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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

२. नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म व कर्णवेध संस्कार

अथ नामकरणसंस्कारविधिं
वक्ष्यामः
अत्र प्रमाणम्—नाम चास्मै दद्युः ॥ १ ॥
घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थमभिनिष्ठानान्तं द्व्यक्षरम् ॥ २ ॥
चतुरक्षरं वा ॥ ३ ॥
द्व्यक्षरं प्रतिष्ठाकामश्चतुरक्षरं ब्रह्मवर्चसकामः ॥ ४ ॥
युग्मानि त्वेव पुंसाम् ॥ ५ ॥
अयुजानि स्त्रीणाम् ॥ ६ ॥
अभिवादनीय च समीक्षेत तन्मातापितरौ
विदध्यातामोपनयनात् ॥ ७ ॥
—इत्याश्वलायनगृह्यसूत्रेषु ॥
दशम्यामुत्थाप्य पिता नाम करोति—द्व्यक्षरं चतुरक्षरं वा
घोषवदाद्यन्तरन्तःस्थं दीर्घाभिनिष्ठानान्तं कृतं कुर्यान्न
तद्धितम्, अयुजाक्षरमाकारान्तञ्च स्त्रियै। शर्म ब्राह्मणस्य
वर्म क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य ॥
इसी प्रकार गोभिलीय और शौनकगृह्यसूत्र में भी लिखा है ॥
अर्थात् जन्मे हुए बालक का सुन्दर नाम धरे।
नामकरण का काल—जिस दिन जन्म हो उस दिन से
लेके १० दिन छोड़ ग्यारहवें वा एक सौ एकवें अथवा दूसरे
वर्ष के आरम्भ में जिस दिन जन्म हुआ हो, नाम धरे।

नामकरणप्रकरणम् ७३
जिस दिन नाम धरना हो उस दिन अति प्रसन्नता से इष्ट-
मित्र, हितैषी लोगों को बुला यथावत् सत्कार कर क्रिया का
आरम्भ यजमान—बालक का पिता और ऋत्विज् करें।
पुनः पृष्ठ ९-३४ में लिखे प्रमाणे सब मनुष्य ईश्वरोपासना,
स्वस्तिवाचन, शान्तिकरण और सामान्य प्रकरणस्थ सम्पूर्ण
विधि करके आधारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति
चार और पृष्ठ ३४-३५ में लिखे प्रमाणे (त्वन्नो अग्ने०) इत्यादि
आठ मन्त्रों से आठ आहुति, अर्थात् सब मिलाके १६ घृताहुति
करें।
तपश्चात् बालक को शुद्ध जल से स्नान करा, शुद्ध वस्त्र
पहनाके उसकी माता कुण्ड के समीप बालक के पिता के पीछे
से आ दक्षिणभाग में होकर बालक का मस्तक उत्तर दिशा में
रखके बालक के पिता के हाथ में देवे और स्त्री पुनः उसी
प्रकार पति के पीछे होकर उत्तरभाग में पूर्वाभिमुख बैठे।
तत्पश्चात् पिता उस बालक को उत्तर में शिर और दक्षिण में
पग करके अपनी पत्नी को देवे। पश्चात् जो उसी संस्कार के
लिए कर्त्तव्य हो, उस प्रथम प्रधानहोम को करे। पूर्वोक्त प्रकार
घृत और सब शाकल्य सिद्ध कर रक्खे। उसमें से प्रथम घी
का चमचा भरके—
ओम् प्रजापतये स्वाहा॥
इस मन्त्र से एक आहुति देकर पीछे जिस तिथि, जिस
नक्षत्र में बालक का जन्म हुआ हो उस तिथि और उस नक्षत्र
का नाम लेके उस तिथि और उस नक्षत्र के देवता के नाम
से चार आहुति देनी, अर्थात् एक तिथि, दूसरी तिथि के देवता,
तीसरी नक्षत्र और चौथी नक्षत्र के देवता के नाम से, अर्थात्
तिथि, नक्षत्र और उनके देवताओं के नाम के अन्त में चतुर्थी
विभक्ति का रूप और स्वाहान्त बोलके चार घी की आहुति
देवे। जैसे किसी का जन्म प्रतिपदा और अश्विनी नक्षत्र में

७४ संस्कारविधिः
हुआ हो तो—
ओं प्रतिपदे स्वाहा। ओं ब्रह्मणे स्वाहा। ओम् अश्विन्यै
स्वाहा। ओम् अश्विभ्यां स्वाहा * ॥
तत्पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखी हुई स्विष्टकृत्-मन्त्र से एक
आहुति और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे चार व्याहृति आहुति
दोनों मिलके पाँच आहुति देके तत्पश्चात् माता बालक को लेके
शुभ आसन पर बैठे और पिता बालक के नासिका-द्वार से
बाहर निकलते हुए वायु का स्पर्श करके—
को॑ऽसि क॒तमो॑ऽसि॒ कस्या॑सि॒ को नामा॑सि।
यस्य॑ ते॒ नामाम॑न्महि॒ यं त्वा॒ सोमे॑नातीतृपाम।
भूर्भुवः॒ स्वः॑ सु॒प्र॒जाः प्र॒जाभिः॑ स्याथँ सु॒वीरो॑
वी॒रैः सु॒पोषः॒ पोषैः॑॥ —अ० ७। मं० २९॥
ओम् कोऽसि कतमोऽस्येषोऽस्यमृतोऽसि।
आहस्पत्यं मासं प्रविशासौ ॥

  • तिथि देवता:—१. ब्रह्मन्। २. त्वष्टृ। ३. विष्णु। ४. यम। ५. सोम।
    ६. कुमार। ७. मुनि। ८. वसु। ९. शिव। १०. धर्म। ११. रुद्र।
    १२. वायु। १३. काम। १४. अनन्त। १५. विश्वेदेव। ३०. पितर।
    नक्षत्र देवता:—अश्विनी—अश्वी। भरणी—यम। कृत्तिका—अग्नि।
    रोहिणी—प्रजापति। मृगशीर्ष—सोम। आर्द्रा—रुद्र। पुनर्वसु—
    अदिति। पुष्य—बृहस्पति। आश्लेषा—सर्प। मघा—पितृ।
    पूर्वाफाल्गुनी—भग। उत्तराफाल्गुनी—अर्यमन्। हस्त—सवितृ।
    चित्रा—त्वष्टृ। स्वाति—वायु। विशाखा—इन्द्राग्नी। अनुराधा—मित्र।
    ज्येष्ठा—इन्द्र। मूल—निर्ऋति। पूर्वाषाढ़ा—अप्। उत्तराषाढ़ा—
    विश्वेदेव। श्रवण—विष्णु। धनिष्ठा—वसु। शतभिषज्—वरुण।
    पूर्वाभाद्रपदा—अजपाद्। उत्तराभाद्रपदा—अहिर्बुध्न्य। रेवती—पूषन्॥

नामकरणप्रकरणम् ७५
जो यह ‘‘असौ’’ पद है इसके स्थान में बालक का ठहराया
हुआ नाम अर्थात् जो पुत्र हो तो नीचे लिखे प्रमाणे दो अक्षर
का वा चार अक्षर का, घोषसंज्ञक और अन्तःस्थ वर्ण अर्थात्
पाँचों वर्गों के आरम्भ के दो-दो अक्षर छोड़के तीसरा, चौथा,
पाँचवाँ और य र ल व—ये चार वर्ण नाम में अवश्य आवें*।
जैसे—देव अथवा जयदेव। ब्राह्मण हो तो देवशर्मा, क्षत्रिय
हो तो देववर्मा, वैश्य हो तो देवगुप्त और शूद्र हो तो देवदास
इत्यादि और जो स्त्री हो तो एक, तीन वा पाँच अक्षर का नाम
रक्खे—श्री, ही, यशोदा, सुखदा, सौभाग्यप्रदा इत्यादि। नामों
को प्रसिद्ध बोलके, पुनः ‘‘असौ’’ पद के स्थान में बालक

  • ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म—ये स्पर्श
    और य, र, ल, व—ये चार अन्तःस्थ और ह एक ऊष्मा, इतने
    अक्षर नाम में होने चाहिएँ और स्वरों में से कोई भी स्वर हो।
    जैसे—भद्रः, भद्रसेनः, देवदत्तः, भवः, भवनाथः, नागदेवः, रुद्रदत्तः,
    हरिदेवः इत्यादि। पुरुषों का समाक्षर नाम रखना चाहिए तथा स्त्रियों
    का विषमाक्षर नाम रक्खें। अन्त्य में दीर्घ स्वर और तद्धितान्त
    भी होवे—जैसे—श्रीः ह्रीः, यशोदा, सुखदा, गान्धारी, सौभाग्यवती,
    कल्याणक्रोडा इत्यादि, परन्तु स्त्रियों के इस प्रकार के नाम कभी
    न रक्खें, उसमें प्रमाण—
    नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्।
    न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्॥ —मनुस्मृतौ।
    (ऋक्ष) रोहिणी, रेवती इत्यादि, (वृक्ष) चम्पा, तुलसी
    इत्यादि, (नदी) गङ्गा, यमुना, सरस्वती इत्यादि, (अन्त्य) चाण्डाली
    इत्यादि, (पर्वत) विन्ध्याचला, हिमालया इत्यादि, (पक्षी) कोकिला,
    हंसा इत्यादि, (अहि) सर्पिणी, नागी इत्यादि, (प्रेष्य) दासी,
    किङ्करी इत्यादि, (भयंकर) भीमा, भयंकरी, चण्डिका इत्यादि नाम
    निषिद्ध हैं।

७६ संस्कारविधिः
का सम्बोधनान्त नाम धरके पुनः ( ओम् कोऽसि० ) ऊपर
लिखित मन्त्र बोलना।
ओं स त्वाह्ने परिददात्वहस्त्वा रात्र्यै परिददातु
रात्रित्स्वाहोरात्राभ्यां परिददात्वहोरात्रौ त्वार्द्धमासेभ्यः
परिदत्तामर्द्धमासास्त्वा मासेभ्यः परिददतु मासास्त्वर्तुभ्यः
परिददत्वृतवस्त्वा संवत्सराय परिददतु संवत्सरस्त्वायुषे
जरायै परिददातु, असौ ॥
इन मन्त्रों से बालक को जैसा जातकर्म में लिख आये
हैं वैसे आशीर्वाद देवें। इस प्रमाणे बालक का नाम रखके संस्कार
में आये हुए मनुष्यों को वह नाम सुनाके पृष्ठ ३६-३७ में लिखे
प्रमाणे महावामदेव्य गान करें।
तत्पश्चात् कार्यार्थ आये हुए मनुष्यों को आदर-सत्कार
करके विदा करे और सब लोग जाते समय पृष्ठ ९-१२ में लिखे
प्रमाणे परमेश्वर की स्तुतिप्रार्थनोपासना करके बालक को
आशीर्वाद देवें कि—
“हे बालक! त्वमायुष्मान् वर्च्चस्वी तेजस्वी श्रीमान्
भूयाः।”
हे बालक! [तू] आयुष्मान्, विद्यावान्, धर्मात्मा, यशस्वी,
पुरुषार्थी, प्रतापी, परोपकारी, श्रीमान् हो ॥
॥ इति नामकरणसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

