सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
Page 573 of 590
Read in contextमुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४३
पुरुषो दृश्यते एष आत्मा' इति जाग्रदवस्थायां द्रष्टृत्वेनाक्षिसन्निहितस्य 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति एष आत्मा' इति स्वप्नावस्थापन्नस्य 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तस्सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानाति एष आत्मा' इति सुषुप्त्यवस्थापन्नस्य 'एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः' इत्यवस्थात्रयोत्तीर्णस्य च जीवस्योपदेशाद् जीवेऽप्यस्ति अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकमिति न तद् दहराकाशस्य परमेश्वरत्वनिर्णायकम्, 'य एष स्वप्ने' इत्यादिपर्यायेषु प्रतिपर्यायम् 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-
आत्मा है ) इस श्रुतिसे जाग्रदवस्थामें द्रष्टारूपसे अक्षिसन्निहित जीवका, 'य एष स्वप्ने०' (जो यह स्वप्नमें वनिता आदिसे पूज्यमान होकर विषयोंका अनुभव करता है, वह आत्मा है ) इत्यादि श्रुतिसे स्वप्नावस्थापन्न जीवका, 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तः०' ( जिस कालमें यह जीव सुषुप्तिको प्राप्त होता है और इसके समस्त करणोंका समुदाय विलीन हो जाता है, तब अपने स्वरूपभूत आनन्दमें मग्न होकर स्वप्नको भी नहीं देखता है, वही आत्मा है ) इस प्रकारकी श्रुतिसे सुषुप्त्यवस्थापन्न जीवका और 'एष सम्प्रसादो०' (सुषुप्ति अवस्थासे उपलक्षित जीव शरीरसे उत्क्रमण करके देवयान मार्गको पा कर अपनी उपासनाके फलभूत ऐश्वर्यसे युक्त स्वरूपको प्राप्त करता है * ) इत्यादि श्रुतिसे अवस्थात्रयसे रहित जीवका उपदेश होनेसे जीवमें भी अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण विद्यमान हैं, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं हो सकता है, क्योंकि 'य † एष स्वप्ने०' इत्यादि पर्यायोंके प्रत्येक पर्यायमें 'एतं त्वेव भूयोऽनु-
* इस वाक्यका पूर्वपक्षकी रीतिसे ब्रह्मलोकमें गया हुआ, उपासक, जीव उत्तमपुरुष अर्थात् अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त होता है, यह अर्थ समझना चाहिए ।
† तात्पर्य यह है कि प्रजापतिवाक्यमें चार पर्यायोंका सर्वथा जाग्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें तात्पर्य नहीं है, क्योंकि प्रथम पर्यायमें किसी जाग्रदवस्थापन्न जीववाची पदके न होनेसे यह जाग्रदवस्थापन्न जीवका बोधक नहीं हो सकता है । इसलिए प्रथम पर्यायसे इन्द्र और विरोचन द्वारा अपहतपाप्मत्वादि गुणोंसे युक्त जिस आत्माके विषयमें प्रश्न किया जाता है, वही आत्मा निर्दिष्ट है, और वह ब्रह्म है, इसलिए प्रजापतिवाक्यमें भी आठ गुणोंसे संयुक्त ब्रह्मका ही उपदेश किया गया है, जीवका नहीं, अतः यह आशङ्का नहीं हो सकती है कि गुणाष्टक दहराकाशमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं है, इस मध्यवर्ती शङ्काका इससे परिहार करते हैं ।