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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

About this granth

The Shukraniti (शुक्रनीति), or Shukranitisara, is a Sanskrit treatise on kingship and government ascribed to Shukracharya, the preceptor of the asuras. It covers the duties of the king, the appointment of ministers and officials, the treasury and taxation, justice, forts, the army and the conduct of war, as well as social conduct, town planning and the making of images. Its date is disputed; because it describes firearms (nalika), many scholars regard its present form as relatively late.

This edition gives the Sanskrit verses with a Hindi commentary called Vidyotini. It was first published in Samvat 2025 (1968) by the Chowkhamba Sanskrit Series Office, Varanasi, as No. 185 of the Kashi Sanskrit Granthamala; the commentator is not named in the opening pages. The scan is of a copy from the Mumukshu Bhavan Veda-Vedanga library, Varanasi.

The text runs chapter by chapter; the second chapter, for example, lays down rules on the pay of royal servants, such as setting aside a sixth or a quarter of a servant's wage for him. The volume has 526 pages.

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२४४ शुक्रनीतिः

तो उन्हें खेती के कार्यों में अथवा नौकरों द्वारा किये जानेवाले किसी कार्यों में लगा दे क्योंकि वे सुनार आदि चोरों के पिता के जगह पर रहते हैं अर्थात् चोरी का माल खरीदकर उनकी पिता के समान रक्षा करते हैं अतः उनकी निगरानी करता रहे।

गङ्झागृहं पृथग् ग्रामात्तस्मिन् रक्षेत्तु मद्यपान् ।
मदिरागृह को ग्राम से पृथक् रखने का निर्देश— और मदिरा बिकने का स्थान ग्राम से बाहर अलग रख कर उसी में मद्यपी लोगों को रखना चाहिये।

न दिवा मद्यपानं हि राष्ट्रे कुर्याद्धि कर्हिचित् ॥ ४५ ॥
दिन में मद्य पीने के निषेध का निर्देश— और राज्य में किसी को दिन में मद्यपान नहीं करने देना चाहिये ।

ग्रामे ग्राम्यान् वने वन्यान् वृक्षान् संरोपयेन्नृपः ।
उत्तमान् विंशतिकरैर्मध्यमांस्तिथिशस्ततः ॥ ४६ ॥
सामान्यान् दशहस्तैश्च कनिष्ठान् पञ्चभिः करैः ।
अजाविगोशकृद्भिर्वा जलैर्मांसैश्च पोषयेत् ॥ ४७ ॥
वृक्षारोपण और पोषण के नियम— ग्राम में होनेवाले वृक्षों को ग्राम में तथा जङ्गल में होनेवाले वृक्षों को जंगल में राजा रोपण करावे, उनमें परस्पर उत्तम को २० हाथ की दूरी पर, मध्यम को १५ हाथ, साधारण को १० हाथ, सबसे निकृष्ट को ५ हाथ की दूरी पर रोपण करवाना चाहिये । और बकरी, भेड़ और गौ की विष्ठा की खाद तथा जल और मांस की खाद देकर उनका पोषण करवाना चाहिये ।

उदुम्बराश्वत्थवटचिञ्चाचन्दनजम्भलाः ।
कदम्बाशोकबकुलबिल्वाम्रातकपित्थकाः ॥ ४८ ॥
राजादनाम्रपुन्नागतूदकाष्ठाम्लचम्पकाः ।
नीपकोकाम्रसरलदाडिमाक्षोटभिस्सटाः ॥ ४९ ॥
शिंशपाशिग्रुबदर-निम्बजम्बीरक्षीरिका ।
खर्जूरदेवकरजफल्गुतापिच्छसिम्भलाः ॥ ५० ॥
कुदालो लवली धात्री क्रमुको मातुलुङ्ककः ।
लकुचो नारिकेलश्च रम्भाऽन्ये सत्फला द्रुमाः ॥ ५१ ॥
सुपुष्पाश्चैव ये वृक्षा ग्रामाभ्यर्णे नियोजयेत् ।
ग्राम्य वृक्षों के नामों का निर्देश— गूलर, पीपल, बर्गेद, इमली, चन्दन, जम्बल (जम्बीरी नींबू), कदम्ब, अशोक, वकुल, विल्व, आमड़ा, कैथ, राजादन (चिरौंजी), आम, पुंनाग, तूदकाष्ठ (वृक्ष विशेष), अम्ल, चम्पा, नीप (जलकदम्ब), कोकम, सरल (चीड़), अनार, अखरोट, भिस्सट, शीशम, शिग्रु

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५

(सहजन) बैर, नीम, जम्भीर, खिरनी, खजूर, देवकरञ्ज, फल्गु ( अञ्जीर ), तापिच्छ, (तमाल ), सिम्बल, कुद्दाल, लवङ्गी ( हरफारेवड़ी ), आंवला, सुपारी, बिजौरा नीबू, बड़हर, नारियल, केला आदि तथा अन्य भी अच्छे फलवाले जो वृक्ष हों उन्हें ग्राम के समीप में लगाना चाहिये।

वामभागेऽथवोद्यानं कुर्याद् वा वासगृहे शुभम् ॥ ५२ ॥

**बगीचा लगाने के स्थान का निर्देश—**निवासगृह के वामभाग में अथवा निवासगृह के हाते के अन्दर ही सुन्दर बगीचा लगाना चाहिये।

सायं प्रातस्तु घर्मान्ते शीतकाले दिनान्तरे ।
वसन्ते पञ्चमेऽह्नस्तु सेच्या वर्षासु न क्वचित् ॥ ५३ ॥

**वृक्षों को ऋतुभेद से सींचने के समयों का निर्देश—**और ग्रीष्म ऋतु में प्रातः तथा सायंकाल में, शीत काल में एक दिन का अन्तर देकर अर्थात् तीसरे दिन, वसन्त ऋतु में दिन के पञ्चम मुहूर्त्त में अथवा पांचवे दिन पर वृक्षों को सींचना चाहिये किन्तु वर्षा में कभी भी नहीं सींचना चाहिये।

फलनाशे कुलुत्थैश्च माषैर्मुद्गैर्यवैस्तिलैः ।
शृतशीतपयःसेकः फलपुष्पाय सर्वदा ॥ ५४ ॥

**वृक्ष के नष्ट न होने का उपाय—**यदि वृक्ष के फल नष्ट हो जाते हों तो इसके लिये कुलथी, उरद, मूंग, जौ, तिल इनमें से किसी एक को डालकर खौटाकर शीतल किये हुये जल-से सीचना चाहिये। इससे वृक्ष सदा फल-फूल देने लगते हैं।

मत्स्याम्भसा तु सेकेन वृद्धिर्भवति शाखिनाम् ।
आविकाजशकृच्चूर्णं यवचूर्णं तिलानि च ॥ ५५ ॥
गोमांसमुदकञ्चेति सप्तरात्रं निधापयेत् ।
उत्सेकः सर्ववृक्षाणां फलपुष्पादिवृद्धिदः ॥ ५६ ॥

**वृक्षों के फल-पुष्प-वृद्धि का उपाय—**मछली के धोने के बाद उसी जल से सींचने से वृक्षों की वृद्धि होती है। और भेड़ तथा बकरी की विष्ठा का चूर्ण, तिल तथा गोमांस और जल इन सबों को सात रात्रि तक वृक्ष के मूल के भीतर देना चाहिये। वृक्षों में इन सबों के प्रयोग से फल और पुष्प की वृद्धि अत्यन्त होती है।

ये च कण्टकिनो वृक्षाः खदिराद्यास्तथापरे ।
आरण्यकास्ते विज्ञेयास्तेषां तत्र नियोजनम् ॥ ५७ ॥

**आरण्य वृक्षों के रोपण के स्थान और नामों का निर्देश—**और जो वृक्ष कटिदार तथा अन्य खैर आदि के हैं, वे जंगली कहाते हैं। इनका रोपण जंगलों में करना चाहिये।

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२४६ | शुक्रनीतिः

खदिराश्मन्तशाकाग्निमन्थस्योनाकबन्बुलाः ।
तमाल-शाल-कुटज-धवार्ज्जुनपलाशकाः ॥ ५८ ॥
सप्तपर्ण-शमीतुङ्ग-देवदारु-विकङ्कताः ।
करमर्दैङ्गुदीभूर्ज-विषमुष्टि-करीरकाः ॥ ५९ ॥
शल्लकी काश्मरी पाठा तिन्दुको बीजसारकः ।
हरीतकी च भल्लातः शम्पाकोऽर्कैश्च पुष्करः ॥ ६० ॥
अरिमेदश्च पीतद्रुः शाल्मलिश्च बिभीतकः ।
नरवेलो महावृक्षोऽपरे ये मधूकादयः ॥ ६१ ॥
प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यो गुल्मिन्यश्च तथैव च ।
ग्राम्या ग्रामे वने वन्या नियोज्यास्ते प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥

जैसे— खैर, अश्मन्तक, सागौन, अरणी, सोनापाठा, बबूर, तमाल, शाल, कुटज (खोरया), अर्जुन, पलाश, धव, सतवन, शमी, तून, देवदारु, विकङ्कत, करौंदा, इङ्गुदी, भोजपत्र, कुचिला, करीर, सलई, खम्भार, पाढ़र, तेंदू, विजय-सार, हरड़, भिलावा, शम्याक, आक, पोहकर, दुर्गन्ध खैर, पीतद्रु, सेमर, बहेड़ा, नरवेल, महावृक्ष और अन्य जो महुआ आदि एवं प्रतान (लम्बी २ पतली शाखाओं) वाली, गुच्छोंवाली, गुल्म (मूल) वाली लतायें हैं इनमें से जो ग्राम में होनेवाले हैं उन्हें ग्राम में और जो वन में होनेवाले हैं उन्हें वन में यत्नपूर्वक लगाना चाहिये।

कूपवापीपुष्करिण्यस्तडागाः सुगमास्तथा ।
कार्याः खाताद् द्वित्रिगुण-विस्तारपदधानिकाः ॥ ६३ ॥

कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश— कूआ, बावली, छोटा तालाब, बड़ा तालाब आदि जलाशय ऐसे बनवाने चाहिये जिसमें लोग सुगमता से उतर सकें। और जलाशय की गहराई से दुगुनी या तिगुनी विस्तार में उसके चारों ओर सीढ़ियां बनवानी चाहिये।

यथा तथा ह्यनेकाश्च राष्ट्रे स्याद्विपुलं जलम् ।
नदीनां सेतवः कार्या निबन्धाः सुमनोहराः ॥ ६४ ॥
नौकादिजलयानानि पारगानि नदीषु च ।

देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश— इस तरह के बहुत से जलाशय राज्य में बनवाना चाहिये, जिससे बहुत जल उनमें भरा रहे। अनेक प्रकार के अत्यन्त मनोहर नदियों में पुल भी बनवाना चाहिये। और नदियों को पार करने के लिये उनमें नौका आदि जलयान बनवाकर रखना चाहिये।

यज्जातिपूज्यो यो देवस्तद्विद्यायाश्च यो गुरुः ॥ ६५ ॥

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४७

तद्दान्यानि तज्जातिगृहपङ्क्तिमुखे न्यसेत् ।

जात्यनुकूल पूज्य देव तथा गुरु के गृह बनाने के स्थान का निर्देश— जिस जाति के जो पूज्य देवता हों और उनको विद्या पढ़ानेवाले जो गुरु हों उनके गृह उस जाति के लोगों के मकानों की पंक्ति के संमुख बनाने चाहिये ।

शृङ्गाटके ग्राममध्ये विष्णोर्वा शंकरस्य च ॥ ६६ ॥
गणेशस्य रवेर्देव्याः प्रासादान् क्रमशोऽन्यसेत् ।

ग्राम के चौराहे पर विष्णु आदि के मन्दिर बनाने का निर्देश— गांव के चौराहे या गांव के मध्य में विष्णु, शंकर, गणेश, सूर्य तथा देवी इन पञ्चदेवों के मन्दिर क्रमशः बनाने चाहिये ।

मेर्वादिषोडशविधलक्षणान् सुमनोहरान् ॥ ६७ ॥
वर्तुलांश्चतुरस्रान् वा यन्त्राकारान् समण्डपान् ।
प्राकारगोपुरगणयुतान् द्वित्रिगुणोच्छ्रितान् ॥ ६८ ॥
यथोक्तान्तःसुप्रतिमाञ्जलमूलान् विचित्रितान् ।

मेरु आदि मन्दिर के १६ प्रकारों का सलक्षण निर्देश— जो मन्दिर मेरु आदि १६ प्रकार के लक्षणों से युक्त, अत्यन्त मनोहर, गोलाकार, चौकोर या यन्त्राकार से युक्त, मण्डप, प्राकार ( परकोटा ) तथा प्रधान विशाल द्वारों से युक्त, परिचारक वर्गों से युक्त, लम्बाई-चौड़ाई से दुगुना या तिगुने ऊंचे हों और जिनके मध्य में शास्त्रोक्त रीति से बनी हुई सुन्दर देवमूर्त्तियां रखी हों । एवं जिनके चारों ओर खाइयों में जल भरा हो तथा जिनमें नाना प्रकार के चित्र बने हों ।

रम्यः सहस्रशिखरः सपादशतभूमिकः ॥ ६६ ॥
सहस्रहस्तविस्तार उच्छ्रायः स्यान्मेरुसंज्ञकः ।

जिस मन्दिर में १ हजार कंगूरे बने हों और १२५ पगभूमि हो, तथा जिसका १ हजार हाथ का विस्तार तथा ऊंचाई हो, वह मेरु संज्ञक होता है ।

ततस्ततोऽष्टांशहीना अपरे मन्दरादयः ॥ ७० ॥
मन्दरो ऋक्षमाली च द्युमणिश्चन्द्रशेखरः ।
माल्यवान् पारियात्रश्च रत्नशीर्षश्च धातुमान् ॥ ७१ ॥
पद्मकोशः पुष्पहासः श्रीकरः स्वस्तिकाभिधः ।
महापद्मः पद्मकूटः षोडशो विजयाभिधः ॥ ७२ ॥

इससे उत्तरोत्तर अष्टांश हीन अन्य मन्दर आदि नामवाले मन्दिर होते हैं। जिनके नाम क्रम से २. मन्दर, ३. ऋक्षमाली, ४. द्युमणि, ५. चन्द्रशेखर, ६. माल्यवान्, ७. पारियात्र, ८. रत्नशीर्ष, ९. धातुमान्, १०. पद्मकोश,

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२४८ | शुक्रनीतिः

११. पुष्पहास, १२. श्रीकर, १३. स्वस्तिक, १४. महापद्म, १५. पद्मकूट, १६. विजय ये सब हैं।

तन्मण्डपश्च तत्तुल्यः पादन्यूनोच्छ्रितः पुरः ।
स्वाराध्यदेवताध्यानैः प्रतिमास्तेषु योजयेत् ॥ ७३ ॥

**मेर्वादियों के अनुसार उनके मण्डपों के प्रमाणों का निर्देश—**उन मन्दिरों के मण्डप ( देवताभवन ) उन्हीं के अनुरूप उनकी ऊँचाई से चतुर्थांश कम ऊँचे आगे भाग में बनाने चाहिये। उनमें अपने आराध्य देवताओं के ध्यान के अनुसार देवता की मूर्तियां स्थापित करनी चाहिये।

ध्यानयोगस्य संसिद्धयै प्रतिमालक्षणं स्मृतम् ।
प्रतिमाकारको मर्त्यो यथा ध्यानरतो भवेत् ॥ ७४ ॥
तथा नान्येन मार्गेण प्रत्यक्षेणापि वा खलु ।

**ध्यान योग में प्रतिमा की साधनमुख्यता का निर्देश—**ध्यान योग की भलीभांति सिद्धि के लिये प्रतिमारूपी साधन मुख्य कहा है, क्योंकि प्रतिमा बनानेवाला मनुष्य जैसा ध्यान में लीन हो जाता है वैसा निश्चय अन्य मार्ग से या प्रत्यक्ष देवता के देखने से भी ध्यान में लीन नहीं हो सकता है।

प्रतिमा सैकती पैष्टी लेख्या लेप्या च मृन्मयी ॥ ७५ ॥
वार्क्षी पाषाणधातूत्था स्थिरा ज्ञेया यथोत्तरा ।

**बालू से लेकर धातु पर्यन्त की बनी प्रतिमाओं की उत्तरोत्तर स्थिरता की अधिकता का निर्देश—**प्रतिमायें बालू की, चावल आदि को पीस कर उसके पिण्ड की, चित्र की, लेप की, मिट्टी की, काष्ठ की, पाषाण की, धातु की बनती हैं। ये उत्तरोत्तर एक से दूसरी अधिक स्थिर होती हैं।

यथोक्तावयवैः पूर्णा पुण्यदा सुमनोहरा ॥ ७६ ॥
अन्यथाऽऽयुर्धनहरा नित्यं दुःखविवर्द्धिनी ।

**शास्त्रोक्त तथा अन्यथा रीति से बनी प्रतिमा के फल—**यदि प्रतिमा शास्त्रोक्त नियमानुसार अङ्गों से परिपूर्ण बनी हो तो वह पुण्य देनेवाली तथा अत्यन्त मनोहर होती है। यदि अन्यथा रीति से बनी हो तो आयु तथा धन को हरण करनेवाली और नित्य दुःख को बढ़ानेवाली होती है।

