संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
46. गर्भवतीके कर्तव्य
गर्भवतीके कर्तव्य ।
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क्रे और जी मचलाना बन्द करके भूख बढ़ाती है। ऐसे समयमें बच्चेका हृदय तैयार हो जाता है, इसलिये माताको अपने हृदय और बच्चे दोनोंके हृदयका पालन करना पड़ता है। यही समय बालकके शरीर बढ़नेका भी होता है। अतएव माता जितना श्रद्धा और अधिक भोजन करती है, उतना ही उत्तम और अधिक रस बनकर बच्चेकी बाढ़में सहायता पहुँचता है और उसका पोषण करता है।
गरिष्ठ, कड़ा, खड़ा, कसैला और फीका भोजन न होना चाहिये। चरबी बढ़नेवाले पदार्थ जैसे घी और मिठाई इत्यादि अधिक न खाना चाहिये। चरबी बढ़नेसे शरीर मोटा पड़ जाता है। इससे सबसे बड़ी हानि यह होती है कि पैदा होते समयमें बच्चा फँस जाता है। प्रायः इसी कारण अनेक बार बच्चोंकी मृत्यु भी देखी गई है।
गर्भवतीको यह सलाह कभी न देनी चाहिये कि वह मांस खावे या शराब पीवे। इससे दुष्ट प्रकृतिकी सन्तान उत्पन्न होती है। प्रत्येक मातापिताको अमूल्य रत्न उत्पन्न करनेकी लालसा रखनी चाहिये।
प्राज्ञ कलके पहनावेकी दशा भी विचार करने योग्य है। स्त्रियाँ सभ्य ललनार्प बननेके लिये सुस्त और बदनसे जकड़ा हुआ कल पहनती हैं। यदि गर्भ-समयको छोड़कर और समयोंमें पहना जाय, तो इतना हर्ज नहीं है, परन्तु गर्भावस्थामें इससे बड़ी हानि होती है। पेट भिचने और काखोंके दबनेसे बड़ा कष्ट होता है, बच्चेकी बाढ़ रुक जाती है तथा स्थानसे दल जानेका भय रहता है।
जिन स्त्रियोंका पेट बड़ा होता है उनका गर्भ नीचेको लटक आता है और बच्चेको महान् कष्ट होता है। इसलिये एक
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बीता चाँड़ा उदर पड़ा, जो मुलायम कपड़ेका हो, बांधन चाहिये।
खियाँ गर्भावस्थामें अपने विचारोंको ठीक नहीं रखतीं। अनेक बुरे विचारोंसे पाला पड़ता है। याद रहे कि जैसे विचार गर्भावस्थामें माताके होते हैं उसीके अनुसार सन्तान उत्पन्न होती है।
रहन-सहनके लिये तो पूछना ही क्या। ऐसे समयमें निश्चय करके असावधानी की जाती है। नीचे ऊपर चढ़ना उतरना, दौड़ना कूदना, परिश्रम और नाचना। यह सब वर्जित है। इससे गर्भपात होनेका भय रहता है। शोक, चिन्ता, भय और क्रोध इतसे बच्चेके मस्तक और स्नायुओंपर धक्का पहुँचता है और दिमाग नियल पड़ जाता है। यह भी न होना चाहिये कि गर्भवती दिन रात पड़ी हो रहे, इससे अनेक प्रकारके शब्दों बुरे विचार उत्पन्न होते हैं। ग्लानि रहती है और पाचन शक्ति बिगड़ जाती है। इसलिये कुछ थोड़ा चलना फिरना आनन्दक है। गर्भवतीका रात्रिमें दस घंटोंसे कम न सोना चाहिये। प्रायः खियाँ चित्त होकर कम सोती हैं। ढेरतक करवट लेकर सोना हानि पहुँचाता है। इससे बच्चा एक और झुक जाता है। थोड़ी देर करवटसे सोना हानि नहीं करता। बाकी समयमें आरामके साथ चित्त होकर सोना चाहिये। सोनेका कमरा साफ़ और ओढने-बिछौने मुलायम होने चाहिये। गर्भवतीको रोगोंकी सेवामें न रहना चाहिये, क्योंकि रोगी निरोग मनुष्य की प्राणशक्ति खोचता है और अपनी रोगशक्तिको दूसरेके शरीरमें प्रवेग करता है। इसलिये गर्भवती और बच्चा दोनोंके रोगी हो जानेका भय रहता है। शरीरमें मस्तक एक काम करनेवाली चीज़ है, परन्तु खियाँ इसकी कुछ भी परवाह नहीं करतीं। मस्तक और दूसरी इन्द्रियोंका बहुत बड़ा सम्बन्ध है।
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यही बुद्धिका स्थान है। यही स्मरण-शक्तिका निवास है। यही प्रेमका गहवर और यही ज्ञानका भण्डार है। उन वच्चोंका दिमाग सुस्त और निकम्मा होता है कि जिनकी माताएँ गर्भावस्थामें अपने दिमागकी परवाह नहीं रखतीं। वैद्यकका मत है कि गर्भवतीके जिस अंगको दुःख पहुँचना है गर्भके बच्चेका वही अंग विगड़ जाता है। ( श०क० )
गर्भवती स्त्रियाँ बालोंकी रस्सिया बनाकर सरको शत्रुकी तरह बांधती हैं जिससे बालोंकी जड़े खिंच जाती हैं। इतना ही नहीं, सर साफ़ करने तककी परवाह भी नहीं करतीं। मैल जम कर बालोंके छिद्रोंको रोक लेता है जिससे वायुका आना जाना रुक जाता है। खासकर गर्भके समयमें चौथे दिन सर साफ़ करना चाहिये।
वैद्यकका मत है कि गर्भवतीको अतुस्तानके दिनसे अति प्रराज-चित्त रहना, शृंगार करना और सफेद वस्त्र पहनना चाहिये। शान्तिपाठ तथा देवता, ब्राह्मणऔर गुरुओंकी सेवा-में तत्पर रहना, मैले, विकारवाले, हीनांग का दर्शन और स्पर्श न करना, वदनुदार पदार्थोंसे बचना तथा चित्तको विगाड़नेवाली कथाओंपर ध्यान न देना, सूखा, चासी, बुसा और सड़ा हुआ पदार्थ न खाना, बाहर न फिरना, सूते घरों और स्मशानोंमें न जाना, वृक्षके नीचे न रहना क्रोध और भय से बचना, क्रिया संकर न करना, बोक न उठाना, चिह्नाकर न बोलना, गर्भको हानि पहुँचानेवाले आहार-विहारोंसे बचने रहना, अधिक तेल और उचटन न लगाना, परिश्रम न करना, अधिक न सोना, बैठे रहना, बिना विछौनेके, पृथ्वीपर बैठना या सोना न चाहिये।
मीठा पतला हृदयको आनन्द देनेवाला चिकना और
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गर्भावस्था में स्त्रीको किन-किन बातोंसे बचना चाहिये ?
१. भारी बोझ उठाना या कठिन परिश्रम करना ।
२. ऊँचे स्थानसे कूदना या तेजीसे दौड़ना ।
३. खट्टी, तीखी, बासी या गरिष्ठ चीजें खाना ।
४. अधिक गरम या अधिक ठण्डी चीजोंका सेवन ।
५. अधिक देर तक जागना या दिनमें बहुत सोना ।
६. क्रोध, शोक, भय या चिन्ता करना ।
७. तंग कपड़े पहनना ।
८. बिना वैद्यकी सलाहके तेज दवाइयाँ खाना ।
९. गर्भावस्थाके अन्तिम महीनोंमें सम्भोग करना ।
१०. ऊबड़-खाबड़ रास्तोंपर सवारी करना ।
इन सब बातोंसे गर्भपात होनेका या सन्तानके निर्बल व रोगी होनेका भय रहता है ।
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थोड़ा सा भी बहुत होता है। अतएव ऐसे समयमें तुरन्त उपचार करना आवश्यक है। ऐसी अवस्थामें अनेक प्रकारके रोग होते हैं।
१. जो मचलाणा। यह स्वभावसे होता है। यह कोई ऐसा विशेष रोग नहीं है। आप ही आप अच्छा भी हो जाता है। इस का एक कारण पित्त भी है। जब पित्तके विकारसे जी मचलाता है तो इसे एक रोग समझना चाहिये। इसके अनेक कारण हैं।
१. पित्त बढ़ानेवाले पदार्थोंका खाना।
२. पित्तकी अधिकता होना। (जन्मसे ही)
३. जब कि गर्भ माता या पिताके ऐसे दूषित रज-वीर्यसे स्थापित हो कि जो पित्तसे दूषित हुआ हो।
ऐसी दशामें अधिक दिनोंतक जी मचलाता है और कभी कभी चकरसा भी आ जाता है। यों तो कुछ दिनोंतक हर एक स्त्रीका जी मचलाता ही है।
२ वमन (कै) का होना। यों तो कै उस समय समयतक होती है जबतक कि बच्चा पेटमें डोलता नहीं है, परन्तु ऐसे समयमें कै नित्य नहीं होती, कभी कभी हो जाती है। उसकाई अवश्य प्रायः नित्य आ जाया करती है। इसके अनेक कारण हैं।
१. गर्भवतीकी इन्द्रियाँ और अवयवोंके गर्भावस्थामें अधिक काम करनेसे।
२. बालकके बोभका दबाव अवयवों, धमनी और स्नायु-तन्तुओंपर पड़नेसे।
ऐसी दशामें मामूली कै होती है, परन्तु जब कै इससे आगे बढ़ती है तब उसको रोग समझना चाहिये। दूसरे
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महीनीसे वृक्षमें डोलनेकी शक्ति आनेतक कै होनेका समय विद्वानोंने माना है। यदि इससे अधिक दिनतक कै होती रहे, तो उसे कुपक्ष और निर्बलता का कारण समझना चाहिये। पैंसी दशामें अनेक उपद्रव उत्पन्न हो जाते हैं।
| (१) पेटमें पेटन। | (२) हाथ-पाँवमें जलन और भड़कन। |
|---|---|
| (३) सीढ़में दर्द। | (४) जाँघोंमें दर्द। |
| (५) सूच्छों आ जाना। | (६) स्तनमें दर्द। |
| (७) नींद न आना। | (८) बेचैनी। |
| (९) कज्ज रहना। | (१०) पक्वाशय (मेढे) में दर्द। |
| (११) आमाशयमें दर्द। | (१२) हृदयका कड़कना। |
| (१३) ऊपरके श्वासका चलन। | (१४) पैरोंमें भक्तभक्ताहट और सूजन। |
| (१५) प्यास लगना। | (१६) गलेका सूख जाना। |
| (१७) गलेमें छोटे छोटे दाने | (१८) जीभमें दाने पड़ जाना। |
| पड़ जाना। | |
| (१९) कैंमें रुधिरका आना। | (२०) ज्वरका होना। |
