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संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

संस्कार विधि (महर्षि दयानन्द सरस्वती - षोडश वैदिक संस्कार एवं गुरुकुल विधान सटीक)

Sanskar Vidhi of Maharshi Dayananda Saraswati

महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती द्वारा

DevanagariHindipublished318 पृष्ठ

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पृष्ठ 86

८२ संस्कारविधिः
पृष्ठ ३३ में लिखे प्रमाणे व्याहृति आहुति चार और पृष्ठ ३३-
३४ में लिखे प्रमाणे (ओम् त्वन्नो०) इत्यादि से आठ आज्याहुति
मिलके बारह आहुति देवे।
उसके पीछे आहुति से बचे हुए भात में दही, मधु और
उसमें घी यथायोग्य किञ्चित्-किञ्चित् मिलाके और सुगन्धियुक्त
और भी चावल बनाये हुए थोड़े-से मिलाके बालक के रुचि
प्रमाणे—
ओम् अन्न॑पतेऽन्न॑स्य नो देह्यनमी॒वस्य॑ शु॒ष्मिण॑ः।
प्रप्र॑ दा॒तारं॑ तारिष॒ऽऊर्जं॑ नो धेहि द्विपदे चतु॑ष्पदे॥
इस मन्त्र को पढ़के थोड़ा-थोड़ा पूर्वोक्त भात बालक के
मुख में देवे। यथारुचि खिला, बालक का मुख धो और अपने
हाथ धोके पृष्ठ ३६-३७ में लिखे प्रमाणे महावामदेव्यगान करके,
जो बालक के माता-पिता और अन्य वृद्ध स्त्री-पुरुष आये हों
वे परमात्मा की प्रार्थना करके—
“त्वमन्नपतिरन्नादो वर्धमानो भूयाः॥”
इस वाक्य से बालक को आशीर्वाद देके, पश्चात् संस्कार
में आये हुए पुरुषों का सत्कार बालक का पिता और स्त्रियों
का सत्कार बालक की माता करके सबको प्रसन्नतापूर्वक विदा
करें॥
॥ इत्यन्नप्राशनसंस्कारविधिः समाप्तः ॥