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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 58 of 222

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भौतिक शरीर में व्याप्त आकाश तत्व के पाँच गुण राग, द्वेष, भय, लज्जा
और मोह शरीरगत व्यवहार में मुख्य हेतु हैं। इन्हीं के आश्रय में शरीर में द्वन्द्व
भावों की उत्पत्ति होती है। यद्यपि ये रागद्वेषादि अन्तःकरण के धर्म हैं तथापि
इनके निवास-स्थान हृदयाकाश का भूताकाश से भेद नहीं है।) इस तरह प्रत्येक
भूत के पाँच-पाँच गुण अथवा धर्म से (पचीस गुणों से) पिण्ड--शरीर उत्पन्न
होता है॥ ४३॥
अन्तःकरणपंचक
मनो बुद्धिरहंकारश्चित्तं चैतन्यमित्यन्तःकरण-
पञ्चकम् ॥ ४४ ॥
(स्थूल पिण्ड-शरीर के संचालक सूक्ष्मशरीरादिपर्यन्त लिङ्गात्मा का
वर्णन किया जाता है।) यद्यपि अवयवी अन्तःकरण है तथापि उसके अवयव के
रूप में मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त और चैतन्य के रूप में अन्तःकरण की पाँच
वृत्तियाँ हैं। यही अन्तःकरणपञ्चक कहा गया है॥ ४४॥
संकल्पो, विकल्पो, मूर्च्छा, जड़ता, मननमिति पञ्चगुणं
मनः ॥ ४५ ॥
मन के पाँच गुण अथवा धर्म हैं। पहला गुण संकल्प है। यह पदार्थ मुझे
मिल जाय अथवा मेरे द्वारा यह कार्य सम्पन्न हो जाय, इस आशा को संकल्प कहा
जाता है। संशयात्मक विचार—यह पदार्थ ऐसा है या नहीं है, इसको विकल्प
कहा जाता है। मन की यह दूसरी अवस्था है। मन का तीसरा गुण मूर्च्छा है,
मन की मुग्धता, विमूढ़ता अथवा अचेत वृत्ति को मूर्च्छा कहा जाता है। मन का
चौथा गुण जड़ता है। विवेक का अभाव ही जड़ता है। मन का पाँचवां गुण
मनन है। मनन का आशय है तर्कसंगत विचार ॥ ४५ ॥
विवेको, वैराग्यं, शान्तिः, सन्तोषः, क्षमेति पंचगुणा
बुद्धिः ॥ ४६ ॥
बुद्धि के पाँच गुण हैं। पहला गुण विवेक है। वस्तु के स्वरूप का यथार्थ
निश्चय ही विवेक है। (विवेक हो जाने पर वैराग्य का उदय होता है।)
१६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति