शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
About this granth
The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.
This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.
The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५३
हाथ और पैर ऐसे बनाने चाहिये जिसमें सिरायें (नसें) तथा गुल्फ न दिखाई पड़े।
तद्विज्ञैः प्रस्तुता ये ये मूर्तेरवयवाः सदा ॥ १०५ ॥
न हीना नाधिका मानात्ते ते ज्ञेयाः सुशोभनाः ।
न स्थूला न कृशा वापि सर्वे सर्वमनोरमाः ॥ १०६ ॥
रम्य प्रतिमा के लक्षण— मूर्त्ति के बनानेवाले कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्त्ति के जो-जो अवयव हों वे सब यदि शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न कम हों तभी अत्यन्त सुन्दर मानना चाहिये। और यदि सभी अङ्ग न स्थूल तथा न कृश बने हों तो सभी भांति से उन्हें सुन्दर मानना चाहिये।
सर्वाङ्गैः सर्वरम्यो हि कश्चिल्लक्षे प्रजायते ।
शास्त्रमानेन यो रम्यः स रम्यो नान्य एव हि ॥ १०७ ॥
रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर— लाखों में कोई एक प्रतिमा सबों के लिये सर्वाङ्ग सुन्दर बनती है किन्तु शास्त्र के प्रमाणानुसार जो रम्य (सुन्दर) हो वही रम्य कहलाता है अन्य नहीं।
शास्त्रमानविहीनं यदरम्यं तद्विपश्चिताम् ।
एकेषामेव तद् रम्यं लग्नं यत्र च यस्य हृत् ॥ १०८ ॥
मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर— किसी एक का मत है कि— जिसमें जिसका मन लग जाता है उसके लिये वही रम्य होता है किन्तु विद्वानों को तो जो शास्त्र के प्रमाण से विरुद्ध बनी प्रतिमा है वही अरम्य (असुन्दर) होती है।
अष्टाङ्गुलं ललाटं स्यात्तावन्मात्रे भ्रुवौ मते ।
अवयवों की आकृति का वर्णन— ललाट ८ अंगुल चौड़ा, और दोनों भौंहें मिलाकर उतनी ही (८ अंगुल चौड़ी) होनी चाहिये।
अर्द्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवोन्नता ॥ १०६ ॥
नेत्रे च त्र्यङ्गुलायामे द्व्यङ्गुले विस्तृते शुभे ।
दोनों भौंहों की चौड़ाई आधा अंगुल और मध्य में धनुष के आकार के समान कुछ उठी हुई होनी चाहिये। और नेत्रों की लम्बाई तीन अंगुल की तथा चौड़ाई दो अंगुल की एवं देखने में सुन्दर बनानी चाहिये।
तारका तत्तृतीयांशा नेत्रयोः कृष्णरूपिणौ ॥ ११० ॥
द्व्यङ्गुलं तु भ्रुवोर्मध्यं नासामूलमथाङ्गुलम् ।
दोनों नेत्रों की कृष्ण वर्ण की पुतलियाँ नेत्र के तृतीयांश के बराबर (१ अंगुल) की, दोनों भौंहों के मध्य का भाग दो अंगुल चौड़ा एवं नासा का मूल भाग एक अंगुल चौड़ा बनाना चाहिये।
२५४ | शुक्रनीतिः
नासाग्रविस्तरं तद्वद् द्व्यङ्गुलं तद्विलद्वयम् ॥ १११ ॥
शुकनासाकृतिर्नासा सरलं वा द्विधा शुभा ।
नासा के अग्रभाग का विस्तार दो अंगुल का एवं उसके दो छिद्र भी दो ही अंगुल के होने चाहिये। सुग्गे की नासा के आकार जैसी अथवा सीधी दोनों प्रकार की अर्थात् दोनों प्रकारों में से किसी एक प्रकार की नासा बनाई जानी चाहिये।
निष्पावसदृशं नासापुटयुग्मं सुशोभनम् ॥ ११२ ॥
दोनों नासापुट निष्पाव (मोंठ) के समान अत्यन्त सुन्दर बनाना चाहिये।
कर्णौ च भ्रूसमौ ज्ञेयौ दीर्घौ च चतुरङ्गुलौ ।
कर्णपाली त्र्यङ्गुला स्यात् स्थूला चार्धाङ्गुला मता ॥ ११३ ॥
दोनों कान भी भौंहों के समान चार २ अंगुल लम्बे होने चाहिये। कर्णपाली तीन अंगुल लम्बी और आधी अंगुल मोटी होनी चाहिये।
नासावंशोऽर्द्धाङ्गुलस्तु श्लक्ष्णः सार्द्धाङ्गुलोन्नतः ।
नासिका का दण्ड तीन अंगुल लम्बा, डेढ़ अंगुल उन्नत, और चिकना तथा ऊंचा होना चाहिये।
ग्रीवामूलाच्च स्कन्धान्तमष्टाङ्गुलमुदाहृतम् ॥ ११४ ॥
बाह्वन्तरं द्वितालं स्यात्तालमात्रं स्तनान्तरम् ।
अवयवों के अन्तर का प्रमाण—ग्रीवा के मूलभाग से लेकर स्कन्ध पर्यन्त आठ अंगुल का विस्तार होना चाहिये। दोनों बाहुओं का अन्तर अर्थात् वक्ष स्थल दो ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये। और दोनों स्तनों का अन्तर (मध्यभाग) एक ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये।
षोडशाङ्गुलमात्रं तु कर्णयोरन्तरं स्मृतम् ॥ ११५ ॥
कर्णहन्वग्रान्तरं तु सदैवाष्टाङ्गुलं मतम् ।
एक कान से लेकर दूसरे कान तक का अन्तर १६ अंगुल प्रमाण होना चाहिये। और कान तथा हनु का अग्रभाग (ठुड्डी) का अन्तर सदा आठ अंगुल का होना चाहिये।
नासाकर्णान्तरं तद्वत्तदर्धं कर्णनेत्रयोः ॥ ११६ ॥
मुखं तालतृतीयांशमोष्ठावर्धाङ्गुलौ मतौ ।
नाक और कान का अन्तर भी उसी तरह से (आठ अंगुल का) होना चाहिये। और कान तथा नेत्र का अन्तर उससे आधा (चार अंगुल का) रखना चाहिये। मुख की चौड़ाई एक ताल का तृतीयांश प्रमाण होना चाहिये। दोनों ओठ आधा अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५५
द्वात्रिंशदंगुलः प्रोक्तः परिधिर्मस्तकस्य च ॥ ११७ ॥
दशाङ्गुला विस्तृतितस्तद् द्वादशाङ्गुलदीर्घता ।
**अवयवों की परिधि का प्रमाण—**मस्तक की परिधि (घेरा) बत्तिस अंगुल का होना चाहिये। मस्तक का विस्तार (चौड़ाई) दस अंगुल का और लम्बाई बारह अंगुल का होना चाहिये।
ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्वाविंशत्यङ्गुलात्मकः ॥ ११८ ॥
हृन्मध्य-परिधिर्ज्ञेयश्चतुःपञ्चाशदङ्गुलः ।
ग्रीवा मूल की परिधि बाइस अंगुल की होनी चाहिये। हृदय के मध्य भाग (वक्ष के मध्य भाग) की परिधि चउभन (५४) अंगुल की होनी चाहिये।
हीनाङ्गुलचतुस्तालपरिधिर्हृदयस्य च ॥ ११९ ॥
आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता पृथुता द्वादशाङ्गुला ।
हृदय की परिधि एक अंगुल कम चार ताल प्रमाण होनी चाहिये। स्तन से लेकर पृष्ठ पर्यन्त की मुटाई बारह अंगुल की होनी चाहिये।
सार्धत्रितालपरिधिः कट्याश्च द्वयङ्गुलाधिकः ॥ १२० ॥
चतुरङ्गुल उत्सेधो विस्तारः स्यात्षडङ्गुलः ।
