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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 68 of 222

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अथवा प्रसरित होती है, हर्षोत्पादिका कला का नाम प्रवृत्ति है, टेढ़ी-टेढ़ी गति
वाली कला लहरी है। चञ्चल होने वाली कला का नाम लोला है, रसादि को
चाटनेवाली कला लेलिहाना है। फैलनेवाली कला का नाम प्रसरन्ती हैं, चन्द्रकान्त
आदि मणियों को द्रवित करने वाली कला का नाम प्रवाहा है, समस्त पदार्थों,
औषधियों, लता-वृक्षादि को सोमरस से सिक्त करने वाली कला का नाम सौम्या
है, सभी पदार्थों में निर्मलता स्थापित करने वाली कला का नाम प्रसन्ना है,
उछल कर प्रवाहित होनेवाली कला का नाम प्लवन्ती है। चन्द्रमा में स्थायी
रहने वाली, प्रलयकाल में भी अक्षुण्ण रहने वाली सोमरसमयी कला ( निजकला )
का नाम निवृत्ता है, यही अमृत कला है, जो सत्रहवीं कला कहलाती है ॥ ६५ ॥
विशेष—चन्द्रमा की इन समस्त कलाओं का सेवन लोकोत्तरानन्द की
प्राप्ति में भी सार्थक है, केवल विषयेन्द्रिय-भोगजन्य तृप्ति में ही इनकी उपादेयता
सीमित नहीं है, ये परमात्मप्रेम अथवा आत्मरस की तृप्तिस्वरूपिणी हैं।
तापिनी, ग्रासिका, उग्रा, आकुञ्चनी, शोषिणी, प्रबोधिनी,
स्मरा, आकर्षिणी, तुष्टिवर्धनी, ऊर्मिरेखा, किरणवती,
प्रभावतीति द्वादशकला सूर्यस्य त्रयोदशी स्वप्रकाशता
निजकला ॥ ६६ ॥
सूर्य की बारह कलायें हैं। तापिनी ताप पैदा करती हैं, ग्रासिका तम—
अन्धकार का नाश करती है, उग्रा कला प्रखर होती है, आकुञ्चनी समेटने वाली,
संकुचित करनेवाली कला है, कुमुदिनी आदि को संकुचित और आकुंचित करने
वाली कलायें उग्रा और आकुंचिनी हैं। शोषिणी कला जल आदि को सुखाती है।
प्रबोधिनी कला कमल आदि को खिलाती (विकसित करती) है। स्मरा कला
स्मृति उत्पन्न करती है। आकर्षिणी कला भूमि आदि के जल को अपनी ओर
खींचती है। प्राणिमात्र को संतुष्टि प्रदान करनेवाली कला तुष्टिवर्धिनी है। ऊर्मी
रेखा कला प्राणियों की आयु का माप करती है। किरणों का विस्तार करनेवाली
कला किरणवती है और प्रकाश करनेवाली कला का नाम प्रभावती है। सूर्य की
तेरहवीं कला—निजकला स्वप्रकाशता है ॥ ६६ ॥
दीपका, राजिका, ज्वालिनी, विस्फुलिङ्गिनी, प्रचण्डा,
पाचिका, रौद्री, दाहिका, रागिणी, शिखावतो इत्यग्नेर्दशकला
२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति