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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

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सामर्थ्य प्राप्त कर लेता है—दूसरे के मृतशरीर में प्रवेश कर उसे प्राणान्वित
कर देता है। छठें वर्ष में उसका शरीर इतना पुष्ट हो जाता है कि किसी भी
प्रकार के शस्त्र तथा वज्रपात आदि से प्रभावित नहीं होता है। वह आसन पर
बैठे-बैठे पृथ्वीतल से ऊपर उठ जाता है और वायुके समान वेग धारण कर इस
तरह सातवें वर्ष में आसमान में उड़ने लगता है। आठवें वर्ष में वह अणिमा
आदि सभी सिद्धियों से सम्पन्न हो उठता है और नौवें वर्ष में उसका शरीर वज्र
के समान हो जाता है, वह आकाश और अनेक दिशाओं में भ्रमण करने में समर्थ
होता है। दशवें वर्ष में वह स्वेच्छा से पवन के वेग के समान अभीष्ट स्थान में
शीघ्रातिशीघ्र पहुँच जाता है। ग्यारहवें वर्ष में वह सर्वज्ञ और समस्त सिद्धियों
का स्वामी हो जाता है। बारहवें वर्ष में वह साक्षात् शिव के समान जगत्
को रचने और उसका संहार करने की सामर्थ्य से युक्त होता है। वह योगसिद्ध
पुरुष भैरव के समान तीनो लोकों में पूज्य होता है ॥ ३६-४३ ॥
एवं द्वादशवर्षैस्तु सिद्धयोगी महाबलः ।
जायते सद्गुरोः पादप्रभावान्नात्र संशयः ॥४४॥
बारह वर्षों में सद्गुरु के शरणापन्न होकर योगाभ्यास करने से साधक
सिद्धयोगी होकर शिवस्वरूप हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४४ ॥
अनुबुभूषितयोनिजविश्रमं स गुरुपादसरोरुहमाश्रयेत् ।
तदनुससरणात्परमं पदं, समरसोकरणं न च दूरतः ॥४५॥
जो योगसाधक शान्ति-मुक्ति चाहता है, जो मोक्ष का अनुभव करना
चाहता है, उसे गुरु के चरण-कमल का आश्रय ग्रहण करना चाहिये । सद्गुरु
के अनुग्रह से योगसाधन में तत्पर होने से उसे पिण्डसिद्धि ( अपने पिण्ड में
परपिण्ड-परमात्मरूप की अखण्ड व्यापकता की अनुभूति ) और परम पद
की प्राप्ति सहज सुलभ हो जाती है ॥ ४५ ॥
गुरुकुलसन्तान
गुरुकुलसन्तानं पञ्चधा प्रोक्तम् । आईसन्तानं विलेश्वर
सन्तानं, विभूतिसन्तानं, नाथसन्तानं. योगेश्वरसन्तानञ्चे
त्येषामपि सन्तानानां पृथक् पृथक् वैशिष्ट्यं वर्तते ॥ ४६ ॥
१३२ ] [ सिद्धसिद्धान्तपद्धति