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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

65. वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ?

बच्चोंका मल, मूत्र और नींद ।

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साल भरका हो जाय तो दोपहरको पाखाना जानेकी वान बुड़ा देनी चाहिये । बहुत सी अज्ञान माताएँ दूध पिला कर पाखाना कराती हैं, पर यह अनुचित है । इससे कुछ खा कर पाखाना जानेकी वान पड़ जाती है कि जिससे मेदा खराब हो जाता है । इसलिये पाखाना होनेके पीछे दूध देना चाहिये ।

पैदा होनेके बाद बच्चोंको एक, खास तरहकी नींद आती है । पहलेके चार दिनोंमें वह खूब सोता है । इसमें दो भेद हैं । जो बच्चा बहुत कष्टके साथ उत्पन्न होता है वह अचेत होकर सोता है । और वे बच्चे कि जो साधारण रीतिसे उत्पन्न होते हैं अचेत होकर नहीं सोते । इसका कारण यह है कि जो बच्चा कष्टके साथ पैदा होता है उसको बड़ी थकावट आजाती है । जब कि बच्चा अचेत होकर सोता है, माताएँ तरह तरहके विचार उत्पन्न करती हैं । सबसे पहले इनको भूत प्रेतका खयाल आता है ।

जो बच्चा दस मासतक कोठरीमें बन्द रह कर पैदा हुआ है, वह तुरन्त ही कैसे खेल सकता है । पैदा होते समयमें जिसके शरीरको अनेक प्रकारकी असावधानियोंसे कष्ट सहना पड़ा है, वह तुरन्त ही माताके गोदका खिलौना कैसे बन सकता है ? उसका तो भूख प्यासके समय ही जागना बहुत है । जो बच्चे स्वास्थ्य हैं वे कम रोते और बहुत सोते हैं, परन्तु रोगी बच्चे बहुत रोते और कम सोते हैं । नीचेकी सूचीसे ज्ञान होगा कि बच्चोंको कितना सोना चाहिये ।

१७

२५८

सन्तति-शास्त्र ।

अवस्थाचाँबीस घटे मेंदिन में कितनारात में कितना
पहला दिन२० से २२ घंटे तक००
एक मप्ताहतक२० से २१ ,,००
एक मासतक१८ से २० ,,८ मे १० घटे तक१० घटे
चार मासतक१६ से १८ ,,६ से ८ घंटे तक१० घटे
छ मासतक१४ से १७ ,,४ से ७ ,,१० ,,
नौ मासतक१४ मे १६ ,,४ से ६ ,,१० ,,
मूक वर्षतक१३ से १४ ,,३ से ६ ,,९ ,,
मया वर्षतक१२ से १४ ,,३ से ५ ,,९ ,,
देड वर्षतक११ से १३ ,,२ से ३ ,,९ ,,
ठो वर्षतक१० से १२ ,,१ से ३ ,,९ ,,
तीन वर्षतक१० से ११ ,,१ से २ ,,९ ,,
चारसे पांच वर्षतक१० घटे०१० ,,
छमे आठ वर्षतक६ १/२ ,,०६ १/२ ,,
आठमे ढम वर्षतक८ १/२ ,,०८ १/२ ,,
ग्यारहसे पन्द्रह वर्षतक८ ,,०८ ,,

रोगकी बुशामें बच्चे बहुत कम सोते हैं। परन्तु अपने आरामके वास्ते माताएँ अफीम इत्यादि खिला देती हैं। यह बड़ा अनुचित व्यवहार है। इससे कच्चा सरौखे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। अतएव बच्चोंको कोई भी। मादक पदार्थ कभी न देना चाहिये।

बच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २५६

( ६५ ) बच्चोंको किस तरह और कितना

दूध पिलाना चाहिये ?

बच्चोंको दूध पिलाना कोई सरल काम नहीं है। वे माताएँ कि जिनको पहले पहल बच्चा होता है, उनको दूध पिलानेका ढंग ही नहीं होता। इनकी तो बात ही क्या ? वे ख़ियाँ कि जो कई बच्चों की माता हो चुकी हैं, उन्हें भी प्रायः यह ज्ञान नहीं होता। ऐसी माताएँ बड़ी असावधानी करती हैं। जब ये दूध पिलाती हैं तो बच्चे के मुखमें स्तनका अगला भाग ठीकरीतिसे नहीं जाता। प्रायः नाकपर जा लगता है। इससे श्वांस घुटने लगती है और बच्चा स्तन छोड़ देता है। ऐसी दशामें स्तनोंमें दूध होनेसे माताको कष्ट होता है। प्रायः माताएँ अपने वदनको सुडौल रखनेके लिये बच्चोंको थोड़ा दूध पिलाती हैं और यह बहाना करती हैं जि दूध उतरता ही नहीं। ऐसे बच्चोंको गाय और वकरीका दूध पिलाया जाता है। परन्तु ऐसा बहाना बड़ी हानी चहुँचाता है। इसमें सन्देह नहीं कि माताओंको अपने स्तनोंकी रक्षा जरूर करनी चाहिये, परन्तु ऐसी रक्षा किस काम की कि जिसमें हानि हो ? प्रायः ऐसा भी होता है कि सर मार मार कर गाय मैसोंके बच्चोंकी तरहसे बालक दूध पीते हैं। ऐसी दशामें छातीकी नसोंमें बड़ा थक्का पहुँचता है। अतएव ऐसी वान छुड़ा देनी चाहिये। मारने और चिल्लानेसे वान नहीं छूटती। जब ऐसा होता बच्चेको स्तनोंसे अलगकरके थोड़ी देर दूध नहीं पिलाना चाहिये। इस प्रकार वान छूट जायगी। दूध पिलानेमें ढीली छतियोंवाली माताको कुछ दुःख होता है पानीमें फिटकरी घोलकर दिनमें चार पाँच बार धो डालनेसे छाती कड़ी बनी रहती है।

२६०

सन्तति-शास्त्र

प्रायः देखा गया है कि बच्चा दूध पी चुका है। ज्ञातियोंमें दूध लंगा है। मक्खियाँ भिन्न भिन्न करके ज्ञातियोंसे चिपटी जाती हैं। बच्चा आया और फिर पीने लगा। 'इस' कारण बच्चोंमें अनेक रोग हो जाते हैं। अतएव प्रत्येक माताको चाहिये कि दूध पिलानेके पहले और पीछे वह जरूर स्तनोंको धो डाले।

प्रायः माताओंको एक ही ज्ञाती पिलानेकी वान पड़ जाती है। ऐसा न होना चाहिये वरावर दोनों ज्ञातियों पिलाना चाहिये। ऐसा करनेसे एक ज्ञाती बड़ी और एक छोटी हो जाती है एकसे अधिक दूध आता है और दूसरेसे कम। कभी कभी ऐसा भी होता है कि एक ज्ञाती से दूधका आना विलकुल बन्द हो जाता है। ऐसा भी देखा गया है कि जो स्तन बच्चा अधिक पीता है सिंचावके कारण उसमें सूजन आ जाती है और एक भी जाता है अतएव दोनों स्तन वरावर पिलाना चाहिये।

जिस प्रकार अन्न खानेवालोंको बार बारका भोजन हानि पहुँचाता है इसी प्रकार बच्चोंको बार बारका पीया हुआ दूध नुकसान करता है। अतएव बचपनसे ही नियम के अनुसार दूध पीनेकी वान डालनी चाहिये। प्रायः माताएँ बिना भूख भी बच्चोंको दूध पिला देती हैं, जब जरा बच्चा रोया फौरन दूध पिला दिया। यह इस बातपर पूरा विश्वास रखती हैं कि बच्चा उसी समय रोता है जब कि वह भूखा होता है। इस अंधपरम्पराको माननेवाली सौमें अढ़ानेसे स्त्रियाँ हमारे देशमें मौजूद हैं। कैसे दूध पिलाना चाहिये? हमारे देशमें इसका कोई नियम नहीं है। खड़े होकर, लेट कर, करवट लेकर, चित्त लेट कर, चलते फिरते जैसा मौका लगा पिला दिया। इनको तो बच्चेके पेटमें दूध पहुँचानेसे काम है !

