सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextदूसरा उपदेश
[ पिण्डविचार ]
नौ चक्र-वर्णन
पिण्डे नवचक्राणि । आधारे ब्रह्मचक्रं त्रिधावतं भगमण्डला-
कारं तत्र मूलकन्दस्तत्र शक्तिं पावकाकारां ध्यायेत् तत्रैव
कामरूपपीठं सर्वकामप्रदं भवति ॥ १ ॥
शरीर में नौ चक्र हैं। ( गुदा से दो अंगुल ऊपर और लिङ्ग से दो अंगुल
नीचे—चार अंगुल परिमाण का मूलाधार है। ) मूलाधार में तीन बार गोल
आकार में चारों ओर लिपटा त्रिकोण भगमण्डल के सदृश ब्रह्मचक्र है, वहीं
( उसी के समीप) मूलकन्द है, वहाँ अग्नि के आकारवाली शक्ति का (योगी को)
ध्यान करना चाहिये, वहीं कामरूप पीठ है, जिसके ध्यान मात्र से समस्त काम-
नाओं की सिद्धि होती है ॥ १ ॥
विशेष—हमारे पिण्ड में पीठ में संलग्न मेरुदण्ड है। मेरुदण्ड के भीतर ही
दाहिनी ओर पिंगला तथा बायीं ओर इडा नाड़ी स्थित हैं, मध्य में सुषुम्ना
नाड़ी है। यह तेजःस्वरूपिणी नाड़ी मूलाधार से ब्रह्मरन्ध्रपर्यन्त सहस्रार तक जाती
है। इसी नाड़ी में स्थित अनेक आकार-विशेष ही षट्चक्र के रूप में प्रसिद्ध हैं।
गोरखनाथजी ने यद्यपि इसमें नवचक्र निरूपित किये हैं तथापि उन्होंने गोरक्ष-
शतक आदि में षट्चक्र ही स्वीकार किये हैं।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ३३