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संतति शास्त्र

Santati Shastra

पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा

स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)

Devanagarihipublished302 पृष्ठ

38. सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव

सन्तानपर दूषित वीर्यका प्रभाव ।

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६. पित्त और कफ से दूषित वीर्यकी उत्पन्न सन्तान अल्पायु, टेढ़े अंगवाली होती है । (१० क०)

१०. वात, पित्त और कफ तीनोंसे दूषित वीर्य सन्तान उत्पन्न नहीं करता । गर्भपात हो जाता है । (१० क०)

११. सिद्धियोंका कुरूप और काला रंग, यूरोपियनोंकी कंजी आखें, अमेरिकावालोंका ताम्रवर्ण, काबुलियोंका कोधी होना, वीर्यका दोष है ।

१२. गर्भाधान समयमें यदि पिताका बहुत ही थोड़ा वीर्य हो तो आसेवय अर्थात् थोड़े वीर्यवाला पुरुष उत्पन्न होता है । (सु० १० अ० २ श्लो० ४२)

१३. वीर्य-दोषके कारण गर्भमें कन्याका गर्भाशय नष्ट हो जाता है । पैंसी खीके स्तन नहीं निकलते और न उसे पुरुष समागमकी इच्छा होती है । पैंसी खीको पत्नी कहते हैं । (च० चि० अ० ३० श्लो० २३)

१४. जब पुरुष के बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है, तब पित्त अर्थात् पितासे उत्पन्न होनेवाले अवयवोंमें विकार होता है । (१० क०)

१५. जब पुरुषके सन्तान-कारक अर्थात् सन्तान उत्पन्न करनेवाले बीजभागमें दोष उत्पन्न होता है तो पूति अर्थात् नमर्द सन्तान उत्पन्न होती है । (१० क०)

१६. जब पुरुष-कारक बीजभाग दूषित हो जाता है, तब पुरुषकृति, विशिष्ट पुरुष चिह्नोंसे रहित, दण्डपूति सन्तान होती है । (१० क०)

१७. वीर्यसे उत्पन्न होनेवाले जितने अवयव हैं, जब वीर्यमें उन अवयवोंका अंश, जिससे वे बनते हैं, दूषित हो

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सन्तति-शास्त्र ।

जाता है तब वे श्रवयव विरुत अर्थात् देहे इत्यादि हां जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० १५)

१८. वीर्यमें जब हडिडियोंको बनानेवाला अंश दूषित हो जाता है तब वीनी सन्तान उत्पन्न होती । (१० क०)

१९. यदि गर्भाधान समयमें पिताका थोडा वीर्य गिरे तो ऐसे पितासे नरप० सन्तान उत्पन्न होती है ।

(च० १० अ० २ श्लो० १८)

२०. गर्भके जो श्रवयव वीर्यके जिस अंशसे उत्पन्न हों हैं उस वीर्यके उसी अंशके दूषित होने से गर्भके वेही श्रवयव दूषित हो जाते हैं । (च० १० अ० ४ श्लो० २५)

२१. वीर्य रक्त और गर्भाशयकारक अंश दूषित होनेसे स्त्री वन्ध्या कन्याको उत्पन्न करती है ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ३९)

२२. वीर्यमें रज और गर्भाशय-कारक अंश दूषित हों तथा आनुवंशिक स्त्री-चिह्न प्रगटकर्ता बीजांश दूषित होनेसे गर्भिणी स्त्री—स्त्रीकी आकृतिवाली, योनि रहित पाला नामक सन्तान-उत्पन्न करती है । (च० १० अ० ४ श्लो० ४५)

२३. मिले हुए रजवीर्यमें जब वीर्य उत्पन्न करनेवाली वीर्यका अंश दूषित होने और आनुवंशिक पुरुष चिह्न कारक बीजांश दूषित होनेसे पुरुषकी सी आकृतिवाली नाम० कृष्णतिक नामक सन्तान उत्पन्न होती है । इसको पुरुष भ्रष्ट श्रवयव पुरुष नश कहते हैं ।

(च० १० अ० ४ श्लो० ५५)

वीर्य और सन्तानका बहुत बडा सम्बन्ध है । जिनने मनुष्योंके सन्तान होती है सबके लिये यह नहीं कहा जा सकता कि उनका वीर्य शुद्ध और नीरग है । यहाँ एक बहुत