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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

56. अवयजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?

मनुष्याकृति भिन्न भिन्न क्यों होती है ?

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२. जिस पदार्थके खानेसे शरीरके जिस अंगको हानि पहुँचती है गर्भमें बच्चेका वही अंग विकृत हो जाता है। ( श० क० )

३. जिस पदार्थके खानेसे जिस अंगकी पुष्टि होती है गर्भमें बालकका वह अंग उत्तम रीतिसे विकसित होता है। ( श० क० )

यही कारण है कि बच्चे माता पिता, मामा और नौकरों इत्यादिकी आकृतिके होते हैं। इसमें माताका विचार रजस्वला समयका दर्शन तथा गर्भाधान समयका चिन्तवन कारण है। स्त्री के हृदयमें एक ऐसी दैवीशक्ति है कि जिससे चिन्तवन किये हुए मनुष्यकी आकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। जिस प्रकार तसवीर खिचते समयमें हँसने रोनेवालेकी उसी विकारके अनुसार तसवीर खिंच जाती है, इसी प्रकार माताके हृदयपर पड़े हुए स्त्री पुरुषके आकारके अनुसार सन्तान होती है। इस विषयमें माता-पिताका मिला हुआ रज-वीर्य भी कम असर नहीं रखता। जिस अंगके बननेका सामान रजवीर्यमें कम होता है, वह अंग बेदंगा और निस्तेज होता है। जिस अंगके बननेका अंश प्रबल होता है वह अंग पूरी रीतिसे प्रफुल्लित रहता है। इसी प्रकार गर्भावस्थामें माताके खाए हुए भोजनका कुछ कम प्रभाव नहीं पड़ता। जिस पदार्थके खानेसे जिन्न अंगकी पुष्टि होती है उसके खानेसे वह अंग गर्भमें उत्तम बन जाता है और जिसके खानेसे जिस अंगको हानि होती है वह ठेढ़ा और बदस्वरत हो जाता है।

अतएव इस विषयमें रजोधर्म और गर्भाधान समयका चिन्तवन और ध्यान तथा गर्भावस्थामें माताका भोजन मुख्य

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कारण है कि जो एक सा सारी स्त्रियाँका नहीं हो सकता । अतएव प्रत्येक मनुष्यकी आकृति भिन्न भिन्न होती है ।

( ५५ ) नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होना ।

जिस प्रकार मनुष्यका रूप रंग एकसा नहीं होता इसी प्रकार नेत्र भी एक प्रकारके नहीं होते । गर्भ जब चार महीनेका हो जाता है तब आँखोंमें कुछ ज्योति आने लगती है । इसलिये चौथे महीनेमें जैसा तेज दृष्टि-भाग में आता है वैसी ही आँखें होती हैं ।

वैयक्तिका मत ।

( सु० श० अ० २ ख० ० ९३ )

१ यदि गर्भके बालककी आँखोंमें तेज धातु न पहुँचे तो बालक जन्मसे ही अन्ध होता है ।

२ यदि तेज धातु रक्तके साथ होकर दृष्टि-भागमें जावे तो बालक लाल नेत्रोंवाला होता है ।

३ यदि तेज धातु पित्तके साथ होकर आँखोंमें पहुँचे तो बालक पीले नेत्रोंवाला होता है ।

४. यदि तेज धातु कफके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो सफेद नेत्रोंवाला बालक होता है ।

५ यदि तेज धातु वायुके साथ होकर दृष्टि-भागमें पहुँचे तो मँडी आँखोंवाला या नेत्र रोग वाला या चंचलाक्ष बालक होता है ।

तेज धातुके साथ दूसरी धातुओंके मेलसे इस प्रकार वच्चों-की आँखें बनती हैं । यहाँपर एक बहुत बड़ा प्रश्न यह होता है कि तेज धातुके साथ वात पित्त इत्यादि किस प्रकार पहुँचते हैं । शरीरमें वात पित्त इत्यादिमें से जिसकी अधिकता