देवानां प्रतिबिम्बानि कुर्याच्छ्रेयस्कराणि च ॥ ७७ ॥
स्वर्ग्याणि मानवादीनामस्वर्ग्यान्यशुभानि च ।

**देव-प्रतिमा की शुभकारिता मानव-प्रतिमा की अशुभकारिता का निर्देश—**देवताओं की प्रतिमायें बनवानी चाहिये क्योंकि वे शुभकारक तथा स्वर्गदायक होती हैं। और मनुष्यों की प्रतिमायें तो अशुभकारक तथा स्वर्ग देनेवाली नहीं होती हैं।

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४९

मानतो नाधिकं हीनं तद्विम्बं रम्यमुच्यते ॥ ७८ ॥

देवताओं की प्रतिमा शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न हीन होने पर ही रम्य और कल्याणकारक होती हैं।

अपि श्रेयस्करं नृणां देवबिम्बमलक्षणम् ।
सलक्षणं मर्त्यबिम्बं न हि श्रेयस्करं सदा ॥ ७६ ॥

और देवता की प्रतिमा यदि शास्त्रोक्त लक्षणों से रहित भी हो तो मनुष्यों के लिये कल्याणकारक होती है और यदि मनुष्य की प्रतिमा लक्षणों से युक्त भी हो तो सदा ही कल्याणकारक नहीं होती है।

सात्त्विकी राजसी देवप्रतिमा तामसी त्रिधा ।
विष्ण्वादीनां च या यत्र योग्या पूज्या तु तादृशी ॥ ८० ॥

**सात्विकी आदि तीन प्रकार की प्रतिमाओं का निर्देश—**विष्णु आदि देवता १. सात्विकी, २. राजसी, ३. तामसी इन भेदों से ३ प्रकार की होती है। और जहां पर जैसी योग्य हो वहां पर वैसी प्रतिमा की पूजा करनी चाहिये।

योगमुद्रान्विता स्वस्था वराभयकरान्विता ।
देवेन्द्रादिस्तुतनुता सात्त्विकी सा प्रकीर्तिता ॥ ८१ ॥

**सात्विकी प्रतिमा के लक्षण—**जो प्रतिमा योगमुद्रा से युक्त, स्वाभाविक अवस्था में स्थित, वरदान तथा अभय दान देनेवाली मुद्रा से युक्त हाथोंवाली है, एवं इन्द्रादि देवता जिसकी स्तुति तथा नमन कर रहे हैं, वह 'सात्विकी' कहलाती है।

तिष्ठन्ती वाहनस्था वा नानाभरणभूषिता ।
या शस्त्रास्त्राभयवर-करा सा राजसी स्मृता ॥ ८२ ॥

**राजसी प्रतिमा के लक्षण—**जो प्रतिमा किसी वाहन पर बैठी हुई तथा नाना आभूषणों से युक्त होती है एवं जिसके हाथों में शस्त्र, अस्त्र तथा वर और अभय दान की मुद्रा बनी हुई है वह 'राजसी' कहलाती है।

शस्त्रास्त्रैर्दैत्यहन्त्री या ह्युग्ररूपधरा सदा ।
युद्धाभिनन्दिनी सा तु तामसी प्रतिमोच्यते ॥ ८३ ॥

**तामसी प्रतिमा के लक्षण—**जो प्रतिमा शस्त्र तथा अस्त्रों से दैत्यों को मारनेवाली, उग्ररूप को धारण किये हुई, सदा युद्ध के लिये उत्सुक रूप में होती है वह 'तामसी' कहलाती है।

संक्षेपतस्तु ध्यानादि विष्ण्वादीनां तथोच्यते ।
प्रमाणं प्रतिमानां च तदङ्गानां सुबिस्तरम् ॥ ८४ ॥

संक्षेप से विष्णु आदि देवताओं का जैसा ध्यान है तथा विस्तारपूर्वक प्रतिमाओं का एवं उनके अङ्गों का प्रमाण है, वैसा कहते हैं।

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२५० | शुक्रनीतिः

स्वस्वमुष्टेश्चतुर्थोऽशो ह्यङ्गुलं परिकीर्तितम् ।
तदङ्गुलैर्द्वादशभिर्भवेत् तालस्य दीर्घता ॥ ८५ ॥

अंगुष्ठादिकों के प्रमाणों का निर्देश— अपनी २ मुष्टि के चतुर्थांश के बराबर १ अंगुल का प्रमाण कहा हुआ है। और १२ अंगुल की लम्बाई १ ताल की मानी गई है।

वामनी सप्तताला स्यादष्टताला तु मानुषी ।
नवताला स्मृता दैवी राक्षसी दशतालिका ॥ ८६ ॥

वामनी, मानुषी, दैवी, राक्षसी प्रतिमाओं के लक्षण— जो प्रतिमा ७ ताल की प्रमाण ऊँची है वह 'वामनी' ८ ताल की 'मानुषी' ९ ताल की 'दैवी' और १० ताल प्रमाण की ऊँची 'राक्षसी' कहलाती है।

सप्ततालाद्युच्चता वा मूर्तीनां देशभेदतः ।
सदैव स्त्री सप्तताला सप्ततालश्च वामनः ॥ ८७ ॥

स्त्री देवता तथा वामन भगवान की प्रतिमा की ऊँचाई का प्रमाण— अथवा देशभेद से उपर्युक्त ७ ताल आदि प्रमाण की ऊंचाई प्रतिमाओं की मानी गई है। और सदा स्त्री देवता की प्रतिमा ७ ताल की ऊँची और वामन भगवान की ७ ताल की ऊँची बनानी चाहिये।

नरो नारायणो रामो नृसिंहो दशतालकः ।
दशतालः स्मृतो बाणो बलीन्द्रो भार्गवोऽर्जुनः ॥ ८८ ॥

नर-नारायणादि की प्रतिमाओं की ऊँचाई का प्रमाण— नर, नारायण, राम और नृसिंह की प्रतिमा १० ताल की ऊंची, एवं बाणासुर, बलि, इन्द्र, परशुराम तथा अर्जुन की भी प्रतिमा १० ताल ऊंची कही हुई है।

चण्डी भैरववेतालनरसिंहवराहकाः ।
क्रूरा द्वादशतालाः स्युर्ह्ययशीर्षादयस्तथा ॥ ८९ ॥
ज्ञेया षोडशताला तु पैशाची वाऽऽसुरी सदा ।

चण्डी आदि की प्रतिमाओं की ऊंचाई के प्रमाण— चण्डी, भैरव, वेताल, नरसिंह, वराह तथा हयग्रीव आदि क्रूर देवताओं की प्रतिमा १२ ताल ऊंची एवं पैशाची या आसुरी प्रतिमा १६ ताल ऊंची सदा बनाने को कही गई है।

हिरण्यकशिपुर्वृत्रो हिरण्याक्षश्च रावणः ॥ ९० ॥
कुम्भकर्णोऽथ नमुचिर्निशुम्भः शुम्भ एव हि ।
एते षोडशतालाः स्युर्महिषो रक्तबीजकः ॥ ९१ ॥

असुरों की प्रतिमा की ऊंचाई का प्रमाण— हिरण्यकशिपु, वृत्रासुर, हिरण्याक्ष, रावण, कुम्भकर्ण, नमुचि, निशुम्भ, शुम्भ, महिषासुर तथा रक्तबीज इन सब असुरों की प्रतिमायें १६ ताल की ऊंची होती हैं।

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २४१

पञ्चतालाः स्मृता बालाः षट्‌तालाश्च कुमारकाः ।
**बाल तथा कुमार भावकी प्रतिमा की ऊंचाई का प्रमाण—**बालभाव की मूर्त्ति ५ ताल की तथा कुमार भाव की ६ ताल की ऊँची बनानी चाहिये ।

दशताला कृतयुगे त्रेतायां नवतालिका ॥ ९२ ॥
अष्टताला द्वापरे तु सप्तताला कलौ स्मृता ।
**सत्ययुगादि-भेद से प्रतिमा की ऊँचाई के प्रमाण में भेद—**सत्ययुग में १० ताल ऊंची, त्रेता में ९ ताल, द्वापर में ८ ताल और कलियुग में ७ ताल प्रमाण ऊंची प्रतिमा बनाने के लिये सामान्य रूप से कहा है ।

