सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
About this granth
The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.
It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.
This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.
महासाकार पिण्ड की आठ मूर्ति
स एव शिवः शिवाद् भैरवो भैरवात् श्रीकण्ठः श्रीकण्ठात्
सदाशिवः सदाशिवादीश्वर ईश्वराद्रुद्रो रुद्राद्विष्णु विष्णो-
र्ब्रह्मेति महासाकारपिण्डस्य मूर्त्यष्टकम् ॥ ३७ ॥
महासाकार पिण्ड पञ्चानन शिव की आठ मूर्ति—आकृति ( रूप ) है ।
वह शिव है । शिव से भैरव, भैरव से श्रीकण्ठ, श्रीकण्ठ से सदाशिव, सदाशिव से
ईश्वर, ईश्वर से रुद्र, रुद्र से विष्णु और विष्णु से ब्रह्मा अभिव्यक्त हैं ।) इन्हीं
आठों के द्वारा सृजन, नियमन ( रक्षण ) और संहार के कार्य सम्पादित होते हैं ।
ये ही संसारग्रस्त जीवों को बन्धनमुक्त कर भवसागर से तार देते हैं, अतएव सभी
मुमुक्षुओं के लिये अभीष्ट पूर्तिहेतु ये ही उपास्य अथवा पूज्य हैं ।) इस तरह
एक महासाकार पिण्ड शिव से आठ रूपों की अभिव्यक्ति है ॥ ३७ ॥
नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की उत्पत्ति और पंचभूतों के
पचीस गुण
तद् ब्रह्मणः सकाशादवलोकनेन नरनारीरूपप्रकृतिपिण्डः
समुत्पन्नस्तच्च पञ्चपञ्चात्मकं शरीरम् ॥ ३८ ॥
( नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की सृष्टि का वर्णन किया जाता है । ( सबसे
पहले ब्रह्मा के अवलोकन—ईक्षणरूप संकल्प से स्त्रीसम्पुटित पुरुषप्रकृतिपिण्ड
( शतरूपासहित मनुप्रजापति ) की समुत्पत्ति होती है । ( इसके उपरान्त
जरायुजादि भौतिक ( पञ्चभूतात्मक ) शरीरों की उत्पत्ति है ।) यही प्रकृतिपिण्ड
भूमि आदि पंचभूतों के पांच गुणों से युक्त होने से पाञ्चभौतिक शरीर कहा
जाता है ॥ ३८ ॥
अस्थिमांसत्वङ् नाड़ीरोमाणीति पञ्चगुणा भूमिः ॥ ३६ ॥
( इस पाञ्चभौतिक शरीर में पृथ्वी का अंश अधिक है, इसलिये यह शरीर
पार्थिव कहा जाता है ।) इस भौतिक शरीर में पृथ्वीतत्व के पांच गुण हैं, इसका
पहला गुण अस्थि है, दूसरा गुण मांस है, तीसरा गुण त्वचा है, चौथा गुण नाड़ी है
१४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
और पाँचवां गुण रोम ( बाल ) है। शरीर के रचनाक्रम में पृथ्वीतत्व के गुण के
रूप में अस्थि, मांस, त्वचा, नाड़ी और रोम ही मुख्य हेतु हैं ॥ ३६ ॥
लाला मूत्रं शुक्रं शोणितं स्वेद इतिपञ्चगुणा
आपः ॥ ४० ॥
भौतिक शरीर में स्थित जल तत्व के पाँच गुण लार, मूत्र, शुक्र, ( वीर्य )
शोणित ( रक्त ) और स्वेद पसीना हैं । जलीय द्रव्य के रूप में भौतिक शरीर की
संरचना में ये पाँचों अंश मुख्य हेतु हैं ॥ ४० ॥
क्षुधा तृषा निद्रा कान्तिरालस्यमिति पञ्चगुणं
तेजः ॥ ४१ ॥
भौतिक शरोर में तेज ( पावक—अग्नि ) तत्व के पाँच गुण क्षुधा, तृषा
( प्यास ) निद्रा, कान्ति और आलस्य हैं। तेज तत्व के रूप में भौतिक शरीर
की संरचना में ये पाँचों अंश मुख्य हेतु हैं ॥ ४१ ।
विशेष—निद्रा को अग्नि तत्व का गुण इसलिये कहा गया है कि पेट
भर भोजन करने के बाद पेट में गर्मी की अधिकता से पित्त नाड़ियों में व्याप्त
होता है, मन का नाड़ियों में सञ्चार ( भ्रमण ) बन्द हो जाने से निद्रा आती
है। इसी तरह नाड़ियों में पित्त के व्याप्त हो जाने पर आलस्य आता है।
धावनं भ्रमणं प्रसारणमाकुञ्चनं निरोधनमिति पञ्च-
गुणो वायुः ॥ ४२ ॥
भौतिक शरीर में वायु की स्थिति ही उसकी सजीवता अथवा प्राणमयता
है। शरीर में स्थित वायु के पाँच गुण धावन (वेगपूर्वक संचरण), भ्रमण ( प्रत्येक
नाड़ी में प्रवहन ), प्रसारण ( फैलना ), आकुञ्चन ( समेटना—स्वाभिमुख-
संयोगानुकूल व्यापार और निरोध ( नियतदेशसंयोगानुकूल व्यापार ) हैं।
शरीरस्थ वायु के ये पाँच गुण शरीर के जीवित रहने में मुख्य हेतु हैं ॥ ४२ ॥
रागो द्वेषो भयं लज्जा मोह इति पञ्चगुण आकाशः
इति पञ्चविंशति गुणानां भूतानां पिण्डः ॥ ४३ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १५
भौतिक शरीर में व्याप्त आकाश तत्व के पाँच गुण राग, द्वेष, भय, लज्जा
और मोह शरीरगत व्यवहार में मुख्य हेतु हैं। इन्हीं के आश्रय में शरीर में द्वन्द्व
भावों की उत्पत्ति होती है। यद्यपि ये रागद्वेषादि अन्तःकरण के धर्म हैं तथापि
इनके निवास-स्थान हृदयाकाश का भूताकाश से भेद नहीं है।) इस तरह प्रत्येक
भूत के पाँच-पाँच गुण अथवा धर्म से (पचीस गुणों से) पिण्ड--शरीर उत्पन्न
होता है॥ ४३॥
अन्तःकरणपंचक
मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं चैतन्यमित्यन्तःकरण-
पञ्चकम् ॥ ४४ ॥
(स्थूल पिण्ड-शरीर के संचालक सूक्ष्मशरीरादिपर्यन्त लिङ्गात्मा का
वर्णन किया जाता है।) यद्यपि अवयवी अन्तःकरण है तथापि उसके अवयव के
रूप में मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और चैतन्य के रूप में अन्तःकरण की पाँच
वृत्तियाँ हैं। यही अन्तःकरणपञ्चक कहा गया है॥ ४४॥
संकल्पो, विकल्पो, मूर्च्छा, जड़ता, मननमिति पञ्चगुणं
मनः ॥ ४५ ॥
मन के पाँच गुण अथवा धर्म हैं। पहला गुण संकल्प है। यह पदार्थ मुझे
मिल जाय अथवा मेरे द्वारा यह कार्य सम्पन्न हो जाय, इस आशा को संकल्प कहा
जाता है। संशयात्मक विचार—यह पदार्थ ऐसा है या नहीं है, इसको विकल्प
कहा जाता है। मन की यह दूसरी अवस्था है। मन का तीसरा गुण मूर्च्छा है,
मन की मुग्धता, विमूढ़ता अथवा अचेत वृत्ति को मूर्च्छा कहा जाता है। मन का
चौथा गुण जड़ता है। विवेक का अभाव ही जड़ता है। मन का पाँचवां गुण
मनन है। मनन का आशय है तर्कसंगत विचार ॥ ४५ ॥
विवेको, वैराग्यं, शान्तिः, सन्तोषः, क्षमेति पंचगुणा
बुद्धिः ॥ ४६ ॥
बुद्धि के पाँच गुण हैं। पहला गुण विवेक है। वस्तु के स्वरूप का यथार्थ
निश्चय ही विवेक है। (विवेक हो जाने पर वैराग्य का उदय होता है।)
१६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
सद्वस्तु का ज्ञान प्राप्त हो जाने पर लोक-परलोक के विषयभोग और पुण्यफलभोग
में मन की आसक्ति का समाप्त हो जाना ही वैराग्य है। यह बुद्धि का दूसरा गुण
है। बुद्धि का तीसरा गुण शान्ति है । ( विवेक और वैराग्य हो जाने पर मन में
शान्ति-वृत्ति का उदय होता है । ) चित्त में चञ्चलता अथवा विषयभोग की
कामना में उपरामता की वृत्ति ही शान्ति है। मन शान्त हो जाता है। बुद्धि
का चौथा गुण संतोष है । जब विवेक, वैराग्य और भोग में अनासक्ति का बुद्धि में
उदय होता है, तब मन सहज संतुष्ट होकर आत्मस्वरूप में ही तृप्त रहने का
स्वभाव ग्रहण करता है ।। बुद्धि की यही वृत्ति संतोष है । पांचवां गुण क्षमा है ।
विवेक, वैराग्य, शान्ति और संतोष से मन राग-द्वेष से प्रभावित नहीं होता है ।
वह सहनशील होकर दूसरे जीव में दोष-दर्शन नहीं करता और दोष बन जाने पर
भी उसे दण्डित करने की भावना का त्याग कर देता है । यह आत्मोदय की वृत्ति
है। यह आत्मोदय की वृत्ति ही स्थितप्रज्ञता की भूमिका है ।
प्रजहाति यदा कामान् सर्वान् पार्थ मनोगतान् ।
आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते ॥
दुःखेष्वनुद्विग्नमनाः सुखेषु विगतस्पृहः ।
वीतरागभयक्रोधः स्थितधीर्मुनिरुच्यते ॥
यः सर्वत्रानभिस्नेहस्तत्तत्प्राप्य शुभाशुभम् ।
नाभिनन्दति न द्वेष्टि तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता ।
( गीता २ । ५५-५७ )
जिस काल में यह पुरुष मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को अच्छी तरह
त्याग देता है और आत्मा से आत्मा में ही संतुष्ट रहता है, उस काल में वह
स्थितप्रज्ञ कहा जाता है । दुःखों की प्राप्ति होने पर जिसके मन में उद्वेग नहीं
होता, सुखों की प्राप्ति में जो निःस्पृह है तथा जिसमें राग, भय, क्रोध नहीं रह
जाते, वह स्थिरबुद्धि है। जो पुरुष सर्वत्र स्नेहरहित होकर शुभाशुभ की
प्राप्ति में प्रसन्न और द्वेषयुक्त नहीं होता, उसी की बुद्धि स्थिर है ।
अभिमानं, मदीयं, मम सुखं, मम दुःखं, ममेदमिति
पञ्चगुणोऽहंकारः ॥ ४७ ॥
अहंकार की पाँच वृत्तियाँ हैं। पहली अवस्था अभिमान है। मैं ही इस
तरह का कार्य करने में समर्थ हूँ, ऐसा विचार ही अभिमान है। दूसरी अवस्था
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १७
मदीय ( यह वस्तु मेरी ) है, शरीर, इन्द्रियादि मेरे हैं । तीसरी वृत्ति मम सुख—
इस सुख से मेरा ही एकमात्र सम्बन्ध है--इस भावना की प्रतिपादिका है ।
चौथी वृत्ति मम दुख— मैं इससे दुःखी हूँ, इस दुःखपरक अवस्था से सम्बन्ध
स्थापित करती है । पाँचवीं वृत्ति ममेदम् — यह पदार्थ मेरा है, ये मेरे सम्बन्धी
हैं, आदि की परिचायिका है ॥ ४७ ॥
मतिर्धृतिस्मृतिस्त्यागः स्वीकार इति पञ्चगुणं
चित्तम् ॥ ४८ ॥
चित्त की पाँच वृत्तियाँ हैं । पहली वृत्ति मति है, मति का आशय है
इच्छा । दूसरी वृत्ति धैर्य—उत्साह है । तीसरी वृत्ति स्मृति है, संस्कार-मात्र
से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को स्मृति कहा गया है । चौथी वृत्ति त्याग है ।
उत्तम पात्र को अपनी प्रिय से प्रिय वस्तु का उसकी सुखेच्छा की तृप्ति के लिये
दान कर देना ही त्याग है । पाँचवीं वृत्ति स्वीकार है, इसका आशय है दाना-
नुकूल और ग्रहणानुकूल के व्यापार-अनुक्रम से किसी पदार्थ या भाव को स्वीकार
करना ॥ ४८ ॥
विमर्शः शोलनं धैर्यं चिन्तनं निःस्पृहत्वमिति पञ्चगुणं
चैतन्यमेवमन्तःकरणगुणाः ॥ ४६ ॥
चैतन्य के पाँच गुण अथवा धर्म हैं। पहला गुण विमर्श है । प्रमाण के
माध्यम से वस्तु का विचार ही विमर्श है । शीलन दूसरा धर्म है, इसका
आशय है तत्परतापूर्वक बार-बार पदार्थ अथवा भाव के गुण-
दोष की यथार्थज्ञानप्राप्ति में लगे रहना । तीसरा धर्म धैर्य है । बड़ी-से-बड़ी
विपत्ति के आ जाने पर भी कार्य से विमुख न होना तथा शरीर-मन और
इन्द्रियों को निरन्तर उत्साहित करते रहना ही धैर्य है । चौथा गुण चिन्तन है ।
इसका आशय है बार-बार अपने द्वारा सम्पादित होने वाले कार्य के प्रति सावधान
रहना । पाँचवां गुण निःस्पृहत्व हैं । संसार के विषय-भोगों में मन को आसक्त न
