संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
3. शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान
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सन्तति-शास्त्र ।
चौगुना एक फिल्लीमें दँका हुआ होता है। चलनेकी शक्ती इसी तार और फिल्लीमें ही होती है। वीर्यमें थोड़ीसी पतली और बहनेवाली वस्तुके सिवा विशेष भाग कोईका ही होती।
इसी भाँति रजमें भी एक प्रकारके जन्तु पाप जाते हैं। जिनको शर्तव जन्तु, रज-जन्तु या रज-कोप (Sell-) कहने हैं। डाकूर कालिलकरके मतानुसार एक रज-कोपका आकार \frac{1}{300} इञ्च होता है। इसकी दन्तावट एक ग्रण्डकी भाँति होती है। ऐसे रज-कोपका व्यास \frac{1}{320} से \frac{1}{200} इञ्च तक होता है।
रज और वीर्यके मिश्रणमें बालकका शरीर बननेके लिये सारे अवयव रहते हैं। कुछ अंगोंकी उत्पत्ति मानाके रज और कुछेककी पिताके वीर्यमें होती है। इसलिये रज और वीर्यके मेलसे जो आकार घनता है वह सारे अवयवोंसे पूर्ण होता है।
(३) शुद्ध और दूषित रज-वीर्यकी पहचान ।
रज और वीर्यका वर्णन पहले कर चुके हैं, साथ ही साथ यह भी जानना आवश्यक है कि शुद्ध और दूषित रज-वीर्यके लक्षण क्या हैं।
शुद्ध रज ।
१—खरहा (खरपाश) के खधिरको समान लाल या लालके रंगके सदृश जिसमें सफेद वस्त्र रंग कर सुखानेसे फिली प्रकारका दाग न पड़े और धो डालनेसे सफेद हो जाय, वही शुद्ध रज है। (सु० न० ७० २ श्लोक १००)
२—लाखके रंगकासा लाल, जिसके निकलनेमें जलन और पीडा न हो कपड़ेमें दाग न पड़े और दुर्गन्ध न आती हो।
(१० क०)
शुद्ध और दूषित रज-वोध्यकी पहचान ।
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२—दूषित रज ।
१. वातमें दूषित रज ।
१. ऐसे दूषित रजका रंग लालीमें काला लिये होता है और कुछ रुक कर निकलता है । (सुश्रुत)
२. ऐसे रजका रंग कुसुमके पतले और मुलायम फूलके समान होता है । खावके समय कमर और योनिमें पीड़ा तथा ज्वर भी होता है । (श० क०)
२. पित्तसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें पीला लिये कुछ नीला होता है और निकलनेके समय दाह उत्पन्न करता है। (सुश्रुत)
२. ऐसे रजका रंग जामुनके फलसे मिलता हुआ होता है खावके समय कुछ पीड़ा और जलन होती है । (श० क०)
३. कफसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लालीमें सफेदी या पीलापन लिये होता है, और खावके समय दर्द पैदा करता है । (सुश्रुत)
२. ऐसा रज कुछ थोड़ा भागदार और खावके समय नाभीके नीचे दर्द पैदा करता है । (श० क०)
४. रक्तमें दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लाल होता है । मुरदेकी सी दुर्गंध आती है । अधिक खाव होता है और दाह उत्पन्न करता है । (सुश्रुत)
५. कफ और वायुसे दूषित रज ।
१. ऐसे रजका रंग लाली लिये होता है और कुटकी सी गांठे पड़ी रहती है । खावमें कष्ट होता है । (सुश्रुत)