बच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६१

एक विद्वानकी राय है कि बच्चेको करबट सुला कर दूध पिलानेसे बच्चेके कानमें दूध आ जाता है। इसी कारण प्रायः बच्चे बहुरे हो जाते हैं। कान बहा करता है। अतएव माताओंको चाहिये कि दूध पिलाती समय पैर पसार कर या कुरसी मोढ़ेपर बैठकर बच्चेका सर हाथमें ले और मुँह ठीक स्तनके सामने लावें और दूसरे हाथसे स्तनका अगला हिस्सा मुँहमें लगा दें। बच्चा आरामसे दूध पी लेगा और उसको किसी प्रकारकी बाधा न होगी। माताओंको यह अन्दाज नहीं आता कि हमने कितना दूध पिलाया। जबतक बच्चा छाती नहीं छोड़ता पिलाए चली जाती हैं। बच्चेको भी इतना ज्ञान नहीं कि मैंने कितना दूध पीया। न माताको अन्दाज न बच्चेको ज्ञान, यही रोगका कारण है। सबल और निर्बल बच्चे होते ही हैं। इनके साथ एकसा ज्यहार नहीं होना चाहिये। जितना दूध सबल बच्चा पी सकता है उतना निर्बल नहीं पी सकता। इसलिये सबल बच्चेको दस मिनिट और निर्बलको आठ मिनिट हर बार दूध पिलाना चाहिये। सबल और निर्बल बच्चोंको दिन रातमें कै बार दूध पिलाना चाहिये यह एक बड़ा गंभीर प्रश्न है। इस विषयमें विद्वानोंके मातानुसार एक सूची नीचे दी जाती है। (यह माताके दूध की सूची है)

— २६१ —

२७२

सन्तति-शाखा ।

श्रवण्यादिन रातमें कितने बार पिलाना चाहिएदिन रातमें सबलको के बार पिलाना चा°दिन रातमें निर्बलको के बार पिलाना चा°
सबलनिर्बलसबलनिर्बल
पहला दिन४ बार३ बार३ बार
दूसरा दिन६ "५ "५ "
३ दिनसे २० दिन तक१० "८ "५ "
तीसरे सप्ताहसे १२ मास तक८ "७ "७ "
३ माससे ५ मास तक७ "६ "६ "
६ माससे १२ मास तक६ "५ "५ "
१३ माससे १८ मास तक५ "५ "४ "

वच्चोंको किस तरह और कितना दूध पिलाना चाहिये ? २६३

डेढ़ वर्षके पीछे वच्चोंको माताका दूध पिलाना ही नहीं चाहिये । प्रायः वे वच्चे कि जिनको जन्मसे ही माताका दूध नहीं मिलता उनका पोषण गाय अथवा बकरीके दूध से होता है । इसमें भी स्त्रियाँ अनेक असावधानी करती हैं । इनका यह खयाल होता है कि जितना अधिक बच्चा दूध पीयेगा उतनाही पुष्ट होगा । यह एक भ्रम है । पैसा करनेसे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं । गाय अथवा बकरीका दूध कितना और कै बार पिलाना चाहिये, विद्वानोंके मतानुसार इसकी भी एक सूची नीचे दी जाती है । यहाँ सूर्य निकलने से अस्त होने तक दिन और शामसे आगे रातका समय जानना चाहिये ।

अवस्थासबल वच्चोंको २४ घंटोंमें कै बार और कितना दूध पिलाना चाहिये
दिनमें कै बाररातमें कै बार
पहला दिन३
दूसरा दिन३
३ दिनसे १० दिनतक४
११ दिनसे २० दिनतक५
२१ दिनसे ३० दिनतक६
१ माससे ११ मासतक६
११ माससे २ मासतक८
तीसरे महीनेसे पाँचवेंतक८
छठे और सातवें मासमें८
आठवें और नवें मासमें८
दसवें और ग्यारहवें मासमें८
बारहवें महीनेमें८
तेरहवेंसे १८ मासतक८

२६४

सन्तति-शास्त्र ।

श्रवस्था | निर्वल बच्चेको २४ घंटैमै कै वार
और कितना दूध पिलाना चाहिये
---|---
दिनमै कै
वार | रातमै कै
वार | कितना दूध
दिन रातमै
पहला दिन | २ | वार | १ | वार | ३ | छटांक
दूसरा दिन | २ | " | १ | " | ३ | "
३ दिनसे १० दिनतक | ३ | " | २ | " | ५ | "
११ दिनसे २० दिनतक | ५ | " | २ | " | ७ | "
२१ दिनसे ३० दिनतक | ५ | " | ३ | " | ८ | "
१ माससे ११ मासतक | ६ | " | ३ | " | १० | "
११ माससे २ मासतक | ६ | " | ३ | " | १२ | "
तीससे महीनेसे पांचवैँतक | ७ | " | ३ | " | ११ | सेर
छठे और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | "
आठवैँ और सातवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | ११ | "
दसवैँ और ग्यारहवैँ मासमै | ७ | " | ३ | " | २१ | "
बारहवैँ महीनेमै | ७ | " | ३ | " | २१ | "
बारहवैँसे १८ मासतक | ७ | " | ३ | " | २१ | "

सबल और निर्वलसे यह मतलब नहीं है कि अत्यन्त सबल और अत्यन्त निर्वल, इससे यह अर्थ लेना चाहिये कि अच्छे शरीरवाला और निर्वल वह कि जो अच्छेसे कुछ निर्वल हो। जो बच्चे अत्यन्त दुर्बल हों उनकी योग्यता के अनुसार व्यवहार करना चाहिये। छ मासके बाद बच्चोंको कुछ थोड़ा थोड़ा अन्न देना चाहिये। इस प्रकार बच्चेका पोषण करना भविष्यके लिये अच्छा है।

बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।

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(६६) बच्चोंकी ज्ञानेन्द्रिय ।

जिस प्रकार हमारी ज्ञानेन्द्रिय प्रबल होती है, इस प्रकार तुरन्तके पैदा हुए बच्चेकी नहीं होती । पैदा होनेसे चौबीस घंटेतक बच्चोंको कुछ नहीं सुनाई देता । इसके बाद थोडाथोड़ा सुनने लगते हैं । कारण यह कि बच्चेका मस्तक अत्यन्त कोमल होता है, इसलिये वह धीरे २ अपना काम करता है । इसीसे भारी शब्द होनेपर बच्चेचौंक उठते हैं । चार महीनेके बालकमें मामूली आवाज सुननेकी ताकत आ जाती है । इसी तरह बोलनेके भी अनेक भेद हैं । कोई देरमें और कोई जल्द बोलने लगता है । लड़कोंसे लड़कियाँ जल्द बोलती हैं । प्रायः दो वर्षकी अवस्थातक अच्छी तरह पता नहीं लग सकता कि बच्चा कैसा बोलेगा ? यदि दो वर्षके बाद बच्चा बोलनेमें उन्नति नकरे तो समझना चाहिये कि इसके मस्तकमें कुछ दोष है । होशियार बच्चोंका मस्तक कुछ बड़ा होता है । पैदा होनेपर सर १३ और १४ इञ्च गोल होना चाहिये, यदि छोटा हो तो बच्चेको बुद्धि-हीन समझना चाहिये; क्योंकि बुद्धि मस्तकपर ही निर्भर है । इसलिये मस्तकका वह भाग जहाँ बुद्धिका स्थान है ऐसेबच्चोंमें बहुत छोटा होता है । इसी प्रकार रस उत्पन्न होते ही बच्चेको रसका ज्ञान होता है और स्वादको पहचानने लगता है । सृष्टिनेका ज्ञान भी उसी समय होता है जबकि प्राणेन्द्रिय कुछ प्रबल पड़ती है । यह प्रायः डेढ़ सालके बाद होता है । इसी प्रकार और इन्द्रियाँ अपने समयपर विकास पाती हैं ।

(६७) स्त्री और पशुओंके दूधका अन्तर ।

जबतक बच्चा अन्न न खाने लगे उस समयतक उसका जीवन दूधपर ही निर्भर रहता है । इसलिये ईश्वरने स्त्री, गाय,