शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context| २६४ | शुक्रनीतिः |
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कर्णयोरन्तरे व्यासो द्व्यङ्गुलस्तालसम्मितः ।
मस्तकेऽस्यैव परिधिर्ज्ञेयः षट्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७३ ॥
दोनों कानों के अन्तर का व्यास १ ताल २ अंगुल प्रमाण का होना चाहिये। मस्तक में इस (कान) की परिधि छत्तीस अंगुल की होनी चाहिये।
नेत्रोपान्ते च परिधिः शीर्षतुल्यः सदा मतः ।
सद्व्यङ्गुलद्वितालः स्यान्नेत्राधः परिधिः करे ॥ १७४ ॥
कराग्रे परिधिर्ज्ञेयः पुष्करे च दशाङ्गुलः ।
त्र्यङ्गुलं कण्ठदैर्घ्यं तत्परिधिस्त्रिंशदङ्गुलः ॥ १७५ ॥
दोनों नेत्रों के उपान्त भाग की परिधि सदा मस्तक के तुल्य होनी चाहिये। नेत्रों के नीचे भाग की परिधि दो ताल तथा दो अंगुल प्रमाण की होनी चाहिये। शूंढ में शूंढ का अग्रभाग तथा पुष्कर में दश अंगुल प्रमाण की परिधि होनी चाहिये। कण्ठ की लम्बाई तीन अंगुल की एवं उसकी परिधि तीस अंगुल की होनी चाहिये।
परिणाहस्तूदरे च चतुस्तालात्मकः सदा ।
षडङ्गुलो नियोक्तव्योऽष्टाङ्गुलो वापि शिल्पिभिः ॥ १७६ ॥
उदर की लम्बाई सदा छः अथवा आठ अंगुल अधिक चार ताल प्रमाण की शिल्पी (मूर्तिकार) को बनानी चाहिये।
दन्तः षडङ्गुलो दीर्घस्तन्मूलपरिधिस्तथा ।
षडङ्गुलश्चाधरोष्ठः पुष्करं कमलान्वितम् ॥ १७७ ॥
दांत की लम्बाई छः अंगुल प्रमाण तथा उसके मूल भाग की परिधि भी उसी भांति (छः अंगुल प्रमाण) की बनानी चाहिये। अधरोष्ठ छः अंगुल का तथा पुष्कर कमल से युक्त बनाना चाहिये।
ऊरुमूलस्य परिधिः षट्त्रिंशदङ्गुलो मतः ।
त्रयोविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिस्तथा ॥ १७८ ॥
ऊरुमूल की परिधि छत्तीस अंगुल की और ऊरुवों के अग्रभाग की परिधि तेइस अंगुल की बनानी चाहिये।
जङ्घामूले तु परिधिर्विंशत्यङ्गुलसंमितः ।
परिधिर्बाहुमूलादेरधिको द्व्यङ्गुलोऽङ्गुलः ॥ १७९ ॥
जंघामूल की परिधि बीस अंगुल की और बाहु के मूलभाग की परिधि उससे दो अंगुल अधिक (२२ अंगुल) तथा अग्रभाग की अङ्गुल भर अधिक (२१ अङ्गुल) प्रमाण की होनी चाहिये।
कर्णनेत्रान्तरं नित्यं विज्ञेयं चतुरङ्गुलम् ।
मूलमध्याग्रमान्तरं तु दशसप्तषडङ्गुलम् ॥ १८० ॥