संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
16. मेंद-बुद्धि अर्थात् शरीर में चरबी का बढ़ना
मेद-वृद्धि अर्थात् शरीरमें चरबीका बढ़ना ।
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रज वन्द हो जाता है । कभी कभी निकल भी आता है । कभी दो दो तीन तीन मास तक नहीं होता । अतएव गर्भ का सन्देह हो जाता है । इसका कारण गर्भाशय के मुखकी संकीर्णता भी है । प्रायः ऐसी दशामें गर्भाशय में रक्त जम भी जाता है, जिस से अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । गर्भाशय में रज-एकत्र होने और चर्बी के प्रकोप से दूषित होने के कारण रज-जन्तुओं को हानि पहुँचती है । ऐसे स्त्री और पुरुष संयोग नहीं कर सकते । मैथुन में इनका ढम उखड़ जाता है, देह शिथिल हो जाती है, पसीना निकलने लगता है, ब्रह्मराहट् प्रारम्भ हो जाती है, स्वार्स चलने लगता है, व्यास लग आनी है और उठना बैठना कठिन हो जाता है ।
लोग इसको अच्छा समझते हैं कि शरीर मोटा रहे, परन्तु यह बहुत बुरा रोग है । ऐसे स्त्री पुरुष कि जिनका शरीर चर्बी का स्थान हो रहा है, कभी सन्तान उत्पन्न नहीं कर सकते । क्यों कि गर्भाशय चर्बी के विकार से चिंकना होने पर वीर्य ग्रहण नहीं करता और पुरुष के मोटे होने पर इन्द्रिय निश्चित स्थान पर वीर्य नहीं पहुँचा सकती । दोनों में मेद-वृद्धि होनेसे सन्तान नहीं होती, लेकिन उन मोटे स्त्री पुरुषों से सन्तान होती है कि जिनका शरीर रक्त से मोटा हो गया है और रजो-धर्म में विगाड़ और गर्भाशय में किसी प्रकार का परिवर्तन नहीं हुआ है । (रतिशास्त्र)
मोटापन प्रारम्भ होते ही यह निश्चय करना चाहिये कि शरीर रक्त के कारण मोटा हो रहा है या चर्बी से । यदि चर्बी से हो रहा हो, तो ऐसे पदार्थ, जो चर्बी बढ़ाने में सहायक हों, तुरन्त छोड़ देने चाहिये । ऐसी अवस्था में किसी प्रकार का परिश्रम प्रारम्भ करके आराम छोड़ देना परम हितकर है ।
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सन्तति-शास्त्र ।
(१७) योनिरोग ।
योनि उस स्थान को कहते हैं कि जहां से वच्चा निकलता है और यही संयोग स्थान है । इसका और गर्भाशयका बहुत बड़ा संबंध है । इसके रोगों से गर्भाशय में और गर्भाशय के रोगोंसे इसमें अनेक रोग उत्पन्न होजाते हैं । योनि कई प्रकार की होती है । इस के विगड़ने के मुख्य चार कारण होते हैं । (१) वुरा भोजन, (२) दूषित रज, (३) वीर्य दोष, (४) दैवका प्रकोप । इनके अनेक भेद हैं । (श० क०)
१—अनेक प्रकार की विगड़ी हुई योनि के भेद ।
( ३० वि० ३७ ३० श्लोक ५ मे २७ तक )
(१) वातल योनि—उस को कहते हैं कि जिसमें वायु पैदा करने वाले आहार-विहार और चेशे से वायु विगड़कर योनिमें मुड़े छेदने की सी पीड़ा और चाँटी चलनेका सा मालम हो । कर्कशता, सुख, आयाम और दूसरे वायु से पैदा होने वाले रोग हों तथा वायु के कारण थोड़ा सा पतला, रूखा, आवाज करता हुआ भागदार रक्त निकला करे ।
(२) पित्तल योनि उसको कहते हैं कि जिस में खटाई, नमक, खार इत्यादि मिले पदार्थों को अधिक खाने से पित्त द्वारा योनिरोग होता है । ऐसी योनिमें दाह, पाक ज्वर-सुक गर्मी से व्यास नीला, पीला और काला खून निकलता है । इसमें मुड़े कीसी अधिक दुर्गन्ध आती है ।
(३) शैलिक योनि—उसको कहते हैं कि जिस में अभिप्यन्दी आहार खाने से कफ बढ़ कर स्त्री की योनिमें कफज रोग उत्पन्न करता है । इसके कारण योनि में शीतलता, चिप-
योनिरोग ।
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चिपापन, खुजली, दर्द और पाएडुता होती है और उससे पीला, गिलगिला रक्त निकलता रहता है ।
(४) सन्निपातिकयोनि—उसको कहते हैं कि जिसमें वात, पित्त और कफ पैदा करनेवाले आहारके सेवनसे योनि और गर्भाशयमें भिन्न भिन्न वायु कुपित होकर अपने अपने लक्षण उत्पन्न करें और उन रोगोंके होनेसे दाह, शूल और पीड़ा अधिक हो । योनिसे सफेद और गिलगिला रज निकला करे ।
(५) रक्तपित्तज योनि—उसको कहते हैं कि रक्त पित्त उत्पन्न करनेवाले आहारसे योनि दूषित होकर रक्त अधिक निकलने लगता है और वीर्य ग्रहण करने पर भी सन्तान नहीं होती ।
(६) अरजस्का योनि—उसको कहते हैं कि योनि और गर्भाशयमें रहा हुआ पित्त जब रक्तको बिगाड़ देता है तब रजस्वला होना बन्द हो जाता है और स्त्री अत्यन्त दुर्बल हो जाती है ।
(७) अचरणा योनि—उसको कहते हैं कि जिसमें साफ न रखनेके कारण छोटे छोटे कीड़े पड़ जावें और खुजलीके कारण पुरुष-सयोगकी बहुत इच्छा हो ।
(८) अतिचरणा योनि—उसको कहते हैं जो अति मैथुन करनेके कारण वायु बिगाड़कर योनिमें सूजन, सुख और दर्द उत्पन्न कर देती है ।
(९) प्राक्चरणा योनि—उसको कहते हैं कि थोड़ी अवस्थाकी स्त्रीके साथ सयोग करनेसे स्त्रीकी पीठ, जाँघ, ऊरु और वक्षमें दर्द पैदाकर वायु योनि को दूषित कर देती है ।
(इसी कारण अत्यन्त कम अवस्थामें संयोग मना किया
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