संतति शास्त्र
Santati Shastra
पं० अयोध्याप्रसाद भार्गव द्वारा
स्रोत: Santati - Shastra · काशी, भार्गव पुस्तकालय (उद्गम)
11. रजोधर्म के रोग
रजोधर्मके रोग ।
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और संयोग शक्ति कुछ दूसरी ही चीज है। रजस्वला होना बतलाता है कि अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशय अच्छी दशा में हैं और उनका विकास हो रहा है।
एक विद्वानकी राय है कि सोलह वर्ष के पहले स्त्री का शरीर संयोग करने योग्य नहीं होता, क्यों कि इसके पहिले रज कच्चे अण्ड और गर्भाशय से आता है। इनके पुष्ट होने का एक खास समय होता है। चारह वर्ष के बाद से इनका पुष्ट होना प्रारम्भ होता है और सोलह वर्ष की अवस्था तक अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशय तीनों पुष्ट होकर पूरे तौर से बढ़ जाते हैं। यदि इस अवस्था के पहिले संयोग किया जाय, तो ये तीनों बिगड़ जाते हैं। स्वार्थी पुरुष इन बातों पर ध्यान न देते हुए उत्तम सन्तान की इच्छा करते हैं। परिणाम यह होता है कि स्त्रियाँ अनेक रोगों में फँस कर जिन्दगी से हाथ धो बैठती हैं। अतएव यह शिक्षा मिलती है कि सोलह वर्ष से कम उमर वाली स्त्री से संयोग न करना चाहिये। रजस्वला होने के दिनों में मामूली स्त्री के—जो न बहुत निर्बल और न बहुत बलवती हो—उसके शरीर से दसतोला रज तो अवश्य ही निकलना चाहिये, परन्तु जो मोटी ताजी और अत्यन्त बलवती हैं उनके पन्द्रह तोला निकलना जरूरी है। यदि ऐसा नहीं होता, तो समझना चाहिये कि कोई रोग अवश्य है। इन्हीं कारणों से प्रदर इत्यादि अनेक रोग उत्पन्न होकर बहुत बड़ी बड़ी बाधाएँ करते हैं।
( ११ ) रजोधर्म के रोग ।
शरीर एक फलकी भाँति है जिसप्रकार कल हजारों पुरजों के मिलाने से बनती है। उसी प्रकार हजारों नसों और इन्द्रियों से बनकर शरीर काम करता है। स्त्रियों के लिये रजस्वाव
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सन्तति-शास्त्र ।
शरीर का एक प्रधान धर्म है। इसके नियमपूर्वक होते रहने से स्त्रियाँ वही हुई नदी के समान स्वच्छ रहती हैं। जिस प्रकार नदी का बहाव रुक जाने पर उस में अनेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं, इसी प्रकार रजोधर्म विगड़ने पर स्त्रियों में अनेक रोग उत्पन्न होते हैं। इनके अनेक भेद हैं।
१. रजोधर्माका न होना ।
इसके दो भेद हैं (१) विलकुल न होना (२) प्रारम्भ होकर चन्द हो जाना । (रतिशान्त)
१. प्रथम भेद—रजोधर्म का विलकुल न होना। इसके कई कारण हैं।
१. अपूर्व भगका होना (यह जन्म से होता है)
२. गर्भ अण्डका न होना (यह जन्म से होता है)
३. भग के मुख का चन्द होना (यह जन्म से होता है)
४. भगके मुखका सूर्यके मुखके समान अत्यन्त भारीक होना (यह जन्मसे होता है)
५. भगकी दोनों शीवारोंका आपसमें जुड़ा होना (यह जन्मसे ही होता है)
जिन स्त्रियाँ के ये व्याधियाँ होती हैं, वचपन में तो कुछ नहीं परन्तु ऋतु-धर्म के समयमें उन्हें बड़ा कष्ट होता है
२. दूसरा भेद—रजोधर्म प्रारम्भ होकर बंद हो जाना। इसके कई कारण हैं।
१. गर्भ, अण्ड, फलवाहिनी नली, भग और गर्भाशय के अनेक रोगों से।
२. रज और रक्त-विकार के अनेक रोगों से।
३. शोक, चिन्ता और भय इत्यादि के अनेक प्रकोपों से।
४. विषम स्वर, संभ्रहणी और श्रुतिसार से।
रजो-धर्मके रोग ।
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- ५. फेफड़े और गुरदेके अनेक रोगोंसे ।
- ६. सरीरमें खून कम हो जानेसे ।
- ७. शरीर दुर्बल और निर्वल होकर पीला पड़ जानेसे ।
