संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
29. गर्भ कैसे रहता है ?
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सन्तति-शास्त्र ।
गरदनके उस सिरेपर पहुँचते हैं जो गर्भाशयसे मिली रहती है । और उधरसे रजके साथ कीड़े जो कि उसमें होते हैं, अरुडवाही नलियोंके छेदोंसे गर्भाशयमें पहुँचते हैं । जब ये दोनों रज वीर्यके कीड़े आपसमें गर्भाशयसे मिली हुई गरदनके सिरेपर पहुँच कर मिलते हैं, तब वीर्यका कीड़ा जो रजके कीड़ेसे छोटा होता है, तुरन्त रजके कीड़ेमें घुस जाता है; घुसते ही उसकी पूँछ कट जाती है और अगला भाग जिसको सर कहते हैं वह रजके कीड़ेमें मिल जाता है तथा गर्भाशयकी गरदनके सिरेसे दोनों कीड़ोंका मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचकर बढता है । यही वध्मेका पहिला स्वरूप है । परन्तु सबसे बड़ी बात इसमें यह है कि वीर्यका कीड़ा रजके कीड़ेमें कुदकर घुसता है । उसलिये वीर्यके कीड़ेमें चंचलता और कुदनेकी शक्ति जरूर होनी चाहिये । यदि ऐसा न हो, तो गर्भास्थापित होनेमें बाधा पड़ती है ।
२; वैयकका मत ।
१. संयोग होनेसे शरीरमें गरमी उत्पन्न होती है । इससे वायु उत्कट होकर गरमीके संबंधसे पुरुषका वीर्य निकलता है और योनिमें पहुँचकर रजसे मिल जाता है । इन दोनोंसे मिला हुआ पदार्थ गर्भाशयमें पहुँचता है । और वायुसे तत्काल घेरला किया हुआ जीवात्मा गर्भाशयमें प्रवेश होकर स्थित होता है । (सू० श० ३० ३ श्लो० २ व ३)
२. रज और वीर्य जैसे ही गर्भाशयमें मिलते हैं उसी समय जीवात्माका संयोग होकर गर्भ रहता है । (श० का०)
गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।
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३. स्त्री और पुरुष जब दोनों एक ही साथ स्वलित होते हैं, तब उधरसे रज आता है और इधरसे वीर्य पहुंचता है और दोनों गर्भाशयमें मिलकर गर्भ बनाते हैं । यदि स्त्री और पुरुष दोनों एक साथ स्वलित न हों, तो गर्भ नहीं बनता । (रति शास्त्र)
डाक्टरों मतसे यह बात सिद्ध होती है कि रज और वीर्य-के कड़े दोनों आपसमें मिलकर गर्भ उत्पन्न करते हैं । वैद्यक-का मत यह कहता है कि रजवीर्यके मिलनेपर जब जीवात्मा इनमें प्रवेश करता है, तब गर्भ रहता है । जीवात्माके प्रवेश होनेसे सतलव यह है कि रजवीर्यसे मिला हुआ पदार्थ सजीव हो जाता है डाक्टरों रीतिसे कौड़ों द्वारा और वैदिक रीतिसे रज-वीर्य मिले हुए पदार्थसे जीवात्मा द्वारा गर्भका स्थित होना सिद्ध है ।
(३०) गर्भ स्थित होनेके तात्कालिक लक्षण ।
प्रायः यह सन्देह ही रहा करता है कि अमुक समयके गर्भाधानसे गर्भ स्थित हुआ या नहीं ? इस विषयमें आचार्यों-के अनेक मत हैं ।
१. वैद्यक का मत ।
१. तात्काल गर्भधारण करनेवाली स्त्रीको थकावट, ग्लानि, प्यास साथलौका थक जाना, योनिका फरकना, और रज-वीर्यका बाहर न निकलना इत्यादि लक्षण होते हैं ।
(सु० श० अ० १२ श्लो० १२)
२. गर्भ धारण समयमें स्त्रीकी चेष्टा अत्यन्त मनोहर हो जाती है और लावण्यता अधिक बढ़ जाती है । (श० क०)