कमर की परिधि दो अंगुल अधिक साढे तीन ताल प्रमाण की होनी चाहिये। और उसकी ऊंचाई चार अंगुल की तथा विस्तार ६ अंगुल का होना चाहिये।
पश्चाद्भागे नितम्बस्य स्त्रीणामङ्गुलतोऽधिकः ॥ १२१ ॥
बाहुप्रमूलपरिधिः षोडशाष्टादशाङ्गुलः ।
स्त्रियों की मूर्ति के नितम्ब के पीछे भाग में पुरुष की अपेक्षा परिधि एक अंगुल अधिक साढे तीन ताल प्रमाण होना चाहिये। बाहु के अग्रभाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं बाहु के मूल भाग की परिधि अट्ठारह अंगुल की होनी चाहिये।
हस्तमूलाग्र-परिधिश्चतुर्दश-दशाङ्गुलः ॥ १२२ ॥
पञ्चाङ्गुला पादकरतलयोर्विस्तृतिः स्मृता ।
हाथ के मूलभाग की परिधि चौदह अंगुल की एवं अग्र भाग की परिधि दश अंगुल की होनी चाहिये। पैर तथा हाथ के तलभाग का विस्तार पांच अंगुल का होना चाहिये।
ऊरुमूलस्य परिधि र्द्वात्रिंशदङ्गुलात्मकः ॥ १२३ ॥
ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिः स्मृतः ।
| २५६ | शुक्रनीतिः |
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ऊरु के मूलभाग की परिधि बत्तीस अंगुल की और और ऊरु के अग्रभाग की परिधि उन्नीस अंगुल की होनी चाहिये ।
जङ्घामूलाग्रपरिधिः षोडशाद्वादशाङ्गुलः ॥ १२४ ॥
मध्यमामूलपरिधिर्विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः ।
जंघा के मूल भाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं जंघा के अग्रभाग की परिधि बारह अंगुल की होनी चाहिये। मध्यमा अंगुली के मूल भाग की परिधि चार अंगुल की होनी चाहिये ।
तर्जन्यनामिकामूलपरिधिः सार्द्धत्र्यङ्गुलः ॥ १२५ ॥
कनिष्ठिकायाः परिधिर्मूले त्र्यङ्गुल एव हि ।
तर्जनी और अनामिका अंगुली के मूल भाग की परिधि साडे तीन अंगुल की होनी चाहिये । किन्तु कनिष्ठिका अंगुली के मूलभाग की परिधि तीन ही अंगुल की होनी चाहिये ।
स्वमूलपरिधेः पादहीनोऽग्रे परिधिः स्मृतः ॥ १२६ ॥
हस्तपादाङ्गुष्ठयोश्च चतुःपञ्चाङ्गुलं क्रमात् ।
और प्रत्येक अंगुलियों के अपने २ मूल भाग की परिधियों की अपेक्षा अग्र भाग की परिधियां प्रमाण में चतुर्थांश हीन होती हैं । जैसे मध्यमा के मूल भाग की परिधि चार अंगुल की है तो उसके अग्र भाग की परिधि चतुर्थांश हीन होने से तीन अंगुल की होती है । इसी भांति से अन्य अंगुलियों के लिये भी समझना चाहिये । हाथ तथा पैर के अंगूठे की परिधि क्रम से चार तथा पांच अंगुल की होनी चाहिये ।
पादाङ्गुलीनां परिधिस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः ॥ १२७ ॥
मण्डलं स्तनयोर्नाभेः सार्द्धाङ्गुलमथाङ्गुलम् ।
पैर की अंगुलियों की परिधि तीन अंगुल की होनी चाहिये । स्तनों का मंडल ( परिधि ) डेढ़ अंगुल का एवं नाभि का मण्डल एक अंगुल का होना चाहिये ।
सर्वाङ्गानां यथाशोभि पाटवं परिकल्पयेत् ॥ १२८ ॥
मूर्ति के संपूर्ण अङ्ग ऐसे बनाने चाहिये जिससे उनकी सुन्दरता की शोभा विशेष रूप से प्रतीत होती हो ।
नोर्ध्वदृष्टिमधोदृष्टिं मीलिताक्षीं प्रकल्पयेत् ।
नोग्रदृष्टिं तु प्रतिमां प्रसन्नाक्षीं विचितयेत् ॥ १२९ ॥
प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण—और ऊपर अथवा नीचे की ओर दृष्टिवाली किंवा मुंदी आँखोंवाली वा उग्र दृष्टिवाली मूर्ति नहीं बनानी चाहिये । अपि तु प्रसन्नता से भरी दृष्टिवाली मूर्ति बनानी चाहिये ।
चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २५७
चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २५७
प्रतिमायास्तृतीयांशमर्द्धांशं तत् सुपीठकम्।
प्रतिमा के आसन का प्रमाण— प्रतिमा (मूर्त्ति) का जो आसन हो वह देखने में सुन्दर एवं प्रतिमा के मान के अनुसार तृतीयांश या अर्द्धांश प्रमाण का होना चाहिये।
द्विगुणं त्रिगुणं द्वारं प्रतिमायाश्चतुर्गुणम् ॥ १३० ॥
एकद्वित्रिचतुर्हस्तं पीठं देवालयस्य च।
योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण— देवमन्दिर का द्वार प्रतिमा के मान से द्विगुण, त्रिगुण या चतुर्गुण बड़ा बनाना चाहिये। और योग्यतानुसार प्रतिमा का पीठ (आसन) एक, दो, तीन या चार हाथ प्रमाण बनाना चाहिये।
पीठतस्तु समुच्छ्रायो भित्तेर्दशकराधिकः ॥ १३१
द्वारात्तु द्विगुणोच्छ्रायः प्रासादस्योर्ध्वभूमिभाक्।
शिखरं चोच्छ्रायसमं द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥ १३२ ॥
देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण— देवगृह की भित्ति (भीत) की ऊंचाई पीठ से दस हाथ अधिक करनी चाहिये। प्रासाद (देवमन्दिर) के ऊपर की भूमि द्वार से दुगुनी ऊंची होनी चाहिये। और प्रासाद का शिखर ऊंचाई के अनुरूप द्विगुण या त्रिगुण बनाना चाहिये।
एकभूमिं समारभ्य सपादाशतभूमिकम्।
प्रासादं कारयेच्छक्त्या ह्यष्टास्रं पद्मसंनिभम् ॥ १३३ ॥
चतुर्दिक्षु मण्डपं वापि चतुःशालं समन्ततः।
मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश— एक मञ्जिल से लेकर सवा सौ मञ्जिल तक का अठपहला कमल के आकार का, चारों दिशाओं में बने हुये मण्डपों से अथवा चारों तरफ कमरों से युक्त प्रासाद (मन्दिर) शक्ति के अनुसार बनाना चाहिये।
सहस्रस्तम्भसंयुक्तश्चोत्तमोऽन्यः समोऽधमः ॥ १३४ ॥
प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश— एक हजार स्तम्भों से युक्त प्रासाद 'उत्तम' उससे न्यून स्तम्भों का 'मध्यम' उससे भी न्यून स्तम्भों का 'अधम' प्रासाद कहलाता है।
प्रासादे मण्डपे वापि शिखरं यदि कल्प्यते।
स्तम्भास्तत्र न कर्तव्या भित्तिस्तत्र सुखप्रदा ॥ १३५ ॥
मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश— जिस प्रासाद अथवा मण्डप के ऊपर यदि शिखर बनाना हो तो वहां पर स्तम्भ नहीं बनाना चाहिये क्योंकि वहां पर केवल भित्ति (भीत) ही सुखप्रद होती है,- स्तम्भ की कोई आवश्यकता नहीं है।
१७ शु०
२५८ | शुक्रनीतिः
प्रासादमध्यविस्तारः प्रतिमायाः समन्ततः ।
षड्गुणोऽष्टगुणो वापि पुरतो वा सुविस्तरः ॥ १३६ ॥
**प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार—**प्रासाद के भीतरी भाग का विस्तार चारो तरफ प्रतिमा से छगुना या आठगुना होना चाहिये और प्रतिमा के आगे की तरफ सब से अधिक विस्तार होना चाहिये ।
वाहनं मूर्तिसदृशं सार्धं वा द्विगुणं स्मृतम् ।
यत्र नोक्तं देवताया रूपं तत्र चतुर्भुजम् ॥ १३७ ॥
अभयं च वरं दद्याद्यत्र नोक्तं यदायुधम् ।
अधः करे तूर्ध्वकरे शङ्खं चक्रं तथाऽङ्कुशम् ॥ १३८ ॥
पाशं वा डमरुं शूलं कमलं कलशं स्रुवम् ।
लड्डुकं मातुलुङ्गं वा वीणां मालां च पुस्तकम् ॥ १३९ ॥
**प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार—**देवता का वाहन देवमूर्ति के अनुरूप डेढ़गुना या दुगुना बड़ा होना चाहिये। जहां पर देवता का रूप (बाहु का उल्लेख) नहीं कहा हो वहां पर चतुर्भुज बनाना चाहिये । जहां पर देवता के आयुध (अस्त्र-शस्त्र) का उल्लेख न हो वहां पर नीचे के हाथों में क्रम से अभय तथा वर मुद्रा का अंकन करना चाहिये । और ऊपर हाथों में शङ्ख, चक्र, अंकुश, पाश, डमरु, शूल, कमल, कलश, स्रुवा, लड्डू, मातुलुङ्ग, वीणा, माला वा पुस्तक का अंकन करना चाहिये ।
मुखानां यत्र बाहुल्यं तत्र पङ्क्त्या निवेशनम् ।
तत् पृथग्-ग्रीवमुकुटं सुमुखं स्वक्षिकर्णयुक् ॥ १४० ॥
**प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश—**जहां पर प्रतिमा में बहुत सा मुख बनाना हो वहां पर उन्हें एक पंक्ति में बनाना चाहिये । और उनकी ग्रीवा, मुकुट तथा मुख, आंख और कान को पृथक् २ सुन्दर रीति से बनाना चाहिये ।
भुजानां यत्र बाहुल्यं न तत्र स्कन्धभेदनम् ।
**अनेक भुजाओं की व्यवस्था—**जिस मूर्ति में बहुत भुजायें बनानी हों वहां स्कन्धों में भेद नहीं किया जाता है अर्थात् स्कन्ध दो ही बनाये जाते हैं किन्तु भुजायें दो से अधिक भी बनाई जाती है ।
कूर्परोर्ध्वं तु सूक्ष्माणि चिपिटानि दृढानि च ॥ १४१ ॥
भुजमूलानि कार्याणि पक्षमूलानि वै यथा ।
केहुनी के ऊपर भुजाओं के मूल भाग, दोनों पार्श्वों के मूल भाग के समान सूक्ष्म, चिपटे तथा दृढ़ बनाने चाहिये ।
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५
ब्रह्मणस्तु चतुर्दिक्षु मुखानां विनियोजनम् ॥ १४२ ॥
**ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था—**ब्रह्मा की मूर्त्ति में चारों दिशाओं में एक २ मुख बनाना चाहिये ।
हयग्रीवो वराहश्च नृसिंहश्च गणेश्वरः ।
मुखैर्विना नराकारो नृसिंहश्च नखैर्विना ॥ १४३ ॥
**हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार—**हयग्रीव, वराह, नृसिंह, गणेश्वर ( गणेश ), इन ४ देवताओं की मूर्त्तियों में मुख को छोड़ कर शेष अङ्ग मनुष्य के आकार का बनाना चाहिये अतः हयग्रीव का मुख घोड़े की भाँति, वराह का सूअर की भाँति, नृसिंह का सिंह की भाँति और गणेश का मुख हाथी की भाँति बनाना चाहिये । और नृसिंह का नख भी सिंह की भाँति ही होना चाहिये ।
तिष्ठन्तीं सूपविष्टां वा स्वासने वाहनस्थिताम् ।
प्रतिमामिष्टदेवस्य कारयेदुक्तलक्षणाम् ॥ १४४ ॥
हीनश्मश्रुनिमेषां च सदा षोडशवार्षिकीम् ।
दिव्याभरणावस्त्राढ्यां दिव्यवर्णक्रियां सदा ॥ १४५ ॥
वस्त्रैरापादगूढां च दिव्यालङ्कारभूषिताम् ।
अपने आसन पर खड़ी अथवा सुखपूर्वक बैठी हुई अथवा वाहन पर स्थित, दाढ़ी तथा मूंछ से एवं निमेष से रहित, सदा १६ वर्ष की अवस्था वाली, दिव्य आभरण तथा वस्त्र से युक्त, दिव्य वर्ण तथा क्रियावाली, वस्त्रों से पैर तक ढकी हुई, दिव्य अलङ्कारों से भूषित ऐसी पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त अपने इष्टदेव की प्रतिमा बनवानी चाहिये ।
हीनाङ्गो नाधिकाङ्गश्च कर्त्तव्या देवताः क्वचित् ॥ १४६ ॥
हीनाङ्गी स्वामिनं हन्ति ह्यधिकाङ्गी च शिल्पिनम् ।
कृशा दुर्भिक्षदा नित्यं स्थूला रोगप्रदा सदा ॥ १४७ ॥
**अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण—**हीन तथा अधिक अङ्गोंवाली देवता की प्रतिमा कभी नहीं बनवानी चाहिये । क्योंकि हीन अङ्गवाली प्रतिमा मूर्त्ति बनवानेवाले स्वामी को एवं प्रमाण से अधिक अङ्गोंवाली शिल्पी ( मूर्त्तिकार ) को नष्ट कर देती है । कृश अङ्गवाली नित्य दुर्भिक्ष ( अभाव ) देनेवाली और स्थूल अङ्गवाली प्रतिमा सदा रोग देनेवाली होती है ।
गूढसन्ध्यस्थिधमनी सर्वदा सौख्यवर्धिनी ।
**सौख्यदायक प्रतिमा के लक्षण—**जिसकी सन्धि, अस्थि तथा धमनियां नहीं दिखाई पड़ती हैं ऐसी प्रतिमा सर्वदा सुख बढ़ानेवाली होती है ।
२६० शुक्रनीतिः
वराभयाब्जशङ्खाढ्यहस्ता विष्णोश्च सात्त्विकी ॥ १४८॥
मृगबाणाभयवर-हस्ता सोमस्य सात्त्विकी ।
**सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन—**विष्णु की जिस मूर्त्ति में क्रम से वर तथा अभयदान की मुद्रा एवं कमल तथा शङ्ख से युक्त चारों हाथ होते हैं वह 'सात्त्विक' कहलाती है । मृग, बाण, अभय तथा वरदान की मुद्रा क्रम से चारों हाथों में जिसके रहती है वह चन्द्रमा की 'सात्त्विक मूर्त्ति' कहलाती है ।
वराभयाब्जलड्डुक-हस्तेभास्यस्य सात्त्विकी ॥ १४९॥
पद्ममालाऽभयवर-करा सत्त्वाधिका रवेः ।
गणेश की जो सात्त्विक मूर्त्ति होती है उसके चारों हाथों में क्रम से वर तथा अभय दान की मुद्रा एवं कमल तथा लड्डू होते हैं । सूर्य की जो सात्त्विक मूर्त्ति होती है उसके चारों हाथों में क्रम से कमल, माला, अभय तथा वरदान की मुद्रा होती है ।
वीणालुङ्गाभयवर-करा सत्त्वगुणा श्रियः ॥ १५०॥
लक्ष्मी की सात्त्विक मूर्त्ति में चारों हाथों में क्रम से वीणा, लुङ्ग, अभय तथा वरदान मुद्रा होती है ।
शङ्खचक्रगदापद्मैरायुधैरादितः पृथक् ।
षट्षड्भेदाश्च मूर्तीनां विष्ण्वादीनां भवन्ति हि ॥ १५१ ॥