नवतालप्रमाणे तु मुखं तालमितं स्मृतम् ॥ ९३ ॥
चतुरङ्गुलं ललाटं स्यादधो नासा तथैव च ।
नासिकाऽधश्च हन्वन्तं चतुरङ्गुलमीरितम् ॥ ९४ ॥
**९ ताल प्रमाण ऊंची प्रतिमा के अवयवों के प्रमाणों का निर्देश—**यदि ९ ताल प्रमाण की प्रतिमा हो तो उसमें मुख १ ताल प्रमाण का बनाना चाहिये, जिसमें ४ अंगुल प्रमाण का ललाट और उसके नीचे नासिका तक का भाग ४ अंगुल का एवं नासिका के नीचे हनु (ठुड्डी) तक का भाग ४ अंगुल प्रमाण का बनाना चाहिये ।

चतुरङ्गुला भवेद् ग्रीवा तालेन हृदयं पुनः ।
नाभिस्तस्मादधः कार्या तालेनैकेन शोभिता ॥ ९५ ॥
नाभ्यधश्च भवेन्मेढ्रं भागेनैकेन वा पुनः ।
४ अंगुल प्रमाण ग्रीवा, १ ताल प्रमाण हृदय अर्थात् वक्षःस्थल, उसके नीचे १ ताल प्रमाण सुन्दर नाभि बनानी चाहिये । और १ ताल प्रमाण नाभि से नीचे लिङ्ग तक का भाग बनाना चाहिये ।

द्वितालौ ह्यायतावूरू जानुनी चतुरङ्गुले ॥ ९६ ॥
जङ्गे ऊरुसमे कार्ये गुल्फाधश्चतुरङ्गुलम् ।
२ ताल प्रमाण लंबे दोनों ऊरु, ४ अंगुल प्रमाण दोनों जानु, ऊरु के समान २ ताल प्रमाण दोनों जंघायें और दोनों गुल्फों के नीचे का भाग ४ अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये ।

नवतालात्मकमिदमूर्द्धमानं बुधैः स्मृतम् ॥ ९७ ॥
पण्डितों ने इस प्रकार से प्रतिमा की ९ ताल प्रमाण की ऊंचाई का विभागपूर्वक वर्णन किया है ।

शिखावधि तु केशान्तं त्र्यङ्गुलं सर्वमानतः ।
दिशाऽनया च विभजेत् सप्ताष्टदशतालकम् ॥ ९८ ॥

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२५२ | शुक्रनीतिः


चाहे जिस मान की प्रतिमा बनावे, सभी मानों में शिखा पर्यन्त केशों का मान ३ ही अङ्गुल मानना चाहिये। इस रीति से ७, ८ तथा १० ताल प्रमाण की प्रतिमाओं के अङ्ग-निर्माण में त्रैराशिक नियमानुसार मान-कल्पना करनी चाहिये ।

चतुस्तालात्मकौ बाहू अङ्गुल्यन्तावुदाहृतौ ।
स्कन्धादिकूर्परान्तं च विंशत्यङ्गुलमुत्तमम् ॥ ९९ ॥
त्रयोदशाङ्गुलं चाधः कक्षायाः कूर्परान्तकम् ।
अष्टाविंशत्यङ्गुलस्तु मध्यमान्तः करः स्मृतः ॥ १०० ॥

अङ्गुलि पर्यन्त दोनों बाहुओं की लम्बाई ४ ताल प्रमाण कही हुई है। स्कन्ध से लेकर कूर्पर (केहुनी) पर्यन्त २० अङ्गुल की लम्बाई उत्तम कही है। कक्षा (कांख) के नीचे से कूर्पर पर्यन्त की लम्बाई १३ अङ्गुल की होनी चाहिये। कूर्पर से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त हाथ की लम्बाई २८ अङ्गुल प्रमाण कहा हुआ है ।

सप्ताङ्गुलं करतलं मध्या पञ्चाङ्गुला मता ।
सार्धत्रयाङ्गुलोऽङ्गुष्ठस्तर्जनीमूलपर्वभाक् ॥ १०१ ॥
पर्वद्वयात्मकोऽन्यासां पर्वाणि त्रीणि त्रीणि तु ।
अर्धाङ्गुलेनाङ्गुलेन हीनानामा च तर्जनी ॥ १०२ ॥
कनिष्ठिकानामिकातोऽङ्गुलोना च प्रकीर्तिता ।

उसमें ७ अङ्गुल का करतल, ५ अङ्गुल लम्बी मध्यमा अङ्गुलि मानी गई है। अंगूठे की लम्बाई ३॥ अङ्गुल प्रमाण होनी चाहिये और वह तर्जनी के मूल भाग तक पहुँचनेवाली एवं दो पर्व (पोर) वाला होना चाहिये। और अन्य सभी अङ्गुलियों में तीन २ पोर होने चाहिये। तथा मध्यमा अङ्गुलि से आधा अङ्गुल छोटी अर्थात् ४॥ अङ्गुल लम्बी अनामिका (कनिष्ठिका के बगल की) अङ्गुलि और १ अंगुल छोटी (४ अंगुल लम्बी) तर्जनी (अंगूठा के बगल की) अंगुलि होनी चाहिये।

चतुर्दशाङ्गुलौ पादौ अङ्गुष्ठो द्वयङ्गुलो मतः ॥ १०३ ॥
सार्द्धद्वयाङ्गुलोऽङ्गुष्ठस्तन्मिता वा प्रदेशिनी ।
प्रदेशिनी द्व्यङ्गुला तु सार्धाङ्गुलमयैतराः ॥ १०४ ॥

१४ अंगुल लम्बे दोनों पैर होने चाहिये। उसमें अंगूठा दो अंगुल प्रमाण का और प्रदेशिनी (अंगूठे के बगल की) अंगुली भी २ अंगुल प्रमाण की अथवा अंगूठा और प्रदेशिनी ढाई २ अंगुल प्रमाण की तथा अन्य अंगुलियां डेढ़ २ अंगुल प्रमाण की बनानी चाहिये।

शिरोष्णिप्तौ पाणिपादौ गूढगुल्फौ प्रकीर्तितौ ।

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५३

हाथ और पैर ऐसे बनाने चाहिये जिसमें सिरायें (नसें) तथा गुल्फ न दिखाई पड़े।

तद्विज्ञैः प्रस्तुता ये ये मूर्तेरवयवाः सदा ॥ १०५ ॥
न हीना नाधिका मानात्ते ते ज्ञेयाः सुशोभनाः ।
न स्थूला न कृशा वापि सर्वे सर्वमनोरमाः ॥ १०६ ॥

रम्य प्रतिमा के लक्षण— मूर्त्ति के बनानेवाले कारीगरों द्वारा निर्मित मूर्त्ति के जो-जो अवयव हों वे सब यदि शास्त्रोक्त मान से न अधिक और न कम हों तभी अत्यन्त सुन्दर मानना चाहिये। और यदि सभी अङ्ग न स्थूल तथा न कृश बने हों तो सभी भांति से उन्हें सुन्दर मानना चाहिये।

सर्वाङ्गैः सर्वरम्यो हि कश्चिल्लक्षे प्रजायते ।
शास्त्रमानेन यो रम्यः स रम्यो नान्य एव हि ॥ १०७ ॥

रम्य तथा अरम्य प्रतिमा का अन्तर— लाखों में कोई एक प्रतिमा सबों के लिये सर्वाङ्ग सुन्दर बनती है किन्तु शास्त्र के प्रमाणानुसार जो रम्य (सुन्दर) हो वही रम्य कहलाता है अन्य नहीं।

शास्त्रमानविहीनं यदरम्यं तद्विपश्चिताम् ।
एकेषामेव तद् रम्यं लग्नं यत्र च यस्य हृत् ॥ १०८ ॥

मतान्तर से रम्य और अरम्य के अन्तर— किसी एक का मत है कि— जिसमें जिसका मन लग जाता है उसके लिये वही रम्य होता है किन्तु विद्वानों को तो जो शास्त्र के प्रमाण से विरुद्ध बनी प्रतिमा है वही अरम्य (असुन्दर) होती है।

अष्टाङ्गुलं ललाटं स्यात्तावन्मात्रे भ्रुवौ मते ।

अवयवों की आकृति का वर्णन— ललाट ८ अंगुल चौड़ा, और दोनों भौंहें मिलाकर उतनी ही (८ अंगुल चौड़ी) होनी चाहिये।

अर्द्धाङ्गुला भ्रुवोर्लेखा मध्ये धनुरिवोन्नता ॥ १०६ ॥
नेत्रे च त्र्यङ्गुलायामे द्व्यङ्गुले विस्तृते शुभे ।

दोनों भौंहों की चौड़ाई आधा अंगुल और मध्य में धनुष के आकार के समान कुछ उठी हुई होनी चाहिये। और नेत्रों की लम्बाई तीन अंगुल की तथा चौड़ाई दो अंगुल की एवं देखने में सुन्दर बनानी चाहिये।

