सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextमहासाकार पिण्ड की आठ मूर्ति
स एव शिवः शिवाद् भैरवो भैरवात् श्रीकण्ठः श्रीकण्ठात्
सदाशिवः सदाशिवादीश्वर ईश्वराद्रुद्रो रुद्राद्विष्णु विष्णो-
र्ब्रह्मेति महासाकारपिण्डस्य मूर्त्यष्टकम् ॥ ३७ ॥
महासाकार पिण्ड पञ्चानन शिव की आठ मूर्ति—आकृति ( रूप ) है ।
वह शिव है । शिव से भैरव, भैरव से श्रीकण्ठ, श्रीकण्ठ से सदाशिव, सदाशिव से
ईश्वर, ईश्वर से रुद्र, रुद्र से विष्णु और विष्णु से ब्रह्मा अभिव्यक्त हैं ।) इन्हीं
आठों के द्वारा सृजन, नियमन ( रक्षण ) और संहार के कार्य सम्पादित होते हैं ।
ये ही संसारग्रस्त जीवों को बन्धनमुक्त कर भवसागर से तार देते हैं, अतएव सभी
मुमुक्षुओं के लिये अभीष्ट पूर्तिहेतु ये ही उपास्य अथवा पूज्य हैं ।) इस तरह
एक महासाकार पिण्ड शिव से आठ रूपों की अभिव्यक्ति है ॥ ३७ ॥
नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की उत्पत्ति और पंचभूतों के
पचीस गुण
तद् ब्रह्मणः सकाशादवलोकनेन नरनारीरूपप्रकृतिपिण्डः
समुत्पन्नस्तच्च पञ्चपञ्चात्मकं शरीरम् ॥ ३८ ॥
( नरनारीरूप प्रकृतिपिण्ड की सृष्टि का वर्णन किया जाता है । ( सबसे
पहले ब्रह्मा के अवलोकन—ईक्षणरूप संकल्प से स्त्रीसम्पुटित पुरुषप्रकृतिपिण्ड
( शतरूपासहित मनुप्रजापति ) की समुत्पत्ति होती है । ( इसके उपरान्त
जरायुजादि भौतिक ( पञ्चभूतात्मक ) शरीरों की उत्पत्ति है ।) यही प्रकृतिपिण्ड
भूमि आदि पंचभूतों के पांच गुणों से युक्त होने से पाञ्चभौतिक शरीर कहा
जाता है ॥ ३८ ॥
अस्थिमांसत्वङ् नाड़ीरोमाणीति पञ्चगुणा भूमिः ॥ ३६ ॥
( इस पाञ्चभौतिक शरीर में पृथ्वी का अंश अधिक है, इसलिये यह शरीर
पार्थिव कहा जाता है ।) इस भौतिक शरीर में पृथ्वीतत्व के पांच गुण हैं, इसका
पहला गुण अस्थि है, दूसरा गुण मांस है, तीसरा गुण त्वचा है, चौथा गुण नाड़ी है
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