होने देना तथा उसको विवेक-वैराग्यपूर्वक आत्माभिमुख रखना ही निःस्पृहता
है । ये ही अन्तःकरण के पचीस गुण हैं । इस तरह सूक्ष्म-शरीर का वर्णन
किया गया ॥ ४६ ॥
१८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
कुलपंचक
सत्त्वं रजस्तमः कालो जीव, इति कुलपञ्चकम् ॥ ५० ॥
सत्व, रज और तम ( तीनों गुण ) काल और जीव ( इन पाँचों ) की
भाव, मन और बुद्धि और इन्द्रिय आदि के संचालन में प्रधानता रहती है । इस
कारण ये पाँच कुल अर्थात् प्रधान कहे गये हैं ( योगतन्त्र में इन्हें कुलपंचक
कहा गया है । ) ॥ ५० ॥
दया, धर्मः, क्रियाभक्तिः श्रद्धेति पञ्चगुणं सत्त्वम् ॥ ५१ ॥
सत्व गुण के पाँच कार्यरूप गुणों का वर्णन किया जाता है । पहला गुण
दया—प्राणियों पर अनुग्रह करना है । दूसरा गुण धर्म है, जिससे सुख की प्राप्ति
और श्रेय का अभ्युदय हो, वह धर्म है । तीसरा गुण क्रिया है, पूजा आदि
सत्कर्म और पुण्याचरण तथा भगवत्प्रीत्यर्थ व्रतोपवास-अनुष्ठान आदि क्रिया है ।
चौथा गुण भक्ति है । परमेश्वर में भक्ति—प्रीति ही भक्ति है । भक्ति से परमेश्वर
की शरणागति प्राप्त होती है । इससे योगी को समाधिसिद्धि होती है । महर्षि
पतञ्जलि का अभिमत है :
समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात् ॥
( योगदर्शन २ । ४५ )
पाँचवां गुण श्रद्धा है । श्रद्धा से इस लोक के अतिरिक्त परलोक के अस्तित्व
तथा स्वरूपावस्थानपरक आत्मज्ञान ( परमात्मा के प्रति विश्वास ) में निष्ठा
होती है ।
सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसंभवाः ।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम् ।
तत्र सत्त्वं निर्मलत्वात्प्रकाशकमनामयम् ।
सुखसङ्गेन बध्नाति ज्ञानसङ्गेन चानघ ॥
( गीता १४ । ५–६ )
सत्वगुण निर्मलता के कारण प्रकाश करने वाला और विकार रहित होता
है । यह जीवात्मा को सुख और ज्ञान के सम्बन्ध से प्रभावित करता है । गीता
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १६
(१४।६) में कहा गया है--'सत्वं सुखे संजयति ।' (सत्व सुख में लगाता है ।)
इन्द्रियों में चेतनता और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है । 'सत्वात् संजायते ज्ञानम्'
( गीता १४।१७ ) – सत्वगुण से ज्ञान उत्पन्न होता है ॥ ५१ ॥
दानं भोगः शृङ्गारो वस्तुग्रहणं स्वार्थसंग्रहणमिति
पञ्चगुणं रजः ॥ ५२ ॥
रजोगुण से दान, भोग, शृङ्गार, वस्तुग्रहण और संग्रह में प्रवृत्ति होतो है ।
यह जीव को कर्म से वन्धनयुक्त करता है । रजोगुण रागरूप है । यह कामना
और आसक्ति ( तृष्णा ) से उत्पन्न होता है । जीवात्मा इसके द्वारा कर्मफल की
प्राप्ति की स्पृहा करता है । रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, प्रवृत्ति, स्वार्थबुद्धि से
कर्मों का सकाम भाव से आरम्भ, अशान्ति, विषयभोग की लालसा—ये सब उत्पन्न
होते हैं । राजस कर्म का फल दुःख है । 'रजसस्तु फलं दुःखम् ।' (गीता १४।१६)
रजोगुण से लोभ बढ़ता है । रजोगुण का पहला गुण दान है, भविष्य में
अथवा जन्मान्तर में फल-प्राप्ति की कामना से देश-काल के अनुसार सत्पात्र
का विचार कर यथाशक्ति धन अथवा पदार्थ प्रदान करना दान है । दूसरा गुण
भोग है । सुन्दर रूप, रस, गन्ध शब्द, स्पर्शादि की कामना में प्रवृत्त होना भोग है ।
तीसरा गुण शृङ्गार है, मोक्ष-प्राप्ति के लिये नहीं, विषयभोग की इच्छा की पूर्ति
के लिये शरीरादि को समलंकृत करना शृङ्गार है । चौथा गुण वस्तुग्रहण है ।
अपने भोग-सुख के लिये वस्तु के ग्रहण और संचय में आसक्त रहना वस्तुग्रहण
है । पाँचवां गुण स्वार्थ-संग्रहण है । दूसरे की हानि होगी, दुःख होगा—इन
बातों का विचार किये बिना अपने स्वार्थ की तृप्ति के लिये वस्तु और विषय-
भोग में सहायक उपकरणों के संग्रह में अभिरुचिपूर्वक उन्हें सुरक्षित रखना ही
स्वार्थ-संग्रहण है ॥ ५२ ॥
विवादः कलहः शोको वधो वञ्चनमिति पञ्चगुणं
तमः । ५३ ॥
तमोगुण की पाँच वृत्तियाँ हैं । तमोगुण अज्ञान से उत्पन्न होता है ।
देहाभिमानियों को मोहग्रस्त कर प्रमाद, आलस्य और निद्रा से बन्धनमुक्त
करता है । तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अप्रकाश (अन्धकार)
कर्तव्य में अप्रवृत्ति, मोहिनी प्रमादमयी वृत्तियों का जन्म होता है । तमोगुण से
प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं ।
२० ] [ सिद्धसिद्धान्तप
प्रमादमोहौ तमसो भवतोऽज्ञानमेव च ।
( गीता ५ । १७ )
तम का पहला गुण विवाद है । इससे व्यर्थ प्रलाप में समय निष्प्रयोजन
बीत जाता है । तम का दूसरा गुण कलह है । तमोगुणी व्यक्ति अविवेकी होने
से दूसरों से कलह करने में सुख मानता है । तम का तीसरा गुण शोक है । तम
का चौथा गुण वध है । तमोगुणी व्यक्ति अपनी स्वार्थसिद्धि के लिये दूसरे प्राणी
को मार डालने में संकोच नहीं करता है । तम का पाँचवां गुण वञ्चन है ।
तमोगुणी व्यक्ति दूसरों को ठगने में प्रवृत्त रहता है ॥ ५३ ॥
कलना, कल्पना, भ्रान्तिः प्रमादः अनर्थ इति पञ्चगुणाः
कालः ॥ ५४ ॥