तारका तत्तृतीयांशा नेत्रयोः कृष्णरूपिणौ ॥ ११० ॥
द्व्यङ्गुलं तु भ्रुवोर्मध्यं नासामूलमथाङ्गुलम् ।

दोनों नेत्रों की कृष्ण वर्ण की पुतलियाँ नेत्र के तृतीयांश के बराबर (१ अंगुल) की, दोनों भौंहों के मध्य का भाग दो अंगुल चौड़ा एवं नासा का मूल भाग एक अंगुल चौड़ा बनाना चाहिये।

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२५४ | शुक्रनीतिः

नासाग्रविस्तरं तद्वद् द्व्यङ्गुलं तद्विलद्वयम् ॥ १११ ॥
शुकनासाकृतिर्नासा सरलं वा द्विधा शुभा ।
नासा के अग्रभाग का विस्तार दो अंगुल का एवं उसके दो छिद्र भी दो ही अंगुल के होने चाहिये। सुग्गे की नासा के आकार जैसी अथवा सीधी दोनों प्रकार की अर्थात् दोनों प्रकारों में से किसी एक प्रकार की नासा बनाई जानी चाहिये।

निष्पावसदृशं नासापुटयुग्मं सुशोभनम् ॥ ११२ ॥
दोनों नासापुट निष्पाव (मोंठ) के समान अत्यन्त सुन्दर बनाना चाहिये।

कर्णौ च भ्रूसमौ ज्ञेयौ दीर्घौ च चतुरङ्गुलौ ।
कर्णपाली त्र्यङ्गुला स्यात् स्थूला चार्धाङ्गुला मता ॥ ११३ ॥
दोनों कान भी भौंहों के समान चार २ अंगुल लम्बे होने चाहिये। कर्णपाली तीन अंगुल लम्बी और आधी अंगुल मोटी होनी चाहिये।

नासावंशोऽर्द्धाङ्गुलस्तु श्लक्ष्णः सार्द्धाङ्गुलोन्नतः ।
नासिका का दण्ड तीन अंगुल लम्बा, डेढ़ अंगुल उन्नत, और चिकना तथा ऊंचा होना चाहिये।

ग्रीवामूलाच्च स्कन्धान्तमष्टाङ्गुलमुदाहृतम् ॥ ११४ ॥
बाह्वन्तरं द्वितालं स्यात्तालमात्रं स्तनान्तरम् ।
अवयवों के अन्तर का प्रमाण—ग्रीवा के मूलभाग से लेकर स्कन्ध पर्यन्त आठ अंगुल का विस्तार होना चाहिये। दोनों बाहुओं का अन्तर अर्थात् वक्ष स्थल दो ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये। और दोनों स्तनों का अन्तर (मध्यभाग) एक ताल प्रमाण चौड़ा होना चाहिये।

षोडशाङ्गुलमात्रं तु कर्णयोरन्तरं स्मृतम् ॥ ११५ ॥
कर्णहन्वग्रान्तरं तु सदैवाष्टाङ्गुलं मतम् ।
एक कान से लेकर दूसरे कान तक का अन्तर १६ अंगुल प्रमाण होना चाहिये। और कान तथा हनु का अग्रभाग (ठुड्डी) का अन्तर सदा आठ अंगुल का होना चाहिये।

नासाकर्णान्तरं तद्वत्तदर्धं कर्णनेत्रयोः ॥ ११६ ॥
मुखं तालतृतीयांशमोष्ठावर्धाङ्गुलौ मतौ ।
नाक और कान का अन्तर भी उसी तरह से (आठ अंगुल का) होना चाहिये। और कान तथा नेत्र का अन्तर उससे आधा (चार अंगुल का) रखना चाहिये। मुख की चौड़ाई एक ताल का तृतीयांश प्रमाण होना चाहिये। दोनों ओठ आधा अंगुल प्रमाण का होना चाहिये।

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २५५

द्वात्रिंशदंगुलः प्रोक्तः परिधिर्मस्तकस्य च ॥ ११७ ॥
दशाङ्गुला विस्तृतितस्तद् द्वादशाङ्गुलदीर्घता ।
**अवयवों की परिधि का प्रमाण—**मस्तक की परिधि (घेरा) बत्तिस अंगुल का होना चाहिये। मस्तक का विस्तार (चौड़ाई) दस अंगुल का और लम्बाई बारह अंगुल का होना चाहिये।

ग्रीवामूलस्य परिधिर्द्वाविंशत्यङ्गुलात्मकः ॥ ११८ ॥
हृन्मध्य-परिधिर्ज्ञेयश्चतुःपञ्चाशदङ्गुलः ।
ग्रीवा मूल की परिधि बाइस अंगुल की होनी चाहिये। हृदय के मध्य भाग (वक्ष के मध्य भाग) की परिधि चउभन (५४) अंगुल की होनी चाहिये।

हीनाङ्गुलचतुस्तालपरिधिर्हृदयस्य च ॥ ११९ ॥
आ स्तनात् पृष्ठदेशान्ता पृथुता द्वादशाङ्गुला ।
हृदय की परिधि एक अंगुल कम चार ताल प्रमाण होनी चाहिये। स्तन से लेकर पृष्ठ पर्यन्त की मुटाई बारह अंगुल की होनी चाहिये।

सार्धत्रितालपरिधिः कट्याश्च द्वयङ्गुलाधिकः ॥ १२० ॥
चतुरङ्गुल उत्सेधो विस्तारः स्यात्षडङ्गुलः ।
कमर की परिधि दो अंगुल अधिक साढे तीन ताल प्रमाण की होनी चाहिये। और उसकी ऊंचाई चार अंगुल की तथा विस्तार ६ अंगुल का होना चाहिये।

पश्चाद्भागे नितम्बस्य स्त्रीणामङ्गुलतोऽधिकः ॥ १२१ ॥
बाहुप्रमूलपरिधिः षोडशाष्टादशाङ्गुलः ।
स्त्रियों की मूर्ति के नितम्ब के पीछे भाग में पुरुष की अपेक्षा परिधि एक अंगुल अधिक साढे तीन ताल प्रमाण होना चाहिये। बाहु के अग्रभाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं बाहु के मूल भाग की परिधि अट्ठारह अंगुल की होनी चाहिये।

हस्तमूलाग्र-परिधिश्चतुर्दश-दशाङ्गुलः ॥ १२२ ॥
पञ्चाङ्गुला पादकरतलयोर्विस्तृतिः स्मृता ।
हाथ के मूलभाग की परिधि चौदह अंगुल की एवं अग्र भाग की परिधि दश अंगुल की होनी चाहिये। पैर तथा हाथ के तलभाग का विस्तार पांच अंगुल का होना चाहिये।

ऊरुमूलस्य परिधि र्द्वात्रिंशदङ्गुलात्मकः ॥ १२३ ॥
ऊनविंशत्यङ्गुलः स्यादूर्वग्रपरिधिः स्मृतः ।

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२५६शुक्रनीतिः

ऊरु के मूलभाग की परिधि बत्तीस अंगुल की और और ऊरु के अग्रभाग की परिधि उन्नीस अंगुल की होनी चाहिये ।

जङ्घामूलाग्रपरिधिः षोडशाद्वादशाङ्गुलः ॥ १२४ ॥
मध्यमामूलपरिधिर्विज्ञेयश्चतुरङ्गुलः ।

जंघा के मूल भाग की परिधि सोलह अंगुल की एवं जंघा के अग्रभाग की परिधि बारह अंगुल की होनी चाहिये। मध्यमा अंगुली के मूल भाग की परिधि चार अंगुल की होनी चाहिये ।

तर्जन्यनामिकामूलपरिधिः सार्द्धत्र्यङ्गुलः ॥ १२५ ॥
कनिष्ठिकायाः परिधिर्मूले त्र्यङ्गुल एव हि ।

तर्जनी और अनामिका अंगुली के मूल भाग की परिधि साडे तीन अंगुल की होनी चाहिये । किन्तु कनिष्ठिका अंगुली के मूलभाग की परिधि तीन ही अंगुल की होनी चाहिये ।

स्वमूलपरिधेः पादहीनोऽग्रे परिधिः स्मृतः ॥ १२६ ॥
हस्तपादाङ्गुष्ठयोश्च चतुःपञ्चाङ्गुलं क्रमात् ।

और प्रत्येक अंगुलियों के अपने २ मूल भाग की परिधियों की अपेक्षा अग्र भाग की परिधियां प्रमाण में चतुर्थांश हीन होती हैं । जैसे मध्यमा के मूल भाग की परिधि चार अंगुल की है तो उसके अग्र भाग की परिधि चतुर्थांश हीन होने से तीन अंगुल की होती है । इसी भांति से अन्य अंगुलियों के लिये भी समझना चाहिये । हाथ तथा पैर के अंगूठे की परिधि क्रम से चार तथा पांच अंगुल की होनी चाहिये ।

