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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 79

नामकरणप्रकरणम् ७५
जो यह ‘‘असौ’’ पद है इसके स्थान में बालक का ठहराया
हुआ नाम अर्थात् जो पुत्र हो तो नीचे लिखे प्रमाणे दो अक्षर
का वा चार अक्षर का, घोषसंज्ञक और अन्तःस्थ वर्ण अर्थात्
पाँचों वर्गों के आरम्भ के दो-दो अक्षर छोड़के तीसरा, चौथा,
पाँचवाँ और य र ल व—ये चार वर्ण नाम में अवश्य आवें*।
जैसे—देव अथवा जयदेव। ब्राह्मण हो तो देवशर्मा, क्षत्रिय
हो तो देववर्मा, वैश्य हो तो देवगुप्त और शूद्र हो तो देवदास
इत्यादि और जो स्त्री हो तो एक, तीन वा पाँच अक्षर का नाम
रक्खे—श्री, ही, यशोदा, सुखदा, सौभाग्यप्रदा इत्यादि। नामों
को प्रसिद्ध बोलके, पुनः ‘‘असौ’’ पद के स्थान में बालक

  • ग, घ, ङ, ज, झ, ञ, ड, ढ, ण, द, ध, न, ब, भ, म—ये स्पर्श
    और य, र, ल, व—ये चार अन्तःस्थ और ह एक ऊष्मा, इतने
    अक्षर नाम में होने चाहिएँ और स्वरों में से कोई भी स्वर हो।
    जैसे—भद्रः, भद्रसेनः, देवदत्तः, भवः, भवनाथः, नागदेवः, रुद्रदत्तः,
    हरिदेवः इत्यादि। पुरुषों का समाक्षर नाम रखना चाहिए तथा स्त्रियों
    का विषमाक्षर नाम रक्खें। अन्त्य में दीर्घ स्वर और तद्धितान्त
    भी होवे—जैसे—श्रीः ह्रीः, यशोदा, सुखदा, गान्धारी, सौभाग्यवती,
    कल्याणक्रोडा इत्यादि, परन्तु स्त्रियों के इस प्रकार के नाम कभी
    न रक्खें, उसमें प्रमाण—
    नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम्।
    न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम्॥ —मनुस्मृतौ।
    (ऋक्ष) रोहिणी, रेवती इत्यादि, (वृक्ष) चम्पा, तुलसी
    इत्यादि, (नदी) गङ्गा, यमुना, सरस्वती इत्यादि, (अन्त्य) चाण्डाली
    इत्यादि, (पर्वत) विन्ध्याचला, हिमालया इत्यादि, (पक्षी) कोकिला,
    हंसा इत्यादि, (अहि) सर्पिणी, नागी इत्यादि, (प्रेष्य) दासी,
    किङ्करी इत्यादि, (भयंकर) भीमा, भयंकरी, चण्डिका इत्यादि नाम
    निषिद्ध हैं।