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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

by श्रीमदप्पय्य दीक्षित

Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)

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DevanagariHindipublished590 pages

Page 571 of 590

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Page 571

मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४१

पक्षोऽयं चरमः साधुः सूत्रभाष्यादिषु स्फुटः ।
आविर्भूतस्वरूपेऽपि गुणाष्टकनिरूपणात् ॥ १९॥

यह अन्तिम पक्ष ही श्रेष्ठ है, क्योंकि सूत्र, भाष्य आदिमें इसीकी स्पष्टता पाई जाती है, सगुण अपरोक्ष ब्रह्मानुभवसे ईश्वरस्वरूपमें आविर्भूत जीवमें आठ गुणोंका निरूपण किया गया है ॥ १९ ॥

अयमेव पक्षः श्रुतिसूत्रभाष्याद्यनुगुणः । तथा हि—समन्वयाध्याये तावद् ‘दहर उत्तरेभ्यः’ (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १४) इत्य- धिकरणे ‘अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन् अन्तराकाशः’ इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टो दहराकाशो न भूताकाशः, नापि जीवः, किन्तु परमेश्वरः, उत्तरेभ्यो वाक्यशेषेभ्यः । ‘उभे अस्मिन् द्यावा- पृथिवी अन्तरेव समाहिते’ ‘यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ ‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपि- पासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः’ इत्यादिना प्रतिपाद्यमानेभ्यो द्यावा- पृथिव्याद्याधारत्वलक्षणगुणेभ्यो हेतुभ्य इति निर्णीय ‘उत्तराच्चेदाविर्भूत-

यही पक्ष श्रुति, सूत्र और भाष्य आदि सम्मत है—क्योंकि समन्वया- ध्यायमें ‘दहर उत्तरेभ्यः’ इस अधिकरणमें ‘अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म०’* इत्यादि श्रुतिमें उक्त दहराकाश भूताकाश नहीं है, और जीव भी नहीं है, किन्तु परमेश्वर ही है, ‘उमे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ (इस प्रकृत दहराकाशमें अन्तः द्युलोक और पृथ्वी स्थित हैं) ‘यावान्वा०’ (यह जितना बड़ा बाहरका भूताकाश है उतना ही बड़ा हृदयके भीतर दहराकाश है) ‘एष आत्मा०’ (आत्मा पापसम्बन्धसे रहित है, जरासे रहित है, मृत्युसे रहित है, शोकसे रहित है, भोजनेच्छासे रहित है, पिपासासे रहित है, आत्मा सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है) इत्यादि श्रुतिसे प्रतिपादित द्यु, पृथ्वी आदिके प्रति आश्रयत्व प्रभृति गुणरूप हेतुओंसे दहराकाशसे परमात्माका ही ग्रहण† है, ऐसा निर्णय करके


* ब्रह्मकी उपलब्धिमें हेतुभूत जो यह शरीर है उसमें छोटे आकारका जो पुण्डरीक है, उसके भीतर दहर आकाश है, यह इस श्रुतिका अर्थ है। और ‘दहर उत्तरेभ्यः’ इस सूत्रसे, दहराकाश शब्दसे परमात्मा ही लिया जायगा, किससे ? उत्तरके वाक्यशेषोंसे, इस प्रकारका जो अर्थ होता है, उसीका ही इस अग्रिम ग्रन्थसे कथन है।
† कारण कि दहराकाशशब्दसे यदि भूताकाश लिया जाय, तो उसमें सत्यसङ्कल्पत्व

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