काल की पाँच अवस्थायें अथवा गुण हैं । पहली अवस्था कलना-एक, दो,
तीन आदि की संख्या गिनना, आयु आदि की गणना करना है । दूसरी अवस्था
कल्पना-अनेक वस्तु-रचना की सामर्थ्य है-वसन्त है, हेमन्त है-इत्यादि ।
तीसरी अवस्था भ्रान्ति है । बुढ़ापा, यौवन, वचपन आदि में परिवर्तन-निमित्तता
भ्रान्ति है । चौथी अवस्था प्रमाद है । असावधानी में उत्पन्न कार्य में प्रवृत्ति—
व्यर्थ आलस्य आदि में समय बिताना प्रमाद है । पाँचवीं अवस्था अनर्थ है ।
अनिष्ट कार्य में लगना अनर्थ का द्योतक है ॥ ५४ ॥
जाग्रत् स्वप्नः सुषुप्तिस्तुरीयातुर्यातीतमिति पञ्चगुणो
जीवः ॥ ५५ ॥
जीव की पाँच अवस्थायें हैं । पहली जाग्रत् अवस्था है । स्थूल-शरीर में
इन्द्रियों द्वारा कर्म होते रहने का भान अथवा ज्ञान जाग्रत् अवस्था है । दूसरी
स्वप्न-अवस्था है । बाह्य इन्द्रियों के कार्यकलाप शान्त होने पर मन में
( अचेतावस्था में ) अनेक वस्तु आदि का व्यवहार होते रहना स्वप्नावस्था है ।
तीसरी सुषुप्ति-अवस्था है । इसमें बाह्य इन्द्रियों और मन के व्यापार-कार्य के
निरोध से निद्रा की स्थिति ही सुषुप्ति है । चौथी तुर्यावस्था है । इसमें
आत्मस्वरूपविषयक एकाग्रचित्तता बनी रहती है । आत्मस्वरूपविषयक मनोवृत्ति
और द्वैतप्रपंच की अप्रतीति ही तुर्यावस्था का लक्षण है । पाँचवीं तुर्यातीत अवस्था
में निर्विकल्प समाधि में जीव प्रतिष्ठित हो जाता है ॥ ५५ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २१
व्यक्तिपंचक और उसके पचीस गुण
इच्छा, क्रिया, माया, प्रकृतिर्वागिति व्यक्तिपञ्चकम् ॥५६॥
सूक्ष्म-शरीर में जिन-जिन गुणों से व्यवहार का सम्पादन होता है, वे इच्छा
क्रिया, माया, प्रकृति और वाक्-पाँच गुण हैं । जीव के उपभोगसाधन में ये
व्यवहार में तत्पर रहते हैं, इन्हें व्यक्तिपंचक कहा जाता है ॥ ५६ ॥
उन्मादो, वासना, वाञ्छा, चिन्ता चेष्टेति पञ्च-
गुणेच्छा ॥ ५७ ॥
इच्छा के कार्यभूत पाँच व्यापार-गुण हैं । पहला उन्माद है, इच्छा भंग
होने पर उन्माद होता है । स्वकर्त्तव्य-निर्वाह में पहले किये गये कर्मों के संस्कार के
अनुरूप शरीर, इन्द्रिय मन आदि को प्रवृत्त करना वासना है धन आदि पदार्थों
की प्राप्ति की कामना वाञ्छा है । वासना और वाञ्छा यथाक्रम दूसरे और
तीसरे गुण हैं। चौथा गुण चिन्ता है । इष्ट विषय के अन्वेषण की इच्छा
चिन्ता है । पाँचवां गुण चेष्टा है, शरीर का व्यापार ही चेष्टा है, कार्य की पूर्ति
में शरीर का प्रयासरत होना ही चेष्टा है ॥ ५७ ॥
स्मरणं उद्योगः कार्यं निश्चयः स्वकुलाचार इति पञ्चगुणा
क्रिया ॥ ५८ ॥
क्रिया के पाँच गुण अथवा अवस्थायें हैं । संसार के व्यवहार में स्मृति-ज्ञान
के उत्पादक व्यापार को स्मरण कहा जाता है । साधनजनक व्यापार को उद्योग
कहा जाता है । घट-पटादि उत्पन्न करने वाला व्यापार ( मन की वृत्ति को
क्रियात्मक रूप देना ) ही कार्य है । निश्चयात्मक ज्ञान को उत्पन्न करने वाली
इन्द्रियादि तथा मन की क्रिया ही निश्चय है और अपनी कुलपरम्परागत मर्यादा
के पालन में मन की प्रवृत्ति ही स्वकुलाचार है । ये ही पाँचों क्रिया के गुण
हैं ॥ ५८ ॥
मदो, मात्सर्यं, दम्भः कृत्रिमत्त्वमसत्यमिति पञ्चगुणा
माया ॥ ५६ ॥
२२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
माया के पाँच रूप हैं। पहला मद है। मद से युक्त प्राणी कहता है कि
मैं ही बलवान हूँ, धनी हूँ, मेरे समान कोई दूसरा नहीं है। अपने सत्स्वरूप को
इस तरह अज्ञान से आच्छादित करना मद है। दूसरा रूप मात्सर्य है, दूसरों की
उन्नति देख कर उनके प्रति मन में द्वेष-भाव रख कर उनकी उन्नति से जलते
रहना और उन्हें गिराने की चेष्टा में लगे रहना मत्सर है। सत् को छिपाकर
असत् अथवा मिथ्या भाव दिखाकर दूसरों से अपनी प्रशंसा करवाने का भाव
दम्भ है। यह माया का तीसरा गुण है। चौथा रूप कृत्रिमता—बनावट है और
पाँचवां गुण माया का है असद् व्यवहार और मिथ्या भाषण, वचन आदि के
द्वारा दूसरे को विमुग्ध कर असत्य-से अपना काम बनाना; असत्य ही मिथ्या
आचरण है ॥ ५६ ॥
आशा तृष्णा स्पृहा काङ्क्षामित्येति पञ्चगुणा
प्रकृतिः ॥ ६० ॥
(अन्तःकरण के स्वभाव को प्रकृति कहा जाता है।) प्रकृति के पाँच गुण
हैं। पहला गुण आशा है। आगे प्राप्त होने वाली वस्तु के विषय में प्राप्ति की
भावना आशा है। दूसरा गुण तृष्णा है। अपने पास भोग के समस्त साधन रहते
हुए भी अधिक-से-अधिक साधनपदार्थ की प्राप्ति की कामना में प्रवृत्त रहना
तृष्णा है। यह कभी जीर्ण नहीं होती। 'तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः' वचन
पर भर्तृहरि ने वैराग्यशतक में पक्की छाप (मुहर) लगा दी है। तीसरा
गुण स्पृहा है, अमुक वस्तु की प्राप्ति हो जाय, इस तरह की मनोवृत्ति स्पृहा है।
चौथा गुण काङ्क्षा है, यह वस्तु सदा बनी रहे, कोई छीन न ले, ऐसी वृत्ति
काङ्क्षा है। पाँचवां गुण मिथ्या है, न मिलने वाली वस्तु की प्राप्ति की
इच्छा करना मिथ्या है ॥ ६० ॥
परा, पश्यन्ती, मध्यमा, वैखरी, मातृकेति पञ्चगुणा वाक्
इति व्यक्तिपञ्चकः पञ्चविंशति गुणा ॥ ६१ ॥