पैंसी दशामें पित्त बढ़ जाता है। कैंमें पित्तका लसदार बह्वा पानी ही विशेष आता है। थोड़े दिनोंतक कै होकर बन्द हो जाना अच्छा है। वह जानेपर दशा बिगड़ जाती है। परिणाम यह होता है कि या तो गर्भ गिर जाता है या स्त्री ही मर जाती है। गर्भ गिर जानेपर ये उपद्रव शान्त हो जाते हैं। प्रायः देखा गया है कि किसी किसी स्त्रीके वृक्षा पैदा होनेतक कै होती रहती है। कभी प्रातःकाल मचली प्रारम्भ होकर दोपहरको बन्द हो जाती है। कभी दोपहरसे प्रारम्भ होकर गणितक रहती है। इसी बीचमें एक दो बार या कई बार कै
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हो जाती है । बढ़ती हुई दशा में कै बराबर हुआ करती है । कभी कभी बेहोशी भी आ जाया करती है । उस समय रोग कठिन पड़ जाता है जब कि कै बार बार होती है और खून आने लगता है । ऐसी दशा कुछ काल तक रहनेसे मृत्यु अवश्य हो जाती है ।
३. फेफड़ेके रोगोंका होना । ऐसे समयमें यह रोग खास तौर से होता है । कारण इसका यह है कि ज्यों ज्यों गर्भ बढ़ता है त्यों त्यों फेफड़ेपर दबाव पहुँचता है । इससे अनेक रोग उत्पन्न हो जाते हैं ।
१. स्वाँसका कष्टसे निकलना । इस रोगमें स्वाँस उखड़ जाती है और दम घुटने लगता है ।
२. मामूली खाँसी । प्रायः सूखी खाँसी आती है ।
३. कूकरखाँसी । यह खाँसी खास तरहकी होती है । इसमें कुत्तोंकी तरह खाँसी आती है, इसीलिये इसको कूकर खाँसी कहते हैं । यह तुरन्त अच्छी नहीं होती, इसमें धीरे धीरे आराम होता है ।
४. अतिसार । यह रोग कुपचसे होता है । जब अन्न नहीं पचता तब अग्नि मन्द पड़ जाती है । इस कारण दस्त आने लगते हैं । कभी यह रोग इतना बढ़ता है, कि गर्भ गिर जाता है ।
५. हिचकी । यों तो दस पाँच बार हिचकी आ जाना दूसरी बात है, परन्तु यह हिचकी एक खास तरहकी होती है । ऐसी हिचकी सोनेके समयको छोड़कर दिनरात आया करती है । इसको वैद्य लोग हिका कहते हैं । इसका कारण कुपच है । इससे गर्भको बहुत बड़ा थक्का पहुँ-
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चता है । बार बार थक्का लगनेसे गर्भाशय ढीला पड़ जाता है और गर्भपात हो जानेका भय रहता है ।
६. कृच्छ्र । इसको लोग मामूली रोग समझते हैं, परन्तु यह एक बड़ा भयंकर रोग है । आंतोंपर दवाव पड़नेसे यह हो जाता है । इससे गर्भको बहुत बड़ा हानि पहुँचती है क्योंकि शौच जाते समय कान्धनेसे गर्भपर दवाव पड़ता, जिसका सहन करना पूरे दिनोंकी गर्भवतीका कठिन होता है । जब पेशा हो, तो जल्दी पचनेवाला हलका भोजन करना चाहिये ।
७. रक्तका कम बनना । यह रोग उन स्त्रियोंको विशेष होता है कि जो अत्यन्त दुबली और सूखी होती हैं जिनके शरीरमें रक्त पहले हीसे कम होता है और गर्भ स्थित होनेपर कम बनता भी है । कारण यह है कि भोजन किये हुए पदार्थोंसे रस बनता है और रससे रक्त । जबकि भोजन ही कम किया जाता है और चने हुए रससे चञ्चेका भी पोषण होता है, तो यदि पेशे समयमें कुपच या अतिसार पेशी बीमारी हो गई तो रक्त कम बनने लगता है और गर्भवती अत्यन्त निर्बल हो जाती है । अतएव बच्चा उत्पन्न होते समयमें कठिनाई पड़ती है ।
८. मूत्ररोग । यह उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका गर्भाशय टल जाता है । इसके कई कारण हैं ।
१. बार बार मूत्रका आना—पेशा दो तरहसे होता है । यदि यह रोग गर्भके प्रारम्भके दिनोंमें हो, तो मूत्राशयकी गरदनकी खाड़से और जब अन्तके दिनोंमें हो, तो मसानेपर गर्भाशयके दवाव पड़नेसे होता है । जब पेशा होता है तो गर्भाशयमें सूत्र रहने ही नहीं पाता ।