पादाङ्गुलीनां परिधिस्त्र्यङ्गुलः समुदाहृतः ॥ १२७ ॥
मण्डलं स्तनयोर्नाभेः सार्द्धाङ्गुलमथाङ्गुलम् ।

पैर की अंगुलियों की परिधि तीन अंगुल की होनी चाहिये । स्तनों का मंडल ( परिधि ) डेढ़ अंगुल का एवं नाभि का मण्डल एक अंगुल का होना चाहिये ।

सर्वाङ्गानां यथाशोभि पाटवं परिकल्पयेत् ॥ १२८ ॥

मूर्ति के संपूर्ण अङ्ग ऐसे बनाने चाहिये जिससे उनकी सुन्दरता की शोभा विशेष रूप से प्रतीत होती हो ।

नोर्ध्वदृष्टिमधोदृष्टिं मीलिताक्षीं प्रकल्पयेत् ।
नोग्रदृष्टिं तु प्रतिमां प्रसन्नाक्षीं विचितयेत् ॥ १२९ ॥

प्रतिमा की दृष्टि का प्रमाण—और ऊपर अथवा नीचे की ओर दृष्टिवाली किंवा मुंदी आँखोंवाली वा उग्र दृष्टिवाली मूर्ति नहीं बनानी चाहिये । अपि तु प्रसन्नता से भरी दृष्टिवाली मूर्ति बनानी चाहिये ।

चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २५७

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मानिरूपणप्रकरणम् २५७

प्रतिमायास्तृतीयांशमर्द्धांशं तत् सुपीठकम्।

प्रतिमा के आसन का प्रमाण— प्रतिमा (मूर्त्ति) का जो आसन हो वह देखने में सुन्दर एवं प्रतिमा के मान के अनुसार तृतीयांश या अर्द्धांश प्रमाण का होना चाहिये।

द्विगुणं त्रिगुणं द्वारं प्रतिमायाश्चतुर्गुणम् ॥ १३० ॥
एकद्वित्रिचतुर्हस्तं पीठं देवालयस्य च।

योग्यतानुसार द्वारादि का प्रमाण— देवमन्दिर का द्वार प्रतिमा के मान से द्विगुण, त्रिगुण या चतुर्गुण बड़ा बनाना चाहिये। और योग्यतानुसार प्रतिमा का पीठ (आसन) एक, दो, तीन या चार हाथ प्रमाण बनाना चाहिये।

पीठतस्तु समुच्छ्रायो भित्तेर्दशकराधिकः ॥ १३१
द्वारात्तु द्विगुणोच्छ्रायः प्रासादस्योर्ध्वभूमिभाक्।
शिखरं चोच्छ्रायसमं द्विगुणं त्रिगुणं तु वा ॥ १३२ ॥

देवमन्दिर की ऊंचाई का प्रमाण— देवगृह की भित्ति (भीत) की ऊंचाई पीठ से दस हाथ अधिक करनी चाहिये। प्रासाद (देवमन्दिर) के ऊपर की भूमि द्वार से दुगुनी ऊंची होनी चाहिये। और प्रासाद का शिखर ऊंचाई के अनुरूप द्विगुण या त्रिगुण बनाना चाहिये।

एकभूमिं समारभ्य सपादाशतभूमिकम्।
प्रासादं कारयेच्छक्त्या ह्यष्टास्रं पद्मसंनिभम् ॥ १३३ ॥
चतुर्दिक्षु मण्डपं वापि चतुःशालं समन्ततः।

मञ्जिल तथा प्रासाद की आकृति आदि का निर्देश— एक मञ्जिल से लेकर सवा सौ मञ्जिल तक का अठपहला कमल के आकार का, चारों दिशाओं में बने हुये मण्डपों से अथवा चारों तरफ कमरों से युक्त प्रासाद (मन्दिर) शक्ति के अनुसार बनाना चाहिये।

सहस्रस्तम्भसंयुक्तश्चोत्तमोऽन्यः समोऽधमः ॥ १३४ ॥

प्रासाद के उत्तमादि ३ भेदों का निर्देश— एक हजार स्तम्भों से युक्त प्रासाद 'उत्तम' उससे न्यून स्तम्भों का 'मध्यम' उससे भी न्यून स्तम्भों का 'अधम' प्रासाद कहलाता है।

प्रासादे मण्डपे वापि शिखरं यदि कल्प्यते।
स्तम्भास्तत्र न कर्तव्या भित्तिस्तत्र सुखप्रदा ॥ १३५ ॥

मन्दिर के स्तम्भों का प्रमाण तथा निषेध का निर्देश— जिस प्रासाद अथवा मण्डप के ऊपर यदि शिखर बनाना हो तो वहां पर स्तम्भ नहीं बनाना चाहिये क्योंकि वहां पर केवल भित्ति (भीत) ही सुखप्रद होती है,- स्तम्भ की कोई आवश्यकता नहीं है।

१७ शु०

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२५८ | शुक्रनीतिः

प्रासादमध्यविस्तारः प्रतिमायाः समन्ततः ।
षड्गुणोऽष्टगुणो वापि पुरतो वा सुविस्तरः ॥ १३६ ॥

**प्रासाद के भीतरी विस्तार का विचार—**प्रासाद के भीतरी भाग का विस्तार चारो तरफ प्रतिमा से छगुना या आठगुना होना चाहिये और प्रतिमा के आगे की तरफ सब से अधिक विस्तार होना चाहिये ।

वाहनं मूर्तिसदृशं सार्धं वा द्विगुणं स्मृतम् ।
यत्र नोक्तं देवताया रूपं तत्र चतुर्भुजम् ॥ १३७ ॥
अभयं च वरं दद्याद्यत्र नोक्तं यदायुधम् ।
अधः करे तूर्ध्वकरे शङ्खं चक्रं तथाऽङ्कुशम् ॥ १३८ ॥
पाशं वा डमरुं शूलं कमलं कलशं स्रुवम् ।
लड्डुकं मातुलुङ्गं वा वीणां मालां च पुस्तकम् ॥ १३९ ॥

**प्रतिमा के वाहन, रूप तथा आयुध के स्थान का विचार—**देवता का वाहन देवमूर्ति के अनुरूप डेढ़गुना या दुगुना बड़ा होना चाहिये। जहां पर देवता का रूप (बाहु का उल्लेख) नहीं कहा हो वहां पर चतुर्भुज बनाना चाहिये । जहां पर देवता के आयुध (अस्त्र-शस्त्र) का उल्लेख न हो वहां पर नीचे के हाथों में क्रम से अभय तथा वर मुद्रा का अंकन करना चाहिये । और ऊपर हाथों में शङ्ख, चक्र, अंकुश, पाश, डमरु, शूल, कमल, कलश, स्रुवा, लड्डू, मातुलुङ्ग, वीणा, माला वा पुस्तक का अंकन करना चाहिये ।

मुखानां यत्र बाहुल्यं तत्र पङ्क्त्या निवेशनम् ।
तत् पृथग्-ग्रीवमुकुटं सुमुखं स्वक्षिकर्णयुक् ॥ १४० ॥

**प्रतिमा के अनेक मुख होने पर व्यवस्था का निर्देश—**जहां पर प्रतिमा में बहुत सा मुख बनाना हो वहां पर उन्हें एक पंक्ति में बनाना चाहिये । और उनकी ग्रीवा, मुकुट तथा मुख, आंख और कान को पृथक् २ सुन्दर रीति से बनाना चाहिये ।

भुजानां यत्र बाहुल्यं न तत्र स्कन्धभेदनम् ।

**अनेक भुजाओं की व्यवस्था—**जिस मूर्ति में बहुत भुजायें बनानी हों वहां स्कन्धों में भेद नहीं किया जाता है अर्थात् स्कन्ध दो ही बनाये जाते हैं किन्तु भुजायें दो से अधिक भी बनाई जाती है ।

कूर्परोर्ध्वं तु सूक्ष्माणि चिपिटानि दृढानि च ॥ १४१ ॥
भुजमूलानि कार्याणि पक्षमूलानि वै यथा ।

केहुनी के ऊपर भुजाओं के मूल भाग, दोनों पार्श्वों के मूल भाग के समान सूक्ष्म, चिपटे तथा दृढ़ बनाने चाहिये ।

चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २४५

ब्रह्मणस्तु चतुर्दिक्षु मुखानां विनियोजनम् ॥ १४२ ॥
**ब्रह्मा के मुखों की व्यवस्था—**ब्रह्मा की मूर्त्ति में चारों दिशाओं में एक २ मुख बनाना चाहिये ।