अथ निष्क्रमणसंस्कारविधिं
वक्ष्यामः
'निष्क्रमण' संस्कार उसको कहते हैं कि जो बालक को
घर से जहाँ का वायु, स्थान शुद्ध हो, वहाँ भ्रमण कराना होता
है। उसका समय जब अच्छा देखें तभी बालक को बाहर घुमावें।
अथवा चौथे मास में तो अवश्य भ्रमण करावें। इसमें प्रमाण—
चतुर्थे मासि निष्क्रमणिका सूर्यमुदीक्षयति-तच्चक्षुरिति ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥
जननाद्यस्तृतीयो ज्योत्स्नस्तस्य तृतीयायाम् ॥
—यह पारस्करगृह्यसूत्र में भी है॥
अर्थः—निष्क्रमण-संस्कार के काल के दो भेद हैं—एक
बालक के जन्म के पश्चात् तीसरे शुक्लपक्ष की तृतीया और
दूसरा चौथे महीने में जिस तिथि में बालक का जन्म हुआ
हो उस तिथि में यह संस्कार करे।
उस संस्कार के दिन प्रातःकाल सूर्योदय के पश्चात् बालक
को शुद्ध जल से स्नान करा, शुद्ध-सुन्दर वस्त्र पहनावे। पश्चात्
बालक को यज्ञशाला में बालक की माता ले-आके पति के
दक्षिण पार्श्व में होकर पति के सामने आकर बालक का मस्तक
उत्तर और छाती ऊपर अर्थात् चित्ता रखके पति के हाथ में
देवे, पुनः पति के पीछे की ओर घूमके बाएँ पार्श्व में पूर्वाभिमुख
बैठे।
ओं यत्ते सुसीमे हृदयँ हितमन्तः प्रजापतौ।
वेदाहं मन्ये तद् ब्रह्म माहं पौत्रमघं निगाम् ॥ १ ॥
ओं यत् पृथिव्या अनामृतं दिवि चन्द्रमसि श्रितम्।
वेदामृतस्याहं नाम माहं पौत्रमघँ रिषम् ॥ २ ॥

७८ संस्कारविधिः
ओम् इन्द्राग्नी शर्म यच्छतं प्रजायै मे प्रजापती।
यथायं न प्रमीयेत पुत्रो जनित्र्या अधि॥३॥
इन तीन मन्त्रों से परमेश्वर की आराधना करके पृष्ठ ९-
३४ में लिखे प्रमाणे परमेश्वरोपासना, स्वस्तिवाचन,
शान्तिकरण आदि और सामान्यप्रकरणोक्त समस्त विधि कर
और पुत्र को देखके इन निम्नलिखित तीन मन्त्रों से पुत्र के
शिर का स्पर्श करे—
ओम् अङ्गादङ्गात् सम्भवसि हृदयादधिजायसे।
आत्मा वै पुत्र नामासि स जीव शरदः शतम्॥ १ ॥
ओं प्रजापतेष्ट्वा हिङ्कारेणावजिघ्रामि ।
सहस्रायुषाऽसौ जीव शरदः शतम् ॥ २ ॥
गवां त्वा हिङ्कारेणावजिघ्रामि ।
सहस्रायुषाऽसौ जीव शरदः शतम् ॥ ३ ॥
तथा निम्नलिखित मन्त्र बालक के दक्षिण कान में जपे—
अ॒स्मे प्र य॑न्धि मघवन्नृजीषिन्निन्द्र॑ रा॒यो वि॒श्ववा॑रस्य॒ भूरेंः।
अ॒स्मे श॒तः श॒रदो॑ जी॒वसै॑ धा अ॒स्मे वी॒राञ्छश्व॑त इन्द्र शिप्रिन्॥ १ ॥
इन्द्र॑ श्रेष्ठा॑नि॒ द्रवि॑णानि धेहि चित्तिं॒ दक्ष॑स्य सुभग॒त्वम॒स्मे।
पोषं॑ रयी॒णामरि॑ष्टिं त॒नूनां॑ स्वा॒द्मानं॑ वा॒चः सु॑दि॒नत्वमह्नाम्॥ २ ॥
इस मन्त्र को वाम कान में जपके पत्नी की गोद में उत्तर
दिशा में शिर और दक्षिण दिशा में पग करके बालक को देवे
और मौन करके स्त्री के शिर का स्पर्श करे। तत्पश्चात्
आनन्दपूर्वक उठके बालक को सूर्य का दर्शन करावे और
निम्नलिखित मन्त्र वहाँ बोले—

निष्क्रमणप्रकरणम् ७९
ओं तच्चक्षु॑र्देवहि॑तं पुरस्ता॑च्छु॒क्रमुच्च॑रत्। पश्ये॑म श॒रदः॑
श॒तं जीवे॑म श॒रदः॑ श॒तः॑ शृणुयाम श॒रदः॑ श॒तं प्रब्र॑वाम श॒रदः॑
श॒तमदी॑नाः स्याम श॒रदः॑ श॒तं भूय॑श्च श॒रदः॑ श॒तात्॥
इस मन्त्र को बोलके थोड़ा-सा शुद्ध वायु में भ्रमण कराके
यज्ञशाला में लावे। सब लोग—
“त्वं जीव शरदः शतं वर्धमानः”॥
इस वचन को बोलके आशीर्वाद देवें।
तत्पश्चात् बालक के माता और पिता संस्कार में आये
हुए स्त्रियों और पुरुषों का यथायोग्य सत्कार करके विदा करें।
तत्पश्चात् जब रात्रि में चन्द्रमा प्रकाशमान हो, तब बालक
की माता लड़के को शुद्ध वस्त्र पहना दहिनी ओर से आगे
आके पिता के हाथ में बालक को उत्तर की ओर शिर और
दक्षिण की ओर पग करके देवे और बालक की माता दाहिनी
ओर से लौटकर बाईं ओर आ, जल की अञ्जलि भरके चन्द्रमा
के सम्मुख खड़ी रहके—
ओं यददश्चन्द्रमसि कृष्णं पृथिव्या हृदयग्॑ श्रितम्।
तदहं विद्वाग्॑स्तत् पश्यन् माहं पौत्रमघग्॑ रुदम्॥
इस मन्त्र से परमात्मा की स्तुति करके जल को पृथिवी
पर छोड़ देवे।
तत्पश्चात् बालक की माता पुनः पति के पृष्ठ की ओर
से पति के दाहिने पार्श्व से सम्मुख आके पति से पुत्र को लेके
पुनः पति के पीछे होकर बाईं ओर आ बालक का उत्तर की
ओर शिर दक्षिण की ओर पग रखके खड़ी रहे और बालक
का पिता जल की अञ्जलि भर (ओम् यददश्च०) इसी मन्त्र
से परमेश्वर की प्रार्थना करके जल को पृथिवी पर छोड़के दोनों
प्रसन्न होकर घर में आवें।
॥ इति निष्क्रमणसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

अथान्नप्राशनविधिं वक्ष्यामः
'अन्नप्राशन' संस्कार तभी करे जब बालक की शक्ति अन्न
पचाने योग्य होवे। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण—
षष्ठे मास्यन्नप्राशनम् ॥ १ ॥
घृतौदनं तेजस्कामः ॥ २ ॥
दधिमधुघृतमिश्रितमन्नं प्राशयेत् ॥ ३ ॥
इसी प्रकार पारस्करगृह्यसूत्रादि में भी है॥
छठे महीने बालक को अन्नप्राशन करावे। जिसको तेजस्वी
बालक करना हो, वह घृतयुक्त भात अथवा दही, सहत और
घृत तीनों भात के साथ मिलाके निम्नलिखित विधि से अन्नप्राशन
करावे, अर्थात् पूर्वोक्त पृष्ठ ९-२१ में कहे हुए सम्पूर्ण विधि
को करके जिस दिन बालक का जन्म हुआ हो, उसी दिन
यह संस्कार करे और निम्न लिखे प्रमाणे भात सिद्ध करे—
ओम् प्राणाय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ १ ॥
ओम् अपानाय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ २ ॥
ओम् चक्षुषे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ३ ॥
ओम् श्रोत्राय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ४ ॥
ओम् अग्नये स्विष्टकृते त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ५ ॥
इन पाँच मन्त्रों का यही अभिप्राय है कि चावलों को धो,
शुद्ध करके अच्छे प्रकार बनाना और पकते हुए भात में यथायोग्य
घृत भी डाल देना।
जब चावल अच्छे प्रकार पक जावें, तब उतार थोड़े ठण्डे
हुए पश्चात् होमस्थाली में—

अन्नप्राशनप्रकरणम् ८९
ओम् प्राणाय त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ १ ॥
ओम् अपानाय त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ २ ॥
ओम् चक्षुषे त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ ३ ॥
ओम् श्रोत्राय त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ ४ ॥
ओम् अग्नये स्विष्टकृते त्वा जुष्टं निर्वपामि ॥ ५ ॥
इन पाँच मन्त्रों से कार्यकर्त्ता यजमान और पुरोहित तथा
ऋत्विजों को पात्र में पृथक्-पृथक् देके पृष्ठ ३०-३५ में लिखे
प्रमाणे अग्न्याधान, समिदाधानादि करके प्रथम आघारावाज्य-
भागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार मिलके ८ घृत की
आहुति देके, पुनः उस पकाये हुए भात की आहुति नीचे लिखे
हुए मन्त्रों से देवे—
दे॒वीं वाच॑मजनयन्त दे॒वास्तां वि॒श्वरू॑पाः प॒शवो॑ वदन्ति ।
सा नो॑ म॒न्द्रेष॒मूर्जं॒ दुहा॑ना धे॒नुर्वाग॒स्मानुप॒ सुष्टुतैतु॒ स्वाहा॑ ॥
इदं वाचे—इदन्न मम ॥ १ ॥
वाजो॑ नो॒ऽअद्य प्र सु॑वाति॒ दानं॒ वाजो॑ दे॒वाँऽऋ॒तुभि॑: कल्पयाति ।
वाजो॑ हि मा॒ सर्व॑वीरं ज॒जान॒ विश्वा॒ऽआशा॒ वाज॑-
पतिर्जयेयु॒थ्ंस्वाहा॑ ॥ इदं वाचे वाजाय—इदन्न मम ॥ २ ॥
इन दो मन्त्रों से दो आहुति देवें। तत्पश्चात् उसी भात
में और घृत डालके—
ओं प्राणेनान्नमशीय स्वाहा ॥ इदं प्राणाय—इदन्न मम ॥ १ ॥
ओमपानेन गन्धानशीय स्वाहा ॥ इदमपानाय—इदन्न मम ॥ २ ॥
ओं चक्षुषा रूपाण्यशीय स्वाहा ॥ इदं चक्षुषे—इदन्न मम ॥ ३ ॥
ओं श्रोत्रेण यशोऽशीय स्वाहा ॥ इदं श्रोत्राय—इदन्न मम ॥ ४ ॥
इन मन्त्रों से चार आहुति देके (ओं यदस्य कर्मणो०)
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाण स्विष्टकृत् आहुति एक देवे। तत्पश्चात्

८२ संस्कारविधिः
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३-
३४ में लिखे प्रमाणे (ओम् त्वन्नो०) इत्यादि से आठ आज्याहुति
मिलके बारह आहुति देवे।
उसके पीछे आहुति से बचे हुए भात में दही, मधु और
उसमें घी यथायोग्य किञ्चित्-किञ्चित् मिलाके और सुगन्धियुक्त
और भी चावल बनाये हुए थोड़े-से मिलाके बालक के रुचि
प्रमाणे—
ओम् अन्न॑पतेऽन्न॑स्य नो देह्यनमी॒वस्य॑ शु॒ष्मिण॑ः।
प्रप्र॑ दा॒तारं॑ तारिष॒ऽऊर्जं॑ नो धेहि द्विपदे चतु॑ष्पदे॥
इस मन्त्र को पढ़के थोड़ा-थोड़ा पूर्वोक्त भात बालक के
मुख में देवे। यथारुचि खिला, बालक का मुख धो और अपने
हाथ धोके पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके,
जो बालक के माता-पिता और अन्य वृद्ध स्त्री-पुरुष आये हों
वे परमात्मा की प्रार्थना करके—
“त्वमन्नपतिरन्नादो वर्धमानो भूयाः॥”
इस वाक्य से बालक को आशीर्वाद देके, पश्चात् संस्कार
में आये हुए पुरुषों का सत्कार बालक का पिता और स्त्रियों
का सत्कार बालक की माता करके सबको प्रसन्नतापूर्वक विदा
करें॥
॥ इत्यन्नप्राशनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

8
अथ चूडाकर्मसंस्कारविधिं
वक्ष्यामः
यह आठवाँ संस्कार 'चूडाकर्म' है, जिसको केशछेदन-
संस्कार भी कहते हैं। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का मत ऐसा
है-
तृतीये वर्षे चौलम् ॥ १ ॥
उत्तरतोऽग्नेर्व्रीहियवमाषतिलानां शरावाणि
निदधाति ॥ २ ॥
इसी प्रकार पारस्करगृह्यसूत्रादि में भी है—
सांवत्सरिकस्य चूडाकरणम् ॥
इसी प्रकार गोभिलीयगृह्यसूत्र का भी मत है॥
यह चूडाकर्म अर्थात् मुण्डन बालक के जन्म के तीसरे
वर्ष वा एक वर्ष में करना। उत्तरायणकाल शुक्लपक्ष में जिस
दिन आनन्द-मङ्गल हो, उस दिन यह संस्कार करे।
विधि—आरम्भ में पृष्ठ ९-३४ में लिखित विधि करके
चार शरावे ले, एक में चावल, दूसरे में यव, तीसरे में उर्द
और चौथे शरावे में तिल भरके वेदी के उत्तर में धर देवे।
धरके पृष्ठ ३२ में लिखे प्रमाणे “ओम् अदितेऽनुमन्यस्व"
इत्यादि तीन मन्त्रों से कुण्ड के तीन बाजू और पृष्ठ २७ में लिखे
प्रमाणे 'ओम् देव सवितः प्रसुव०' इस मन्त्र से कुण्ड के चारों
ओर जल छिटकाके, पूर्व पृष्ठ ३०-३२ में लिखित अग्न्याधान
समिदाधान कर अग्नि को प्रदीप्त करके जो समिधा प्रदीप्त हुई
हो उसपर लक्ष देकर पृष्ठ ३२-३३ में लिखे प्रमाणे

