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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

60. जन्म लेनेपर वचको दूध कब पिलाना चाहिये ?

जन्म लेनेपर वच्चको दूध कव पिलाना चाहिये ? २४६

मातापैँ हो चुकी हैं, उनके प्रायः उसी दिनसे उत्तर आता है। जब दूध न उत्तरे तो गाय या बकरीका दूध पिलाना चाहिये। परन्तु दूध न उत्तरनेपर भी वच्चको चार बार स्तनोंमें लगाना जरूरी है। इसलिये कि बच्चा अपने दूधका स्थान न भूले और दूधके प्रवाहकी उत्तेजना होती रहे। प्रायः देखा गया है कि स्तनोंमें भरपूर दूध भरा रहनेपर भी बच्चा दूध नहीं पिता। धरके लोग माताकी असावधानी और भूत प्रेतका अनुमान करते हैं, परन्तु कारण कुछ और ही होता है। प्रायः मुँहके अंदर भाग इत्यादिकी सफाई न होनेसे बच्चा छाती नहीं दवा सकता। किसी किसीके जीभके नीचे एक प्रकारकी भिल्ली लगी होती है, उससे बच्चा दूध नहीं खाँच सकता। ऐसी दशामें इन बातों को देख लेना जरूरी है। ऐसी भिल्ली काट देनेसे बच्चा दूध पीने लगता है। जिन स्त्रियोंमें छोटी भिटनी होती है उनसे बच्चे ठीक तौरसे दूध नहीं खाँच सकते। भिटनी छोटी पड़ जानेका कारण यह है कि जो स्त्रियां स्तनोंको खूब कस कर रखती हैं तो दवाव के कारण भिटनी छोटी पड़ जाती है। ऐसी दशाओंमें बच्चको दूध पीना कठिन पड़ जाता है। बहुत सी मातापैँ बच्चको लगातार देरतक दूध पिलाती हैं। ऐसा न होना चाहिये। इससे बच्चा अधिक दूध पी जाता है। ज्यादासे ज्यादा एक बारमें दस मिनटसे अधिक दूध न पिलाना चाहिये।

प्रायः विलासप्रिय मातापैँ अपना दूध नहीं पिलाती, उनके स्तनोंमें दूध सूख जाता है, नसँ कड़ी पड़ जाती हैं। यदि दूसरा बच्चा होनेपर वे पिलाना चाहें तो दूध उत्तरनेमें बड़ी कठिनाई पड़ती है। जिन माताओंके बच्चे बार बार मर जाते हैं, उनके दूधमें एक प्रकारका विष होता है। ऐसी माताओंके

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सन्तति-शास्त्र ।

बच्चे धायके यहां पाले जाने उचित है। परन्तु पैदा होनेके साथ ही धायका दूध पिलाना ठीक नहीं। कमसे कम एक मास गाय या बकरीका दूध पिलाकर जब कि बच्चेकी पाचन-शक्ति ठीक हो जाय, तब धायका दूध पिलवाना चाहिये। सब से उत्तम तो यह है कि धायका दूध न पिलाया जाय। गाय और बकरी के दूधपर बच्चा अच्छी तरह पाला जा सकता है।

(६१) बच्चोंकी तौल ।

हमारे देशमें इस बातको अशुभ मानते हैं कि पैदा होते ही बच्चेको तौला जावे। परन्तु इसके अतिरिक्त और कोई रीति तौल जाननेकी नहीं है। तौलनेसे बच्चेके स्वास्थ्यका पता ठीक लग सकता है। जो बालक जितना हलका होगा उसको उतना ही रोगी समझना चाहिये। पैदा हुए बच्चेको तौल ३ सेरसे ५सेर तक जरूर होना चाहिये। कहीं कहीं इससे कुछ अधिक तौलके भी उत्पन्न होते हैं। बच्चा जब पैदा होता है उसमें जितनी तौल उस समय होती है वह दो तीन दिन पीछे नहीं रह जाती। प्रायः ३ सेरकी कमी अवश्य हो जाती है। इसके दो कारण हैं—पक तो यह कि पैदा होनेके बाद बच्चा पाखाना पेशाब करता है, दूसरा यह कि दो तीन दिन ठीक ठीक दध नहीं मिलता। यहाँपर यह शंका होती है कि गर्भमें दध कहीं मिलता था कि जिससे उसका पालन होता? इस विषय में आचार्योंका मत है कि गर्भमें बच्चेका पालन माताके भोजन किये हुए रससे होता है और पैदा होनेके बाद दधसे पलता है। इसलिये तीसरे दिन बच्चेको तौलना चाहिये। जब बच्चेको दध मिलने लगता है तो उसको तौलव दूने लगती है। हमारे देश की अपेक्षा यूरोपमें बच्चोंकी तौल अधिक होती है।