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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

About this granth

The Siddha Siddhanta Paddhati (सिद्धसिद्धान्तपद्धति) is a principal Sanskrit text of the Nath tradition, ascribed to Guru Gorakhnath (Goraksha). It sets out the philosophy of the Nath yogis in systematic form, centred on the idea that the body (pinda) and the cosmos are two forms of one reality, so that the yogi can realise the highest state within his own body.

It has six teachings (upadeshas): the origin of the body, tracing the unfolding of Shakti from the supreme state; reflection on the body; awareness of the holy places and deities within it; its supports, namely nine chakras, sixteen adharas, three lakshyas and five voids; the harmony of body and the supreme; and the marks of the avadhuta yogi.

This edition with Hindi translation is published by the Gorakhnath Temple, Gorakhpur. It opens with a picture of the perpetual flame in the temple's sanctum, believed to have been lit by Gorakhnath, followed by a verse in praise of Ganapati from the sixth teaching with its Hindi meaning. The translator is not named in the opening pages. It runs to 222 pages.

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सृष्टिकुण्डलिनी ख्याता द्विधा भागवती तु सा । एकधा
स्थूलरूपा च लोकानां प्रत्यगात्मिका । अपरा सर्वगा सूक्ष्मा
व्याप्ति-व्यापकवर्जिता । तस्या भेदं न जानाति मोहिता
प्रत्ययेन तु ॥ २३ ॥
( प्रत्येक प्राणी के मूलाधार में सूक्ष्म रूप से कुण्डलिनी विद्यमान है, वह
प्रत्येक जीवात्मा में व्यापक है । ) यह भगवत्सम्बन्धवाली ( भागवती )
कुण्डलिनी दो प्रकार की है, यह स्थूल और सूक्ष्म है। यह स्थूल जगत् की सृष्टि
करती है, इसलिये सृष्टि-कुण्डलिनी के रूप में प्रसिद्ध है । जब यह नाभिचक्र--
मणिपूर में प्रबुद्ध होकर उपाधिसम्बन्ध छोड़कर अखण्ड स्वरूप में ऊर्ध्वमुखी
होकर प्रतिष्ठित होती है, तब वह सर्वव्यापक, सूक्ष्म और व्याप्तिव्यापक भाव से
रहित होती है । विषयप्रपञ्च में सम्मोहित प्राणी उसके सत्स्वरूप को नहीं जान
पाते हैं ॥ २३ ॥
तस्मात् सूक्ष्मापरा संवित्स्वरूपा मध्या शक्ति कुण्डलिनी
योगिभिर्देहसिद्ध्यर्थं सद्गुरुमुखाज्ज्ञात्वा स्वस्वरूपदशायां
प्रबोधनीया ॥ २४ ॥
इसलिये सूक्ष्म चिद्रूपिणी विषयरहित मध्य कुण्डलिनीशक्ति को देहसिद्धि
( मृत्यु को वश में करने ) के लिये गुरु के सदुपदेश से अपनी आत्मस्वरूप की
अभिव्यक्ति के लिये जगाना चाहिये । (गुरु की कृपा से ही उनके मुख से तत्सम्बन्धी
प्रबोधन-क्रिया का ज्ञान प्राप्त कर ही योगसाधक मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी
को जगाकर सहस्रार की ओर ऊर्ध्वमुख करता है । ) यह संवित्स्वरूपा मध्य
कुण्डलिनी नितान्त प्रबोधनीय है ॥ २४ ॥
अथ ऊर्ध्वशक्तिनिपातः कथ्यते सर्वेषां तत्त्वानामुपरिवर्त-
मानत्वान्निर्नमं परमं पदमेवमूर्ध्वंप्रसिद्धं तस्याः स्वसंवेदन
नानासाक्षात्कारसूचनशीलाया सोर्ध्वशक्तिरभिधीयते तस्या
निपातनमिति स्वस्वरूपद्विधाभासनिरासः किन्तु स्वस्वरूपा-
खण्डत्वेन भवति ॥ २५ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११५

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( मध्य कुण्डलिनी शक्ति का सहस्रार में प्रवेश ही ऊर्ध्व-शक्तिनिपात कहा
जाता है । ) ऊर्ध्वशक्ति-निपात का वर्णन किया जाता है । समस्त विषयप्रपञ्च—
भौतिक पदार्थों के ऊपर वर्तमान रहने की स्थिति ही ऊर्ध्व है । नाम-रूप से
रहित आदिनाथ परमेश्वरस्वरूप ही परमपद है । उस अनन्त अखण्ड परमात्मा
की स्वरूपाभिव्यक्ति करनेवाली शक्ति ही ऊर्ध्व शक्ति ( परम जाग्रत् परमेश्वरी
कुण्डलिनी ) कही जाती है । मूलाधार से मणिपूर चक्रादि का भेदन करती
हुई महाकुण्डलिनी सहस्रार में शिव का ऐक्य प्राप्त कर 'यह, तुम, मैं' आदि के
भेदभाव का अन्त कर देती है, किंतु ( साथ-ही-साथ ) परमात्मा और जीवात्मा
के अखण्ड-अभिन्न व्यापक स्वरूप का ज्ञान करा देती है ॥ २५ ॥
शिवस्याभ्यन्तरे शक्ति शक्तेराभ्यन्तरः शिवः ।
अन्तरं नैव जानीयाच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव ॥ २६ ॥
( शक्ति और शक्तिमान्—स्वरूपतः दोनों एक-दूसरे में अभिन्न हैं । कूटस्थ
असंग शिव सर्वत्र व्यापक हैं, शिव को धारण करनेवाली शक्ति भी व्यापक है । )
शिव में शक्ति है, शक्ति में शिव हैं, जिस तरह चन्द्रमा और चाँदनी में स्वरूपतः
भेद—भिन्नता नहीं है, उसी तरह शिव और शक्ति में भिन्नता नहीं है । ' दोनों
में कूटस्थता और असंगता की दृष्टि से व्यवहार में भेद परिलक्षित होता है और
पारमार्थिक सत्ता में वे स्वरूपतः अखण्ड और अभेद हैं । ) शिव-शक्ति
एक हैं ॥ २६ ॥
अत ऊर्ध्वशक्तिनिपातेन योगिभिः परमं पदं प्राप्यत इति
सिद्धम् ॥ २७ ॥
अतएव योगियों द्वारा ऊर्ध्व शक्ति—भगवती कुण्डलिनी महाशक्ति के निपात
से सहस्रार में पूर्ण जाग्रत् कर प्रविष्ट कराने पर परम पद की—स्वरूप-स्थिति
की प्राप्ति की जाती है, इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है ।
सत्त्वे सत्त्वे सकलरचना राजते संविदेका
तत्त्वे तत्त्वे परममहिमा संविदेवावभाति ।
भावे भावे बहुलतरला लम्पटा संविदेषा
भासे भासे भजनचतुरा बृंहिता संविदेव ॥२८॥
११६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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अखण्ड शुद्ध चैतन्य सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म सर्वत्र विद्यमान है। यह
चेतन ही समस्त विश्वप्रपंच का आधार है। प्रकृति, माया आदि तत्वों पर महिमा
सहित शक्ति सर्वत्र प्रकाशित हो रही है । समस्त मानसिक व्यापारों में इसी
शक्ति की सत्ता अभिव्यक्त है। आशय यह है कि सभी पदार्थों की समस्त व्यवस्थाओं
के अंगों और गुणों को एकत्र करने वाला तथा सभी प्रकार की सत्ताओं की
व्यवस्थाओं में संवित् ही प्रकाशमान है । वही समस्त व्यावहारिक सत्ताओं के
सीमित, परिवर्तनशील तथा अनेक वस्तुरूपों में स्वयं को प्रकट कर रहा है।
सभी प्रकार के मानसिक अनुभवों में स्वयं को अनेक आत्मगत रूपों में प्रकट कर
कौशल से वह संवित् ही अनेक सीमित विशेषतायें धारण कर लेता है ।। २८ ।।
किमुक्तं भवति परापरविमर्शरूपिणी संविन्नानाशक्ति-
रूपेण निखिलपिण्डाधारत्वेन वर्त्तते इति सिद्धान्तः ।। २६ ।।
इस तरह परासंवित्स्वरूप शिवशक्ति के सामरस्य का स्पष्ट निर्णीत
रूप यह है कि व्यष्टि-समष्टिभूत भौतिक समस्त पदार्थों का अनुभवरूप
सच्चिदानन्दस्वरूप चेतन ब्रह्म ही निजा, परा सूक्ष्मा शक्ति-रूपों के द्वारा
समस्त पिण्डोंका आधार (आश्रय) है ।। २६ ।।
इति शिवगोरक्षविरचितसिद्धसिद्धान्तपद्धतौ चतुर्थोपदेशः ।।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११७

