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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

DevanagariHindipublished222 pages

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तथा अमरी की क्रिया के द्वारा उसे सहस्रार से द्रवित अमृत का पान करना
चाहिये, प्राणायाम और आसनों के अभ्यास से उत्पन्न पसीने का अंग में लेप
करना चाहिये । एकान्तवास का सेवन करते हुए गुरु की दीक्षा के अनुरूप निर्मल
चित्त से संध्या-जप आदि के अनुष्ठान में तत्पर रहना चाहिये और योगसाधना
मे विघ्नों के निवारण के लिये शास्त्रविधि से भैरव देव का पूजन करना चाहिये ।
शंखनाद करना चाहिये, वस्त्र के रूप में कौपीन धारण करना चाहिये, पैरों में
खड़ाऊँ पहनना चाहिये तथा ओढ़ने-बिछाने के लिये कम्बल तथा पहनने के लिये
अँचला अथवा धोती के रूप में वस्त्र रखना चाहिये, पानी के लिये कमण्डलु और
जलवृष्टि से बचने के लिये पास में छाता रखना चाहिये । शरीर को स्नान के
उपरान्त भस्म से अलंकृत कर ललाट में त्रिपुण्ड्र धारण करना चाहिये । नित्यप्रति
गुरु के चरण का ध्यान करते हुए प्रणाम समर्पित कर साधना में तत्पर रहना
चाहिये ॥ १३-१६ .।
विशेष—अमरीपान (अमरोली) के अभ्यास द्वारा शरीर में साधक वीर्य की
अखण्डता सुरक्षित रखता है । हठयोग-प्रदीपिका में अमरीपान पर प्रकाश डाला
गया है ।
पित्तोल्वणत्वात्प्रथमाम्बुधारां
विहाय निःसारतयान्त्यधाराम् ।
निषेव्यते शीतलमध्यधारा
कापालिके खण्डमतेऽमरोली ॥
अमरीं यः पिबेन्नित्यं नस्यं कुर्वन् दिने दिने ।
वज्रोलीमभ्यसेत् सम्यगमरोलीति कथ्यते ॥
अभ्यासान्निःसृतां चान्द्रीं विभूत्या सह मिश्रयेत् ।
धारयेदुत्तमाङ्गेषु दिव्यदृष्टिः प्रजायते ॥
( हठयोगप्रदीपिका ३ । ६६-६८ )
अधिक पित्तवाली ( प्रारम्भिक ) बिन्दु-धारा और सार-अंश से रहित
अन्तकी धारा को छोड़कर शीतल मध्यधारा ( चन्द्रामृत ) का ही (इस मुद्रा में)
पान किया जाता है, खण्डकापालिकमत में यही अमरोली है । साधक नासिका
द्वारा अमरी का नित्य पान करते हुए वज्रोली मुद्रा द्वारा वीर्य के ऊर्ध्वाकर्षण का
अभ्यास करता है । यही अमरोली है । अमरोली के अभ्यास से निकलती सुधा
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