सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextआकर स्थूल रूप धारण करती है, तब यह पश्यन्ती वाणी हो जाती है। इसके
साथ मनका सम्बन्ध भी रहता है। योगी सविकल्प समाधि में इसे जानते हैं।
वाक् का तीसरा रूप मध्यमा है। पश्यन्ती वाणी ऊपर गति करती हुई जब हृदय
में प्रवेश करती है और अकारादि वर्ण-समुदाय पदरूप धारण करती है, तब इसी
का नाम मध्यमा हो जाता है। यही वाणी जब मस्तक से लौट कर कण्ठ और तालु
आदि स्थानों में टकराती है, तब उससे प्रकट होने वाले शब्द की वाणी वैखरी
कहलाती है। यह वाक् का चौथा रूप है। वाक् का पाँचवां रूप मातृका है।
अकारादि वर्णों में शिवरूप मकारके अनुस्वार होने से 'अ आ इ ई' इत्यादि
बीज-मन्त्ररूप वर्णमाला ही मातृका वाक् है। इस तरह व्यक्तिपञ्चक के पचीस
गुणों—प्रकार आदि का वर्णन किया गया ॥ ६१ ॥
प्रत्यक्षकरणपंचक
कर्म कामश्चन्द्रः सूर्योऽग्निरिति प्रत्यक्षकरणपञ्च-
कम् ॥६२ ॥
कर्म, काम, चन्द्रमा, सूर्य और अग्नि सुख-दुःख भोगने वाले शरीर की प्राप्ति
के पाँच प्रधान कारण हैं। शुभ-अशुभ कर्म की अनुकूल वासना के द्वारा शरीर
प्राप्त होता है। बिन्दुरूप शरीर का निमित्तकारण, कर्म और वासना है। यह
संसार में अग्नि और चन्द्रमा के मेल से ही स्थित रहता है। सोमरस भोग्य है
और अग्नि शोषक और भोक्ता है। एक के न रहने पर केवल मात्र दूसरे की
प्रबलता या अधिकता से संसार और शरीर की स्थिति नहीं रह सकती, इसलिये
दोनों का सामरस्य ही शरीर-प्राप्ति और उसकी स्थिति की दृष्टि से आवश्यक
है। सोम से कुछ अग्नि-अंश अधिक रहने से अग्नि की विशिष्टता स्वीकृत
है। यद्यपि सूर्य और अग्नि अन्यत्र एक ही तत्व के रूप में वर्णित हैं, पर
सूर्य बारह कलात्मक, अग्नि दस कलात्मक है और सोम अथवा चन्द्रमा को
सोलह कलात्मक परिलक्षित किया गया है। यह शरीर माता के रज और
पिता के वीर्य से उत्पन्न होता है। रज सोमात्मक है, चन्द्रमारूप है और वीर्य
सूर्य और अग्नि-तत्व रूप है। इस शरीर का उपादान कारण सूर्य, अग्नि और
चन्द्रमा है तथा कर्म और काम निमित्त कारण हैं। कला का अर्थ है चित् से
मिली हुई सत्त्वरूप शक्ति। यही प्रत्यक्षकरणपंचक है ॥ ६२ ॥
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