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पाँचवां उपदेश
[ पिण्डपदसामरस्य ]
महासिद्धयोगिभिः पूर्वोक्तक्रमेण परपिण्डादिस्वपिण्डान्तं
ज्ञात्वा परमपदे समरसं कुर्यात् ॥ १ ॥
परासंवित्स्वरूप शिव-शक्ति को नितान्त अभिन्न समझते हुए योगी को
मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी महाशक्ति को जगाकर मध्य शक्ति के प्रबोधनपूर्वक
ऊर्ध्व शक्ति का सहस्रार में निपात करना चाहिये। अपने व्यष्टि पिण्ड और
सच्चिदानन्दपरमात्मस्वरूप परपिण्ड का ज्ञान प्राप्त कर परमपद परमात्मा में
सामरस्य ( ऐक्य ) स्थापित करना चाहिये,—ऐसा करने से उन्हें परमात्म
असंग शिवस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है ॥ १ ॥
परमपद
परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् ॥ २ ॥
( परम पद द्वैताद्वैतविवर्जित है । ) परम पद स्वानुभवैकगम्य है—स्वसंवेद्य
है और स्वप्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त है—किसी अन्य प्रकाश के माध्यम से यह बोध-
गम्य नहीं है ॥ २ ॥
विशेष—स्वसंवेद्य परमपद का आशय यह है कि परमात्मा ही परमात्मा
को जानता है अथवा जब कुण्डलिनी के पूर्ण प्रबोधन से जीवात्मा अखण्ड परमात्म-
११८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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स्वरूप को प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपद में स्वस्थ हो जाता है—यही परम-
पद की स्वसंवेद्यता है ।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
( गीता १० । १५ )
यह परमात्मा स्वप्रकाश से प्रकाशस्वरूप—अत्यन्त भासाभासक है ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
( गीता १३ । १७ )
उपनिषद् में उल्लेख है कि स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा सूर्य-चन्द्र के प्रकाश
से नहीं प्रकाशित होता, सूर्य-चन्द्र का तेज उस परमप्रकाश में विलय को प्राप्त
हो जाता है ।
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् ।
( कठोपनिषद् २ । ५ । १५ )
यह परमात्मपद सच्चिदानन्दस्वरूप होने से चक्षुरादिइन्द्रियातीत है ।
यत्र बुद्धिर्मनो नास्ति तत्त्वविन्नापराकला ।
ऊहापोहौ कर्तव्यौ, वाचा तत्र करोति किम् ।
वाग्मिनागुरुणा सम्यक् कथं तत्पदमीर्यते ।
तस्मादुक्तं शिवेनैव स्वसंवेद्यं परपदम् ॥ ३ ॥
उस परम पद के सम्बन्ध में बुद्धि किसी भी तरह का निश्चय नहीं कर
सकती है, न मन, जो संकल्परूप है, उसमें प्रवेश पा सकता है, उस परमपद का न
तो ( वाणी से ) मण्डन किया जा सकता है, न स्वरूप में स्थित कराने वाली
कला भी उसका निर्वचन कर सकती है, न किसी धर्म-विशेष के आश्रय में
उसका खण्डन किया जा सकता है । वाग्मी (वाचस्पति) गुरु के द्वारा भी उसका
तत्वतः निरूपण नहीं हो सकता है । यही कारण है कि साक्षात् शिव ने उस परम
पद को स्वसंवेद्य कहा है ॥ ३ ॥
विशेष—उस परम पद में चक्षुइन्द्रिय का प्रवेश नहीं है, उसमें वागिन्द्रिय
की भी पहुँच नहीं है । मन ( अन्तःकरण ) का भी इसमें प्रवेश नहीं है । यह
बतलाने से भी तो समझ में नहीं आ सकता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११६

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न तत्र चक्षुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनो न विद्मो
न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ।
( केनोपनिषद् १ । ३ )
साक्षात् शिव के कथन का सन्दर्भ महायोगी गोरखनाथ ने इस परम पद
के सम्बन्ध में निरूपित किया है, जिसकी पुष्टि शिवसंहिता में की गयी है ।
यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह ।
साधनादमलं ज्ञानं स्वयं स्फुरति तद् ध्रुवम् ॥
( शिवसंहिता ५ । २१६ )
यह पद न तो वाणी से प्राप्त हो सकता है, न मन से ही । योगाभ्यासरूपी
साधन से यह निर्मल ज्ञानस्वरूप स्वयं प्रकाशित होता है ।
अतएव नानाविध विचार्यचातुर्यचर्चाविस्मयाङ्गत्वाद्
गुरुचरणकृपात्तत्त्वमात्रेण, निरुपाधिकत्वेन निर्णोतुं शक्यत्वात्
स्वसंवेद्यमेव परमपदं प्रसिद्धमिति सिद्धान्तः ॥ ४ ॥
अतएव उस परम पद का वर्णन करने में अनेक प्रकार के सूक्ष्म विचारों में
निपुण विद्वानों को भी विस्मित होना पड़ता है । यह परमपद तो निरुपाधिक है,
प्रमाण आदि से इसकी प्राप्ति सम्भव नहीं है, गुरु के चरण में शरणागत होने पर
उनकी अहेतुकी कृपा से ही इसका ज्ञान—बोध प्राप्त हो सकता है, यह तो नितान्त
निर्विकल्प समाधि में स्थित होने पर स्वानुभव में ही स्वयं प्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त
होता है, यह स्वसंवेद्य है । श्रुतिस्मृति में इस तरह का सिद्धान्त निर्णीत किया
गया है ॥ ४ ॥
गुरु द्वारा सन्मार्गदर्शन
गुरुरत्र सम्यक्सन्मार्गसन्दर्शनशीलो भवति सन्मार्गो
योगमार्गस्तदितरः पाखण्डमार्गः । तदुक्तमादिनाथेन—
योगमार्गेषु तन्त्रेषु दीक्षितास्तांश्च दूषकाः ।
तेहि पाखण्डिनः प्रोक्तास्तथा तैः सह वासिनः ॥ ५ ॥
१२० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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परम पद की प्राप्ति में गुरु ही ठीक-ठीक सन्मार्गदर्शन कराने वाला होता
है, सन्मार्ग ही योगमार्ग है ( जिसके द्वारा समस्त चित्तवृत्तियों का निरोध होने
पर सहज समाधि में साधक को परम पद का साक्षात्कार होता है । योगमार्ग
(श्रुतिस्मृतिप्रतिपादित सम्यक् स्वरूपप्राप्ति-मार्ग) के अतिरिक्त दूसरा मार्ग पाखंड
मार्ग है ( जिस पर अनात्मवादी चलकर सन्मार्ग की निन्दा और खण्डन करता
है) । आदिनाथ शिव का कथन है—जो योगमार्ग और उसके उपायभूत (सहायक)
तन्त्र ( दक्षिण मार्ग ) में दीक्षित और गुरुमुख हैं, उनकी निन्दा करने वाले और
उन ( निन्दकों ) के सहायक पाखण्डी हैं, क्योंकि वे सत्स्वरूप की प्राप्ति में
बाधक और अनभिज्ञ हैं ॥ ५ ॥
विशेष—यह योगमार्ग ही सिद्धमार्ग है, कैवल्यपद—परमपद की प्राप्ति
इसों मार्ग के अनुशीलन से सम्भव है ।
नानामार्गैस्तु दुष्प्राप्यं कैवल्यं परमं पदम् ।
सिद्धमार्गेण लभ्यन्ते नान्यथा शिवभाषितम् ॥
( योगबीज-८ )
योग से बड़ा परमपद की प्राप्ति की दिशा में कोई दूसरा बल ही नहीं है ।
यस्मिन् दर्शिते सति तत् क्षणात् स्वसंवेद्यसाक्षात्कारः
समुत्पद्यते ततो गुरुरेवात्र कारणमुच्यते ॥ ६ ॥
जिस समय ( सिद्ध गुरु द्वारा ) परमपद की प्राप्ति के उपायभूत योगमार्ग
के उपदेश से परमात्मबोध कराया जाता है, तत्काल ही ( उसी समय )
स्वसंवेद्य अलख-निरञ्जन परमेश्वर का साक्षात्कार हो जाता है । ( यह निर्वि-
वाद है कि ) परमपद की प्राप्ति में गुरु ( की कृपा ) ही एकमात्र कारण
है ॥ ६ ॥
गुरु और सामरस्य
तस्माद् गुरुकटाक्षपातात् स्वसंवेद्यतया च महासिद्ध-
योगिभिः स्वकीयपिण्डनिरुत्थानानुभवेन समरसं क्रियत इति
सिद्धान्तः ॥ ७ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२१

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यही कारण है कि बड़े-बड़े सिद्धयोगी गुरु के कृपाकटाक्ष और अपने
( मनोनिग्रहादि योगसाधना के ) अनुभव से स्वरूप-बोध में समर्थ होकर अपने
व्यष्टिशरीर का निरुत्थानानुभव ( व्यापक पर-पिण्ड में अभेदता ) के समाश्रय
में सामरस्य करते हैं—परमात्मस्वरूप परमपद की प्राप्ति के द्वारा सच्चिदानन्द
स्वरूप हो जाते हैं—जीवात्मा-परमात्मा में पूर्ण अभेदता की प्रतिष्ठा ही यह व्यष्टि
पिण्ड से परपिण्ड का सामरस्य है ॥ ७ ॥
विशेष—गुरु की वन्दना में महायोगी गोरखनाथ ने गोरक्षशतक के
मांगलिक श्लोक में इसी सामरस्य को परिलक्षित किया है ।
श्रीगुरुं परमानन्दं वन्दे स्वानन्दविग्रहम् ।
यस्य सान्निध्यमात्रेण चिदानन्दायते तनुः ॥
( गोरक्षशतक-१ )
गोरखनाथ का कथन है कि मैं अपने गुरुदेव की वन्दना करता हूँ, जो
साक्षात् परमानन्द हैं, जो सच्चिदानन्दस्वरूप—आनन्दविग्रह अथवा मूर्तिमान्
आनन्द हैं, जिनके सान्निध्यमात्र से ही—कृपाकटाक्ष से ही यह शरीर चिदानन्द,
चिन्मय, परमानन्द, परमात्मस्वरूप हो जाता है ।
निरुत्थान-प्राप्ति का उपाय
निरुत्थानप्राप्त्युपायः कथ्यते । महासिद्धयोगिनः स्वस्व-
रूपतथ्यानुसन्धानेन निजावेशो भवति निजावेशान्निःपीडित
निरुत्थानदशामहोदयः कश्चिज्जायते ततः सच्चिदानन्दचम-
त्काराद्भुताकारप्रकाशप्रबोधो जायते, प्रबोधादखिलमेतद्
द्वयाद्वयप्रकटतया चैतन्यभासाभासकं परात्परपरमपदमेव
प्रस्फुटं भवतीति सत्यम् ॥ ८ ॥
निरुत्थान ( जीवात्मा-परमात्मा के अभिन्नत्व, एकत्वं अथवा सामरस्य )
की प्राप्ति के उपाय का वर्णन किया जाता है । अभेद रूप परमपद को चाहनेवाले
योगी का अपने स्वरूप के अनुसन्धान से ( स्व-परपिण्ड की अभेदता के द्वारा )
निजावेश होता है—वह परमेश्वर को अपने ही स्वरूप में प्रतिष्ठित देखता है ।
१२२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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स्वपिण्ड-परपिण्ड की अभेदता के अनुभव से उसे सर्वेश्वर परमात्मा के पिण्ड में
आत्माभिव्यक्ति-निजावेश होता है और इस निजावेश के परिणामस्वरूप ही
निरुत्थान अथवा सामरस्य का उदय होता है, उसे स्वाभिव्यक्तिपूर्वक इसका
अनुभव होता है कि यह परपिण्ड-परमात्मपिण्ड मेरा ही (व्यष्टि-) पिण्ड
है। सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के स्वसंवेद्य अनुभव के चमत्कार से अद्भुत प्रकाश-
स्वरूप आत्मबोध होता है। इस बोध से द्वन्द्व-परमात्म पिण्ड और स्वपिण्ड में भेद
भाव का अन्त हो जाता है और अखण्ड परमात्मस्वरूप परमपद प्रत्यक्ष हस्तामलक
के समान प्रस्फुटित-स्वप्रकाशित अथवा स्वाभिव्यक्त हो जाता है। इसमें तनिक
भी संशय नहीं है-यह सत्य है ॥ ८ ॥
अतएव महासिद्धयोगिभिः सम्यग् गुरुप्रसादं लब्ध्वावधान-
बलेनैक्यं भजमानैस्तत्क्षणात् परं पदमेवानुभूयते ॥ ६ ॥
व्यष्टि-पिण्ड और परपिण्ड (परमात्मपिण्ड) में सामरस्य की प्राप्ति गुरु
के अनुग्रह से ही होती है। सिद्धयोगियों को इसके लिये सबसे पहले गुरु के चरण
में शरणागत होकर उसकी प्रसन्नता से चित्तवृत्तियों के निरोधपूर्वक स्वरूप-ध्यान
और समाधि से उपासना में-योगसाधना में तत्पर होकर स्वपिण्ड से परपिण्ड
पर्यन्त ऐक्य का अनुभव करना चाहिये, इस तरह की साधना से ही तत्क्षण परम-
पद-द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्म पद का अनुभव होता है ॥ ६ ॥
तदनुभवबलेन स्वकीयं सिद्धं सम्यङ् निजपिण्डं ज्ञात्वा
तमेव परमपद एकीकृत्य तस्मिन्प्रत्यावृत्त्या रूढैवाभ्यन्तरे
स्वपिण्डसिद्धयर्थे महत्वमनुभूयते ॥ १० ॥
इस तरह अपने योगसाधनापरक अनुभव के प्रकाश में अपने व्यष्टिपिण्ड
(परमात्मस्वरूप से अभेदता) का ज्ञान प्राप्त कर उसे परमपद में एकीकृत कर
तथा उस परमपद को अपने व्यष्टि-पिण्ड में एकात्मस्वरूप कर अपने पिण्ड को
सच्चिदानन्दस्वरूप में अभिव्यक्त कर परपिण्ड की उसमें अभिन्नता-अभेदता का
महत्व योगी अनुभव करता है ॥ १० ॥
निजपिण्डपरीक्षा च स्वस्वरूपकिरणानन्दोन्मेषमात्रं
यस्योन्मेषस्य प्रत्याहरणमेव समरसकरणं भवति ॥ ११ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२३

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निज पिण्डपरीक्षा ( से आशय ) यह है कि अपने शरीर में भी परमात्म-
स्वरूपकिरणरूप आनन्द का ही विकास है और इस प्रकाश के उन्मेष को अपने
ही ( व्यष्टिपिण्ड के ) भीतर समेट कर परमात्मा से अभिन्न अथवा अभेद
अनुभव करना ही सामरस्य है ॥ ११ ॥
अतएव स्वकीयं पिण्डं महद्रश्मिपुञ्जं स्वेनैवाकारेण
प्रतीयमानं स्वानुसन्धानेन स्वस्मिन्तुरीकृत्य महासिद्धयोगिनः
पिण्डसिद्ध्यर्थं तिष्ठन्तोति प्रसिद्धम् ॥ १२ ॥
परमात्मप्रकाश के अपने व्यष्टि-पिण्ड में प्रत्याहरण के परिणामस्वरूप यह
शरीर महाप्रकाशपुञ्जरूप में आकारित ( सच्चिदानन्दस्वरूप ) हो उठता है ।
इस तरह अपने व्यष्टि-पिण्ड में परमात्म-प्रकाश के प्रत्याहरण—सामरस्यकरण
द्वारा सिद्धयोगी देहसिद्धि — चिन्मय स्वरूप-स्वानन्दविग्रह की प्राप्ति से चिरकाल
तक अजर-अमर रहते हैं ॥ १२ ॥
पिण्डसिद्धि का वेष
अथ पिण्डसिद्धौ वेषः कथ्यते—
शङ्खमुद्राधारणं च केशरोमप्रधारण
ममरीपानममलं तथा मर्दनमुत्तमम् ॥ १३ ॥
एकान्तवासो दीक्षा च संध्याजपममायया ।
ज्ञानं भैरवमूर्त्तंस्तु तत्पूजा च यथाविधि ॥ १४ ॥
शङ्खध्मातं सिंहनादं कौपीनं पादुके तथा ।
अङ्गवस्त्रं बहिर्वस्त्रं कम्बलं छत्रमद्भुतम् ॥ १५ ॥
वेत्रं कमण्डलुञ्चैव भस्मना च त्रिपुण्ड्रकम् ।
कुर्यादेतान् प्रयत्नेन गुरुवन्दनपूर्वकम् । । १६ ।
पिण्ड ( देह )-सिद्धि हो जाने पर योगी—योगसिद्ध ( परमात्मपदप्राप्त )
के वेषधारण का वर्णन किया जाता है । उसे ( गले और हाथ में ) शंख और
(दोनों कानों में) मुद्रा को धारण करना चाहिये, केश और रोम धारण करना चाहिये
१२४ । [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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तथा अमरी की क्रिया के द्वारा उसे सहस्रार से द्रवित अमृत का पान करना
चाहिये, प्राणायाम और आसनों के अभ्यास से उत्पन्न पसीने का अंग में लेप
करना चाहिये । एकान्तवास का सेवन करते हुए गुरु की दीक्षा के अनुरूप निर्मल
चित्त से संध्या-जप आदि के अनुष्ठान में तत्पर रहना चाहिये और योगसाधना
मे विघ्नों के निवारण के लिये शास्त्रविधि से भैरव देव का पूजन करना चाहिये ।
शंखनाद करना चाहिये, वस्त्र के रूप में कौपीन धारण करना चाहिये, पैरों में
खड़ाऊँ पहनना चाहिये तथा ओढ़ने-बिछाने के लिये कम्बल तथा पहनने के लिये
अँचला अथवा धोती के रूप में वस्त्र रखना चाहिये, पानी के लिये कमण्डलु और
जलवृष्टि से बचने के लिये पास में छाता रखना चाहिये । शरीर को स्नान के
उपरान्त भस्म से अलंकृत कर ललाट में त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । नित्यप्रति
गुरु के चरण का ध्यान करते हुए प्रणाम समर्पित कर साधना में तत्पर रहना
चाहिये ॥ १३-१६ .।
विशेष—अमरीपान (अमरोली) के अभ्यास द्वारा शरीर में साधक वीर्य की
अखण्डता सुरक्षित रखता है । हठयोग-प्रदीपिका में अमरीपान पर प्रकाश डाला
गया है ।
पित्तोल्वणत्वात्प्रथमाम्बुधारां
विहाय निःसारतयान्त्यधाराम् ।
निषेव्यते शीतलमध्यधारा
कापालिके खण्डमतेऽमरोली ॥
अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने दिने ।
वज्रोलीमभ्यसेत् सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥
अभ्यासान्निःसृतां चान्द्रीं विभूत्या सह मिश्रयेत् ।
धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३ । ६६-६८ )
अधिक पित्तवाली ( प्रारम्भिक ) बिन्दु-धारा और सार-अंश से रहित
अन्तकी धारा को छोड़कर शीतल मध्यधारा ( चन्द्रामृत ) का ही (इस मुद्रा में)
पान किया जाता है, खण्डकापालिकमत में यही अमरोली है । साधक नासिका
द्वारा अमरी का नित्य पान करते हुए वज्रोली मुद्रा द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का
अभ्यास करता है । यही अमरोली है । अमरोली के अभ्यास से निकलती सुधा
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२५

