सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
by श्रीमदप्पय्य दीक्षित
Source: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (origin)
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Read in context५३८ सिद्धान्तलेशसंग्रह [ चतुर्थ परिच्छेद
भावाद् नाऽविद्यानिवृत्तिः, न वा तन्मूलाहङ्कारादेर्विलयः । आवरणा-
निवृत्तेर्नाखण्डानन्दस्फुरणम् । ‘जगद्व्यापारवर्जं प्रकरणादसन्निहितत्वाच्च’
(उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० १७) ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’
(उ० अ० ४ पा० ४ सू० २१) इत्यादिसूत्रोक्तन्यायेन तेषां पर-
मेश्वरेण भोगसाम्येऽपि सङ्कल्पमात्रात् स्वभोगोपयुक्तदिव्यदेहेन्द्रियवनि-
तादिसृष्टिसामर्थ्येऽपि सकलजगत्सृष्टिसंहारादिस्वातन्त्र्यलक्षणं न निरव-
ग्रहमैश्वर्यम् । मुक्तानां तु निस्सन्धिबन्धमीश्वरभावं प्राप्तानां तत्सर्वमिति
सगुणविद्याके फलके समान ही होगी, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सगुणोपासकों-
को अखण्डब्रह्मसाक्षात्कार नहीं होता है, अतः उनकी अविद्याकी निवृत्ति
नहीं होती है और अविद्यामूलक अहङ्कार आदिकी भी निवृत्ति नहीं होती ।
आवरणकी निवृत्ति न होनेके कारण अखण्ड आनन्दकी स्फूर्ति भी नहीं
होती । ‘जगद्व्यापारवर्जम्’* और ‘भोगमात्रसाम्यलिङ्गाच्च’ † इत्यादि
सूत्रोक्तन्यायसे यद्यपि उन सगुण उपासकोंका भोग परमेश्वरके साथ समान है
और सङ्कल्पमात्रसे ‡ अपने भोगके उपयुक्त दिव्य देह, इन्द्रिय, वनिता आदिकी
सृष्टिमें सामर्थ्य है, तथापि सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, संहार आदिमें स्वातन्त्र्यरूप
अप्रतिहत ऐश्वर्य नहीं है । और मुक्त पुरुषोंके, जो कि निर्गुण उपासनाके
प्रभावसे सर्वात्मरूपसे ईश्वरभावको प्राप्त हुए हैं, पूर्वोक्त अविद्यानिवृत्ति
* इस सूत्रका यह अर्थ है—सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि, स्थिति और संहार करनेकी ईश्वरमें जो शक्ति है उससे भिन्न अपने भोगमें उपयुक्त भोग्यभोगोपकरणमात्रकी उत्पत्ति करनेकी ही उपासकोंमें शक्ति हो जाती है, क्योंकि जगत्की सृष्टिमें ‘आत्मनः आकाशः सम्भूतः’ इत्यादिसे परमात्माका ही उल्लेख किया गया है और सृष्टिवाक्योंमें उपासकोंका सन्निधान भी नहीं है ।
† हिरण्यगर्भके शरीरमें प्रवेश करके भोग भोगनेवाले परमेश्वरके साथ उपासकोंका केवल भोगमात्रमें ही साम्य है, क्योंकि उसमें प्रमाण है—‘तमाह आपो वै खलु मीयन्ते लोकोऽसौ’ अर्थात् अपने पास आये हुए उपासकसे उसने कहा कि मैं अमृतरूप जलका भोग करता हूँ, अतः तुम्हें भी इसी अमृतरूप जलका भोग करना चाहिए, यह भाव है ।
‡ ‘यं ये कामं पित्रादिरूपं कामयते स स कामः सङ्कल्पादेव समुत्तिष्ठति’ (उपासक पिता आदि जिन जिन पदार्थोंकी अभिलाषा करता है, वे सबके सब केवल इसके सङ्कल्पमात्रसे ही प्राप्त हो जाते हैं, इस श्रुतिसे केवल भोग्य पदार्थ ही सङ्कल्पसिद्ध प्रतीत होते हैं, यह भाव है ।