हयग्रीवो वराहश्च नृसिंहश्च गणेश्वरः ।
मुखैर्विना नराकारो नृसिंहश्च नखैर्विना ॥ १४३ ॥

**हयग्रीवादिकों की आकृतिविषयक विचार—**हयग्रीव, वराह, नृसिंह, गणेश्वर ( गणेश ), इन ४ देवताओं की मूर्त्तियों में मुख को छोड़ कर शेष अङ्ग मनुष्य के आकार का बनाना चाहिये अतः हयग्रीव का मुख घोड़े की भाँति, वराह का सूअर की भाँति, नृसिंह का सिंह की भाँति और गणेश का मुख हाथी की भाँति बनाना चाहिये । और नृसिंह का नख भी सिंह की भाँति ही होना चाहिये ।

तिष्ठन्तीं सूपविष्टां वा स्वासने वाहनस्थिताम् ।
प्रतिमामिष्टदेवस्य कारयेदुक्तलक्षणाम् ॥ १४४ ॥
हीनश्मश्रुनिमेषां च सदा षोडशवार्षिकीम् ।
दिव्याभरणावस्त्राढ्यां दिव्यवर्णक्रियां सदा ॥ १४५ ॥
वस्त्रैरापादगूढां च दिव्यालङ्कारभूषिताम् ।
अपने आसन पर खड़ी अथवा सुखपूर्वक बैठी हुई अथवा वाहन पर स्थित, दाढ़ी तथा मूंछ से एवं निमेष से रहित, सदा १६ वर्ष की अवस्था वाली, दिव्य आभरण तथा वस्त्र से युक्त, दिव्य वर्ण तथा क्रियावाली, वस्त्रों से पैर तक ढकी हुई, दिव्य अलङ्कारों से भूषित ऐसी पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त अपने इष्टदेव की प्रतिमा बनवानी चाहिये ।

हीनाङ्गो नाधिकाङ्गश्च कर्त्तव्या देवताः क्वचित् ॥ १४६ ॥
हीनाङ्गी स्वामिनं हन्ति ह्यधिकाङ्गी च शिल्पिनम् ।
कृशा दुर्भिक्षदा नित्यं स्थूला रोगप्रदा सदा ॥ १४७ ॥
**अनिष्टकारक प्रतिमा के लक्षण—**हीन तथा अधिक अङ्गोंवाली देवता की प्रतिमा कभी नहीं बनवानी चाहिये । क्योंकि हीन अङ्गवाली प्रतिमा मूर्त्ति बनवानेवाले स्वामी को एवं प्रमाण से अधिक अङ्गोंवाली शिल्पी ( मूर्त्तिकार ) को नष्ट कर देती है । कृश अङ्गवाली नित्य दुर्भिक्ष ( अभाव ) देनेवाली और स्थूल अङ्गवाली प्रतिमा सदा रोग देनेवाली होती है ।

गूढसन्ध्यस्थिधमनी सर्वदा सौख्यवर्धिनी ।
**सौख्यदायक प्रतिमा के लक्षण—**जिसकी सन्धि, अस्थि तथा धमनियां नहीं दिखाई पड़ती हैं ऐसी प्रतिमा सर्वदा सुख बढ़ानेवाली होती है ।

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२६० शुक्रनीतिः

वराभयाब्जशङ्खाढ्यहस्ता विष्णोश्च सात्त्विकी ॥ १४८॥
मृगबाणाभयवर-हस्ता सोमस्य सात्त्विकी ।
**सात्त्विक प्रतिमाओं का वर्णन—**विष्णु की जिस मूर्त्ति में क्रम से वर तथा अभयदान की मुद्रा एवं कमल तथा शङ्ख से युक्त चारों हाथ होते हैं वह 'सात्त्विक' कहलाती है । मृग, बाण, अभय तथा वरदान की मुद्रा क्रम से चारों हाथों में जिसके रहती है वह चन्द्रमा की 'सात्त्विक मूर्त्ति' कहलाती है ।

वराभयाब्जलड्डुक-हस्तेभास्यस्य सात्त्विकी ॥ १४९॥
पद्ममालाऽभयवर-करा सत्त्वाधिका रवेः ।
गणेश की जो सात्त्विक मूर्त्ति होती है उसके चारों हाथों में क्रम से वर तथा अभय दान की मुद्रा एवं कमल तथा लड्डू होते हैं । सूर्य की जो सात्त्विक मूर्त्ति होती है उसके चारों हाथों में क्रम से कमल, माला, अभय तथा वरदान की मुद्रा होती है ।

वीणालुङ्गाभयवर-करा सत्त्वगुणा श्रियः ॥ १५०॥
लक्ष्मी की सात्त्विक मूर्त्ति में चारों हाथों में क्रम से वीणा, लुङ्ग, अभय तथा वरदान मुद्रा होती है ।

शङ्खचक्रगदापद्मैरायुधैरादितः पृथक् ।
षट्षड्भेदाश्च मूर्तीनां विष्ण्वादीनां भवन्ति हि ॥ १५१ ॥
विष्णु आदि देवताओं की मूर्त्तियों के प्रथम से लेकर चतुर्थ पर्यन्त चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा, पद्म और आयुधों के धारण करने में भिन्नता होने से ६-६ भेद होते हैं ।

यथोपाधिप्रभेदेन ससंयोगविभागतः ।
समस्तव्‍यस्तवर्णादिभेदज्ञानं प्रजायते ॥ १५२ ॥
मूर्त्तियों की जैसी उपाधि (नाम) है उसके अनुसार भेद होने से और वाहन तथा अक्षादियों के संयोग तथा पृथक्ता होने से, समस्त तथा पृथक् पृथक् रूप से वर्णादियों का भेद ज्ञात होता है ।

लेख्या लेप्या सैकती च मृन्मया पैष्टिकी तथा ।
एतासां लक्षणाभावे न कश्चिद्दोष ईरितः ॥ १५३॥
**लक्षणों के अभाव में भी दोषरहित प्रतिमा का निर्देश—**चित्र, लेप, बालू, मिट्टी, तथा चूर्ण-चावल आदि के चूर्ण की पिष्टि (पीठी) के द्वारा बनी हुई इन मूर्त्तियों में शास्त्रानुसार सिद्ध किसी लक्षण की न्यूनता होने पर भी कोई इसमें दोष नहीं मानते हैं अर्थात् यथारुचि बनाई जा सकती हैं ।

बाणलिङ्गे स्वयम्भूते चन्द्रकान्तसमुद्भवे ।
रत्नजे गण्डकोद्भूते मानदोषो न सर्वथा ॥ १५४ ॥

चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१

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चतुर्थोऽध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६१

पाषाणधातुजायां तु मानदोषान् विचिन्तयेत् ।
**प्रमाण तथा दोषरहित प्रतिमा का निर्देश—**स्वयं प्रगट, चन्द्रकान्त मणि से उत्पन्न, रत्न से उत्पन्न, गण्डक नदी से उत्पन्न शालिग्राम, ये सब बाणलिङ्ग कहे जाते हैं इन सब मूर्त्तियों में पूर्वोक्त मानसम्बन्धी दोषों का विचार सर्वथा नहीं करना चाहिये । किन्तु पाषाण तथा धातु-निर्मित मूर्त्तियों में मानविषयक दोषों का विचार करना ही चाहिये ।

श्वेतपीतारक्तकृष्णपाषाणैर्युगभेदतः । ॥ १५५ ॥
प्रतिमां कल्पयेच्छिल्पी यथारुच्यपरैः स्मृता ।
**युगभेद से वर्ण भेद का कथन—**मूर्त्तिकार युगभेदानुसार श्वेत, पीत, किंचित् रक्त तथा कृष्ण वर्ण के पत्थरों से मूर्त्ति का निर्माण करे । और इनसे अन्य काष्ठ आदि से अपनी रुचि के अनुसार मूर्त्ति का बर्त्तन बनावे ।

श्वेता स्मृता सात्त्विकी तु पीता रक्ता तु राजसी ॥ १५६ ॥
तामसी कृष्णवर्णा तु युक्तलक्ष्मयुता यदि ।
**वर्णभेद से सात्त्विकी आदि प्रतिमाओं का निर्देश—**पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त मूर्त्ति यदि श्वेत वर्ण की हो तो 'सात्त्विकी' पीत या रक्त वर्ण की हो तो 'राजसी' और कृष्ण वर्ण की हो तो 'तामसी' कहलाती है ।

सौवर्णी राजती ताम्री रैतिकी वा कृतादिषु ॥ १५७ ॥
**युगभेद से सौवर्णादि का प्रतिमा-विभाग-निर्देश—**और सत्ययुग आदि (त्रेता, द्वापर, कलि) युगों में क्रम से सुवर्ण, चांदी, तामा तथा पीतल की मूर्त्तियां बनानी चाहिये ।