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से अंग में लेप करने से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। सुधा को भस्म से मिश्रित
कर लेप करना चाहिये।
परमपद की प्राप्ति
तेषां पिण्डसिद्धौ सत्यां सर्वसिद्धय. संनिधाना
भवन्ति ॥ १७ ॥
यस्मिञ्ज्ञाते जगत्सर्वसिद्धं भवति लीलया ।
सिद्धयः स्वयमायान्ति तस्माज्ज्ञेयं परं पदम् ॥ १८ ॥
परं पदं न वेषेण प्राप्यते परमार्थतः ।
देहमूलं हि वेषः स्याल्लोकप्रत्ययहेतुकः ॥ १६ ॥
इस प्रकार योगसाधना में तत्पर होने पर पिण्डसिद्धि--शरीर में ही
परपिण्डस्थ परमात्मा की व्यापकता की अनुभूति होती है और इस सत्स्वरूप में
समस्त अणिमादि सिद्धियां प्रत्यक्ष हो जाती हैं ॥ १७ ॥ इस परमपद--परमात्म-
तत्व का बोध होने पर जगत् परमात्मस्वरूप में सहज--अनायास अभिव्यक्त हो
उठता है। सिद्धियाँ बिना चाहे ही स्वतः उपस्थित हो जाती हैं। साधक को
इन सिद्धियों में न उलझ कर परमपद का ही बोध प्राप्त करना चाहिये ॥ १८ ॥
यह परम पद वेष धारण करने से नहीं सिद्ध होता है। वस्तुतः वेषधारण का
तात्पर्य तो यह है कि लोकमात्र को—संसार में निवास करने वाले प्राणियों को
संन्यासवेष धारण के महत्व का पता चल जाय। यही कारण है कि देह को इस
प्रकार वेषादि-चिह्नों से अलंकृत किया जाता है। साधनसहित वेष धारण कर
परमपद का बोध प्राप्त करना चाहिये ।
योगमार्ग
लोके निकृष्टमुत्कृष्टं परिगृह्य पृथक्कृतम् ।
तत्स्वधर्म इति प्रोक्तो योगमार्गे विशेषतः ।.२०।।
योगामार्गात्परो मार्गो नास्ति नास्ति श्रुतौ स्मृतौ ।
शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥२१॥
१२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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लोक में ऐहिक फलजनक ( सेवादि ) कर्म तथा यज्ञ, दानादि उत्कृष्ट
पुण्यकर्म--दोनों ही सकाम बुद्धि से किये जाते हैं और जब भगवत्प्रीत्यर्थ कर्म के
सम्पादन द्वारा साधक कर्मफल की लिप्सा का त्याग कर देता है, तब यही विशेष
रूप से योगमार्ग में स्वधर्म कहा जाता है ॥ २० ॥ भगवान् शिव ने श्रुति, स्मृति,
तन्त्र और पुराण तथा आगमों में यही कहा है कि योगमार्ग से श्रेष्ठ मोक्षप्रद--
परमात्मवोधप्रदायक अन्य कोई मार्ग नहीं है ॥ २१ ॥
महायोगी गोरखनाथजी ने योग को वेदकल्पतरु का परम फल कहा है—
द्विजसेवितशाखस्य श्रुतिकल्पतरोः फलम् ।
शमनं भवतापस्य योगं भजत सत्तमाः ॥
( गोरक्षशतक-६ )
वेद कल्पतरु हैं। जिस तरह कल्पतरु की शाखायें पक्षियों के आश्रयस्थान
हैं, ठीक इसी तरह द्विजों ( पण्डितों, विद्वानों ) द्वारा वेद की शाखाओं, प्रति-
शाखाओं का परिशीलन किया जाता है। वेदरूपी कल्पतरु का फल योग है। हे
सत्पुरुषो ! इसका सेवन ( साधन ) करो। यह योग संसार के त्रय—आधिदैहिक
आधिभौतिक और आधिदैविक ताप का शमन ( नाश ) कर देता है। इस
अभ्यास अथवा साधन से सांसारिक दुःख अथवा भववन्धन समाप्त हो जाता है,
स्वरूपबोध प्राप्त होता है।
योगः संहननोपायो ज्ञानसङ्गतियुक्तिषु ॥ २२ ॥
लोके निकृष्टं सततं यं वा यं वा प्रकुर्वते ।
तं वा तं वा वर्जयन्ति लोका ज्ञानबलेन तु ॥ २३ ॥
मनुष्याणां च सर्वेषां प्राक् संस्कारवशादिह ।
शास्त्रयुक्तिसमाचारः क्रमेण भवति स्फुटम् ॥ २४ ॥
दो वस्तुओं को मिलाना ही योग है। लोक में अनित्य फल देने वाली
वस्तुओं के योग का जो अर्थ किया जाता है, वह गौण है। यह योग तो ज्ञान-
साधनपरक मोक्षप्रदायक है। ( यही योग का मुख्य अर्थ है । ) ज्ञानी लोक में
व्यवहृत निकृष्ट अर्थ का परित्याग कर—अनित्य फलदायक गौण अर्थ के स्थान
पर मुख्य अर्थ का ग्रहण करते हैं। सभी मनुष्यों की पूर्वजन्म के संस्कार
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२७

