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सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

सिद्धसिद्धान्तपद्धति (गुरु गोरखनाथ - पिण्ड-उत्पत्ति, पिण्ड-विचार एवं ब्रह्माण्ड-एकात्म दर्शन)

Siddha Siddhanta Paddhati of Guru Gorakhnath with Commentary

by गुरु गोरखनाथ (सम्पादक: गोरक्षनाथ मन्दिर शोध संस्थान, गोरखपुर)

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DevanagariHindipublished222 pages

Page 165 of 222

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Page 165

स्वपिण्ड-परपिण्ड की अभेदता के अनुभव से उसे सर्वेश्वर परमात्मा के पिण्ड में
आत्माभिव्यक्ति-निजावेश होता है और इस निजावेश के परिणामस्वरूप ही
निरुत्थान अथवा सामरस्य का उदय होता है, उसे स्वाभिव्यक्तिपूर्वक इसका
अनुभव होता है कि यह परपिण्ड-परमात्मपिण्ड मेरा ही (व्यष्टि-) पिण्ड
है। सच्चिदानन्दस्वरूप आत्मा के स्वसंवेद्य अनुभव के चमत्कार से अद्भुत प्रकाश-
स्वरूप आत्मबोध होता है। इस बोध से द्वन्द्व-परमात्म पिण्ड और स्वपिण्ड में भेद
भाव का अन्त हो जाता है और अखण्ड परमात्मस्वरूप परमपद प्रत्यक्ष हस्तामलक
के समान प्रस्फुटित-स्वप्रकाशित अथवा स्वाभिव्यक्त हो जाता है। इसमें तनिक
भी संशय नहीं है-यह सत्य है ॥ ८ ॥
अतएव महासिद्धयोगिभिः सम्यग् गुरुप्रसादं लब्ध्वावधान-
बलेनैक्यं भजमानैस्तत्क्षणात् परं पदमेवानुभूयते ॥ ६ ॥
व्यष्टि-पिण्ड और परपिण्ड (परमात्मपिण्ड) में सामरस्य की प्राप्ति गुरु
के अनुग्रह से ही होती है। सिद्धयोगियों को इसके लिये सबसे पहले गुरु के चरण
में शरणागत होकर उसकी प्रसन्नता से चित्तवृत्तियों के निरोधपूर्वक स्वरूप-ध्यान
और समाधि से उपासना में-योगसाधना में तत्पर होकर स्वपिण्ड से परपिण्ड
पर्यन्त ऐक्य का अनुभव करना चाहिये, इस तरह की साधना से ही तत्क्षण परम-
पद-द्वैताद्वैतविवर्जित परमात्म पद का अनुभव होता है ॥ ६ ॥
तदनुभवबलेन स्वकीयं सिद्धं सम्यङ् निजपिण्डं ज्ञात्वा
तमेव परमपद एकीकृत्य तस्मिन्प्रत्यावृत्त्या रूढैवाभ्यन्तरे
स्वपिण्डसिद्धयर्थे महत्वमनुभूयते ॥ १० ॥
इस तरह अपने योगसाधनापरक अनुभव के प्रकाश में अपने व्यष्टिपिण्ड
(परमात्मस्वरूप से अभेदता) का ज्ञान प्राप्त कर उसे परमपद में एकीकृत कर
तथा उस परमपद को अपने व्यष्टि-पिण्ड में एकात्मस्वरूप कर अपने पिण्ड को
सच्चिदानन्दस्वरूप में अभिव्यक्त कर परपिण्ड की उसमें अभिन्नता-अभेदता का
महत्व योगी अनुभव करता है ॥ १० ॥
निजपिण्डपरीक्षा च स्वस्वरूपकिरणानन्दोन्मेषमात्रं
यस्योन्मेषस्य प्रत्याहरणमेव समरसकरणं भवति ॥ ११ ॥
सिद्धसिद्धान्तपद्धति ] [ १२३