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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

44. मूढ़ गर्भ

मृदुगर्भ ।

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आत्मस्य और पेटका बढ़ना इत्यादि । ऐसा गर्भ कैसे उत्पन्न होता है ? इस विषयमें वैद्यकका मत है कि—अतुल्लान करके स्त्री यदि स्वप्नमें पुरुषसे प्रसंग करे, तो वायु रजको लेकर गर्भाशयमें गर्भ सरीखा पिंड बना देती है । ऐसा गर्भ हर महीने बढ़ता है और सारे लक्षण सच्चे गर्भकेसे प्रतीत होते हैं और पिताके गुणोंसे रहित मांस पिंड सरीखा उत्पन्न होता है । किसी किसी स्त्रीके इस प्रकार होता है कि जब दो स्त्रियाँ आपसमें संयोगकी चाहसे मैथुन करें और इनका वीर्यपात हो, तो एकका वीर्य और दूसरीका रज मिलकर गर्भाशयमें यदि पहुँच जावे, तो बिना हॉर्डियोंका लोथड़ासा, पिताके गुणोंसे वर्जित, गर्भ बन जाता है ।

( सु० ५० अ० २ श्लो० ५१ मे० ३ )

पैसे गर्भमें माताके रजसे उत्पन्न होनेवाले गुण होते हैं, परन्तु पिताके गुण नहीं होते । कारण यह है कि ऐसा गर्भ केवल माताके रजसे ही उत्पन्न होता है । पिताके वीर्यके अंशसे बच्चेमें बाल, रोप, हड्डी, नाखून, दाँत, बारीक रंग, नस, नाड़ी, और वीर्य इत्यादि स्त्रि पदार्थ बनने हैं । अतएव पिताका वीर्य सामिलित न होनेसे ये बातें नहीं होतीं, केवल लोथड़ासा रहता है ।

पेसा गर्भ विशेष रीतिसे युवा विधवाओं, कुमारियों तथा ऐसी स्त्रियोंको कि जिनका संबन्ध पतिसे नहीं हुआ है, या बहुत दिनोंसे छूट गया है या जो अन्यन्त कामातुर हैं, उन्हींको रहता है । इसलिये सब गर्भके चिह्न मालूम होने लगे, तो यह पहचान कर लेनी चाहिये कि गर्भ सच्चा है या नहीं । स्त्रीके शारीरिक लक्षणोंसे इसकी पहचान नहीं हो सकती, क्योंकि मृदुगर्भमें सारे लक्षण सच्चे गर्भकेसे होती हैं । सबसे बड़ी

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सन्तति-शास्त्र ।

पहचान यह है कि बालकके हृदयकी धड़कन घड़ीके समान टिक-टिकका शब्द बालकके हृदयपेणियोंके संकोचनसे होता है। इसके सुनाई पड़नेसे बालकका गर्भाणियमें होता निश्चय होता है। यह शब्द माताकी बाईं कोखके बीचमें सुन पड़ता है। इसकी चाल प्रायः एक मिनटमें १६० बारतक होती है। कन्याके गर्भमें अधिक और पुत्रमें कम होती है। जब ऐसा न हो, तो मृदुगर्भ समझना चाहिये। इस प्रकार परीक्षा करके सब्जे और मृदुगर्भका निश्चय करना कर्तव्य है। इसके अतिरिक्त और कई प्रकारसे परीक्षा हो सकती है।

(४५) गर्भ रह जानेपर कवतक संयोग करना चाहिये ?

यह एक बहुत बड़ा प्रश्न है। लोग इसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। खास कारण इसका यह है कि गर्भाधान हो जानेपर लोगोंको मालूम ही नहीं होता कि गर्भ रह गया है या नहीं। इसके अलावा स्वार्थवश विषय-वासनामें फँसकर लोग कुछ भी विचार नहीं करते। इस विषयमें अनेक मत देखे जाने हैं।

१. धर्मशास्त्रका मत ।

१ गर्भवतीके साथ दो मासतक भोग करना चाहिये ।

(त्रा० ४०)

२ गर्भवतीके साथ छ् मासतक मनुष्य विषय कर सकता है ।

(अत्रिस्तुति० १६३)

२. वैद्यकका मत ।

१. गर्भवतीके साथ दो मासतक संयोग करनेमें कोई हर्ज नहीं होता, यदि स्त्रीको कुछ रोग न हो। (१० क०)