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और वासना के अनुरूप इस दिशा में प्रवृत्ति होती है । अतएव क्रमपूर्वक शास्त्र-
युक्ति व्यवहार के प्रकट होने पर ही किन्ही-किन्हीं भाग्यशाली प्राणी की
प्रवृत्ति योगसाधना में होती है ॥ २२–२४ ॥
एवं पिण्डे संसिद्धे ज्ञानप्राप्त्यर्थं तच्च परमं पद महा-
सिद्धानां मतं परिज्ञाय च तस्मिन्नहं भावे जीवात्मा च
सहजसंयमसोपायाद्वैतक्रमेणोपलक्ष्यते ॥ २५ ॥
इस तरह योगसाधना के द्वारा पिण्ड के सिद्ध होने पर अखण्ड ज्ञान
की प्राप्ति के लिये महासिद्धों के मत में चिद्रूप शक्ति सहित अखण्ड शिवतत्त्व
ही परम पद कहा जाता है । उस आत्मस्वरूप अखण्ड शिवतत्त्व में यह भाव
स्थापित करे कि मैं ही शिव हूँ, मुझमें और शिव में सम्पूर्ण तादात्म्य है ।
परम शिव से अभिन्न जीवात्मा — जीव का वास्तविक आत्मस्वरूप ही सहज,
संयम, सोपाय और अद्वैत क्रम से लक्षित होता है ॥ २५ ॥
सहजसंयमसोपायाद्वैतज्ञान
तत्र सहजमिति विश्वातीतं परमेश्वरं विश्वरूपेणाव-
भासमानमिति ज्ञात्वैकमेवास्तीति स्वस्वभावेन यज्ज्ञानं तत्सहजं
प्रसिद्धम् ॥ २६ ॥
सहज ज्ञान का वर्णन किया जाता है । यद्यपि ( अलखनिरञ्जन )
परमेश्वर विश्वातींत निराकार और निर्गुण है तथापि वह मायाउपाधिसहित
विश्वरूप में अवभासित, प्रतिभासित होता है । ऐसा समझ कर तत्वदृष्टि से
परमेश्वर और मुझ ( जीवात्मा ) में पूर्ण अभेदता है । अपने आपको साधक
परमात्मस्वरूप, असंग और व्यापक अनुभव करता है । इस तरह का स्वाभाविकं
यथार्थ ( तत्व ) ज्ञान ही सहज ज्ञान है ॥ २६ ॥
संयम इति सावधानानां प्रस्फुरद्व्यापाराणां निजवर्तिनां
संयमं कृत्वाऽऽत्मनि धीयत इति संयमः ॥ २७ ॥
१२८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

४. पञ्चम-षष्ठ उपदेश: पिण्ड-ब्रह्माण्ड समरसता, अवधूत-लक्षण एवं ग्रन्थ उपसंहार

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सहज ज्ञान के उपरान्त संयम के क्रम का वर्णन किया जाता है । इन्द्रियाँ
हमारे शरीर के कार्यों में अपने विषयों के ग्रहण में तत्पर रहती हैं । ( इन्द्रियों की
विषयों में प्रवृत्ति स्वाभाविक है । ) निरन्तर विषय-ग्रहण-व्यापार में तत्पर
इन्द्रियों तथा मन को विषयाभिमुख होने से निरुद्ध कर उन्हें आत्मा में—अखण्ड
परमात्म स्वरूप में लगाना ही संयम कहा जाता है ॥ २७ ॥
सोपायमिति स्वयमेव प्रकाशमयं स्वेनैव स्वात्मन्येकीकृत्य
सदा तत्त्वेन स्थातव्यम् ॥ २८ ॥
अब सोपाय का वर्णन किया जाता है । मैं स्वयमेव स्वप्रकाशस्वरूप
( द्वैताद्वैतविवर्जित अखण्ड परमात्मरूप ) हूँ—इस तरह परमात्मा में अपनी
आत्मा को तत्त्वतः अभेद कर साधक को आत्मस्वरूप में स्थित रहना चाहिये ।
जिस ज्ञान से इस अखण्डस्वरूपता का बोध होता है, वही सोपाय
ज्ञान है ॥ २८ ॥
अद्वैतमित्यकर्तृत्वेनैव योगी नित्यतृप्तो निर्विकल्पः सदा
निरुत्थानत्वेन तिष्ठति ॥ २९ ॥
अब अद्वैत स्वरूपस्थितिका निरूपण किया जाता है । आत्मा न कर्ता है,
न भोक्ता है, वह असंग, शून्य, निर्विकल्प है । इस तरह आत्मा की परमात्मा
में —अखण्ड निरञ्जन परमेश्वर में अभेदता का स्थापन कर—निरुत्थान भाव
से परमात्मस्वरूप में स्थित योगी नित्यतृप्त होता है; उस परमात्मस्वरूप में
सदा अच्युत रहता है ॥ २६ ॥
सहजं स्वात्मसंवित्तिः संयमः स्वस्वनिग्रहः सोपायं
स्वस्वविश्रान्तिरद्वैतं परमं पदम् ॥ ३० ॥
जीवात्मा और परमात्मा में सम्पूर्ण अभेदता है—इस तरह का ज्ञान ही
सहज कहलाता है । इन्द्रियों सहित मन को आत्मा में प्रवृत्त करना—निग्रहीत
करना ही संयम है । अपने सत्स्वरूप में स्थिति-—विश्रान्ति ही सोपाय है और
अद्वैत स्वरूप ही परम पद है ॥ ३० ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२६