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२. मूत्रका बन्द हो जाना—ऐसा भी गर्भके दवावके कारण होता है। यदि ऐसा कुछ दिनोंतक रहे, तो मूत्राशयमें सूजन आ जाती है।
६. बच्चेकी थैलीमें अधिक जल भर जाना। गर्भाशयमें एक थैली होती है जिसमें जल भरा रहता है। बच्चा उसी जलमें तैरा करता है। यह रोग थैलीमें सूजन हो जानेसे होता है इसमें खेड़ी बड़ी और सूजी हुई होती है। यह पाँचवें या छठे महीनेमें होता है और गर्भ गिर जाता है।
१०. रक्तकी नादियोंका फूल जाना। यह रोग गर्भाशयपर दवाव पड़नेसे होता है। पैरमें काले रूधिरकी नसें फूल जाती है। खड़े होनेमें पैरोंका कांपना, सनसनाहट और तलुवोंमें जलन होना इसका लक्षण है।
११. गर्भाशयके रोग। ये अनेक प्रकारसे होते हैं।
१. गर्भाशयका आगे-पीछे-दहिने और बाएँ टल जाना या आगे निकल आना।
२. गर्भाशयका फट जाना और उलट जाना।
इन रोगोंकी व्याख्या 'गर्भाशयके रोग' प्रकरणमें लिखी गई है, अतएव यहाँ आवश्यकता नहीं है।
१२. हृदयकी धड़कन। यह रोग उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका हृदय निर्बल है। इसका खास कारण हृदयपर गर्भका बोझ पड़ना है। इससे हृदयमें धड़कन और दर्द होता है।
१३. दस्तोंका होना। यह रोग उन स्त्रियोंको होता है कि जिनका हृदय निर्बल है, जिनको रंजकी बात सुननेमें दिलकी धड़कन और बेहोशी तुरन्त हो जाती है। प्रायः गर्भके पाँचवेंसे आठवें महीनेतक ऐसा होता है और इसका कारण मत्ताशयपर दवाव पहुँचना है। ऐसा रोग दो रीतिसे होता है।
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एक तो वह कि दो चार दस्त बराबर चार छः दिन आजावे; और दूसरा वह कि एक ही दिनमें दस-चीस-पचास दस्त हो जावें। इसमें बहुत सोच समझकर चिकित्सा करनी चाहिये।
गर्भावस्थामें कोई भी रोग क्यों न हो अत्यन्त कष्ट होता है। पेटके रोगोंमें बहुत सावधानीसे औषधि करनी चाहियें; क्योंकि जरा भी प्रतिकूल होनेसे गर्भस्त्राव या गर्भपात हो जानेका भय रहता है।
(४८) गर्भस्त्राव और गर्भ-पात ।
१. गर्भस्त्रावके कारण ।
समय पूरा न होने के अन्दर ही बालकका पैदा होना गर्भ-पात कहलाता है। इसमें दो भेद हैं। जब चार मास तकका गर्भ गिर जावे, तो उसको गर्भस्त्राव कहते हैं और जब सात मास तकका गिरे तो उसको गर्भ-पात कहते हैं ।
जिस बालकका जन्म आठवें मासमें होता है तो उसे अपूर्ण जन्म होना कहते हैं। बच्चा पैदा होनेकी अपेक्षा गर्भस्त्राव और गर्भपातमें विशेष हानि और भय समझना चाहिये ।
बालकका जन्म प्रकृति के अनुसार स्वाभाविक है, परन्तु बीच में ही गर्भ गिर पड़ना प्रकृति के नियमों के विरुद्ध है। इस कारण गर्भस्त्राव या गर्भपात होनेमें स्त्रीको बड़ा कष्ट होता है। बच्चा पैदा होने की अपेक्षा गर्भस्त्राव और गर्भपात होनेमें रक्त इतना अधिक निकलता है कि जिससे बाज़ी बाज़ी निर्बल स्त्रियाँ बेहोश हो जाती हैं। सबसे अधिक कष्ट होनेका कारण यह है कि पूरे दिनोंमें गर्भाशयसे गर्भका सर्वत्र प्रकृति