संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
61. वच्चोंकी तौल
वच्चोंकी तौल ।
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कारण यह है कि गर्भावस्थामे यहाँ माताएँ भोजनपर किञ्चित् विचार नहीं रखतीं, परन्तु यूरोपकी माताएँ गर्भावस्थामे अच्छे से अच्छा, पुष्ट, बलकारी भोजन करती हैं । उत्पन्न होनेके दिन से बारह वर्षतक वच्चोंकी तौलपर ध्यान रखना चाहिये, क्योंकि प्रारम्भसे ही शरीरकी उन्नति होना आवश्यक है । इस विषयमें विद्वानोंकी रायके अनुसार एक सूची नीचे दी जाती है ।
उत्पन्न होनेपर वच्चोंकी तौल कमसे कम आयुके अनुसार निम्नलिखित क्रोकेके अनुसार होनी चाहिये ।
| वच्चोंकी आयु | तौल | वच्चोंकी आयु | तौल |
|---|---|---|---|
| पैदा होते ही | ३ सेर | ६ मास | १० सेर |
| १५ दिन | ३½ " " | १० " | १०½ " |
| १ मास | ४ " " | ११ " | १०¾ " |
| १½ " " | ४½ " " | १२ " | ११ " " |
| २ " " | ५ " " | १ वर्ष | १२ " " |
| २½ " " | ५½ " " | १½ " " | १२½ " " |
| ३ " " | ५¾ " " | १ " " | १३ " " |
| ३½ " " | ६ " " | २ " " | १४½ " " |
| ४ " " | ६½ " " | ३ " " | १६ " " |
| ४½ " " | ७ " " | ४ " " | १७½ " " |
| ५ " " | ७½ " " | ५ " " | १८½ " " |
| ५½ " " | ८ " " | ६ " " | २० " " |
| ६ " " | ८½ " " | ७ " " | २२ " " |
| ६½ " " | ९ " " | ८ " " | २५ " " |
| ७ " " | ९½ " " | ९ " " | २८ " " |
| ७½ " " | १० " " | १० " " | ३२ " " |
| ८ " " | १०½ " " | ११ " " | ३६ " " |
| ८½ " " | ११ " " | १२ " " |
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सन्तति-शास्त्र ।
कमसे कम इतना वजन बच्चोंमें होना आवश्यक है । यदि इससे कम हो तो वे निरोग नहीं कहे जा सकते ।
इन दिनोंमें माताओंको अनेक पुरुष पदार्थ खाने चाहियें; क्योंकि जो माताएँ खाने पीनेपर ध्यान नहीं रखतीं उनके बच्चे डुबले पतले और कम वजनके बने रहते हैं । बच्चा जब तक दूधके ही आसरे रहता है उस समयतक माताके आहारपर ही उसका जीवन होता है । इसलिये माता जैसा भोजन करेगी उसीके अनुसार बच्चेका वजन बढ़ेगा । जब बचपनमें वजनकी कमी रह जाती है तो वह पूरी नहीं होती । यदि होती भी है तो वर्षों लगते हैं । इसलिये बच्चोंको प्रारम्भसे ही चलवाना चनाना हमारा कर्तव्य है ।
(६२) धाय कैसी होनी चाहिये ?
बच्चोंकी जीवन-यात्राके लिये यह एक बड़ा प्रश्न है कि धाय कैसी हो ? प्रायः माताएँ स्तनोंमें दूध न होने या बच्चा पैदा होकर बारम्बार मर जाने या अपने स्तनोंको सुन्दर सुडौल बनाए रखनेके कारण दूध नहीं पिलातीं । ऐसी दशामें बच्चे गाय, भैंस और बकरियों या धायोंके दूधपर पाले जाते हैं । धाय कैसी होनी चाहिये ? यह एक बड़े महत्वका प्रश्न है ।
वैद्यकशास्त्रके एक विद्वान्ने कहा है कि धायको माताके समान होना चाहिये । ( १० क० )
इसका तात्पर्य यह है कि जो कार्य माताका बालकके प्रति है वही धायका भी है । अतएव धायका सर्व-गुण-संपन्न होना आवश्यक है । विद्वानोंने इस विषयका अनेक प्रकारसे प्रतिपादन किया है ।