55. नेत्रोंका उत्तम और मध्यम होता

अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती ? २२६

होगी वही प्रबल होगा और वही तेज धातुके साथ नेत्रोंमें पहुँचेगा। माता जैसा भोजन करती है उसीके अनुसार शरीर में वात पित्त इत्यादि बढ़ते हैं। बहुतसे लोग ऐसे देखे जाते हैं कि जिनकी आंखें बिल्डों की सी पीली होती हैं। उनकी आंखोंमें तेज धातुके साथ पित्त ऐसा विकार उत्पन्न करता है। यह रोग वंश परंपरासे भी देखा जाता है। माता पिता दोनोंकी आंखें पीली होनेपर बच्चोंकी भी आंखें पीली होती हैं; परंतु माता या पिता एककी आंखोंमें ऐसा विकार होने पर नहीं होती। यहां पर यह सवाल हो सकता है कि यूरोपमें सबकी आंखें सफेद क्यों होती है? इसका कारण यह है कि यूरोप सदा देश है और कफ सदीसे उत्पन्न होता है, इसलिये वहांके निवासियोंमें कफकी अधिकता रहती है। जब शरीरमें कफकी अधिकता होती है तो तेज धातुके साथ कफ दृष्टि-भागमें पहुँचता है, इस कारण यूरोप निवासियोंकी आंखें कंजी होती हैं। इस प्रकार तेजके साथ पित्तादि धातुओंके बिगाड़से अनेक प्रकारकी आंखें होती हैं।

( ५६ ) अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती है ?

यह एक बड़ा गंभीर विषय है। बहुतोंका तो कहना यह है कि यह वात ईश्वरके हाथमें है। बहुतसे लोग पूर्व जन्मके पाप और पुण्य पर मानते हैं, परंतु हम किसीके मन्तव्य पर आश्रय नहीं करते। हमने भी कई जगह ऐसा पढ़ा है कि आयु कर्मोंके अनुसार होती है, परंतु आजकालकी नवीन रीतिके अनुसार यह बात सिद्ध हुई है कि गर्भ रज-वीर्यके कीड़ोंसे

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ही रहता है। वीर्य जव मज्जा धातुसे बनकर २६ से लेकर ३६ घंटे पर्यन्त वीर्यशयमें रह चुकता है, तव उस वीर्यके कौठे पुष्ट होते हैं। जो लोग इससे कम समयमें या दिन रातमें कई बार प्रसंग करते हैं तो कच्चे रहते हैं उनके वीर्यमें वीर्य-जन्तु होते ही नहीं, यदि होते भी हैं तो कच्चे रहते हैं और उनमें कूदने और गर्भ बनानेकी शक्ति ही नहीं होती।

इसमें एक बहुत बड़ी वारीकी यह है कि पुरुषकी कम अवस्थामें ऐसे जन्तु कभी नहीं पकते। एक विद्वानकी राय है कि जन्तुओंका पकना वीस वर्षकी अवस्थासे प्रारंभ होता है, और पचीस वर्षकी अवस्थामें खूब अच्छी तरह पक जाते हैं इनके बाद हमेशा पकते रहते हैं। यह बात उन लोगोंमें पाई जाती है कि जिन्होंने पचीस वर्षतक ब्रह्मचर्य पालन किया है, परन्तु जिसका ब्रह्मचर्य इस नियत समयतक नहीं रहा, उनके वीर्य-जन्तु हमेशा बुरी दशामें रहते हैं। इस विषयमें ऐसा नहीं होता कि जिन्होंने पच्चीस वर्षतक ब्रह्मचर्य नहीं पालन किया है, सोलह अथवा वीस वर्षकी अवस्थासे ही स्त्री संयोग प्रारंभ हो गया है, तां उनका वीर्य जन्तु पचीस वर्षकी अवस्थामें जाकर पक जावेगा। यह एक बड़ी भूल है, ऐसे लोगोंके वीर्य जन्तु आगे चलकर नहीं पकते, किन्तु अधिकचरे रह जाते हैं। इसी प्रकार स्त्रियोंमें रजवती होनेके समयसे लेकर १६ वर्ष तक रज-जन्तु पक कर ठीक हो जाते हैं और सीतही अवस्थाओंमें पुष्टता आ जाती है। वैद्यकने भी ऐसा ही माना है कि पचीस वर्षकी अवस्थामें पुरुष और सोलह वर्षकी अवस्थामें स्त्री दोनों बराबरकी शक्तिवाले होते हैं। १० क

इस विषयमें स्त्री और पुरुषोंको कुर्पके संमान समझना चाहिये। जिस प्रकार दो चार हाथ भूमिमें गले हुए कुर्प थोडा

अल्पजीवी और दीर्घजीवी सन्तान कैसे होती? २३१

सा पानी निकालने पर सूख जाते हैं और जो कुरपें अच्छी तरह से गले हैं वे चाहे जितना पानी निकालने पर भी, नहीं सूखते, इसी प्रकार जिन माता पिताओंने थोड़े दिन ब्रह्मचर्य पालन करके संयोग किया है, वे झिल्ले कुरपेंके समान हैं, परंतु जिनका ब्रह्मचर्य पूरा पालन हुआ है उनको गहर और गंभीर कुरपेंके समान समझना चाहिये।

एक खेतको देखना चाहिये, उसमें बहुतसे पेड़ हानेपर कुछ छोटे ही रह जाते हैं। कुछ बड़े होते हैं, कुछ सबमें अच्छे रहते हैं। इनका कारण यह है कि जैसा पका हुआ अच्छा वीर्य होता है उसीके अनुसार अच्छे लम्बे चौड़े पेड़ होते हैं। यह बात भी देखनेमें आवेगी कि पके हुए वीर्यके पेड़की जड़ गहरीमें होगी और वह कुछ देरमें सूखेगा परंतु जो पेड़ अध-पके वीर्यसे उगेगा उसकी जड़ तो अधिक नीचे न जायगी और वह जल्द सूख जायगा। इसी प्रकार मनुष्योंमें भी जानना चाहिये। जिन बच्चोंका गर्भ उत्तम और पके रजवीर्यके जन्तुओं से हुआ है, वे दीर्घजीवी अर्थात् ज्यादा दिन जीनेवाले; और जिनका गर्भ खराब कुछ कच्चे वीर्यसे हुआ है वे अल्पजीवी अर्थात् कम दिनों जीनेवाले होते हैं।

अच्छा और पका हुआ वीर्य हानेपर भी अल्पजीवी अर्थात् कम दिनों जीनेवाली सन्तान भी होती है। इसका कारण यह है कि जब अच्छा सूख पका हुआ वीर्य घुन जाता है, तो उससे पेड़ होता ही नहीं। यदि होता भी है तो छोटा और जल्द सूख जानेवाला। इसी प्रकार स्त्री और पुरुषोंके बीजोंमें भी समझना चाहिये। जब स्त्री पुरुषके रजवीर्यके जीव किसी रोगसे दूषित हो जाते हैं तो वह घुने हुए बीजके समान गर्भ ही नहीं उत्पन्न करते। यदि करते भी हैं, तो कच्चे

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सन्तति-शास्त्र ।

बीजके समान सन्तान पूरी उमरतक न जीनेवाली होती है। अतएव स्त्री पुरुषोंको पूरे दिनोंतक ब्रह्मचर्य्य करके संयोग करना चाहिये तभी उत्तम और दीर्घजीवी सन्तान उत्पन्न हो सकती है।

(५७) बच्चा कितने दिनोंमें उत्पन्न होता है ?

जिन माता पिताओंको गर्भाधानका दिन याद रहता है, उनको यह मालूम करनेमें कठिनाई नहीं पड़ती कि बच्चा कब पैदा होगा ? परन्तु जहाँ इसपर कुछ विचार ही नहीं है, वहाँ कैसे पता चल सकता है ? इस विषयमें अनेक मत हैं।

१. डाक्टरोंका मत ।

१. गर्भाधानसे २७८ या २८० दिन पर सन्तान उत्पन्न होती है।

२ कोई कोई गर्भाधानसे ३०० दिनतक उत्पन्न होनेका समय मानते हैं।

२. वैद्यकका मत ।

१ नवें, दसवें और कभी ग्यारहवें महीनेमें बालकका जन्म होता है। यदि इससे अधिक समय बीते तो एक प्रकार-का विकार सम्भूना चाहिये। ( सु० ७० अ० ३ श्लो० ३५ )

२. आहार न पहुँचने से गर्भ पेटमें सूख जाता है या गिर जाता है। गर्भ जब इस प्रकार सूख जाता है, तो कई वर्षोंमें पुष्ट होता है और फिर जन्म लेता है।

( च० ३० अ० २ श्लो० ५४ )

जहाँतक देखा गया है दस मासके अन्दर ही बच्चा पैदा हो जाता है। पैसा कम होता है कि साल भरमें हो और पैसा