८४ संस्कारविधिः
आघारावाज्यभागाहुति चार और व्याहृति आहुति चार और
पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे आठ आज्याहुति, सब मिलके सोलह
आहुति देके, पृष्ठ ३४ में लिखे प्रमाणे “ओम् भूर्भुवः स्वः।
अग्न आयूंषि०” इत्यादि मन्त्रों से चार आज्याहुति प्रधान होम
की देके, पश्चात् पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति
चार और पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे स्विष्टकृत् मन्त्र से एक आहुति
मिलके पाँच घृत की आहुति देवे।
इतनी क्रिया करके कर्मकर्त्ता परमात्मा का ध्यान करके
नाई की ओर प्रथम देखके—
ओम् आयम॑गन्त्सवि॒ता क्षुरेणो॒ष्णेन॑ वाय उद॒केनेहि॑।
आदि॑त्या रु॒द्रा वस॑व उन्दन्तु॒ सचे॑त॒सः सोम॑स्य॒ राज्ञो॑
वप॒त् प्रचे॑तसः॥ —अथर्व० कां० ६। सू० ६८॥
इस मन्त्र का ज़प करके, पिता बालक के पृष्ठ-भाग में
बैठके किञ्चित् उष्ण और किञ्चित् ठण्डा जल दोनों पात्रों में
लेके—
ओम् उष्णेन वाय उदकेनैधि॥
इस मन्त्र को बोलके दोनों पात्र का जल एक पात्र में
मिला देवे। पश्चात् थोड़ा जल, थोड़ा माखन अथवा दही की
मलाई लेके—
ओम् अदि॑तिः श्मश्रु॑ वप॒त्वाप॑ उन्दन्तु॒ वर्च॑सा।
चिकि॑त्सतु प्र॒जाप॑तिर्दी॒र्घायु॒त्वाय॒ चक्ष॑से॥१॥
—अथर्व० कां० ६। सू० ६८॥
ओं स॒वित्रा प्रसूता दैव्या आप उन्दन्तु ते तनूं
दीर्घायुत्वाय वर्चसे॥२॥
इन मन्त्रों को बोलके, बालक के शिर के बालों में तीन
बार हाथ फेरके केशों को भिगोवे। तत्पश्चात् कङ्घा लेके केशों
को सुधारके इकट्ठा करे, अर्थात् बिखरे न रहे। तत्पश्चात्—

चूड़ाकर्मप्रकरणम् ८५
ओम् ओषधे त्रायस्वैनम्॥
इस मन्त्र को बोलके तीन दर्भ लेके दाहिनी बाजू के केशों
के समूह को हाथ से दबाके—
ओं विष्णोर्दँष्ट्रोऽसि॥
इस मन्त्र से छुरे की ओर देखके—
ओं शिवो नामा॑सि॒ स्वधि॑तिस्ते पि॒ता नर्म॑स्तेऽअस्तु॒ मा
र्मा हिँग्ंसीः॥
इस मन्त्र को बोलके छुरे को दाहिने हाथ में लेवे।
तत्पश्चात्—
ओं स्वधिते मैनँ हिँग्सीः ॥ १ ॥
ओं निवर्त्तयाम्यायु॑षे॒ऽन्नाद्या॑य प्र॒जन॑नाय रा॒यस्पोषा॑य
सु॒प्र॒जा॒स्त्वाय॑ सु॒वीर्या॑य ॥ २ ॥
इन दो मन्त्रों को बोलके उस छुरे और उन कुशाओं को
केशों के समीप ले-जाके—
ओं येनाव॑पत् सवि॒ता क्षुरेण॒ सोम॑स्य॒ राज्ञो॒ वरु॑णस्य
वि॒द्वान्। तेन॑ ब्रह्माणो वप॒तेदम॒स्य गोमा॑न॒श्ववा॒नय॒मस्तु
प्र॒जावा॑न्॥ —अथर्व० का० ६। सू० ६८॥
इस मन्त्र को बोलके कुशासहित उन केशों को काटे*
और वे काटे हुए केश और दर्भ शमीवृक्ष के पत्रसहित, अर्थात्
यहाँ शमीवृक्ष के पत्र भी प्रथम से रखने चाहिएँ, उन सबको
लड़के का पिता और लड़के की माँ एक शरावे में रक्खें और
कोई केश छेदन करते समय उड़ा हो, उसको गोबर से उठाके

  • केश-छेदन की रीति ऐसी है कि दर्भ और केश दोनों युक्ति से
    पकड़कर अर्थात् दोनों ओर से पकड़के बीच में से केशों को
    छुरे से काटे। यदि छुरे के बदले कैंची से काटे तो भी ठीक है।

८६ संस्कारविधिः
शरावा में अथवा उसके पास रक्खें। तत्पश्चात् इसी प्रकार—
ओं येन धाता बृहस्पतेरग्नेरिन्द्रस्य चायुषेऽवपत्।
तेन त आयुषे वपामि सुश्लोक्याय स्वस्तये॥
इस मन्त्र से दूसरी बार केश का समूह दूसरी ओर का
काटके उसी प्रकार शरावा में रक्खे। तत्पश्चात्—
ओं येन भूयश्च रात्र्यां ज्योक् च पश्याति सूर्यम्।
तेन त आयुषे वपामि सुश्लोक्याय स्वस्तये॥
इस मन्त्र से तीसरी बार उसी प्रकार केशसमूह को काटके
उपरि उक्त ३ [तीन] मन्त्रों—अर्थात् (ओं येनावपत्०), (ओं
येन धाता०), (ओं येन भूयश्च०), और—
ओं येन पूषा बृहस्पतेर्वायोरिन्द्रस्य चावपत्। तेन ते
वपामि ब्रह्मणा जीवात्वे जीवनाय दीर्घायुष्ट्वाय वर्चसे॥
इस एक, इन चार मन्त्रों को बोलके चौथी बार इसी प्रकार
केशों के समूह को काटे, अर्थात् प्रथम दक्षिण बाजू के केश
काटने का विधि पूर्ण हुए पश्चात् बायीं ओर के केश काटने
का विधि करे। तत्पश्चात् उसके पीछे आगे के केश काटे।
परन्तु चौथी बार काटने में ‘‘येन पूषा०’’ इस मन्त्र के
बदले—
ओं येन भूरिश्चरादिवं ज्योक् च पश्चाद्वि सूर्यम्। तेन ते
वपामि ब्रह्मणा जीवात्वे जीवनाय सुश्लोक्याय स्वस्तये॥
यह मन्त्र बोल चौथी बार केश छेदन करे। तत्पश्चात्—
ओं त्र्या॒यु॒षं ज॒मद॑ग्ने॒ क॒श्यप॑स्य॒ त्र्या॒यु॒षम्।
यद्दे॒वेषु॑ त्र्या॒यु॒षं तन्नो॑ऽअस्तु त्र्या॒यु॒षम्॥

चूडाकर्मप्रकरणम् ८७
इस एक मन्त्र को बोलके शिर के पीछे के केश एक
बार काटके इसी (ओम् त्र्यायुषं०) मन्त्र को बोलते जाना और
औंधे हाथ के पृष्ठ से बालक के शिर पर हाथ फेरके मन्त्र पूरा
हुए पश्चात् छुरा नाई के हाथ में देके—
ओं यत्क्षुरेण मर्चयता सुपेशसा वप्ता वपसि केशान्।
शुन्धि शिरो मास्यायुः प्रमोषीः॥
इस मन्त्र को बोलके नापित से पथरी पर छुरे की धार
तेज कराके नापित से बालक का पिता कहे कि—‘इस शीतोष्ण
जल से बालक का शिर अच्छे प्रकार कोमल हाथ से भिगो।
सावधानी और कोमल हाथ से क्षौर कर। कहीं छुरा न लगने
पावे’। इतना कहके कुण्ड से उत्तर दिशा में नापित को ले-
जा, उसके सम्मुख बालक को पूर्वाभिमुख बैठाके जितने केश
रखने हों उतने ही केश रक्खे, परन्तु पाँचों ओर थोड़ा-थोड़ा
केश रखावे अथवा किसी एक ओर रक्खे अथवा एक बार
सब कटवा देवे, पश्चात् दूसरी बार के केश रखने अच्छे होते हैं।
जब क्षौर हो चुके, तब कुण्ड के पास पड़ा वा धरा हुआ
देने के योग्य पदार्थ वा शरावा आदि कि जिनमें प्रथम अन्न
भरा था, नापित को देवे और मुण्डन किये हुए सब केश, दर्भ,
शमीपत्र और गोबर नाई को देवे। यथायोग्य उसको धन वा
वस्त्र भी देवे और नाई केश, दर्भ, शमीपत्र और गोबर को
जङ्गल में ले-जा, गढा खोदके उसमें सब डाल ऊपर से मिट्टी
से दबा देवे। अथवा गोशाला, नदी वा तालाब के किनारे पर
उसी प्रकार केशादि को गाड़ देवे, ऐसा नापित से कह दे। अथवा
किसी को साथ भेज देवे, वह उससे उक्त प्रकार करवा लेवे।
क्षौर हुए पश्चात् मक्खन अथवा दही की मलाई हाथ में
लगा, बालक के शिर पर लगाके स्नान करा, उत्तम वस्त्र पहनाके,

८८ संस्कारविधिः
बालक को पिता अपने पास ले शुभासन पर पूर्वाभिमुख बैठके,
पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे सामवेद का महावामदेव्यगान करके
बालक की माता स्त्रियों और बालक का पिता पुरुषों का यथा
योग्य सत्कार करके विदा करें और जाते समय सब लोग तथा
बालक के माता-पिता परमेश्वर का ध्यान करके—
“ओम् त्वं जीव शरदः शतं वर्धमानः”॥
इस मन्त्र को बोल बालक को आशीर्वाद देके अपने-
अपने घर को पधारें और बालक के माता-पिता प्रसन्न होकर
बालक को प्रसन्न रक्खें॥
॥ इति चूडाकर्मसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

⑨
अथ कर्णवेध-संस्कारविधिं
वक्ष्यामः
अत्र प्रमाणम्—
कर्णवेधो वर्षे तृतीये पञ्चमे वा॥
यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का वचन है॥
बालक के कर्ण वा नासिका के वेध का समय जन्म से
तीसरे वा पाँचवें वर्ष का उचित है।
जो दिन कर्ण वा नासिका के वेध का ठहराया हो, उसी
दिन बालक को प्रातःकाल शुद्ध जल से स्नान और वस्त्रालङ्कार
धारण कराके बालक की माता यज्ञशाला में लावे। पृष्ठ ९-
३७ तक लिखा हुआँ सब विधि करे और उस बालक के आगे
कुछ खाने का पदार्थ वा खिलौना धरके—
ओं भ॒द्रं कर्णे॑भिः शृणुयाम देवा भ॒द्रं प॑श्येमा॒क्षभि॑र्यजत्राः।
स्थि॒रैरङ्गैᳵस्तुष्टु॒वाग्ँ स॑स्त॒नूभि॒र्व्यशे॑महि दे॒वहि॑तं॒ यदायु॑ः॥
इस मन्त्र को पढ़के चरक-सुश्रुत वैद्यक ग्रन्थों के जाननेवाले
सद्वैद्य के हाथ से कर्ण वा नासिका वेध करावें कि जो नाड़ी
आदि को बचाके वेध कर सके। पूर्वोक्त मन्त्र से दक्षिण कान,
और—
ओं व॒क्ष्यन्ती॒वेदा ग॑नीगन्ति॒ कर्णं॑ प्रि॒यग्ँ सखा॑यं परि षस्वजा॒ना।
योषे॑व शि॒ङ्क्ते वित॒ताधि॒ धन्व॒ञ्ज्या इ॒यग्ँ सम॑ने पा॒रय॑न्ती॥
इस मन्त्र को पढ़के दूसरे वामकर्ण का वेध करे।
तत्पश्चात् वही वैद्य उन छिद्रों में शलाका रक्खे कि जिससे
छिद्र पूर न जावें और ऐसी ओषधि इसपर लगावे जिससे कान
पकें नहीं और शीघ्र अच्छे हो जावें॥
॥ इति कर्णवेधसंस्कारविधिः समाप्तः ॥

10
अथोपनयन* संस्कारविधिं
वक्ष्यामः
अत्र प्रमाणानि—
अष्टमे वर्षे ब्राह्मणमुपनयेत् ॥ १ ॥ गर्भाष्टमे वा ॥ २ ॥
एकादशे क्षत्रियम् ॥ ३ ॥ द्वादशे वैश्यम् ॥ ४ ॥
आषोडशाद् ब्राह्मणस्यानतीतः कालः ॥ ५ ॥
आद्वाविंशात् क्षत्रियस्य, आचतुर्विंशाद् वैश्यस्य,
अत ऊर्ध्वं पतितसावित्रीका भवन्ति ॥ ६ ॥
—यह आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण है॥
इसी प्रकार पारस्करादि गृह्यसूत्रों का भी प्रमाण है॥
अर्थः—जिस दिन जन्म हुआ हो, अथवा जिस दिन गर्भ
रहा हो, उससे आठवें वर्ष में ब्राह्मण के, जन्म वा गर्भ से ग्यारहवें
वर्ष में क्षत्रिय के और जन्म वा गर्भ से बारहवें वर्ष में वैश्य
के बालक का यज्ञोपवीत करें तथा ब्राह्मण के सोलह, क्षत्रिय
के बाईस और वैश्य के बालक का चौबीसवें वर्ष से पूर्व-
पूर्व यज्ञोपवीत होना चाहिए। यदि पूर्वोक्त काल में इनका
यज्ञोपवीत न हो, तो वे पतित माने जावें।
श्लोकः— ब्रह्मवर्चसकामस्य कार्यं विप्रस्य पञ्चमे।
राज्ञो बलार्थिनः षष्ठे वैश्यस्येहार्थिनोऽष्टमे॥
—यह मनुस्मृति का वचन है
जिसे शीघ्र विद्या, बल और व्यवहार करने की इच्छा हो

  • उप नाम समीप नयन अर्थात् प्राप्त करना वा होना।

उपनयनप्रकरणम् ९१
और बालक भी पढ़ने में समर्थ हुए हों, तो ब्राह्मण के लड़के
का जन्म वा गर्भ से पाँचवें, क्षत्रिय के लड़के का जन्म वा
गर्भ से छठे और वैश्य के लड़के का जन्म वा गर्भ से आठवें
वर्ष में यज्ञोपवीत करे।
परन्तु यह बात तब सम्भव है कि जब बालक की माता
और पिता का विवाह पूर्ण ब्रह्मचर्य के पश्चात् हुआ होवे। उन्हीं
के बालक ऐसे उत्तम, बुद्धि में श्रेष्ठ और पढ़ने में शीघ्र समर्थ
होते हैं। जब बालक का शरीर और बुद्धि वैसी हो कि अब
यह पढ़ने के योग्य हुआ, तभी उसका यज्ञोपवीत करा देवें।
यज्ञोपवीत का समय—उत्तरायण सूर्य, और—
वसन्ते ब्राह्मणमुपनयेत्। ग्रीष्मे राजन्यम्।
शरदि वैश्यम्। सर्वकालमेके ॥
—यह शतपथब्राह्मण का वचन है॥
अर्थ:—ब्राह्मण का वसन्त, क्षत्रिय का ग्रीष्म और वैश्य
का शरद् ऋतु में यज्ञोपवीत करें। अथवा सब ऋतुओं में उपनयन
हो सकता है और उसका प्रातःकाल ही समय है।
पयोव्रतो ब्राह्मणो यवागूव्रतो राजन्य आमिक्षाव्रतो वैश्यः ॥
—यह शतपथब्राह्मण का वचन है॥
जिस दिन बालक का यज्ञोपवीत करना हो, उससे तीन
दिन अथवा एक दिन पूर्व तीन वा एक व्रत बालक को कराना
चाहिए। उन व्रतों में ब्राह्मण का लड़का एक बार वा अनेक
बार दुग्धपान, क्षत्रिय का लड़का 'यवागू' अर्थात् यव को मोटा
दलके गुड़ के साथ पतली जैसीकि कढ़ी होती है, वैसी बनाकर
पिलावें और 'आमिक्षा' अर्थात् जिसको श्रीखण्ड वा सिखण्ड
कहते हैं, वैसी जो दही चौगुना, दूध एक गुना तथा यथायोग्य
खाँड, केसर डालके कपड़े में छानकर बनाया जाता है, उसको
वैश्य का लड़का पीके व्रत करे, अर्थात् जब-जब लड़कों को