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सद्गुरुका सेवन
तज्ज्ञेयं सद्गुरोर्वक्त्रान्नान्यथा शास्त्रकोटिभिः ।
न तर्कशब्दविज्ञानान्नाचाराद्वेदपारगात् ।३१।।
वेदान्तश्रवणान्नैव तत्वमस्यादिबोधनात् ।
न हंसोच्चारणाज्जीवब्रह्मणोरैक्यभावनातू ।३२।।
न ध्यानान्नजपाल्लीनः सर्वज्ञः सिद्धिपारगः ।
स्वेच्छो योगी स्वयं कर्ता लीलया चाजरामरः ।।३३।।
अवध्यो देवदैत्यानां क्रोडति भैरवो यथा ।
इत्येवं निश्चलो योऽसौ क्रमेणाप्नोति लीलया ।।३४।।
असाध्याः सिद्धयः सर्वाः सद्गुरोः करुणां विना ।
अतस्तु गुरुरासेव्यः सत्यमीश्वरभाषितम् ।।३५।।
इस परम पद का ज्ञान सद्गुरु (योगानुष्ठान में तत्पर मार्गदर्शक) के
श्रीमुख से सदुपदेशामृत ग्रहण से ही प्राप्त होता है, चाहे करोड़ों शास्त्रों
का अध्ययन किया जाय, चाहे साधक विज्ञान प्राप्त करे, चाहे अनेक तर्कों
में निपुण हो, चाहे आचार में तत्पर हो, चाहे चारों वेदों में पारंगत हो,
चाहे वेदान्तश्रवण में ज्ञाननिष्ठ हो, चाहे तत्वमसि आदि वाक्यों से आत्मतत्त्व
में प्रबुद्ध हो, चाहे सोऽहं-सोऽहं-हंस मन्त्र (अजपा गायत्री) को सिद्ध कर
ले, जीवात्मा-परमात्मा में अभेदता की अनुभूति करे, चाहे ध्यान लगाये, चाहे
जप करे पर गुरु के उपदेश से ही योगी सिद्ध होता है, सर्वज्ञ होता है, सभी
सिद्धियाँ उसके करतलगत हो जाती हैं, वह स्वयं कर्ता हो जाता है, अनायास
अजर और अमर हो जाता है, वह सर्वत्र अभय हो जाता है, देवताओं और
दैत्यों द्वारा वह अवध्य होता है। वह सर्वत्र भैरव- (साक्षात् भगवान् शिव-)
रूप होकर विहार करता है । वह संशयरहित होता है और असाध्य
सिद्धियों को अपने वश में कर लेता है । यह सब कुछ गुरु की कृपा के
बिना असम्भव है, इसलिये (आदरपूर्वक प्रीतिपूर्वक) अच्छी तरह गुरु की
शरण प्राप्त कर श्रद्धावान् होना चाहिये, ईश्वर (शिव) का यह कथन
सत्य है, सत्य है ।। ३१-३५ ।।
१३० ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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प्रथमेत्वरोगतासिद्धिः सर्वलोकप्रियो भवेत् ।
कांक्षन्ति दर्शनं तस्य स्वात्मारूढ़स्य नित्यशः ॥३६॥
कृतार्थः स्याद् द्वितीये वै कुरुते सर्वभाषणम् ।
तृतीये दिव्यदेहस्तु व्यालैर्व्याघ्रैर्न बाध्यते ॥३७॥
चतुर्थे क्षुतृषानिद्राशीतातपविवर्जितः ।
जायते दिव्य योगीशो दूरश्रावी न संशयः ॥३८॥
वाक्‌सिद्धिः पञ्चमे वर्षे परकायप्रवेशनम् ।
षष्ठे न च्छिद्यते शस्त्रैर्वज्रपातैर्न भिद्यते ॥३६॥
वायुवेगो क्षितित्यागी दूरदर्शी स सप्तमे ।
अणिमादिगुणोपेतस्त्वष्टमे वत्सरे भवेत् ॥४०॥
नवमे वज्रकायः स्यात् खेचरो दिक्चरो भवेत् ।
दशमे पवनाद् वेगी यत्रेच्छा तत्र धावति ॥४१॥
सम्यगेकादशे वर्षे सर्वज्ञः सिद्धिभाग्भवेत् ।
द्वादशे शिवतुल्योऽसौ कर्त्ता हर्त्ता स्वयं भवेत् ॥४२॥
त्रैलोक्ये पूज्यते सिद्धः सत्यं श्रीभैरवो यथा ॥४३॥
सद्गुरु से दीक्षित होकर सदुपदेशग्रहणपूर्वक योगसाधना में तत्पर होने पर
साधक पहले वर्ष में शरीर के मलादि दोषों से निर्मल होकर नीरोग हो जाता
है और सभी लोगों के लिये समानरुप से प्रिय होता है । योग-साधना में तत्पर
उस साधक के दर्शन की सब लोग इच्छा करते हैं । वह दूसरे वर्ष में (संकल्प-
रहित होकर ) सफलमनोरथ हो जाता है और उसे सभी भाषाओं में बातचीत
करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है । तीसरे वर्ष में वह देहसिद्ध हो जाता हैं,
उसका शरीर दिव्यतेज से सम्पन्न हो जाता है, और सर्प-व्याघ्र आदि पशु उसके
समक्ष अहिंसक हो जाते हैं, उसे किसी भी तरह की बाधा नहीं पहुँचाते हैं ।
चौथे वर्ष में वह योगसाधक भूख-प्यास, जाड़ा-गरमी आदि द्वन्द्वों से ऊपर उठ
जाता है और दूर स्थान पर होने वाले शब्दों को सुनने लगता है, इसमें तनिक
भी सन्देह नहीं है । पाँचवें वर्ष में वह वाक्‌सिद्ध हो जाता है—वह जो कुछ
भी कहता है, वह सत्य होता है और वह दूसरे के शरीर में प्रवेश करने की
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३१

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सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है—दूसरे के मृतशरीर में प्रवेश कर उसे प्राणान्वित
कर देता है। छठें वर्ष में उसका शरीर इतना पुष्ट हो जाता है कि किसी भी
प्रकार के शस्त्र तथा वज्रपात आदि से प्रभावित नहीं होता है। वह आसन पर
बैठे-बैठे पृथ्वीतल से ऊपर उठ जाता है और वायुके समान वेग धारण कर इस
तरह सातवें वर्ष में आसमान में उड़ने लगता है। आठवें वर्ष में वह अणिमा
आदि सभी सिद्धियों से सम्पन्न हो उठता है और नौवें वर्ष में उसका शरीर वज्र
के समान हो जाता है, वह आकाश और अनेक दिशाओं में भ्रमण करने में समर्थ
होता है। दशवें वर्ष में वह स्वेच्छा से पवन के वेग के समान अभीष्ट स्थान में
शीघ्रातिशीघ्र पहुँच जाता है। ग्यारहवें वर्ष में वह सर्वज्ञ और समस्त सिद्धियों
का स्वामी हो जाता है। बारहवें वर्ष में वह साक्षात् शिव के समान जगत्
को रचने और उसका संहार करने की सामर्थ्य से युक्त होता है। वह योगसिद्ध
पुरुष भैरव के समान तीनो लोकों में पूज्य होता है ॥ ३६-४३ ॥
एवं द्वादशवर्षैस्तु सिद्धयोगी महाबलः ।
जायते सद्गुरोः पादप्रभावान्नात्र संशयः ॥४४॥
बारह वर्षों में सद्गुरु के शरणापन्न होकर योगाभ्यास करने से साधक
सिद्धयोगी होकर शिवस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४४ ॥
अनुबुभूषितयोनिजविश्रमं स गुरुपादसरोरुहमाश्रयेत् ।
तदनुससरणात्परमं पदं, समरसोकरणं न च दूरतः ॥४५॥
जो योगसाधक शान्ति-मुक्ति चाहता है, जो मोक्ष का अनुभव करना
चाहता है, उसे गुरु के चरण-कमल का आश्रय ग्रहण करना चाहिये । सद्गुरु
के अनुग्रह से योगसाधन में तत्पर होने से उसे पिण्डसिद्धि ( अपने पिण्ड में
परपिण्ड-परमात्मरूप की अखण्ड व्यापकता की अनुभूति ) और परम पद
की प्राप्ति सहज सुलभ हो जाती है ॥ ४५ ॥
गुरुकुलसन्तान
गुरुकुलसन्तानं पञ्चधा प्रोक्तम् । आईसन्तानं विलेश्वर
सन्तानं, विभूतिसन्तानं, नाथसन्तानं. योगेश्वरसन्तानञ्चे
त्येषामपि सन्तानानां पृथक् पृथक् वैशिष्ट्यं वर्तते ॥ ४६ ॥
१३२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति

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योगमहाज्ञान के उपदेष्टा सिद्धगुरुओं की सन्तान ( वंश ) -परम्परा का
वर्णन किया जाता है । यह पाँच प्रकार का वर्णन किया जाता है । यह पांच
प्रकार की है । आई नाम विमला शक्ति का है, यह आईनाथ या उदयनाथ से
सम्बद्ध है, आई शिष्य को ही आईसन्तान-परम्परा से अभिहित किया जाना है ।
दूसरी परम्परा विलेश्वर गुरु की है । ( यद्यपि इस परम्परा में दीक्षित शिष्य
दिगम्बर होते हैं—वस्त्र तक नहीं धारण करते तथापि अपने उपदेशामृत से
श्रद्धालु अधिकारी व्यक्तियों को दीक्षित करते हैं । तीसरी परम्परा उन सिद्ध
गुरुओं की है, जो विभूति धारण करते हैं, उनके द्वारा दीक्षित शिष्य विभूति-
सन्तान कहे जाते हैं । चौथी परम्परा नाथयोग के सिद्ध गुरुओं की है, समस्त
प्रपंचों से अतीत नाथतत्व की दीक्षा से दीक्षित शिष्य नाथसन्तान कहे जाते
हैं । पाँचवीं परम्परा योगीश्वर सन्तान के रूप में विख्यात है । व्यापक, असंग
अलख-निरञ्जन तत्वस्वरूप में लय को प्राप्त योगीगुरु शिष्यों की योग्यता के
अनुरूप सदुपदेश प्रदान करते हैं । ऐसे शिष्य योगीश्वर-सन्तान के रूप में प्रसिद्ध
हैं । इन पाँचों परम्पराओं की पृथक्-पृथक् विशेषताएं हैं ॥ ४६ ॥
परमार्थतः सर्वं पाञ्चभौतिकं न जाताः पुरुषाः
सम्बोधमात्रैकरूपः शिवस्तदितरत्सर्वमज्ञानमव्यक्तं भवति
तत्र शिवस्तु ज्ञानम् ॥ ४७ ॥
परमार्थ के स्तर पर विचार करने से पता चलता हैं कि संसार की समस्त
वस्तुएँ पाञ्चभौतिक हैं, पाँच तत्वों से उत्पन्न हैं । ( इस तरह गुरुप्रणाली भी
पाँच रूपों में विभक्त है । ) जीवात्मा—पुरुष आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती
( क्योंकि जिसकी उत्पत्ति होती है, उसका नाश भी होता है ), यह आत्मा
सद्ज्ञानस्वरूप शिव है, शिव से इतर सब कुछ अज्ञान है, अज्ञान-अव्यक्त माया
से बोधित यह जगत् प्रपञ्च मात्र है । एक मात्र शिव ही अखण्ड ज्ञानस्वरूप
व्यापक परमात्मा हैं ॥ ४७ ॥
एतेषामपि सन्तानानां केचित्स्वपराङ्मुखा वेशमात्रसम्पन्नाः
क्रयविक्रयादिकं कुर्वन्ति सन्तानभेदं प्रत्यन्योन्यमधः कुर्वन्ति
योगमार्गं द्वेषयन्ति ॥ ४८ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १३३

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इन योगी-सन्तानों में अनेक आत्मविमुख होकर जगत् के व्यापार ( लेन-
देन, संग्रह, त्याग आदि प्रपंच ) में तत्पर रहते हैं, केवल वेशमात्र धारण कर योगी
कहलाते हैं। इस तरह परस्पर एक-दूसरे को नीचा दिखाते हैं और योगमार्ग से
द्वेष करते हैं ॥ ४८ ॥
रजसा घोरसंकल्पाः कामुका अतिमन्यवः ।
दाम्भिका मानिनः पापाधिककुर्वन्तीश्वरप्रियान् ॥ ४६ ॥
साधुसङ्गमसच्छास्त्रपरमानन्दलक्षितान् ।
स्वेच्छाचारविहारैकज्ञानविज्ञानसंयुतान् ॥ ५० ॥
यूयं शिष्टा वयं दुष्टा दुष्टा यूयं वयं तथा ।
एव वदन्ति चान्योन्यं प्रमोहेन निरन्तरम् ॥ ५१ ॥
इस तरह सन्मार्ग—योगमार्ग से भ्रष्ट योगी रजोगुणी होते हैं और भयानक
से-भयानक संकल्पों की पूर्ति और कामनाओं की सिद्धि में लगे रहते हैं, वे बड़े
क्रोधी, दाम्भिक और अभिमानी होते हैं, ऐसे पापात्मा परमात्मा के शरणागत,
संत के संग और सच्छास्त्रों के अध्ययन में आनन्द लेने वाले, अखण्ड आत्मस्वरूप
में रमण करने वाले आत्मज्ञानी और परमात्मतत्त्व के विज्ञानियों की निन्दा करते
हैं कि आप अपने को शिष्ट और हमें दुष्ट समझते हैं, पर वास्तव में ( सज्जन
के वेष में ) आप ही दुष्ट और हम लोग शिष्ट हैं; इस तरह अज्ञानी की तरह
वे आपस में एक-दूसरे की निन्दा करते रहते हैं ॥ ४६-५१ ॥
पृथ्विजलं तथा वह्निर्वायुराकाशमेव च ।
एते सन्तानोदयास्तु सम्यगेव प्रकीर्तिताः ॥ ५२ ॥
शक्तिसम्वलित शिव की स्वप्रकृति से पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश-
रूप में पाँच सन्तानों की उत्पत्ति का ही वर्णन उपलब्ध होता है ॥ ५२ ॥
काठिन्यं चार्द्रता तेजो धावनं स्थिरता खलु ।
गुणा एते च पञ्चैव सन्तानानां क्रमात्स्मृताः ॥ ५३ ॥
ब्रह्माविष्णुश्चरुद्रश्च ईश्वरश्च सदाशिवः ।
एताश्च देवताः प्रोक्ता सन्तानानां क्रमेणु तु ॥ ५४ ॥
१३४ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति