संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
18. मूत्ररोग
रजो-धर्ममेंके रोग ।
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३. पेट्ट और कोयम भारतीयन ।
पेसी दशामें कष्ट होता है और नहीं भी होता । जिन स्त्रियोंमें रज कम होता है उनको कष्ट कम होता है; क्योंकि उनके तो रज ही कम है; परन्तु होते हुए न निकलनेसे बड़ी कठिनाई पड़ती है ।
३. कष्टरज
(१० क०)
१. रजका कष्टके साथ निकलना, यही कष्ट-रज है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशयमें विषाड । इससे, दूसरे रोग उत्पन्न हो जाना तथा किसी प्रकारकी रक्तावद ।
२. गर्भाशयके मुख और योनिमार्गमें शोथ इत्यादि ।
३. रजसे संबंध्य रसनेवाली नसाँ और रगों आदिकें किसी तरहका विकार ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. नामी और गर्भाशयके आसपास कठिन घावों के समान दर्द ।
२. काँखने और जोर देनेसे थोड़ासा रक्त निकलना ।
३. रक्त निकल जानेपर थोड़ी देरके लिये दर्द कम होकर फिर ज्योंका त्यों हो जाना ।
४. ऋतुके समयसे प्रायः आठ दिन पहले दर्दका प्रारम्भ होना ।
५. दर्दके साथ थोड़ा थोड़ासा खून निकलना ।
६. भ्रूवाशयमें जलन और दर्दका होना ।
७. नामीके नीचे दर्द और चोभसा मालूम होना ।
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सन्तति-शास्त्र ।
यह रोग जवान स्त्रियोंमें कम, परन्तु जिसकी जवानी ढल रही हो उनमें प्रिश्य पाया जाना है ।
४. वन्द्या स्त्रियों में कष्टरज । (शा० क्र०)
इसके अनेक कारण हैं ।
१. भीतरी अवयवोंकी कठोरता ।
२. अरुड, फलवाहिनी नली, गर्भाशय और भग तथा रजसे संवन्ध रयनेवाली नलों आदिका विकार ।
इसके अनेक लक्षण होते हैं ।
ऋतु प्रारम्भ होनेके प्रायः चार दिन पहलेहीसे ।
नाभिके नीचे और फसरमें उद्व उत्पन्न होकर ऋतुके चार छः दिन यादृक् रहता ।
२. प्यास अरुचि कृच्छ्र और हाथ पाँवोंमें जलन होना ।
३. सांसका जल्दी चलना और बेहोशी ।
५. अधिक रज निकलना ।
१. यह कई प्रकारसे होता है । (रति शास्त्र)
१. चार दिनोंमें ही अधिक रज निकलकर बन्द हो जाना ।
२. बराबर आठ-दस दिन या इससे भी अधिक दिनों तक निकलना ।
३. एक मासमें दो-तीन बार निकल जाना ।
४. बराबर गिरा करना या दो चार दिनोंके लिये बन्द हो जाना ।
५. कभी दो दो मास बराबर गिर कर बन्द हो जाना और फिर गिरने लगना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
(रतिशास्त्र)
रजोधर्मके रोग ।
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- १. ऐसे रोगोंसे कि जिनसे शरीरका रक्त पतला पड़ जावे ।
- २. गर्भाशयमें उन नसांका मुग्न खुल जाना कि जिससे रक्त आता है । यह नीचे लिखे कारणोंसे होता है ।
- १. जब कि छोटे कदकी स्त्री पूरे जवानके साथ संयोग करे तो दवाव और चोटके कारण तन्म खुल जानी हैं ।
- २. पुरुषकी लिंगेन्द्रिय बड़ी होनेके कारण नसोंमें आघात पहुँचकर उनका खुल जाना ।
- ३. कम उम्रवाली स्त्रीका पूरे बड़े जवान पुरुषमें संयोग द्वारा नसोंमें आघात पहुँचकर खुल जाना ।
- ३. स्त्रुतमें किसी प्रकारकी खराबी होने से ।
- ४. तपेदिक और शुरदेके विकारों से ।
- ५. शरीरमें स्त्रुत बहुत घनने से (यह मोटी ताजी स्त्रिया-में होता है) ।
- ६. ऐसे रोग कि जिनसे स्त्रुतमें गरमी उत्पन्न हो ।
- ७. स्त्रुतका गरम हो जाना, जैसे कुछ रोगका स्त्रुत ।
- ८. पांडुरोगके होनेसे ।
- ९. गर्भाशयका मुँह चौड़ा हो जानेसे ।
- १०. गर्भाशयकी गरदन वा गर्भाशय में परिवर्तनसे ।
- ११. अतिमैथुनसे ।
- १२. फेफड़ेके अनेक रोगोंसे ।
- १३. रक्त पतला हो जानेसे ।
- १४. मसानेमें सृजन आ जानेसे ।
- १५. अरुडोंमें शोथ होनेसे ।
- १६. अरुडोंके पास कर्हायर शोथ होनेसे ।
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सन्तति-शास्त्र ।
१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।
१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।
१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।
२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।
२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।
२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।
२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।
२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।
२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।
२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।
२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. रक्तका बहुत निकलना ।
२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।
३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।
४. आलस्य और मेहनत न होना ।
५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।
६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।
७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।
८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।
इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।
१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।
२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।