शांकरी श्वेतवर्णा वा कृष्णवर्णा तु वैष्णवी ।
सूर्यशक्तिगणेशानां ताम्रवर्णा स्मृताऽपि च ॥ १५८ ॥
लौही सीसमयी वापि यथोद्दिष्टा स्मृता बुधैः ।
शंकर की मूर्त्ति श्वेत वर्ण की, विष्णु की मूर्त्ति कृष्ण वर्ण की, सूर्य, शक्ति तथा गणेश की मूर्त्ति ताम्र वर्ण की अथवा लोहा तथा सीसा की शास्त्रानुसार बनाने के लिये कही हुई है ।

चलाच्चार्यां स्थिराच्चार्यां प्रासादाद्युक्तलक्षणाम् ॥ १५६ ॥
प्रतिमां स्थापयेन्नान्यां सर्वसौख्यविनाशिनीम् ।
**अयुक्त प्रतिमा के स्थापन का निषेध—**थोड़े दिन के लिये अथवा चिर दिन के लिये पूजनार्थ प्रासाद (मन्दिर) आदि में पूर्वोक्त लक्षणों से युक्त प्रतिमा का स्थापन करना चाहिये । इससे अन्य प्रकार की मूर्त्ति की स्थापना नहीं करनी चाहिये, क्योंकि वह सब सुखों को नष्ट करनेवाली होती है ।

सेव्यसेवकभावेषु प्रतिमालक्षणं स्मृतम् ॥ १६० ॥

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२६२ | शुक्रनीतिः

जहां सेव्य-सेवक भाव है अर्थात् प्रतिमा पूजा करने के लिये बनाई जाती है वहां के लिये ही प्रतिमा के उक्त लक्षण बताये गये हैं अर्थात् जहां आमोद-प्रमोद के लिये बनाई गई है वहां के लिये उक्त नियम नहीं है।

प्रतिमायाश्च ये दोषा ह्यर्चकस्य तपोबलात् ।
सर्वेश्वरचित्तस्य नाशं यान्ति क्षणात् किल ॥ १६१ ॥

**भक्त-पूजक के तपोबल से प्रतिमा-दोषों के नष्ट होने का निर्देश—**और प्रतिमा के जो उक्त दोष हैं वे हर प्रकार से ईश्वर में अनुरक्त चित्तवाले भक्त पूजनकर्त्ता के तपोबल से क्षणमात्र में नष्ट हो जाते हैं अर्थात् उनके लिये दोष नहीं घटित होते हैं।

देवतायाश्च पुरतो मण्डपे वाहनं न्यसेत् ।
द्विबाहुर्गरुडः प्रोक्तः सुचक्षुः स्वक्षिपक्षयुक् ॥ १६२ ॥
नराकृतिश्चञ्चुमुखो मुकुटी कवचाङ्गदी ।
बद्धाञ्जलिर्नम्रशीर्षः सेव्यपादाब्जलोचनः ॥ १६३ ॥

**वाहन-स्थापन तथा वाहनों के लक्षणविषयक निर्देश—**देवता की मूर्ति के आगे मण्डप में उनके वाहन की मूर्ति रखनी चाहिये। और विष्णु के वाहन गरुड की मूर्ति में दो बाहु, चोंच, दो आँख, दो पक्ष सुन्दर रीति से बनानी चाहिये। एवं मुख के स्थान पर चोंच बनाकर शेष अङ्ग मनुष्य की भांति बनाना चाहिये। और मुकुट, कवच तथा अङ्गद (बाजू बन्द) आभूषण से युक्त, अञ्जलि बांधे हुये, सिर झुकाये तथा अपने सेव्य देवता के चरण कमलों की तरफ दृष्टि किये हुये बनाना चाहिये।

वाहनत्वं गता ये ये देवतानां च पक्षिणः ।
कामरूपधरास्ते ते यथा सिंहवृषादयः ॥ १६४ ॥

देवताओं के वाहन-भाव को प्राप्त हुये जो पक्षी या सिंह तथा वृष (बैल) आदि हैं वे सब इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले हैं।

स्वनामाकृतयश्चैते कार्या दिव्या बुधैः सदा ।
सुभूषिता देवताग्रमण्डपे ध्यानतत्पराः ॥ १६५ ॥

विद्वानों को देवता के मण्डप में उनके आगे ध्यान लगाये हुये, दिव्य सुन्दर रीति से अलङ्कृत किये हुये, अपने नामानुरूप आकृतिवाले उक्त वाहन सदा बनाने चाहिये।

मार्जारकृतिकः पीतः कृष्णचिह्नो बृहद्वपुः ।
असटो व्याघ्र इत्युक्तः सिंहः सूक्ष्मकटिर्महान् ॥ १६६ ॥
बृहद्भूगण्डनेत्रस्तु भालरेखो मनोहरः ।
सटावान् धूसरोऽकृष्णलाञ्छनश्च महाबलः ॥ १६७ ॥

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चतुर्थाध्याये लोकधर्मनिरूपणप्रकरणम् २६३

जो बिल्ली के समान आकृतिवाला पीत वर्ण का, काले चिह्नों से युक्त, ह्रस्व शरीर वाला, कन्धे के बालों (जटा) से रहित पशु होता है उसे 'व्याघ्र' कहते हैं और सिंह की कमर पतली तथा शरीर भारी होता है। पूर्व भौंह, गण्डस्थल तथा नेत्र बड़े होते हैं। भाल पर रेखायें होती हैं। यह देखने में सुन्दर तथा कन्धे पर बड़े २ बालों से युक्त, धूसर वर्ण का काले चिह्नों से रहित बड़ा बलवान् पशु होता है।

भेदः सटाल्लञ्छनतो नाकृत्या व्याघ्रसिंहयोः ।

व्याघ्र तथा सिंह में केवल कन्धे पर जटा (बड़े-बड़े बाल) का तथा काले लान्छन का भेद होता है। आकार दोनों के समान ही होते हैं।

गजाननं नराकारं ध्वस्तकणं पृथूदरम् ॥ १६८ ॥
बृहत्संक्षिप्तगहन-पीनस्कन्धाङ्घ्रिपाणिनम् ।
बृहच्छुण्डं भग्नवामरदमीप्सितवाहनम् ॥ १६९ ॥
ईषत्कुटिलदण्डाग्रवामशुण्डमदक्षिणम् ।
सन्ध्यस्थिधमनीगूढं कुर्यान्मानमितं सदा ॥ १७० ॥

**गणेश की मूर्ति के लक्षण तथा अवयवों का प्रमाण—**गणेश जी की मूर्ति में मुख हाथी के समान तथा अन्य अङ्ग मनुष्य के समान बनाना चाहिये। कान—हाथी के समान लम्बा-चौड़ा, उदर—स्थूल, बृहत्, संक्षिप्त, घन और स्थूल स्कन्ध, चरण तथा हाथ बनाने चाहिये। एवम् शूंड़—लम्बी, बायाँ दांत टूटा हुआ और इच्छानुसार वाहन बनाना चाहिये। शुण्ड का दण्ड अग्रभाग में बाईं ओर कुछ मुड़ा हुआ होना चाहिये, दक्षिण ओर नहीं होना चाहिये। और सन्धि, अस्थि तथा धमनी नहीं दिखाई पड़नी चाहिये। इस भाँति शास्त्रोक्त प्रमाणानुसार सदा मूर्ति बनाना चाहिये।

सार्धचतुस्तालमितः शुण्डादण्डः समस्ततः ।
दशाङ्गुलं मस्तकं च भ्रूगण्डश्चतुरङ्गुलः ॥ १७१ ॥

सम्पूर्ण सूंड की लम्बाई साढ़े चार ताल (विस्तृत अंगूठा से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त एक ताल होता है) प्रमाण, मस्तक-दश अंगुल प्रमाण, भौंह तथा गण्ड स्थल चार अंगुल प्रमाण बनाना चाहिये।

नासोत्तरोष्ठरूपा च शेषा शुण्डा सपुष्करा ।
दशाङ्गुलं कर्णदैर्घ्यं तदष्टाङ्गुलविस्तृतम् ॥ १७२ ॥

नासिका तथा ऊपर का ओष्ठ इन दोनों के स्थान पर शूंड़ ही होती है। और शूंड़ का मूल भाग उत्तरोष्ठ रूप समझना चाहिये तथा अवशिष्ट पुष्कर (शुण्ड का अग्रभाग) सहित शूंड़ का भाग समझना चाहिये। कान की लम्बाई दश अंगुल की और चौड़ाई आठ अंगुल की होनी चाहिये।