सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)
Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary
by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)
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Read in contextपाँचवां उपदेश
[ पिण्डपदसामरस्य ]
महासिद्धयोगिभिः पूर्वोक्तक्रमेण परपिण्डादिस्वपिण्डान्तं
ज्ञात्वा परमपदे समरसं कुर्यात् ॥ १ ॥
परासंवित्स्वरूप शिव-शक्ति को नितान्त अभिन्न समझते हुए योगी को
मूलाधार में सोयी कुण्डलिनी महाशक्ति को जगाकर मध्य शक्ति के प्रबोधनपूर्वक
ऊर्ध्व शक्ति का सहस्रार में निपात करना चाहिये। अपने व्यष्टि पिण्ड और
सच्चिदानन्दपरमात्मस्वरूप परपिण्ड का ज्ञान प्राप्त कर परमपद परमात्मा में
सामरस्य ( ऐक्य ) स्थापित करना चाहिये,—ऐसा करने से उन्हें परमात्म
असंग शिवस्वरूप की प्राप्ति हो जाती है ॥ १ ॥
परमपद
परमपदमिति स्वसंवेद्यमत्यन्तभासाभासकमयम् ॥ २ ॥
( परम पद द्वैताद्वैतविवर्जित है । ) परम पद स्वानुभवैकगम्य है—स्वसंवेद्य
है और स्वप्रकाशस्वरूप अभिव्यक्त है—किसी अन्य प्रकाश के माध्यम से यह बोध-
गम्य नहीं है ॥ २ ॥
विशेष—स्वसंवेद्य परमपद का आशय यह है कि परमात्मा ही परमात्मा
को जानता है अथवा जब कुण्डलिनी के पूर्ण प्रबोधन से जीवात्मा अखण्ड परमात्म-
११८ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति