शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)
Shukra Niti of Shukracharya Hindi
by महर्षि शुक्राचार्य
Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)
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Read in context२४६ | शुक्रनीतिः
खदिराश्मन्तशाकाग्निमन्थस्योनाकबन्बुलाः ।
तमाल-शाल-कुटज-धवार्ज्जुनपलाशकाः ॥ ५८ ॥
सप्तपर्ण-शमीतुङ्ग-देवदारु-विकङ्कताः ।
करमर्दैङ्गुदीभूर्ज-विषमुष्टि-करीरकाः ॥ ५९ ॥
शल्लकी काश्मरी पाठा तिन्दुको बीजसारकः ।
हरीतकी च भल्लातः शम्पाकोऽर्कैश्च पुष्करः ॥ ६० ॥
अरिमेदश्च पीतद्रुः शाल्मलिश्च बिभीतकः ।
नरवेलो महावृक्षोऽपरे ये मधूकादयः ॥ ६१ ॥
प्रतानवत्यः स्तम्बिन्यो गुल्मिन्यश्च तथैव च ।
ग्राम्या ग्रामे वने वन्या नियोज्यास्ते प्रयत्नतः ॥ ६२ ॥
जैसे— खैर, अश्मन्तक, सागौन, अरणी, सोनापाठा, बबूर, तमाल, शाल, कुटज (खोरया), अर्जुन, पलाश, धव, सतवन, शमी, तून, देवदारु, विकङ्कत, करौंदा, इङ्गुदी, भोजपत्र, कुचिला, करीर, सलई, खम्भार, पाढ़र, तेंदू, विजय-सार, हरड़, भिलावा, शम्याक, आक, पोहकर, दुर्गन्ध खैर, पीतद्रु, सेमर, बहेड़ा, नरवेल, महावृक्ष और अन्य जो महुआ आदि एवं प्रतान (लम्बी २ पतली शाखाओं) वाली, गुच्छोंवाली, गुल्म (मूल) वाली लतायें हैं इनमें से जो ग्राम में होनेवाले हैं उन्हें ग्राम में और जो वन में होनेवाले हैं उन्हें वन में यत्नपूर्वक लगाना चाहिये।
कूपवापीपुष्करिण्यस्तडागाः सुगमास्तथा ।
कार्याः खाताद् द्वित्रिगुण-विस्तारपदधानिकाः ॥ ६३ ॥
कूपादि में उतरने योग्य सीढ़ियों के बनाने का निर्देश— कूआ, बावली, छोटा तालाब, बड़ा तालाब आदि जलाशय ऐसे बनवाने चाहिये जिसमें लोग सुगमता से उतर सकें। और जलाशय की गहराई से दुगुनी या तिगुनी विस्तार में उसके चारों ओर सीढ़ियां बनवानी चाहिये।
यथा तथा ह्यनेकाश्च राष्ट्रे स्याद्विपुलं जलम् ।
नदीनां सेतवः कार्या निबन्धाः सुमनोहराः ॥ ६४ ॥
नौकादिजलयानानि पारगानि नदीषु च ।
देश में विपुल जल होने एवं पुल आदि बनवाने का प्रबन्ध करने का निर्देश— इस तरह के बहुत से जलाशय राज्य में बनवाना चाहिये, जिससे बहुत जल उनमें भरा रहे। अनेक प्रकार के अत्यन्त मनोहर नदियों में पुल भी बनवाना चाहिये। और नदियों को पार करने के लिये उनमें नौका आदि जलयान बनवाकर रखना चाहिये।
यज्जातिपूज्यो यो देवस्तद्विद्यायाश्च यो गुरुः ॥ ६५ ॥