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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

DevanagariHindipublished526 pages

Page 349 of 526

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Page 349

चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६३

जो बिल्ली के समान आकृतिवाला पीत वर्ण का, काले चिह्नों से युक्त, ह्रस्व शरीर वाला, कन्धे के बालों (जटा) से रहित पशु होता है उसे 'व्याघ्र' कहते हैं और सिंह की कमर पतली तथा शरीर भारी होता है। पूर्व भौंह, गण्डस्थल तथा नेत्र बड़े होते हैं। भाल पर रेखायें होती हैं। यह देखने में सुन्दर तथा कन्धे पर बड़े २ बालों से युक्त, धूसर वर्ण का काले चिह्नों से रहित बड़ा बलवान् पशु होता है।

भेदः सटाल्लञ्छनतो नाकृत्या व्याघ्रसिंहयोः ।

व्याघ्र तथा सिंह में केवल कन्धे पर जटा (बड़े-बड़े बाल) का तथा काले लान्छन का भेद होता है। आकार दोनों के समान ही होते हैं।

गजाननं नराकारं ध्वस्तकणं पृथूदरम् ॥ १६८ ॥
बृहत्संक्षिप्तगहन-पीनस्कन्धाङ्घ्रिपाणिनम् ।
बृहच्छुण्डं भग्नवामरदमीप्सितवाहनम् ॥ १६९ ॥
ईषत्कुटिलदण्डाग्रवामशुण्डमदक्षिणम् ।
सन्ध्यस्थिधमनीगूढं कुर्यान्मानमितं सदा ॥ १७० ॥

**गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण—**गणेश जी की मूर्ति में मुख हाथी के समान तथा अन्य अङ्ग मनुष्य के समान बनाना चाहिये। कान—हाथी के समान लम्बा-चौड़ा, उदर—स्थूल, बृहत्, संक्षिप्त, घन और स्थूल स्कन्ध, चरण तथा हाथ बनाने चाहिये। एवम् शूंड़—लम्बी, बायाँ दांत टूटा हुआ और इच्छानुसार वाहन बनाना चाहिये। शुण्ड का दण्ड अग्रभाग में बाईं ओर कुछ मुड़ा हुआ होना चाहिये, दक्षिण ओर नहीं होना चाहिये। और सन्धि, अस्थि तथा धमनी नहीं दिखाई पड़नी चाहिये। इस भाँति शास्त्रोक्त प्रमाणानुसार सदा मूर्ति बनाना चाहिये।

सार्धचतुस्तालमितः शुण्डादण्डः समस्ततः ।
दशाङ्गुलं मस्तकं च भ्रूगण्डश्चतुरङ्गुलः ॥ १७१ ॥

सम्पूर्ण सूंड की लम्बाई साढ़े चार ताल (विस्तृत अंगूठा से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त एक ताल होता है) प्रमाण, मस्तक-दश अंगुल प्रमाण, भौंह तथा गण्ड स्थल चार अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये।

नासोत्तरोष्ठरूपा च शेषा शुण्डा सपुष्करा ।
दशाङ्गुलं कर्णदैर्घ्यं तदष्टाङ्गुलविस्तृतम् ॥ १७२ ॥

नासिका तथा ऊपर का ओष्ठ इन दोनों के स्थान पर शूंड़ ही होती है। और शूंड़ का मूल भाग उत्तरोष्ठ रूप समझना चाहिये तथा अवशिष्ट पुष्कर (शुण्ड का अग्रभाग) सहित शूंड़ का भाग समझना चाहिये। कान की लम्बाई दश अंगुल की और चौड़ाई आठ अंगुल की होनी चाहिये।