥ १८ ॥

सगुण उपासनाओंके फलोंके साथ मुक्तिका साम्य भी नहीं है, साम्य होनेपर भी जगद्व्यापार उसमें नहीं है ॥ १८ ॥

न च 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति' 'तं यथा यथोपासते' इत्यादिश्रुतिषु सगुणोपासकानामपीश्वरसायुज्यश्रवणाद् मुक्तेः सगुणविद्याफलाविशेषापत्तिः । सगुणोपासकानामखण्डसाक्षात्कारा-


अविद्या नहीं है, तथापि बद्ध पुरुषान्तरकी अविद्या विद्यमान है। और * ईश्वरका ईश्वरत्व है, और सत्यकामत्वादिवैशिष्ट्य अपने आश्रित अविद्या-से जन्य नहीं हैं, क्योंकि ईश्वर तो निरञ्जन अर्थात् सम्पूर्ण दोषोंसे रहित है, किन्तु बद्धपुरुषकी अविद्यासे ही उसमें ईश्वरत्व आदि हैं, यह समझना चाहिए।

यदि शङ्का हो कि 'यथाक्रतुरस्मिन् लोके०' ( जिस गुणसे युक्त ब्रह्मकी इस लोकमें पुरुष उपासना करता है उसी गुणसे युक्त ब्रह्मको मरणके बाद प्राप्त करता है ) 'तं यथा यथोपासते' ( उस ईश्वरकी जिन जिन गुणोंसे युक्ततया उपासना करता है, वह उस गुणसे विशिष्टको प्राप्त करता है ) इत्यादि श्रुतियोंमें सगुण उपासककी भी ईश्वरसायुज्यरूप मुक्ति सुनी जाती है, अतः मुक्ति भी


* इसमें यदि किसीको शङ्का हो कि जीवकी संसारिता जैसे अपनी अविद्यासे होती है, वैसे ही ईश्वरकी ईश्वरता भी उसकी उपाधिसे ही होगी, इसलिए मुक्त पुरुषमें उपाधिके न रहनेसे ऐश्वर्य नहीं हो सकता, इस शंकाका इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं—तात्पर्य यह है कि ईश्वरकी उपाधि क्या अविद्या है या अविद्याभिन्न माया है ? द्वितीय पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि अविद्यामें बिम्बभूत चैतन्यमें जीवाश्रित अविद्यासे ही ऐश्वर्य हो सकता है, तो फिर अतिरिक्त मायारूप उपाधिकी कल्पना व्यर्थ ही है और तत्तत् जीवगत तत्त्वज्ञानसे तत्तत् अविद्याकी निवृत्ति होगी, इस क्रमसे सब जीवोंकी मुक्तिके बाद भी मायाका निवर्तक न होनेसे उस समयमें भी माया अवश्य रहेगी। 'मम माया दुरत्यया' इत्यादि एकवचनान्त निर्देश जातिके अभिप्रायसे है, अतः अविद्याके नानात्वपक्षमें दोष नहीं है, प्रथम पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि ईश्वरका ऐश्वर्य स्वाविद्याकृत नहीं है, यह भाव है।

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