- ८. तपेदिक और सोमरोगसे ।
- ९. प्रदर और उसके अनेक उपद्रवोंसे ।
- १०. आमाशयके अनेक रोगोंसे ।
- ११. शरीर का खून गाढ़ा होनेसे ।
- १२. रजसे संबंध रखनेवाले अवयवोंके विकारसे ।
- १३. भग मोटी होनेसे और उसके मार्ग रुद्धचित्त पड़ जाने तथा रगोंके द्रव जानेसे ।
- १४. अधिक बैठने और आराम करनेसे ।
- १५. बहुत चड़ा दुःख पहुँचनेसे कि जिसका आघात हृदय पर हो ।
- १६. दिमागी काम करने और अति मंथनसे ।
इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।
- १. पेट्का उभार जब कि रज इकट्ठा होकर न निकले ।
- २. हाथ, पाँव, पैर, कमर, नाभिमें दर्द और जलन उत्पन्न होना ।
- ३. रोग चढ़नेपर सारे पेटमें फोड़ेके समान दर्द ।
- ४. कुपत्त, सरदर्द, और घुमनी तथा आँखोंकी जलन ।
- ५. अण्डोंके दवानेपर दर्द होना ।
- ६. रगोंमें नीलापन ।
- ७. शरीरमें अत्यन्त सुस्ती ।
- ८. पेशाबकी अधिकता ।
- ९. शरीर भारी हो जाता है ।
- १०. पेट्को कड़ाई और रजसावके समयमें अत्यन्त पीड़ा ।
इस रोगमें सबसे पहले अण्डोंपर असर होता है । इसके
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बाद फलवाहनी नली और गर्भाशयपर । इन तीनोंमें जब खुशकी आ जाती है, तो ये सिकुड़ जाते हैं । प्रारम्भमें कुछ नहीं ज्यों ज्यों समय बीतता जाता है, दशा चिगड़ती जाती है ।
२. रजका कम निकलना ।
इसके दो भेद हैं । (गतिदान्त्र)
१. प्रथम भेद—चार दिन बराबर रजसाव होकर थोड़ा निकलना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
१. रजका कम बनना ।
२. रजसे सम्बन्ध रखनेवाली नसों इत्यादिके विकारसे ।
३. गर्भाशयकी गरदनकी रुकावट ।
४. शरीरमें रक्तकी कमी ।
५. रजका गाढ़ा हो जाना ।
६. भ्रदर और कुण्डलसे ।
७. गर्भाशयके मुखका तंग होना ( यह निम्न प्रकारोंसे होता है )
१. जन्म से ही ।
२. गर्भाशयके मुखपर दाव इत्यादिके हो जानेसे ।
८. अण्ड, फलवाहनी नली और गर्भाशयकी किल्ली इत्यादिमें किसी तरहकी रुकावटसे ।
२. दूसरा भेद—एक ही दो दिन निकलकर बन्द हो जाना । इसके अनेक कारण हैं ।
१. इसके भी वही कारण हैं जो ऊपर कहे गए हैं, परन्तु इस दशामें रोग बढ़ा हुआ समझना चाहिये ।
इन दोनों भेदोंके अनेक लक्षण हैं ।
१. हाथ, पाँव, सर और कमरमें दर्द व जलन ।
२. आँखोंमें भारीपन और जलन ।
18. मूत्ररोग
रजो-धर्ममेंके रोग ।
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३. पेट्ट और कोयम भारतीयन ।
पेसी दशामें कष्ट होता है और नहीं भी होता । जिन स्त्रियोंमें रज कम होता है उनको कष्ट कम होता है; क्योंकि उनके तो रज ही कम है; परन्तु होते हुए न निकलनेसे बड़ी कठिनाई पड़ती है ।
३. कष्टरज
(१० क०)
१. रजका कष्टके साथ निकलना, यही कष्ट-रज है । इसके अनेक कारण हैं ।
१. अण्ड, फलवाहिनी नली और गर्भाशयमें विषाड । इससे, दूसरे रोग उत्पन्न हो जाना तथा किसी प्रकारकी रक्तावद ।
२. गर्भाशयके मुख और योनिमार्गमें शोथ इत्यादि ।
३. रजसे संबंध्य रसनेवाली नसाँ और रगों आदिकें किसी तरहका विकार ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. नामी और गर्भाशयके आसपास कठिन घावों के समान दर्द ।
२. काँखने और जोर देनेसे थोड़ासा रक्त निकलना ।
३. रक्त निकल जानेपर थोड़ी देरके लिये दर्द कम होकर फिर ज्योंका त्यों हो जाना ।
४. ऋतुके समयसे प्रायः आठ दिन पहले दर्दका प्रारम्भ होना ।
५. दर्दके साथ थोड़ा थोड़ासा खून निकलना ।
६. भ्रूवाशयमें जलन और दर्दका होना ।
७. नामीके नीचे दर्द और चोभसा मालूम होना ।
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सन्तति-शास्त्र ।
यह रोग जवान स्त्रियोंमें कम, परन्तु जिसकी जवानी ढल रही हो उनमें प्रिश्य पाया जाना है ।
४. वन्द्या स्त्रियों में कष्टरज । (शा० क्र०)
इसके अनेक कारण हैं ।
१. भीतरी अवयवोंकी कठोरता ।
२. अरुड, फलवाहिनी नली, गर्भाशय और भग तथा रजसे संवन्ध रयनेवाली नलों आदिका विकार ।
इसके अनेक लक्षण होते हैं ।
ऋतु प्रारम्भ होनेके प्रायः चार दिन पहलेहीसे ।
नाभिके नीचे और फसरमें उद्व उत्पन्न होकर ऋतुके चार छः दिन यादृक् रहता ।
२. प्यास अरुचि कृच्छ्र और हाथ पाँवोंमें जलन होना ।
३. सांसका जल्दी चलना और बेहोशी ।
५. अधिक रज निकलना ।
१. यह कई प्रकारसे होता है । (रति शास्त्र)
१. चार दिनोंमें ही अधिक रज निकलकर बन्द हो जाना ।
२. बराबर आठ-दस दिन या इससे भी अधिक दिनों तक निकलना ।
३. एक मासमें दो-तीन बार निकल जाना ।
४. बराबर गिरा करना या दो चार दिनोंके लिये बन्द हो जाना ।
५. कभी दो दो मास बराबर गिर कर बन्द हो जाना और फिर गिरने लगना ।
इसके अनेक कारण हैं ।
(रतिशास्त्र)
रजोधर्मके रोग ।
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- १. ऐसे रोगोंसे कि जिनसे शरीरका रक्त पतला पड़ जावे ।
- २. गर्भाशयमें उन नसांका मुग्न खुल जाना कि जिससे रक्त आता है । यह नीचे लिखे कारणोंसे होता है ।
- १. जब कि छोटे कदकी स्त्री पूरे जवानके साथ संयोग करे तो दवाव और चोटके कारण तन्म खुल जानी हैं ।
- २. पुरुषकी लिंगेन्द्रिय बड़ी होनेके कारण नसोंमें आघात पहुँचकर उनका खुल जाना ।
- ३. कम उम्रवाली स्त्रीका पूरे बड़े जवान पुरुषमें संयोग द्वारा नसोंमें आघात पहुँचकर खुल जाना ।
- ३. स्त्रुतमें किसी प्रकारकी खराबी होने से ।
- ४. तपेदिक और शुरदेके विकारों से ।
- ५. शरीरमें स्त्रुत बहुत घनने से (यह मोटी ताजी स्त्रिया-में होता है) ।
- ६. ऐसे रोग कि जिनसे स्त्रुतमें गरमी उत्पन्न हो ।
- ७. स्त्रुतका गरम हो जाना, जैसे कुछ रोगका स्त्रुत ।
- ८. पांडुरोगके होनेसे ।
- ९. गर्भाशयका मुँह चौड़ा हो जानेसे ।
- १०. गर्भाशयकी गरदन वा गर्भाशय में परिवर्तनसे ।
- ११. अतिमैथुनसे ।
- १२. फेफड़ेके अनेक रोगोंसे ।
- १३. रक्त पतला हो जानेसे ।
- १४. मसानेमें सृजन आ जानेसे ।
- १५. अरुडोंमें शोथ होनेसे ।
- १६. अरुडोंके पास कर्हायर शोथ होनेसे ।
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सन्तति-शास्त्र ।
१७. अरुओं और गर्भाशयपर दवाब पहुँचनेसे ।
१८. कलेजेके अनेक रोगोंसे ।
१९. हृदयके अनेक रोगोंसे ।
२०. वषा पैदा होनेपर यदि गर्भाशयमें खेड़ी रह जाय ।
२१. वषा पैदा होनेपर, जब कि गर्भाशय ठीक ठीक न सिकुड़े ।
२२. ऐसे अग्रधरे मेंधुनसे कि जिससे स्त्रीकी चाह पूरी नहो ।
२३. दुर्धल स्त्रियोंमें किसी प्रकारकी गरमीसे ।
२४. गरम वस्तु, जैसे मिर्च, खट्टाईके अधिक खानेसे ।
२५. गर्भाशय और अरुओंपर किसी प्रकारकी चोट पहुँचने और इनके अनेक रोगोंसे ।
२६. गरम औषधियोंके खाने और गर्भाशय तथा योनिमें लगानेसे ।
२७. शोक चिन्ता और व्यथा इत्यादिके सहन करनेसे ।
इसके अनेक लक्षण हैं ।
१. रक्तका बहुत निकलना ।
२. शरीरका दुबला, निर्बल और शिथिल पड़ जाना ।
३. शरीरका रंग पीला और फीका पड़ जाना ।
४. आलस्य और मेहनत न होना ।
५. हाथ पाँवमें दर्द, मन्दाग्नि अरुचि और मूर्च्छा ।
६. कमर और पेटमें अत्यन्त पीड़ा ।
७. आँख, सर और गर्दनमें दर्द ।
८. रीढ़, पीठ, और कोपमें दर्द, घुमनी और प्यास ।
इस रोगकी भयानक दशाके लक्षण ।
१. स्त्रीका बेहोश हो जाना ।
२. नाड़ीकी चाल कम पड़ जाना ।