विष्णु आदि देवताओं की मूर्त्तियों के प्रथम से लेकर चतुर्थ पर्यन्त चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म और आयुधों के धारण करने में भिन्नता होने से ६-६ भेद होते हैं ।
यथोपाधिप्रभेदेन ससंयोगविभागतः ।
समस्तव्यस्तवर्णादिभेदज्ञानं प्रजायते ॥ १५२ ॥
मूर्त्तियों की जैसी उपाधि (नाम) है उसके अनुसार भेद होने से और वाहन तथा अक्षादियों के संयोग तथा पृथक्ता होने से, समस्त तथा पृथक् पृथक् रूप से वर्णादियों का भेद ज्ञात होता है ।
लेख्या लेप्या सैकती च मृन्मया पैष्टिकी तथा ।
एतासां लक्षणाभावे न कश्चिद्दोष ईरितः ॥ १५३॥
**लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश—**चित्र, लेप, बालू, मिट्टी, तथा चूर्ण-चावल आदि के चूर्ण की पिष्टि (पीठी) के द्वारा बनी हुई इन मूर्त्तियों में शास्त्रानुसार सिद्ध किसी लक्षण की न्यूनता होने पर भी कोई इसमें दोष नहीं मानते हैं अर्थात् यथारुचि बनाई जा सकती हैं ।
बाणलिङ्गे स्वयम्भूते चन्द्रकान्तसमुद्भवे ।
रत्नजे गण्डकोद्भूते मानदोषो न सर्वथा ॥ १५४ ॥
चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१
चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१
पाषाणधातुजायां तु मानदोषान् विचिन्तयेत् ।
**प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश—**स्वयं प्रगट, चन्द्रकान्त मणि से उत्पन्न, रत्न से उत्पन्न, गण्डक नदी से उत्पन्न शालिग्राम, ये सब बाणलिङ्ग कहे जाते हैं इन सब मूर्त्तियों में पूर्वोक्त मानसम्बन्धी दोषों का विचार सर्वथा नहीं करना चाहिये । किन्तु पाषाण तथा धातु-निर्मित मूर्त्तियों में मानविषयक दोषों का विचार करना ही चाहिये ।
श्वेतपीतारक्तकृष्णपाषाणैर्युगभेदतः । ॥ १५५ ॥
प्रतिमां कल्पयेच्छिल्पी यथारुच्यपरैः स्मृता ।
**युगभेद से वर्ण भेद का कथन—**मूर्त्तिकार युगभेदानुसार श्वेत, पीत, किंचित् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के पत्थरों से मूर्त्ति का निर्माण करे । और इनसे अन्य काष्ठ आदि से अपनी रुचि के अनुसार मूर्त्ति का बर्त्तन बनावे ।
श्वेता स्मृता सात्त्विकी तु पीता रक्ता तु राजसी ॥ १५६ ॥
तामसी कृष्णवर्णा तु युक्तलक्ष्मयुता यदि ।
**वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश—**पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त मूर्त्ति यदि श्वेत वर्ण की हो तो 'सात्त्विकी' पीत या रक्त वर्ण की हो तो 'राजसी' और कृष्ण वर्ण की हो तो 'तामसी' कहलाती है ।
सौवर्णी राजती ताम्री रैतिकी वा कृतादिषु ॥ १५७ ॥
**युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश—**और सत्ययुग आदि (त्रेता, द्वापर, कलि) युगों में क्रम से सुवर्ण, चांदी, तामा तथा पीतल की मूर्त्तियां बनानी चाहिये ।
शांकरी श्वेतवर्णा वा कृष्णवर्णा तु वैष्णवी ।
सूर्यशक्तिगणेशानां ताम्रवर्णा स्मृताऽपि च ॥ १५८ ॥
लौही सीसमयी वापि यथोद्दिष्टा स्मृता बुधैः ।
शंकर की मूर्त्ति श्वेत वर्ण की, विष्णु की मूर्त्ति कृष्ण वर्ण की, सूर्य, शक्ति तथा गणेश की मूर्त्ति ताम्र वर्ण की अथवा लोहा तथा सीसा की शास्त्रानुसार बनाने के लिये कही हुई है ।
चलाच्चार्यां स्थिराच्चार्यां प्रासादाद्युक्तलक्षणाम् ॥ १५६ ॥
प्रतिमां स्थापयेन्नान्यां सर्वसौख्यविनाशिनीम् ।
**अयुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध—**थोड़े दिन के लिये अथवा चिर दिन के लिये पूजनार्थ प्रासाद (मन्दिर) आदि में पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त प्रतिमा का स्थापन करना चाहिये । इससे अन्य प्रकार की मूर्त्ति की स्थापना नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह सब सुखों को नष्ट करनेवाली होती है ।
सेव्यसेवकभावेषु प्रतिमालक्षणं स्मृतम् ॥ १६० ॥
२६२ | शुक्रनीतिः
जहां सेव्य-सेवक भाव है अर्थात् प्रतिमा पूजा करने के लिये बनाई जाती है वहां के लिये ही प्रतिमा के उक्त लक्षण बताये गये हैं अर्थात् जहां आमोद-प्रमोद के लिये बनाई गई है वहां के लिये उक्त नियम नहीं है।
प्रतिमायाश्च ये दोषा ह्यर्चकस्य तपोबलात् ।
सर्वेश्वरचित्तस्य नाशं यान्ति क्षणात् किल ॥ १६१ ॥
**भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश—**और प्रतिमा के जो उक्त दोष हैं वे हर प्रकार से ईश्वर में अनुरक्त चित्तवाले भक्त पूजनकर्त्ता के तपोबल से क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं अर्थात् उनके लिये दोष नहीं घटित होते हैं।
देवतायाश्च पुरतो मण्डपे वाहनं न्यसेत् ।
द्विबाहुर्गरुडः प्रोक्तः सुचक्षुः स्वक्षिपक्षयुक् ॥ १६२ ॥
नराकृतिश्चञ्चुमुखो मुकुटी कवचाङ्गदी ।
बद्धाञ्जलिर्नम्रशीर्षः सेव्यपादाब्जलोचनः ॥ १६३ ॥
**वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश—**देवता की मूर्ति के आगे मण्डप में उनके वाहन की मूर्ति रखनी चाहिये। और विष्णु के वाहन गरुड की मूर्ति में दो बाहु, चोंच, दो आँख, दो पक्ष सुन्दर रीति से बनानी चाहिये। एवं मुख के स्थान पर चोंच बनाकर शेष अङ्ग मनुष्य की भांति बनाना चाहिये। और मुकुट, कवच तथा अङ्गद (बाजू बन्द) आभूषण से युक्त, अञ्जलि बांधे हुये, सिर झुकाये तथा अपने सेव्य देवता के चरण कमलों की तरफ दृष्टि किये हुये बनाना चाहिये।
वाहनत्वं गता ये ये देवतानां च पक्षिणः ।
कामरूपधरास्ते ते यथा सिंहवृषादयः ॥ १६४ ॥
देवताओं के वाहन-भाव को प्राप्त हुये जो पक्षी या सिंह तथा वृष (बैल) आदि हैं वे सब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं।
स्वनामाकृतयश्चैते कार्या दिव्या बुधैः सदा ।
सुभूषिता देवताग्रमण्डपे ध्यानतत्पराः ॥ १६५ ॥
विद्वानों को देवता के मण्डप में उनके आगे ध्यान लगाये हुये, दिव्य सुन्दर रीति से अलङ्कृत किये हुये, अपने नामानुरूप आकृतिवाले उक्त वाहन सदा बनाने चाहिये।
मार्जारकृतिकः पीतः कृष्णचिह्नो बृहद्वपुः ।
असटो व्याघ्र इत्युक्तः सिंहः सूक्ष्मकटिर्महान् ॥ १६६ ॥
बृहद्भूगण्डनेत्रस्तु भालरेखो मनोहरः ।
सटावान् धूसरोऽकृष्णलाञ्छनश्च महाबलः ॥ १६७ ॥
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६३
जो बिल्ली के समान आकृतिवाला पीत वर्ण का, काले चिह्नों से युक्त, ह्रस्व शरीर वाला, कन्धे के बालों (जटा) से रहित पशु होता है उसे 'व्याघ्र' कहते हैं और सिंह की कमर पतली तथा शरीर भारी होता है। पूर्व भौंह, गण्डस्थल तथा नेत्र बड़े होते हैं। भाल पर रेखायें होती हैं। यह देखने में सुन्दर तथा कन्धे पर बड़े २ बालों से युक्त, धूसर वर्ण का काले चिह्नों से रहित बड़ा बलवान् पशु होता है।
भेदः सटाल्लञ्छनतो नाकृत्या व्याघ्रसिंहयोः ।
व्याघ्र तथा सिंह में केवल कन्धे पर जटा (बड़े-बड़े बाल) का तथा काले लान्छन का भेद होता है। आकार दोनों के समान ही होते हैं।
गजाननं नराकारं ध्वस्तकणं पृथूदरम् ॥ १६८ ॥
बृहत्संक्षिप्तगहन-पीनस्कन्धाङ्घ्रिपाणिनम् ।
बृहच्छुण्डं भग्नवामरदमीप्सितवाहनम् ॥ १६९ ॥
ईषत्कुटिलदण्डाग्रवामशुण्डमदक्षिणम् ।
सन्ध्यस्थिधमनीगूढं कुर्यान्मानमितं सदा ॥ १७० ॥
**गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण—**गणेश जी की मूर्ति में मुख हाथी के समान तथा अन्य अङ्ग मनुष्य के समान बनाना चाहिये। कान—हाथी के समान लम्बा-चौड़ा, उदर—स्थूल, बृहत्, संक्षिप्त, घन और स्थूल स्कन्ध, चरण तथा हाथ बनाने चाहिये। एवम् शूंड़—लम्बी, बायाँ दांत टूटा हुआ और इच्छानुसार वाहन बनाना चाहिये। शुण्ड का दण्ड अग्रभाग में बाईं ओर कुछ मुड़ा हुआ होना चाहिये, दक्षिण ओर नहीं होना चाहिये। और सन्धि, अस्थि तथा धमनी नहीं दिखाई पड़नी चाहिये। इस भाँति शास्त्रोक्त प्रमाणानुसार सदा मूर्ति बनाना चाहिये।
सार्धचतुस्तालमितः शुण्डादण्डः समस्ततः ।
दशाङ्गुलं मस्तकं च भ्रूगण्डश्चतुरङ्गुलः ॥ १७१ ॥
सम्पूर्ण सूंड की लम्बाई साढ़े चार ताल (विस्तृत अंगूठा से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त एक ताल होता है) प्रमाण, मस्तक-दश अंगुल प्रमाण, भौंह तथा गण्ड स्थल चार अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये।
नासोत्तरोष्ठरूपा च शेषा शुण्डा सपुष्करा ।
दशाङ्गुलं कर्णदैर्घ्यं तदष्टाङ्गुलविस्तृतम् ॥ १७२ ॥
नासिका तथा ऊपर का ओष्ठ इन दोनों के स्थान पर शूंड़ ही होती है। और शूंड़ का मूल भाग उत्तरोष्ठ रूप समझना चाहिये तथा अवशिष्ट पुष्कर (शुण्ड का अग्रभाग) सहित शूंड़ का भाग समझना चाहिये। कान की लम्बाई दश अंगुल की और चौड़ाई आठ अंगुल की होनी चाहिये।
| २६४ | शुक्रनीतिः |
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कर्णयोरन्तरे व्यासो द्व्यङ्गुलस्तालसम्मितः ।
मस्तकेऽस्यैव परिधिर्ज्ञेयः षट्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७३ ॥
दोनों कानों के अन्तर का व्यास १ ताल २ अंगुल प्रमाण का होना चाहिये। मस्तक में इस (कान) की परिधि छत्तीस अंगुल की होनी चाहिये।
नेत्रोपान्ते च परिधिः शीर्षतुल्यः सदा मतः ।
सद्व्यङ्गुलद्वितालः स्यान्नेत्राधः परिधिः करे ॥ १७४ ॥
कराग्रे परिधिर्ज्ञेयः पुष्करे च दशाङ्गुलः ।
त्र्यङ्गुलं कण्ठदैर्घ्यं तत्परिधिस्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७५ ॥
दोनों नेत्रों के उपान्त भाग की परिधि सदा मस्तक के तुल्य होनी चाहिये। नेत्रों के नीचे भाग की परिधि दो ताल तथा दो अंगुल प्रमाण की होनी चाहिये। शूंढ में शूंढ का अग्रभाग तथा पुष्कर में दश अंगुल प्रमाण की परिधि होनी चाहिये। कण्ठ की लम्बाई तीन अंगुल की एवं उसकी परिधि तीस अंगुल की होनी चाहिये।
परिणाहस्तूदरे च चतुस्तालात्मकः सदा ।
षडङ्गुलो नियोक्तव्योऽष्टाङ्गुलो वापि शिल्पिभिः ॥ १७६ ॥
उदर की लम्बाई सदा छः अथवा आठ अंगुल अधिक चार ताल प्रमाण की शिल्पी (मूर्तिकार) को बनानी चाहिये।
दन्तः षडङ्गुलो दीर्घस्तन्मूलपरिधिस्तथा ।
षडङ्गुलश्चाधरोष्ठः पुष्करं कमलान्वितम् ॥ १७७ ॥
दांत की लम्बाई छः अंगुल प्रमाण तथा उसके मूल भाग की परिधि भी उसी भांति (छः अंगुल प्रमाण) की बनानी चाहिये। अधरोष्ठ छः अंगुल का तथा पुष्कर कमल से युक्त बनाना चाहिये।
ऊरुमूलस्य परिधिः षट्त्रिंशदङ्गुलो मतः ।
त्रयोविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिस्तथा ॥ १७८ ॥
ऊरुमूल की परिधि छत्तीस अंगुल की और ऊरुवों के अग्रभाग की परिधि तेइस अंगुल की बनानी चाहिये।
जङ्घामूले तु परिधिर्विंशत्यङ्गुलसंमितः ।
परिधिर्बाहुमूलादेरधिको द्व्यङ्गुलोऽङ्गुलः ॥ १७९ ॥
जंघामूल की परिधि बीस अंगुल की और बाहु के मूलभाग की परिधि उससे दो अंगुल अधिक (२२ अंगुल) तथा अग्रभाग की अङ्गुल भर अधिक (२१ अङ्गुल) प्रमाण की होनी चाहिये।
कर्णनेत्रान्तरं नित्यं विज्ञेयं चतुरङ्गुलम् ।
मूलमध्याग्रमान्तरं तु दशसप्तषडङ्गुलम् ॥ १८० ॥
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६५
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६५
नेत्रयोः कथितं तज्ज्ञैर्गणपस्य विशेषतः।
कर्ण और नेत्र का अन्तर सदा चार अङ्गुल का समझना चाहिये। दोनों नेत्रों के मूल, मध्य तथा अग्रभाग का अन्तर क्रम से दश, सात तथा छः अङ्गुल प्रमाण का विद्वानों ने गणेश की मूर्त्ति के संबन्ध में कहा है।
उत्सेधः पृथुता स्त्रीणां स्तने पञ्चाङ्गुला मता ॥ १८१ ॥
स्त्रीकट्यां परिधिः प्रोक्तस्त्रितालो द्व्यङ्गुलाधिकः।
स्त्रीणःमवयवान् सर्वान् सप्ततालैर्विभावयेत् ॥ १८२ ॥
स्त्रियों के अवयवों का प्रमाण—स्त्री-मूर्त्तियों में स्तन की ऊंचाई तथा मुटाई पांच अङ्गुल प्रमाण की होनी चाहिये। स्त्री-मूर्त्ति में कमर की परिधि दो अङ्गुल अधिक तीन ताल प्रमाण की कही हुई है। और स्त्री-मूर्त्तियों में सम्पूर्ण अङ्गों का प्रमाण मिलाकर योग सात ताल प्रमाण होना चाहिये।
सप्ततालादिमानेऽपि मुखं स्याद् द्वादशाङ्गुलम् ।
बालादीनामपि सदा दीर्घता तु पृथक् पृथक् ॥ १८३ ॥
सबों के मुख का प्रमाण—इनका सात ताल आदि प्रमाण होने पर भी मुख का प्रमाण बारह ही अङ्गुल का होता है। और बाला आदि मूर्त्तियों के भेदों की लम्बाई सदा पृथक्-पृथक् समझनी चाहिये।
शिशोस्तु कन्धरा ह्रस्वा पृथु शीर्षं प्रकीर्त्तितम् ।
कण्ठाधो वर्धते यादृक् तादृक्शीर्षं न वर्धते ॥ १८४ ॥
बालक-प्रतिमा के अवयवों का प्रमाण—शिशु-मूर्त्ति की ग्रीवा छोटी और शिर बड़ा बनाना चाहिये, क्योंकि जैसा कण्ठ के नीचे का भाग बढ़ता है वैसा सिर नहीं बढ़ता है।
कण्ठाधोमुखमानेन बालः सार्धचतुर्गुणः।
द्विगुणः शिश्नपर्यन्तो ह्यधः शेषं तु सक्थितः ॥ १८५ ॥
सपादद्विगुणौ हस्तौ द्विगुणौ वा मुखेन हि ।
स्थौल्ये तु नियमो नास्ति यथाशोभि प्रकल्पयेत् ॥ १८६ ॥
बाल-मूर्त्ति में मुख के प्रमाण की अपेक्षा कण्ठ के नीचे का भाग ४॥ गुना बड़ा होता है। उसमें शिश्न पर्यन्त भाग लंबाई में मुख से दुगुना बड़ा होता है। और शेष जंघा से लेकर नीचे का सारा भाग २। गुना अधिक बड़ा होता है। और मुख की अपेक्षा दोनों हाथ २। गुने अथवा दुगुने लम्बे होते हैं। किन्तु मुटाई में कोई नियम नहीं है उसे जिस प्रकार से देखने में सुन्दर लगे वैसा बनाना चाहिये।
नित्यं प्रवर्धते बालः पञ्चाब्दात् परतो भृशम् ।
| २६६ | शुक्रनीतिः |
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स्यात् षोडशेऽब्दे सर्वाङ्ग-पूर्णा स्त्री विंशतौ पुमान् ॥ १८७ ॥
शरीर की पूर्णता होने का वर्ष-प्रमाण— बालक पांच वर्ष तक नित्य धीरे-धीरे बढ़ता है किन्तु पांच वर्ष के बाद अत्यन्त तेजी से बढ़ता है। स्त्री १६ वर्ष की अवस्था में सर्वाङ्गों से परिपूर्ण होती है किन्तु पुरुष २० वर्ष की अवस्था में परिपूर्ण अङ्गवाला होता है।
ततोऽर्हति प्रमाणं तु सप्ततालादिकं सदा ।
कश्चिद् बाल्येऽपि शोभाढ्यस्तारुण्ये वार्धके क्वचित् ॥ १८८॥
इससे सदा युवावस्था होने पर ही सात ताल आदि प्रमाण की योग्यता होती है। और कोई बाल्यावस्था में भी शोभायुक्त होता है, और कोई युवावस्था में एवं क्वचित् कोई वृद्धावस्था में शोभायुक्त होता है।
मुखाधस्त्र्यङ्गुला ग्रीवा हृदयं तु नवाङ्गुलम् ।
तथोदरं च बस्तिश्च सक्थि त्वष्टादशाङ्गुलम् ॥ १८९ ॥
त्र्यङ्गुलं तु भवेज्जानु जङ्घा त्वष्टादशाङ्गुला ।
गुल्फाधस्त्र्यङ्गुलं ज्ञेयं सप्ततालस्य सर्वदा ॥ १९० ॥
सप्त ताल प्रमाण की मूर्त्ति के अवयवों का प्रमाण— मुख के नीचे भाग में ग्रीवा तीन अङ्गुल प्रमाण की। हृदय (वक्षः स्थल) नव अंगुल प्रमाण का तथा उदर और बस्ति (नाभि के नीचे का भाग) भी नव अंगुल प्रमाण का, ऊरु अठारह अङ्गुल प्रमाण का, जानु तीन अंगुल प्रमाण का, जङ्घा अठारह अंगुल प्रमाण की, गुल्फ के नीचे का भाग तीन अंगुल प्रमाण का, सात ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति में सदा होता है।
वेदाङ्गुलं भवेद् ग्रीवा हृदयं तु दशाङ्गुलम् ।
दशाङ्गुलं चोदरं स्याद् बस्तिश्चैव दशाङ्गुलः ॥ १९१ ॥
एकविंशाङ्गुलं सक्थि जानु स्याच्चतुरङ्गुलम् ।
एकविंशाङ्गुला जङ्घा गुल्फाधश्चतुरङ्गुलम् ॥ १९२ ॥
अष्टतालप्रमाणस्य मानमुक्तमिदं सदा ।
चार अंगुल की ग्रीवा, दस अंगुल का हृदय, दस अंगुल का उदर तथा दस अंगुल की बस्ति, इक्कीस अंगुल की ऊरु, बारह अंगुल का जानु, इक्कीस अंगुल की जंघा, चार अंगुल का गुल्फ के नीचे का भाग इस भांति से आठ ताल प्रमाणवाली मूर्त्ति के अङ्गों के प्रमाण होते हैं।
त्रयोदशाङ्गुलं ज्ञेयं मुखं च हृदयं तथा ॥ १९३ ॥
उदरं च तथा बस्तिर्दशतालेषु सर्वदा ।
दस ताल प्रमाणवाली मूर्त्तियों में सदा मुख, हृदय, उदर तथा बस्ति प्रत्येक तेरह अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६७
गुल्फाधश्च तथा ग्रीवा जानु पञ्चाङ्गुलं स्मृतम् ॥ १९४ ॥
षड्विंशत्यङ्गुलं सक्थि तथा जङ्घा प्रकीर्त्तिता ।
और गुल्फ के नीचे का भाग, ग्रीवा, जानु प्रत्येक पांच अंगुल प्रमाण का, तथा ऊरु और जंघा प्रत्येक छब्बीस अंगुल प्रमाण का होना चाहिये ।
एकाङ्गलो मूर्ध्नि मणिर्दशताले प्रकल्पेत् ॥ १९५ ॥
पञ्चाशदङ्गुलौ बाहू दशताले स्मृतौ सदा ।
और इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में सिर की मणि एक अंगुल प्रमाण की, तथा दोनों बाहु पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के सदा होने चाहिये ।
द्व्यङ्गुलौ द्व्यङ्गुलौ चोनौ ततो हीनप्रमाणके ॥ १९६ ॥
पाटवं तु यथाशोभि सर्वमानेषु कल्पयेत् ।
इससे (दश ताल से ) हीन प्रमाणवाली मूर्त्ति में प्रत्येक बाहु का प्रमाण दो-दो अंगुल कम होना चाहिये । और सभी प्रकार के प्रमाणों में अङ्गों की सजावट शोभानुसार करनी चाहिये ।
नवतालप्रमाणे न ह्यूनाधिक्यं प्रकल्पयेत् ॥ १९७ ॥
और नव ताल प्रमाण की मूर्त्ति में अङ्गों के प्रमाण में कमी-बेशी नहीं करनी चाहिये ।
दशताले तु विज्ञेयौ पादौ पञ्चदशाङ्गुलौ ।
एकैकाङ्गुलहीनौ ः स्तस्ततो न्यूनप्रमाणके ॥ १९८ ॥
इस ताल प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर पृथक्-पृथक् पन्द्रह अंगुल प्रमाण के बनाने चाहिये । इससे हीन प्रमाण की मूर्त्ति में दोनों पैर एक-एक अंगुल कम प्रमाण के होने चाहिये ।
दशतालोर्ध्वमानं तु ताले तालेऽधिकाङ्गुलम् ।
कल्पयेन्मुखतो धीमान् शिल्पवित्सु यथा तथा ॥ १९९ ॥
दश ताल से अधिक प्रमाण की मूर्त्ति में प्रत्येक ताल पर एक २ अंगुल अधिक प्रमाण अंगों का करना चाहिये । और बुद्धिमान मूर्तिकार को मुख से आरम्भ कर पैर पर्यन्त अङ्ग जिस भांति से सुन्दर हो सके वैसा बनाना चाहिये ।
दीर्घोरुजङ्घा विकटा क्रूरा स्याद् भीषणाऽऽसुरी ।
पैशाची प्रतिमा ज्ञेया राक्षसी सुकृशाऽपि वा ॥ २०० ॥
आसुरी आदि मूर्तियों के लक्षण— जिस मूर्त्ति की ऊरु तथा जंघा दीर्घ (लम्बी), हो एवं वह देखने में विकट, क्रूर तथा भीषण आकारवाली हो तो उसे 'आसुरी' और उक्त लक्षणों से युक्त होती हुई जो मूर्त्ति अत्यन्त कृश हो उसे 'पैशाची' अथवा 'राक्षसी' समझनी चाहिये ।
| २६८ | शुक्रनीतिः |
|---|
न पञ्चाङ्गुलतो हीना न षडङ्गुलतोऽधिकाः।
करस्य मध्यमा प्रोक्ता सर्वमानेषु तद्विदैः ॥ २०१ ॥
सभी प्रमाण की मूत्ति में हाथ की मध्यमा अंगुलि पांच अंगुल से कम तथा छः अंगुल से अधिक प्रमाण की नहीं बनानी चाहिये ऐसा मूर्ति-कला के विद्वान लोग कहते हैं।
क्वचित्तु बालसदृशं सदैव तरुणं वयः।
मूर्तीनां कल्पयेच्छिल्पी न वृद्धसदृशं क्वचित् ॥ २०२ ॥
शिल्पी को कभी मूर्त्तियों की वृद्धसदृश कल्पना न करने का निर्देश—
मूर्तिकार कहीं पर बालक के समान और कहीं युवा के समान मूर्ति बनावे किन्तु कहीं पर भी वृद्ध के समान मूर्त्ति न बनावे ।
एवंविधान् नृपो राष्ट्रे देवान् संस्थापयेत् सदा ।
प्रतिसंवत्सरे तेषामुत्सवान् सम्यगाचरेत् ॥ २०३ ॥
**राजा को उक्त देवताओं का स्थापन करके प्रतिवर्ष उनका उत्सव करने का निर्देश—**राजा अपने राज्य के अन्दर इसी भांति से बनी देव-मूर्तियों को सदा स्थापना करे । और प्रतिवर्ष उनके उत्सव भलीभांति करे ।
देवालये मानहीनां मूर्तिं भग्नां न धारयेत् ।
प्रासादांश्च तथा देवान् जीर्णानुद्धृत्य यत्नतः ॥ २०४ ॥
देवतां तु पुरस्कृत्य नृत्यादीन् वीक्ष्य सर्वदा ।
न मनः स्त्रोपभोगार्थं विदध्यादु यत्नतो नृपः ॥ २०५ ॥
**मानहीन और भग्न प्रतिमा को रखने का निषेध—**और देवमन्दिर में उक्त प्रकार के प्रमाणों से हीन प्रमाण की अथवा खण्डित मूर्ति को न रहने दे । तथा देवता और उनके मन्दिरों के जीर्ण हो जाने पर उनका यत्नपूर्वक पुनः संस्कार करते हुये और सदा देवताओं के आगे नृत्यादि देखते हुये, राजा यत्नपूर्वक अपने राजोचित भोग भोगने में मनको न प्रवृत्त करे ।
प्रजाभिर्विहिता ये ये ह्युत्सवास्तांश्च पालयेत् ।
प्रजानन्देन संतुष्येत् तद्दुःखैर्दुःखितो भवेत् ॥ २०६ ॥
इति शुक्रनीतौ राष्ट्रमध्यं चतुर्थाध्यायस्य लोकधर्मनिरूपणं नाम चतुर्थं प्रकरणं समाप्तम् ॥ ४ ॥
**प्रजाकृत उत्सवों का सदैव पालने करने का निर्देश—**और प्रजाओं द्वारा जो २ उत्सव किये जाते हों उनकी रक्षा करे एवं प्रजाओं के आनन्द से आनन्दित तथा दुःख से स्वयं दुःखित हो ।
इस प्रकार शुक्रनीति-भाषाटीका में राष्ट्र का मध्य चतुर्थाध्याय का लोकधर्मनिरूपण-नामक चतुर्थ प्रकरण समाप्त हुआ ।
चतुर्थाध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६९
चतुर्थाध्यायस्य पञ्चमं प्रकरणं राजधर्मनिरूपणम्
दुष्टनिग्रहणं कुर्याद् व्यवहारानुदर्शनैः ।
स्वाज्ञया वर्तितुं शक्त्या स्वाधीना च सदा प्रजा ॥ १ ॥
राजा को प्रजा-सुख से सुखी और प्रजा-दुःख से दुखी होने का निर्देश—
विचार के विषय उपस्थित होने पर उसका भलीभांति विचार कर जो दुष्ट हों उनका निग्रह करना चाहिये । ऐसा करने से प्रजा सदा राजा के अधीन रहती है और उसकी आज्ञा के अनुसार कार्य करने में समर्थ होती है । अर्थात् प्रजा जिस प्रकार से स्वेच्छापूर्वक व्यवहार न करे, वैसा करना चाहिये ।
स्वेष्टहानिकरः शत्रुर्दृष्टः पापप्रचारवान् ।
इष्टसंपादनं न्याय्यं प्रजानां पालनं हि तत् ॥ २ ॥
शत्रु, दुष्ट तथा प्रजापालन के लक्षण— अपने अभीष्ट की हानि करनेवाला 'शत्रु' और आचरण द्वारा पाप का प्रचार करनेवाला 'दुष्ट' कहलाता है । और न्यायपूर्वक प्रजा का अभीष्ट सिद्ध करना ही प्रजा का 'पालन' कहलाता है ।
शत्रोरनिष्टकरणान्निवृत्तिः शत्रुनाशनम् ।
पापाचारनिवृत्तिर्यैर्दुष्टनिग्रहणं हि तत् ॥ ३ ॥
शत्रुनाश और दुष्टनिग्रह का लक्षण— शत्रु को अनिष्ट करने से निवृत्त कर देना ही 'शत्रु का नाश' और पापाचरण से निवृत्त करना 'दुष्ट का निग्रह' कहलाता है ।
स्वप्रजाधर्मसंस्थानं सदसत्प्रविचारतः ।
जायते चार्थसंसिद्धिर्व्यवहारस्तु येन सः ॥ ४ ॥
व्यवहार-लक्षण— जिसके द्वारा सत् और असत् विषय का अच्छी तरह से विचार करने से अपनी प्रजा की धर्म में स्थिति तथा कार्यों की भलीभांति सिद्धि होती है, उसे 'व्यवहार-मुकदमा' कहते हैं ।
धर्मशास्त्रानुसारेण क्रोधलोभविवर्जितः ।
सप्राड्विवाकः सामात्यः सब्राह्मणपुरोहितः ॥ ५ ॥
समाहितमतिः पश्येद् व्यवहाराननुक्रमात् ।
राजा को प्राड्विवाकादि के साथ व्यवहारों को देखने का निर्देश— राजा क्रोध और लोभ से रहित एवं प्राड्विवाक ( पूछनेवाला और उस पर विचार करनेवाला ), अमात्य, ब्राह्मण और पुरोहित के साथ सावधान होकर न्यायार्थ उपस्थित व्यवहारों को क्रमानुसार देखे ।
नैकः पश्येच्च कार्याणि वादिनोः शृणुयाद्वचः ॥ ६ ॥
रहसि च नृपः प्राज्ञः सभ्याश्चैव कदाचन ।
| २७० | शुक्रनीतिः |
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बुद्धिमान राजा अथवा न्याय-सभा के सदस्यगण अकेले एकान्त में वादी-प्रतिवादी के कार्यों (मुकदमों) को कभी न देखे और न उनकी बातों को सुने ।
पक्षपाताधिरोपस्य कारणानि च पञ्च वै ॥ ७ ॥
रागलोभभयद्वेषा वादिनोश्च रहःश्रुतिः ।
पक्षपात के ५ कारणों का निर्देश— पक्षपात रूप दोष के निश्चित रूप से ये ५ कारण हैं—१. राग, २. लोभ, ३. भय, ४. द्वेष, ५. वादी-प्रतिवादी की एकान्त में बातें सुनना ।
पौरकार्याणि यो राजा न करोति सुखे स्थितः ॥ ८ ॥
व्यक्तं स नरके घोरे पच्यते नात्र संशयः ।
राजा के अनिष्टकारक हेतुओं का निर्देश— जो राजा सुखभोग में आसक्त रहकर पुरवासी-प्रजाजनों का हित-कार्य मुकदमा आदि देखना, नहीं करता है । वह भविष्य में निश्चित घोर नरक का दुःख भोगेगा । इसमें सन्देह नहीं है ।
यस्त्वधर्मेण कार्याणि मोहात् कुर्यान्नराधिपः ॥ ९ ॥
अचिरात्तं दुरात्मानं वशे कुर्वन्ति शत्रवः ।
जो राजा मूढतावश अधर्म कार्यों को करता है उस दुरात्मा को शत्रु लोग शीघ्र अपने वश (अधीन) कर लेते हैं ।
अस्वर्ग्या लोकनाशाय परानीकभयावहा ॥ १० ॥
आयुर्बौजहरी राज्ञामस्ति वाक्ये स्वयंकृतिः ।
वादी-प्रतिवादी जनों की बातों को सुनकर राजा यदि सभासदों की राय लिये बिना स्वयं कोई निर्णय करता है तो उससे उसे नरक की प्राप्ति, प्रजाओं का नाश, शत्रुसेनाओं से भय (शत्रुओं की वृद्धि) आयु का क्षय इत्यादि होते हैं ।
तस्माच्छास्त्रानुसारेण राजा कार्याणि साधयेत् ॥ ११ ॥
इससे राजा को शास्त्रानुसार कार्यों (मुकद्दमों) को भलीभांति देखना चाहिये ।
यदा न कुर्यान्नृपतिः स्वयं कार्यविनिर्णयम् ।
तदा तत्र नियुञ्जीत ब्राह्मणं वेदपारगम् ॥ १२ ॥
दान्तं कुलीनं मध्यस्थमनुद्वेगकरं स्थिरम् ।
परत्र भीरुं धर्मिष्ठमुयुक्तं क्रोधवर्जितम् ॥ १३ ॥
स्वयं कार्य-निर्णय न कर सकने पर योग्य ब्राह्मण को नियुक्त करने का राजा को निर्देश— जब राजा स्वयं कार्यों (मुकद्दमों) का निर्णय न करे तब
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१
चतुर्थोऽध्याये राजधर्मनिरूपणप्रकरणम् २७१
उसके लिये वेद का अच्छा ज्ञाता, इन्द्रियों का दमन करनेवाला, कुलीन, पक्षपात न करनेवाला, शान्त प्रकृतिवाला, चञ्चलता से रहित, परलोक से डरनेवाला, धार्मिक, उद्योगी और क्रोध से रहित ऐसे ब्राह्मण को नियुक्त करे ।
यदा विप्रो न विद्वान् स्यात् क्षत्रियं तत्र योजयेत् ।
वैश्यं वा धर्मशास्त्रज्ञं शूद्रं यत्नेन वर्जयेत् ॥ १४ ॥
ब्राह्मण न मिलने पर क्षत्रियादि नियुक्त करने का एवं शूद्र को न नियुक्त करने का निर्देश— जब वैसा विद्वान ब्राह्मण न मिले तब उसके लिये (निर्णय के लिये) पूर्वोक्त गुणों से युक्त धर्मशास्त्र का जाननेवाला क्षत्रिय अथवा वैश्य को नियुक्त करे किन्तु शूद्र को यत्नपूर्वक निर्णय के लिये त्याग कर दे अर्थात् उसको नियुक्त न करे ।
यद्वर्णजो भवेद्राजा योष्यस्तद्वर्णजः सदा ।
तद्वर्णे एव गुणिनः प्रायशः सम्भवन्ति हि ॥ १५ ॥
जिस जाति का राजा स्वयं हो निर्णय करने के लिये अपना प्रतिनिधि उसी जाति के व्यक्ति को सदा चुने । क्योंकि प्रायः करके राजा की जाति में ही गुणवान् लोग उत्पन्न होते हैं ।
व्यवहारविदः प्राज्ञा वृत्तशीलगुणान्विताः ।
रिपौ मित्रे समा ये च धर्मज्ञाः सत्यवादिनः ॥ १६ ॥
निरालसा जितक्रोध-कामलोभाः प्रियंवदाः ।
राज्ञा नियोजितव्यास्ते सभ्याः सर्वासु जातिषु ॥ १७ ॥
सभासद् के लक्षण— व्यवहार (मुकदमा देखने की रीति) के जाननेवाले, बुद्धिमान, चरित्र, शील तथा गुण से युक्त, शत्रु तथा मित्र के साथ समान व्यवहार करनेवाले (राग-द्वेष से रहित), धर्म के जाननेवाले, सत्यवादी, आलस्य से रहित, क्रोध, काम तथा लोभ को जीतनेवाले, प्रिय वचन बोलनेवाले ऐसे सभी जातियों के व्यक्तियों को राजा द्वारा विचार-सभा का सदस्य (जूरी) नियुक्त करना चाहिये ।
कीनाशाः कारुकाः शिल्पिकुसीदिश्रेणिनर्तकाः ।
लिङ्गिनस्तस्कराः कुर्युः स्वेन धर्मेण निर्णयम् ॥ १८ ॥
अशक्यो निर्णयो ह्यन्यैस्तत्तज्ज्ञैरेव तु कारयेत् ।
राजा के द्वारा निर्णयायोग्य पुरुषों के लक्षण— कीनाश (कृषक), कारु (बढ़ई), शिल्पी (कारीगर), सूद खानेवाले, श्रेणि (निकृष्ट जातियों के संघ), नाचनेवाले, लिङ्गी (भाण-योगी आदि) तथा तस्कर (जाति विशेष) ये सब लोग अपने २ धर्म के अनुसार अपनी २ जातियों के विवाद का निर्णय स्वयं पंचायत द्वारा करें, क्योंकि उनकी जाति के धर्म को न जाननेवाले
२७२ | शुक्रनीतिः
अन्य लोगों से निर्णय होना असंभव है, अतः जिस जाति के लोगों का विवाद हो, उसका निर्णय उसी जाति के लोगों से कराना चाहिये ।
आश्रमेषु द्विजातीनां कार्ये विवदतां मिथः ॥ १९ ॥
न विब्रूयान्नृपो धर्मे चिकीर्षुर्हितमात्मनः ।
राजा को द्विजाति आदिकों का स्वयं निर्णय न करने का निर्देश— अपना हित चाहनेवाला राजा ब्रह्मचर्यादि आश्रमों में स्थित होकर परस्पर किसी कार्य को लेकर विवाद करनेवाले द्विजातियों के धर्म के विरुद्ध कुछ न कहे।
तपस्विनां तु कार्याणि त्रैविद्यैरेव कारयेत् ॥ २० ॥
मायायोगविदां चैव न स्वयं कोपकारणात् ।
तपस्वियों एवं माया तथा योग विद्या के जाननेवाले लोगों के विवाद का निर्णय वेद के जाननेवाले ब्राह्मणों द्वारा ही कराना चाहिये, अन्य के द्वारा नहीं, क्योंकि विरुद्ध निर्णय होने पर उन लोगों को कोप होगा अतः उससे बचने के लिये स्वयं निर्णय न करे ।
सम्यग्विज्ञानसम्पन्नो नोपदेशं प्रकल्पयेत् ॥ २१ ॥
उत्कृष्टजातिशीलानां गुर्वाचार्यतपस्विनाम् ।
स्वयं विशिष्ट ज्ञान से युक्त होने पर भी राजा उत्कृष्ट जाति एवं शील से युक्त, गुरु, आचार्य, एवं तपस्वी लोगों को उपदेश न दे ।
आरण्यास्तु स्वकैः कुर्युः सार्थिकाः सार्थिकैः सह ॥ २२ ॥
सैनिकाः सैनिकैरेव ग्रामेऽप्युभयवासिभिः ।
जंगली लोग जंगलियों के द्वारा, संघ बनाकर रहनेवाले अपने संघ के लोगों के द्वारा एवं सैनिक लोग सैनिकों के द्वारा और ग्राम में भी रहनेवाले लोग ग्राम तथा जंगल दोनों में निवास करनेवालों के द्वारा अपने विवाद का निर्णय करावें ।
अभियुक्ताश्च ये यत्र यन्निबन्धियोजनाः ॥ २३ ॥
तत्रत्यगुणदोषाणां त एव हि विचारकाः ।
राजा ने जहां पर जिन्हें नियुक्त कर दिया है, तथा जिस कार्य के लिये जो नियुक्त हुये हैं वेही वहां के गुण तथा दोषों के विचार करनेवाले वस्तुतः होते हैं।
राजा तु धार्मिकान् सभ्यान् नियुञ्ज्यात् सुपरीक्षितान् ॥ २४ ॥
व्यवहारधुरं वोढुं ये शक्ताः पुङ्गवा इव ।
जो अच्छे बैलों के समान विवाद-निर्णय के भार को धारण करने में भलीभांति समर्थ हों तथा पूर्ण रूप से परीक्षित एवं धार्मिक हों उन्हीं लोगों को राजा निर्णायक सभ्य ( जूरी ) बनाये ।