Skip to content
SarvaKosh
सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

DevanagariHindipublished222 pages

Page 161 of 222

Read in context
Page 161

स्वरूप को प्राप्त हो जाता है, तब वह परमपद में स्वस्थ हो जाता है—यही परम-
पद की स्वसंवेद्यता है ।
स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम ।
( गीता १० । १५ )
यह परमात्मा स्वप्रकाश से प्रकाशस्वरूप—अत्यन्त भासाभासक है ।
ज्योतिषामपि तज्ज्योतिस्तमसः परमुच्यते ।
( गीता १३ । १७ )
उपनिषद् में उल्लेख है कि स्वप्रकाशस्वरूप परमात्मा सूर्य-चन्द्र के प्रकाश
से नहीं प्रकाशित होता, सूर्य-चन्द्र का तेज उस परमप्रकाश में विलय को प्राप्त
हो जाता है ।
न तत्र सूर्यो भाति न चन्द्रतारकम् ।
( कठोपनिषद् २ । ५ । १५ )
यह परमात्मपद सच्चिदानन्दस्वरूप होने से चक्षुरादिइन्द्रियातीत है ।
यत्र बुद्धिर्मनो नास्ति तत्त्वविन्नापराकला ।
ऊहापोहौ कर्तव्यौ, वाचा तत्र करोति किम् ।
वाग्मिनागुरुणा सम्यक् कथं तत्पदमीर्यते ।
तस्मादुक्तं शिवेनैव स्वसंवेद्यं परपदम् ॥ ३ ॥
उस परम पद के सम्बन्ध में बुद्धि किसी भी तरह का निश्चय नहीं कर
सकती है, न मन, जो संकल्परूप है, उसमें प्रवेश पा सकता है, उस परमपद का न
तो ( वाणी से ) मण्डन किया जा सकता है, न स्वरूप में स्थित कराने वाली
कला भी उसका निर्वचन कर सकती है, न किसी धर्म-विशेष के आश्रय में
उसका खण्डन किया जा सकता है । वाग्मी (वाचस्पति) गुरु के द्वारा भी उसका
तत्वतः निरूपण नहीं हो सकता है । यही कारण है कि साक्षात् शिव ने उस परम
पद को स्वसंवेद्य कहा है ॥ ३ ॥
विशेष—उस परम पद में चक्षुइन्द्रिय का प्रवेश नहीं है, उसमें वागिन्द्रिय
की भी पहुँच नहीं है । मन ( अन्तःकरण ) का भी इसमें प्रवेश नहीं है । यह
बतलाने से भी तो समझ में नहीं आ सकता है ।
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ ११६