अन्तः करण के व्यापारसञ्चालन में वाक्—वाणी का बड़ा महत्व है।
वाक् के पाँच रूप हैं। पहला रूप परा है। यह वाणी मूलाधार-चक्र में रहती है
और निर्विकल्प समाधि के द्वारा जानी जातीं है। इस वाणी में मन की गति
नहीं है। वाक् का दूसरा रूप पश्यन्ती है। जब परावाक्—परावाणी नाभि-देश में
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २३
आकर स्थूल रूप धारण करती है, तब यह पश्यन्ती वाणी हो जाती है। इसके
साथ मनका सम्बन्ध भी रहता है। योगी सविकल्प समाधि में इसे जानते हैं।
वाक् का तीसरा रूप मध्यमा है। पश्यन्ती वाणी ऊपर गति करती हुई जब हृदय
में प्रवेश करती है और अकारादि वर्ण-समुदाय पदरूप धारण करती है, तब इसी
का नाम मध्यमा हो जाता है। यही वाणी जब मस्तक से लौट कर कण्ठ और तालु
आदि स्थानों में टकराती है, तब उससे प्रकट होने वाले शब्द की वाणी वैखरी
कहलाती है। यह वाक् का चौथा रूप है। वाक् का पाँचवां रूप मातृका है।
अकारादि वर्णों में शिवरूप मकारके अनुस्वार होने से 'अ आ इ ई' इत्यादि
बीज-मन्त्ररूप वर्णमाला ही मातृका वाक् है। इस तरह व्यक्तिपञ्चक के पचीस
गुणों—प्रकार आदि का वर्णन किया गया ॥ ६१ ॥
प्रत्यक्षकरणपंचक
कर्म कामश्चन्द्रः सूर्योऽग्निरिति प्रत्यक्षकरणपञ्च-
कम् ॥६२ ॥
कर्म, काम, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि सुख-दुःख भोगने वाले शरीर की प्राप्ति
के पाँच प्रधान कारण हैं। शुभ-अशुभ कर्म की अनुकूल वासना के द्वारा शरीर
प्राप्त होता है। बिन्दुरूप शरीर का निमित्तकारण, कर्म और वासना है। यह
संसार में अग्नि और चन्द्रमा के मेल से ही स्थित रहता है। सोमरस भोग्य है
और अग्नि शोषक और भोक्ता है। एक के न रहने पर केवल मात्र दूसरे की
प्रबलता या अधिकता से संसार और शरीर की स्थिति नहीं रह सकती, इसलिये
दोनों का सामरस्य ही शरीर-प्राप्ति और उसकी स्थिति की दृष्टि से आवश्यक
है। सोम से कुछ अग्नि-अंश अधिक रहने से अग्नि की विशिष्टता स्वीकृत
है। यद्यपि सूर्य और अग्नि अन्यत्र एक ही तत्व के रूप में वर्णित हैं, पर
सूर्य बारह कलात्मक, अग्नि दस कलात्मक है और सोम अथवा चन्द्रमा को
सोलह कलात्मक परिलक्षित किया गया है। यह शरीर माता के रज और
पिता के वीर्य से उत्पन्न होता है। रज सोमात्मक है, चन्द्रमारूप है और वीर्य
सूर्य और अग्नि-तत्व रूप है। इस शरीर का उपादान कारण सूर्य, अग्नि और
चन्द्रमा है तथा कर्म और काम निमित्त कारण हैं। कला का अर्थ है चित् से
मिली हुई सत्त्वरूप शक्ति। यही प्रत्यक्षकरणपंचक है ॥ ६२ ॥
२४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
शुभमशुभं यशोऽपिकीर्तिरदृष्टफलसाधनमिति पञ्चगुणं
कर्म ॥ ६३ ॥
शरीर की उत्पत्ति के निमित्तकारणरूप कर्म पाँच प्रकार के होते हैं।
पहला शुभ कर्म है। यज्ञादि कर्म तथा स्वर्गादि प्राप्त कराने वाले सत्कर्म ही शुभ
कर्म हैं। अशुभ कर्म वे हैं, जो निन्दित और असत्य तथा पापप्रेरित हैं। इनसे नरक
आदि की प्राप्ति होती है। पुण्यादि कर्म से यश बढ़ता है और अकर्म अपकीर्ति
प्रदान करने वाले कर्म हैं। जिन कर्मों के फल चर्मचक्षु--इन्द्रियजन्य ज्ञान के
अप्रत्यक्ष हैं, वे अदृष्टफलसाधन कहे जाते हैं ॥ ६३ ॥
रतिः, प्रीतिः, क्रीड़ा, कामनाऽऽतुरतेति पञ्चगुणाः
कामः ॥ ६४ ॥
विषय-भोग-सेवन-जन्य कर्म ही काम कहा जाता है। काम पाँच प्रकार का
होता है। काम का पहला रूप रति है, स्त्री के प्रति रमणीयता की वृत्ति ही
रति है। सुख-साधनों में अनुरक्ति ही प्रीति है। इन्द्रियों और मन को आनन्दित
करने वाली रमणीय वस्तुओं को साधन बनाकर सुख-सम्पादन की क्रिया ही
क्रीड़ा है, इस सम्बन्ध में नौका-विहार, कन्दुक उछालना आदि खेलों को दृष्टान्त
रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। काम-सुख की प्राप्ति में निरन्तर स्पृहा रखना
ही कामना है तथा भोग-सुख अथवा रमणीयता का आस्वादन शीघ्रातिशीघ्र
हो, इस तरह की मनोवृत्ति ही आतुरता है ॥ ६४ ॥
उल्लोला, कल्लोलिनी,, उच्चलन्ती, उन्मादिनी, तरङ्गिणी
शोषिणी, लम्पटा, प्रवृत्तिः, लहरी, लोला, लेलिहाना, प्रसरन्ती,
प्रवाहा, सौम्या, प्रसन्नता, प्लवन्ती एवं चन्द्रस्य षोडशकला
सप्तदशीकला निवृत्ति, साऽमृतकला ॥ ६५ ॥
चन्द्रमा की सोलह कलायें हैं। भोगप्रवृत्ति को बढ़ानेवाली, द्रवित करने
वाली कला उल्लोला है। बड़े आकार की तरंगमयी कला कल्लोलिनी है, ऊपर
को चलनेवाली, प्रवृत्त होनेवाली उच्चलन्ती है। विषयसुख के प्रति मन को
उन्मादित करने वाली कला उन्मादिनी है, तरंगायित होने वाली कला तरंगिणी
है, जल और रस को सुखाने वाली कला शोषिणी है, लम्पटा चारों ओर फैलती
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २५
अथवा प्रसरित होती है, हर्षोत्पादिका कला का नाम प्रवृत्ति है, टेढ़ी-टेढ़ी गति
वाली कला लहरी है। चञ्चल होने वाली कला का नाम लोला है, रसादि को
चाटनेवाली कला लेलिहाना है। फैलनेवाली कला का नाम प्रसरन्ती हैं, चन्द्रकान्त
आदि मणियों को द्रवित करने वाली कला का नाम प्रवाहा है, समस्त पदार्थों,
औषधियों, लता-वृक्षादि को सोमरस से सिक्त करने वाली कला का नाम सौम्या
है, सभी पदार्थों में निर्मलता स्थापित करने वाली कला का नाम प्रसन्ना है,
उछल कर प्रवाहित होनेवाली कला का नाम प्लवन्ती है। चन्द्रमा में स्थायी
रहने वाली, प्रलयकाल में भी अक्षुण्ण रहने वाली सोमरसमयी कला ( निजकला )
का नाम निवृत्ता है, यही अमृत कला है, जो सत्रहवीं कला कहलाती है ॥ ६५ ॥
विशेष—चन्द्रमा की इन समस्त कलाओं का सेवन लोकोत्तरानन्द की
प्राप्ति में भी सार्थक है, केवल विषयेन्द्रिय-भोगजन्य तृप्ति में ही इनकी उपादेयता
सीमित नहीं है, ये परमात्मप्रेम अथवा आत्मरस की तृप्तिस्वरूपिणी हैं।
तापिनी, ग्रासिका, उग्रा, आकुञ्चनी, शोषिणी, प्रबोधिनी,
स्मरा, आकर्षिणी, तुष्टिवर्धनी, ऊर्मिरेखा, किरणवती,
प्रभावतीति द्वादशकला सूर्यस्य त्रयोदशी स्वप्रकाशता
निजकला ॥ ६६ ॥
सूर्य की बारह कलायें हैं। तापिनी ताप पैदा करती हैं, ग्रासिका तम—
अन्धकार का नाश करती है, उग्रा कला प्रखर होती है, आकुञ्चनी समेटने वाली,
संकुचित करनेवाली कला है, कुमुदिनी आदि को संकुचित और आकुंचित करने
वाली कलायें उग्रा और आकुंचिनी हैं। शोषिणी कला जल आदि को सुखाती है।
प्रबोधिनी कला कमल आदि को खिलाती (विकसित करती) है। स्मरा कला
स्मृति उत्पन्न करती है। आकर्षिणी कला भूमि आदि के जल को अपनी ओर
खींचती है। प्राणिमात्र को संतुष्टि प्रदान करनेवाली कला तुष्टिवर्धिनी है। ऊर्मी
रेखा कला प्राणियों की आयु का माप करती है। किरणों का विस्तार करनेवाली
कला किरणवती है और प्रकाश करनेवाली कला का नाम प्रभावती है। सूर्य की
तेरहवीं कला—निजकला स्वप्रकाशता है ॥ ६६ ॥
दीपका, राजिका, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, प्रचण्डा,
पाचिका, रौद्री, दाहिका, रागिणी, शिखावतो इत्यग्नेर्दशकला
२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
एकादशो कला ज्योतिरिति प्रत्यक्षकरणगुणकला-
समूहः ॥ ६७ ॥
अग्नि की दस कलायें हैं । दीपका कला दीप्त ( प्रकाशित ) करनेवाली
कला है । राजिका कला शोभामयी करती है, ज्वाला कला ही ज्वालिनी है,
विस्फुलिंग—चिनगारी प्रकट करनेवाली कला विस्फुलिंगिनी है । प्रचण्डकिरणों
से युक्त कला ही प्रचण्डा है और जठरादि में भोज्य पदार्थों को पचानेवाली,
वृक्षादि में फलों को रसमय करनेवाली कला ही पाचिका है । रौद्र स्वभाव की
प्रतिपादिका कला रौद्रे है, जलाने वाली कला का नाम दाहिका है, रागिणी अग्नि
की लाल ज्योति की प्रकाशिका है, ऊपर की ओर लौ धारण करनेवाली कला
शिखावती है । अग्नि की निजकला ज्योति है । ( सूर्य, चन्द्र और अग्नि—शिव
के त्रिनेत्र के वाचक हैं । ) इस तरह प्रत्यक्षकरणपंचक के गुण-समूह और
कलाओं का वर्णन किया गया है ॥ ६७ ॥
दस प्रधान नाड़ी और उनके स्थान
ग्रथ नाड़ीनां दश द्वाराणि । इडापिङ्गला नासाद्वारयोर्वहतः
सुषुम्णा नाडी तु ब्रह्मदण्डमार्गेण ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्तं वहति सरस्वती
मुखद्वारे वहति पूषाऽलम्बुषा चक्षुर्द्वारयोर्वहतो गान्धारी हस्ति-
जिह्विका च कर्णद्वारयोर्वहतः कुहूर्गुदाद्वारे वहति शंखिनी
लिङ्गद्वारे वहति एवं दशद्वारेषु वहन्ति ॥ ६८ ॥
शरीर में ( प्राणवाहिनी ) दस ( प्रमुख ) नाड़ियों के दस द्वारों का
वर्णन किया जाता है । नासिका के दोनों रन्ध्र ( द्वार ) से—बायें से इडा और
दायें से पिंगला बहती है । सुषुम्णा नाड़ी ब्रह्मदण्डमार्ग ( मेरुदण्ड ) से ब्रह्मरन्ध्र
तक बहती है और सरस्वती मुख-द्वार में बहती है । चक्षुद्वार—बायें नेत्र में
गान्धारी और दक्षिण नेत्र में हस्तिजिह्विका नाड़ी बहती हैं, कानों के द्वार में—
यथाक्रम पूषा और अलम्बुषा बहती हैं । शंखिनी नाड़ी लिंग द्वार में बहती है
और गुदा द्वार में मूल नाड़ी बहती है । दसों द्वारों में दसों नाड़ियाँ बहती
हैं ॥ ६८ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २७
विशेष—लिङ्ग से ऊपर और नाभि से नीचे पक्षी के अण्डे के समान समस्त
नाड़ियों का उत्पत्तिस्थान मूलकन्द है । इसी मूलकन्द से बहत्तर हजार नाड़ियों
की उत्पत्ति है । इनमें सर्वश्रेष्ठ सुषुम्णा है, सुषुम्णा से प्राण निकलने पर ब्रह्मलोक
तक गति होती है और जीवात्मा मोक्षस्वरूप—परमेश्वर अलख निरञ्जन शिव में
प्रतिष्ठित हो जाता है । दूसरी नाड़ियों से प्राण निकलने पर स्वकर्म के अनुसार
जीवात्मा को स्वर्गादि लोकों की प्राप्ति होती है । योगशिखोपनिषद् में वर्णित
नाड़ी-स्थिति-क्रम के अनुसार ही ( सिद्धसिद्धान्तपद्धति १ । ६८ में वर्णित )
नाड़ी-स्थिति का अर्थ किया गया है ।
गान्धारी हस्तिजिह्वा च तस्मान्नेत्रद्वयं गते । २१ ॥
पूषा चालम्बुषा चैव श्रोत्रद्वयमुपागते ॥ २२ ॥
सरस्वती तु या नाड़ी साजिह्वान्तं प्रसर्पति ॥ २३ ॥
( योगशिखोपनिषद् ५ । २१-२३ )
दस वायु ( प्राण ) और उनके स्थान
अथ दशवायवः । हृदये प्राणवायुरुच्छ्वासनिःश्वासकारो
हकारसकारात्मकश्चास्यैवावस्थाभेदे हठयोग इति संज्ञा, 'हकारः
कीर्त्तितः सूर्यष्ठकारश्चन्द्र उच्यते । सूर्याचन्द्रमसोर्योगाद्
हठयोगो निगद्यते ॥' गुदेत्वपानवायू रेचक.कुम्भकपूरकश्च
नाभौ समानवायुर्दीपकः पाचकश्च सर्वाङ्गे व्यानवायुग्र
सनवमनजल्पकारश्च उदानः नागवायु सर्वाङ्ग व्यापकश्चाल-
कश्च कूर्मवायुः कम्पकश्चचक्षुरुन्मेषकारकश्च कृकल उद्गारकः
क्षुत्कारकश्चदेवदत्तो मुखविजृम्भकः धनञ्जयो नादघोषक इति
दशवायववलोकनेन पिण्डोत्पत्तिर्नरनारीरूपः । ६८ ॥
शरीर में दस ( प्रधान ) वायु हैं । हृदय में प्राणवायु उच्छ्वास और
निःश्वास का संचालन करती है । यही प्राणवायु हकार और सकारात्मक है । यह
हकार की ध्वनि से बाहर जाती है, सकार की ध्वनि से भीतर आती है, यह हठयोग
की स्थिति है । हकार सूर्य और ठकार चन्द्र कहा जाता है, हकार और ठकार का
योग ही हठ ( प्राण )-साधना है । गुदादेश में अपान वायु रहती है, यह अपान
२८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
२. द्वितीय-तृतीय उपदेश: पिण्ड-विचार एवं पिण्ड-संवित्ति (शरीरस्थ तीर्थ व देवता)
वायु रेचक, पूरक, कुम्भक की सामर्थ्य से युक्त होती है । ( प्राणवायु को शरीर
में रोकती है और प्राणायाम के अभ्यास में सिद्धि प्रदान करती है । ) नाभि में
समान वायु रहती है, यह जठरानल को दीप्त करती है और भोजन के रूप में
ग्रहण किये गये पदार्थों को रसयुक्त करती तथा पचाती है । व्यानवायु शरीर में
व्याप्त रहती है, यह समस्त नाड़ियों में विद्यमान मलादि दोषों का शोषण कर
शरीर की कान्ति और तेज को बढ़ाती है । कंठ में उदान वायु रहती है । इसका
कार्य वमन, भाषण और शरीर से प्राण का उत्क्रमण है । नागवायु शरीर में व्याप्त
रह कर उसके अंग-प्रत्यंग के संचालन में सहायता करती है । आँखों की पलकों
को खोलना और बन्द करना ( नेत्रोन्मीलन ) कूर्मवायु का कार्य है । कृकल
( कृकर ) वायु का कार्य है डकार उत्पन्न करना तथा भूख बढ़ाना । देवदत्त
वायु जँभाई लेने में सहायता रती है तथा धनञ्जय समस्त शरीर में व्याप्त
रहकर अव्यक्त नाद उत्पन्न करती है । ( प्राण, अपान, समान, उदान और
व्यान, पाँच मुख्य वायु हैं और नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त तथा धनञ्जय उपवायु
हैं । ) इस तरह इन दस वायुओं के सम्बन्ध से नरनारीरूप पिण्ड ( शरीर ) की
उत्पत्ति होती है ॥ ६६ ॥
विशेष -- प्राण-वायु के हकार की ध्वनि से बाहर जाने पर और सकार की
ध्वनि से भीतर आने पर हंस-हंस मन्त्र की उत्पत्ति शरीर में इक्कीस हजार छः
सौ बार होती रहती है । इस हंस मन्त्र से सोऽहं शब्द की उत्पत्ति होती है ।
हंस-मन्त्र का जप ही अजपा गायत्री है । यह योगियों को मोक्ष प्रदान करती है,
इसके संकल्पमात्र से उसके समस्त पाप नष्ट होते हैं । कुण्डलिनी से उत्पन्न यह
गायत्री, प्राण-विद्या महाविद्या है ।
हकारेण वहिर्याति सकारेण विशेत् पुनः ।
हंसहंसेत्यमुं मन्त्रं जीवो जपति सर्वदा ॥
अजपा नाम गायत्री योगिनां मोक्षदायिनी ।
अस्याः संकल्पमात्रेण सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
कुण्डलिन्यां समुद्भूता गायत्री प्राणधारिणी ।
प्राणविद्या महाविद्या यस्तां वेत्ति स योगवित् ॥
( गोरक्षशतक ४२, ४४, ४६ )
हकार से सूर्यस्वर और ठकार से चन्द्रस्वर का सुषुम्ना नाड़ी में संयोग ही
हठयोग में प्राणसिद्धि है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ २६
जीवात्मा के स्थूल शरीर का उत्पत्ति-क्रम
अथ गर्भोली पिण्डोत्पत्तिर्भवति नरनारीसंयोगे ऋतुकाले
रजोविन्दुसंयोगे जीवः ॥ ७० ॥
ऋतु-काल में नर और नारी के संभोग—संयोग ( संगम ) से निकले हुए
रज-विन्दु का स्त्री की योनि में ऐक्य होने से जीव के स्थूल शरीर की उत्पत्ति
होती है ॥ ७० ॥
विशेष—शिवरूप विन्दु है और बीज शक्ति रूप है । इन दोनों का परस्पर
सम्बन्ध ही नाद कहा गया है । व्यष्टि जीव सहित शुक्र भी बिन्दु है, पुरुष के वीर्य
में अन्य जीवात्मा निवास करता है, पर उसके शरीर में उसे सुख-दुःखादि प्रभावित
नहीं करते, पर संभोग-काल में भोगार्थ कर्मवश वह अन्य जीवात्मा पुरुष के बिन्दु
से स्त्री के गर्भाशय में रज में सिंचित होकर स्थूल शरीर ( रज-वीर्य से उत्पन्न
शरीर ) में जन्म लेने में समर्थ होता है । अतएव रज और बिन्दु का ऐक्य ही
भोगकर्म के परिणामस्वरूप स्थूल शरीर की उत्पत्ति का कारण है ।
प्रथमदिने कलल भवति सप्तरात्रे बुद्बुदाकारं भवति ।
अर्धमासे गोलाकारं भवति । मासमात्रेण कठिनं मासद्वयेन
शिरो भवति । तृतीयमासि हस्तपादादिकं भवति । चतुर्थे मासि
चक्षुःकर्णादिनासिकामुखमेढ्रगुदं भवति । पञ्चमे मासि
पृष्ठोदरौ भवतः । षष्ठे मासि नखकेशादिकं भवति । सप्तमे
मासे सर्वचेतनयुक्तो भवति । अष्टमे मासि सर्वलक्षणयुक्तो
भवति । नवमे मासि सत्यज्ञानयुक्तो भवति । दशमे मासि
योनिसंस्पर्शादज्ञानी बालको भवति ॥ ७१ ॥
( माता के गर्भ में प्रविष्ट जीवात्मा के स्थूल शरीर के निर्माण ( सृष्टि )
क्रम पर प्रकाश डालते हुए महायोगी गोरखनाथजी का कथन है— ) नर-नारी
के परस्पर सम्भोग के परिणामस्वरूप वीर्य और रज का मिश्रित द्रव पहले दिन
कुछ गाढ़ा-सा रहता है । सात दिन की अवधि में यह बुलबुले का आकार धारण
कर लेता है । पन्द्रह दिनों में यह गोल आकार का ( पिण्ड ) हो जाता है । एक
३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति
माह में यह स्थूल ठोस—कठिन-सा हो जाता है और दो माह में ( उस गोलाकार
पिण्ड में ) सिर बनता है, तीन माह में उसमें हाथ-पैर आदि अंग बनते हैं, चार
माह की अवधि में उसमें नेत्र, कान, नाक, मुख, लिंग, गुदा के आकार बन जाते
हैं, पाँचवें मास में पीठ और पेट आकारित होते हैं, छठें माह में नख, बाल आदि
उत्पन्न होते हैं; सातवें माह में उसमें चेतनता का समस्त अंगों में संचार होता है ।
आठवें मास में उसमें सभी लक्षण पूरे हो जाते हैं। नौवें मास में उसे ( चेतन
जीवात्मा को ) अपने सत्स्वरूप का ज्ञान होता है । ( उसे पिछले जन्म के
कर्मों और तज्जन्य दुःखों का स्मरण हो आता है और वह परमात्मा से प्रार्थना
करता है कि मुझे कृपा करके इस गर्भवास नरक-यातना से मुक्त कीजिये । दसवें
मास में गर्भ से बाहर होते समय योनि-द्वार का स्पर्श होते ही वह अज्ञानी बालक-
रूप में जन्म लेता है ॥ ७१ ॥
शुक्राधिकेषु पुरुषो रक्ताधिका कन्यका समशुक्ररक्ताभ्यां
नपुंसकः परस्परं चिन्ताव्याकुलत्वादन्धः कुब्जो वामनः पङ्गु
रङ्गहीनश्च भवति । परस्परं रतिकालेऽङ्गनिःपीडनकर-
गुणैः शुक्रो द्वित्रिवारं पतति, येन द्वितीयो बालको
भवति ॥ ७२ ॥
यदि पिता का वीर्य गर्भाशय में अधिक सिंचित होता है और माता का रक्त
( रज ) कम है तो संभोग के परिणामस्वरूप पुरुष- ( बालक ) शरीर उत्पन्न
होता है, माता का रज अधिक होने से कन्या-शरीर की उत्पत्ति होती है ।
पिता-माता के वीर्य और रज के समान ( मिश्रित ) द्रव से नपुंसक सन्तान की
प्राप्ति होती है । यदि संभोग के समय स्त्री-पुरुष, दोनों चिन्ताग्रस्त हों तो जन्म
लेने वाली सन्तान अन्धी, कुबड़ी, वामन (बौनी), लँगड़ी, अंगहीन होती है । रति-
प्रसंग के समय आपस में अङ्गमर्दन से वीर्य-स्खलन में अवरोध होने पर गर्भाशय में
रुक-रुक कर दुबारा वीर्यपात होते रहने पर एक से अधिक सन्तान उत्पन्न
होती हैं ॥ ७२ ॥
सार्धपलत्रयं शुक्रं विंशतिपलं रक्तं द्वादशपलं मेदः,
दशपलं मज्जा, शतपलं मांसं, दशपल पित्तं, विंशतिपलं श्लेष्मा,
तद्वद्वातः स्यात् षष्ट्यधिकशतत्रयमस्थीन्यस्थिमात्रं सन्धयः
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३१
सार्धत्रयकोटिरोमकूपाणि पितृमातृवीर्यं भवति वातपित्तश्लेष्म-
धातुत्रयं दशधातुमयं शरीरमिति गर्भोत्थपिण्डोत्पत्तिः ॥ ७३ ॥
( जीवात्मा के स्थूल शरीर में कितनी मात्रा में कौन-कौन धातु हैं, इसका
वर्णन किया गया है । ) इस शरीर में वीर्य साढ़े तीन पल ( २२५ ग्राम ), रक्त
बीस पल (१२८० ग्राम), मेद बारह पल ( ७६८ ग्राम ), मज्जा, दस पल
(६४० ग्राम), मांस सौ पल (६४०० ग्राम), पित्त दस पल (६४० ग्राम), कफ
२० पल ( १२८० ग्राम ), वात बीस पल (१२८० ग्राम), अस्थि तीन सौ साठ,
सन्धि (जोड़) तीन सौ साठ, रोम और रोमकूप साढ़े तीन करोड़ हैं । यह शरीर
पिता-माता के वीर्य और रज से उत्पन्न है । वात, पित्त, कफ आदि से युक्त दस
धातुओं से निर्मित शरीर की गर्भ से उत्पत्ति होती है । यह गर्भ में उत्थित पिण्ड
की उत्पत्ति है ॥ ७३ ॥
विशेष--१ पल ४ कर्ष के बराबर होता है, और १ कर्ष का तौल १६
मासा है, १ मासा १ ग्राम के तौल के बराबर होता है, इस तरह १ पल का तौल
६४ ग्राम है ।
इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ प्रथमोपदेशः ॥
३२ ] [ सिद्ध सिद्धान्तपद्धति
दूसरा उपदेश
[ पिण्डविचार ]
नौ चक्र-वर्णन
पिण्डे नवचक्राणि । आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिधावतं भगमण्डला-
कारं तत्र मूलकन्दस्तत्र शक्तिं पावकाकारां ध्यायेत् तत्रैव
कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति ॥ १ ॥
शरीर में नौ चक्र हैं। ( गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिङ्ग से दो अंगुल
नीचे—चार अंगुल परिमाण का मूलाधार है। ) मूलाधार में तीन बार गोल
आकार में चारों ओर लिपटा त्रिकोण भगमण्डल के सदृश ब्रह्मचक्र है, वहीं
( उसी के समीप) मूलकन्द है, वहाँ अग्नि के आकारवाली शक्ति का (योगी को)
ध्यान करना चाहिये, वहीं कामरूप पीठ है, जिसके ध्यान मात्र से समस्त काम-
नाओं की सिद्धि होती है ॥ १ ॥
विशेष—हमारे पिण्ड में पीठ में संलग्न मेरुदण्ड है। मेरुदण्ड के भीतर ही
दाहिनी ओर पिंगला तथा बायीं ओर इडा नाड़ी स्थित हैं, मध्य में सुषुम्ना
नाड़ी है। यह तेजःस्वरूपिणी नाड़ी मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त सहस्रार तक जाती
है। इसी नाड़ी में स्थित अनेक आकार-विशेष ही षट्चक्र के रूप में प्रसिद्ध हैं।
गोरखनाथजी ने यद्यपि इसमें नवचक्र निरूपित किये हैं तथापि उन्होंने गोरक्ष-
शतक आदि में षट्चक्र ही स्वीकार किये हैं।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३३