संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)
Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा
पृष्ठ 84, कुल 318 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथान्नप्राशनविधिं वक्ष्यामः
'अन्नप्राशन' संस्कार तभी करे जब बालक की शक्ति अन्न
पचाने योग्य होवे। इसमें आश्वलायनगृह्यसूत्र का प्रमाण—
षष्ठे मास्यन्नप्राशनम् ॥ १ ॥
घृतौदनं तेजस्कामः ॥ २ ॥
दधिमधुघृतमिश्रितमन्नं प्राशयेत् ॥ ३ ॥
इसी प्रकार पारस्करगृह्यसूत्रादि में भी है॥
छठे महीने बालक को अन्नप्राशन करावे। जिसको तेजस्वी
बालक करना हो, वह घृतयुक्त भात अथवा दही, सहत और
घृत तीनों भात के साथ मिलाके निम्नलिखित विधि से अन्नप्राशन
करावे, अर्थात् पूर्वोक्त पृष्ठ ९-२१ में कहे हुए सम्पूर्ण विधि
को करके जिस दिन बालक का जन्म हुआ हो, उसी दिन
यह संस्कार करे और निम्न लिखे प्रमाणे भात सिद्ध करे—
ओम् प्राणाय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ १ ॥
ओम् अपानाय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ २ ॥
ओम् चक्षुषे त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ३ ॥
ओम् श्रोत्राय त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ४ ॥
ओम् अग्नये स्विष्टकृते त्वा जुष्टं प्रोक्षामि ॥ ५ ॥
इन पाँच मन्त्रों का यही अभिप्राय है कि चावलों को धो,
शुद्ध करके अच्छे प्रकार बनाना और पकते हुए भात में यथायोग्य
घृत भी डाल देना।
जब चावल अच्छे प्रकार पक जावें, तब उतार थोड़े ठण्डे
हुए पश्चात् होमस्थाली में—