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शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

शुक्र नीति (महर्षि शुक्राचार्य - हिन्दी टीका सहित)

Shukra Niti of Shukracharya Hindi

by महर्षि शुक्राचार्य

Source: Shukra Niti with Vidyodini Sanskrit-Hindi Commentary (origin)

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DevanagariHindipublished526 pages

Page 338 of 526

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Page 338

२५२ | शुक्रनीतिः


चाहे जिस मान की प्रतिमा बनावे, सभी मानों में शिखा पर्यन्त केशों का मान ३ ही अङ्गुल मानना चाहिये। इस रीति से ७, ८ तथा १० ताल प्रमाण की प्रतिमाओं के अङ्ग-निर्माण में त्रैराशिक नियमानुसार मान-कल्पना करनी चाहिये ।

चतुस्तालात्मकौ बाहू अङ्गुल्यन्तावुदाहृतौ ।
स्कन्धादिकूर्परान्तं च विंशत्यङ्गुलमुत्तमम् ॥ ९९ ॥
त्रयोदशाङ्गुलं चाधः कक्षायाः कूर्परान्तकम् ।
अष्टाविंशत्यङ्गुलस्तु मध्यमान्तः करः स्मृतः ॥ १०० ॥

अङ्गुलि पर्यन्त दोनों बाहुओं की लम्बाई ४ ताल प्रमाण कही हुई है। स्कन्ध से लेकर कूर्पर (केहुनी) पर्यन्त २० अङ्गुल की लम्बाई उत्तम कही है। कक्षा (कांख) के नीचे से कूर्पर पर्यन्त की लम्बाई १३ अङ्गुल की होनी चाहिये। कूर्पर से मध्यमा अङ्गुलि पर्यन्त हाथ की लम्बाई २८ अङ्गुल प्रमाण कहा हुआ है ।

सप्ताङ्गुलं करतलं मध्या पञ्चाङ्गुला मता ।
सार्धत्रयाङ्गुलोऽङ्गुष्ठस्तर्जनीमूलपर्वभाक् ॥ १०१ ॥
पर्वद्वयात्मकोऽन्यासां पर्वाणि त्रीणि त्रीणि तु ।
अर्धाङ्गुलेनाङ्गुलेन हीनानामा च तर्जनी ॥ १०२ ॥
कनिष्ठिकानामिकातोऽङ्गुलोना च प्रकीर्तिता ।

उसमें ७ अङ्गुल का करतल, ५ अङ्गुल लम्बी मध्यमा अङ्गुलि मानी गई है। अंगूठे की लम्बाई ३॥ अङ्गुल प्रमाण होनी चाहिये और वह तर्जनी के मूल भाग तक पहुँचनेवाली एवं दो पर्व (पोर) वाला होना चाहिये। और अन्य सभी अङ्गुलियों में तीन २ पोर होने चाहिये। तथा मध्यमा अङ्गुलि से आधा अङ्गुल छोटी अर्थात् ४॥ अङ्गुल लम्बी अनामिका (कनिष्ठिका के बगल की) अङ्गुलि और १ अंगुल छोटी (४ अंगुल लम्बी) तर्जनी (अंगूठा के बगल की) अंगुलि होनी चाहिये।

चतुर्दशाङ्गुलौ पादौ अङ्गुष्ठो द्वयङ्गुलो मतः ॥ १०३ ॥
सार्द्धद्वयाङ्गुलोऽङ्गुष्ठस्तन्मिता वा प्रदेशिनी ।
प्रदेशिनी द्व्यङ्गुला तु सार्धाङ्गुलमयैतराः ॥ १०४ ॥

१४ अंगुल लम्बे दोनों पैर होने चाहिये। उसमें अंगूठा दो अंगुल प्रमाण का और प्रदेशिनी (अंगूठे के बगल की) अंगुली भी २ अंगुल प्रमाण की अथवा अंगूठा और प्रदेशिनी ढाई २ अंगुल प्रमाण की तथा अन्य अंगुलियां डेढ़ २ अंगुल प्रमाण की बनानी चाहिये।

शिरोष्णिप्तौ पाणिपादौ गूढगुल्फौ प्रकीर्तितौ ।