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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

DevanagariHindipublished222 pages

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Page 168

से अंग में लेप करने से दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है। सुधा को भस्म से मिश्रित
कर लेप करना चाहिये।
परमपद की प्राप्ति
तेषां पिण्डसिद्धौ सत्यां सर्वसिद्धय. संनिधाना
भवन्ति ॥ १७ ॥
यस्मिञ्ज्ञाते जगत्सर्वसिद्धं भवति लीलया ।
सिद्धयः स्वयमायान्ति तस्माज्ज्ञेयं परं पदम् ॥ १८ ॥
परं पदं न वेषेण प्राप्यते परमार्थतः ।
देहमूलं हि वेषः स्याल्लोकप्रत्ययहेतुकः ॥ १६ ॥
इस प्रकार योगसाधना में तत्पर होने पर पिण्डसिद्धि--शरीर में ही
परपिण्डस्थ परमात्मा की व्यापकता की अनुभूति होती है और इस सत्स्वरूप में
समस्त अणिमादि सिद्धियां प्रत्यक्ष हो जाती हैं ॥ १७ ॥ इस परमपद--परमात्म-
तत्व का बोध होने पर जगत् परमात्मस्वरूप में सहज--अनायास अभिव्यक्त हो
उठता है। सिद्धियाँ बिना चाहे ही स्वतः उपस्थित हो जाती हैं। साधक को
इन सिद्धियों में न उलझ कर परमपद का ही बोध प्राप्त करना चाहिये ॥ १८ ॥
यह परम पद वेष धारण करने से नहीं सिद्ध होता है। वस्तुतः वेषधारण का
तात्पर्य तो यह है कि लोकमात्र को—संसार में निवास करने वाले प्राणियों को
संन्यासवेष धारण के महत्व का पता चल जाय। यही कारण है कि देह को इस
प्रकार वेषादि-चिह्नों से अलंकृत किया जाता है। साधनसहित वेष धारण कर
परमपद का बोध प्राप्त करना चाहिये ।
योगमार्ग
लोके निकृष्टमुत्कृष्टं परिगृह्य पृथक्कृतम् ।
तत्स्वधर्म इति प्रोक्तो योगमार्गे विशेषतः ।.२०।।
योगामार्गात्परो मार्गो नास्ति नास्ति श्रुतौ स्मृतौ ।
शास्त्रेष्वन्येषु सर्वेषु शिवेन कथितः पुरा ॥२१॥
१२६ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति